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''हमें चहुंतरफा संघर्षरत आज की युवा पीढ़ी की बेचैनी और छटपटाहट को समझते हुए उनसे संवाद बनाना होगा।''-आनन्द प्रधान

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, दिसंबर 20, 2012 | गुरुवार, दिसंबर 20, 2012


पहला पीयूष किशन युवा पुरस्कार-2012


भारत के अनेकानेक पिछड़े इलाकों में एक गाजीपुर जैसे पिछड़े जिले से आने वाला एक विद्यार्थी अपनी पढाई के साथ-साथ वाराणसी और दिल्ली जैसे बड़े शहरों की झुग्गी-झौपड़ियों और विभिन्न निर्माण कार्यों मे लगे गरीब मजदूरों के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और विधवाओं की आत्मनिर्भरता के लिए जिस जज्बे से लगा हुआ है, वह बहुत ही सराहनीय है और आज उसी रामाशंकर कुशवाहा को पहले पीयूष किशन युवा पुरस्कार-2012 से सम्मानित किया जाना काबिलेतारिफ है। यह बात 17 दिसम्बर 2012 को जेएनयू, नयी दिल्ली के समाज विज्ञान संस्थान-1 में आयोजित पहले पीयूष किशन युवा पुरस्कार-2012 के सम्मान समारोह में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कही। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि ऐसा मैं अधिकारपूर्वक इसलिए भी कह सकता हूँ कि मैं खुद उन बच्चों से जुड़ा रहा हूँ। मैंने रामाशंकर को इन बच्चों के लिए जहाँ कहीं से भी मदद मिल सकती है और बिना किसी अनुकम्पा के मिल सकती है, उन्हें उसके लिए जी-जान लगाते और जहाँ जरूरत होती है वहाँ जाते देखा है। जिन बच्चों के साथ रामाशंकर काम करते है और उनके 26 जनवरी या 15 अगस्त को होने वाले सालाना समारोह में हमलोग आते-जाते रहे है।

पहला पीयूष किशन युवा पुरस्कार-2012 युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामाशंकर कुशवाहा को उनके द्वारा किये गये उल्लेखनीय सामाजिक कार्यो और भविष्य की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए संवेद फाउण्डेशन के न्यासी अखलाक आहन द्वारा प्रदान किया गया। पुरस्कार के रूप में उन्हें प्रतीक चिह्न, प्रशस्ति पत्र और ग्यारह हजार रूपये की सम्मान राशि दी गयी। कार्यक्रम का संचालन तृप्ति पाण्डेय ने किया और सम्मान समारोह की शुरूआत पीयूष किशन के दोस्तों द्वारा निर्मित डॉक्यूमैण्ट्री के प्रदर्शन से हुई। समारोह में पीयूष किशन की स्मृति में तृप्ति पाण्डेय और शबीह राहत द्वारा सम्पादित पुस्तक अलविदा नही का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय और कथाकार सुरेन्द्र कुमार ने किया।

मीडिया विशेषज्ञ आनन्द प्रधान ने अपने विशेष व्याख्यान हमारे समय में युवा में कहा कि आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौति बदलते हुए भारत में अपनी भूमिका की तलाश कर रहे हजारों, लाखों, करोड़ों नौजवानों को अपने समय और समाज के प्रति जागरूक बनाना है, उनकी ऊर्जा को एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए तैयार करना है। इसके लिए हमें चहुंतरफा संघर्षरत आज की युवा पीढी की बेचैनी और छटपटाहट को समझते हुए उनसे संवाद बनाना होगा। नयी अर्थव्यवस्था की नयी आकांक्षाएं और चरम उपभोक्तावादी समय में परिवार के अन्दर के सामन्ती ढाँचे को तोड़ते हुए पिता-पुत्र, माँ-बेटे और साथियों के बीच के दोस्ताना रिश्ते को नये सिरे से परिभाषित करना हमारे समय की एक बड़ी चुनौति है और किशन कालजयी ने इसका एक अनुकरणीय मॉडल हमारे सामने रखा है।

