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समस्याओं की उपस्थिति के संकेत समकालीन हिन्दी लघुकथा के माध्यम से प्राप्त होते हैं।

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, दिसंबर 12, 2012 | बुधवार, दिसंबर 12, 2012

व्यंग्यकार जितेन्द्र ‘जीतू’ को महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी विषय में उनके शोध प्रबन्ध- 
समकालीन हिन्दी लघुकथा का सौन्दर्यशास्त्र एवं समाजशास्त्रीय सौन्दर्यबोध 
पर विद्या वाचस्पति (पीएच.डी) की उपाधि प्रदान की गयी है। 

जितेन्द्र ‘जीतू’ के इस शोध प्रबन्ध में बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, विष्णु प्रभाकर, राजेन्द्र यादव, भोलानाथ त्यागी, डा.उषा त्यागी, डा. रामकुमार घोटड़, डा.कमल चोपड़ा, डा. अशोक भाटिया, सतीशराज पुष्करणा, बलराम, रमेश बतरा, चित्रा मुद्गल, डा. राजेन्द्र साहिल, रूप देवगुण, डा. शकुन्तला किरण, महेश दर्पण, अश्विनी कुमार आलोक आदि...आदि अनेक लघुकथाकारों की सन् 1971 के बाद की लघुकथाओं की सौन्दर्यशास्त्रीय एवं समाजशास्त्रीय समीक्षा की गयी है।जितेन्द्र ‘जीतू’ के अब तक चार व्यंग्य संग्रह तथा बच्चों पर चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे अपने ब्लॉग - चौथा ईडियट - पर भी सक्रिय हैं।

प्रस्तुत है जितेन्द्र ‘जीतू’ के शोध प्रबन्ध के अंशः

लघुकथा साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। इसकी प्रसिद्धि का आलम यह है कि अपने लघु आकार एवं बौद्धिक डाइट से भरपूर होने के कारण यह हिन्दी के कमोबेश सभी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में खूब प्रकाशित होती है। लेकिन इसे विडम्बना ही कहेंगे कि लगभग चार दशकों पूर्व हिन्दी साहित्य में एक विधा के रूप में स्वीकृत होने के पश्चात भी लघुकथा पर शोध कार्य लगभग न के बराबर हुआ है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के महात्मा ज्योतिबा फुलेरूहेलखण्ड विश्वविद्यालय द्वारा इस प्रकार के सर्वथा मौलिक और भिन्न शीर्षक को शोध हेतु स्वीकृत करना तत्पश्चात उस शोध पर उपाधि प्रदान करना स्वयं ही महत्वपूर्ण सिद्ध हो जाता है।

गत् अनेक वर्षों से अनेक शोधार्थियों ने लघुकथा पर अपनी पैनी दृष्टि डाली है। फलस्वरूप अनेक नये शोध प्रकाश में आए हैं। लघुकथा जब अस्सी के दशक में थी, तब खूब पढी जातीं थीं। पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा प्रतियोगिताएं छायी रहतीं थीं। उस समय लघुकथाकारों का लघुकथा की संख्या पर ज्यादा जोर रहता था। किसने कितनी ज्यादा लघुकथा लिखीं और उसमें से कितनी छपीं। प्रतिदिन एक लघुकथा वाला फार्मूला भी कतिपय लेखकों ने अपना रखा था। अन्ततः, उसे एक विधा के रूप में मान्यता दिलाने का प्रश्न था और इस प्रश्न का उत्तर सभी लघुकथा लेखक अपने-अपने ढंग से खोज रहे थे। ऐसे में लघुकथा के समक्ष खड़े प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाने की आवश्यकता भी महसूस हुई। उन्हीं में से एक प्रश्न लघुकथा के शिल्प का तथा एक संवेदना का था। एक अन्य प्रश्न लघुकथा के तत्वों का था। इसी तरह के कुछ अन्य प्रश्न भी थे। इन प्रश्नों पर लगातार लिखा तो जा रहा था किन्तु उत्तर के सम्बन्ध में उतना नहीं लिखा जा रहा था जितना प्रश्नों को ही दोहराया जा रहा था। 
लघुकथा पर किये गये कार्यों को ध्यान से देखें, तो पायेंगे कि अधिकांश कार्य लघुकथा के उद्भव, विकास तथा परम्परा पर केन्द्रित हुआ है। शिल्प पर भी थोड़ा कार्य हुआ है। किन्तु लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष पर कोई कार्य नही है। प्रस्तुत कार्य लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष का भी सिंहावलोकन करता है। लघुकथा का सौन्दर्य भाव उसके शास्त्र में निहित है। लघुकथाओं में जीवन की बहुआयामी समस्याओं पर हुआ कार्य 1995 से पूर्व की काल अवधि का है। वर्तमान कार्य 1971 से अब तक की काल अवधि का है। निःसन्देह प्रस्तुत कार्य में विहंगम दृष्टि का उपयोग किया गया है और यह समस्याओं की गहराई से पड़ताल - सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, धार्मिक आदि शीर्षकों के अन्तर्गत करता है।
लघुकथा के उद्भव और विकास पर तो लगभग सभी ने ही लेखनी चलाई है लेकिन लघुकथा के सौन्दर्यशास्त्र की ओर शोधार्थियों का ध्यान नहीं गया है। इसकी वजह सम्भवतः यह हो सकती है कि अधिकांश कार्य गत् शताब्दी का है जिसमें लघुकथा के सौन्दर्य को पहचानने और उसके प्रतिमानो को गढ़ने का कार्य अभी शुरू भी नही हुआ था। यह वह समय था जब लघुकथा को विधा के तौर पर स्वीकृत कराने का कार्य भी चल रहा था। 

लघुकथा के सौन्दर्यशास्त्र को समकालीन हिन्दी लघुकथा में तलाशने का कार्य प्रस्तुत शोध के माध्यम से किया गया। यह अध्ययन सौन्दर्यशास्त्र तथा काव्यशास्त्र के कतिपय तत्वों के माध्यम से किया गया और इसमें बिम्बों, प्रतीकों, रस और अलंकार आदि का समाहित किया गया।व्यक्ति और समाज की समकालीन समस्याओं की उपस्थिति के संकेत समकालीन हिन्दी लघुकथा के माध्यम से प्राप्त होते हैं। अतः समकालीन हिन्दी लघुकथा का समाजशास्त्रीय सौन्दर्यबोध उन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, धार्मिक आदि समस्याओं की अनदेखी नहीं कर सकता, जिनके चिह्न समकालीन हिन्दी लघुकथा में प्राप्त होते हैं।

जितेन्द्र ‘जीतू’

(अभी तक जितेन्द्र  भाई के चार व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं-1 आज़ादी से पहले, आज़ादी के बाद,2 शहीद को पत्र,3 पति से कैसे लड़ें,4 काँटा लगा,एक बाल संग्रह - झूठ बोले, कौआ काटे- के साथ बच्चों पर 3 अन्य किताबें भी आ चुकी हैं। )

ईमेल संपर्क-jitendra.jeetu1@gmail.com




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1 टिप्पणी:

  1. यह सामग्री बहुत कम है और किसी नतीजे तक नहीं पहुँचने देती। उम्मीद है कि 'अपनी माटी' पर जीतेन्द्र 'जीतू' के शोध-प्रबन्ध के कुछ अधिक अंशों को प्रकाशित करने की व्यवस्था करेंगे। जितेन्द्र भाई को इस सत्कार्य के लिए बधाई, शुभकामनाएँ।

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