पीयूष किशन स्मृति युवा पुरस्कार छोटे कस्बे से आए एक होनहार नौजवान पीयूष किशन की याद को जीवित रखने का, उसे अपने साथ रखने के अलावा इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं की सक्रिय भागीदारी को पुरस्कृत भी करना है। पीयूष किशन की स्मृति को सर्जना के माध्यम के रूप में बदलने की ये कोशिश समाज के हजारों-हजार नौजवानों के सपनों को आगे बढाने का उपक्रम है। किसी की याद को जीवित रखने का, उसे अपने साथ रखने का इससे बेहतर कोई और तरीका नहीं हो सकता है।

युवा आलोचक गंगासहाय मीणा ने कहा कि पीयूष किशन और पुरस्कृत युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामाशंकर कुशवाहा में दूसरों के चेहरों पर, विशेषकर वंचितों के चेहरों पर खुशी देखने की विशिष्ट समानता मिलती है और दोनों ही दो पिछड़े इलाकों से सम्बद्ध रहे है। इस घोर अवसरवादी समय में, ऐसे युवाओं का मिलना बहुत कठिन है जो अपने कैरियर और वैयक्तिक आकांक्षाओं को त्यागकर दूसरों की खुशी के लिए कार्यरत रहते है, रामाशंकर ने अपने सपनों से समझौता करते हुए, न केवल उन बच्चों और विधवाओं के लिए काम किया बल्कि अपने समानधर्मा युवाओं की एक टीम तैयार करने में सफलता पाई। पुरस्कृत युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामाशंकर कुशवाहा दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके आसपास हो रहे निर्माण कार्यों से जुड़े विस्थापितों का जीवन जीते प्रवासी गरीब मजदूरों के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य और उन क्षेत्रों के आसपास की विधवाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली योजनाओं से जुड़े रहे है।

सम्पर्क सोसाइटी के माध्यम से उन्होंने न केवल उन बच्चों का प्रवेश निकटवर्ती विद्यालयों में उनका प्रवेश भी कराया बल्कि लगातार उनकी मॉनिटरिंग भी की ताकि उनकी शिक्षा-दीक्षा का क्रम बना रहे। तमाम तरह के विमर्शों के इस दौर में में वंचितों के लिए उन्होंने जमीनी स्तर जो काम किया है वह युवाओं के लिए प्रेरणास्पद है। सामाजिक कार्यों के साथ व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने तमाम तरह की रूढियों को तोड़ते हुए बिना किसी दहेज के अपनी पसन्द से विवाह किया। ऐसे में उन्हें यह पुरस्कार दिया जाना पीयूष किशन को सच्ची श्रृद्धांजलि है।

युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि ने कहा कि रामाशंकर उन तमाम लोगों से सर्वथा अलग है जो सामाजिक कार्यों को एक उपकार की तरह सम्पन्न करते है और बार-बार इसका अहसास भी कराते है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास की बहुत सी जगहों के बच्चों के मन में पढाई का सपना जगाया। आज रघुवीर सहाय की कविता वाले सैकड़ों हरचनवा इस सपने को जी रहे है। उन्होंने उन संस्थाओं और उन लोगों को भी सम्पर्क सोसाइटी से जोड़ा जो इन बच्चों की पढाई का खर्च उठा सके और एक युवा अपनी पढाई-लिखाई के साथ यह कर रहा है यह अपने आप में बड़ी बात है।

निर्णायक मण्डल के सदस्य पुखराज जाँगिड़ ने प्रशस्ति वाचन करते हुए कहा कि पीयूष किशन स्वयं एक साहसी, जिन्दादिल और सामर्थ्यवान युवा थे। उनके जीवन का अधिकांश दूसरों की उदासी दूर करने में बीता। यह अद्भुत संयोग है कि श्री रामाशंकर कुशवाहा ने भी अज्ञान के अँधेरे में डूबे घरों में ज्ञान की रौशनी पहुँचाने के काम में खुद को लगा दिया है। अपने छात्र जीवन में अपनी पढ़ाई के साथ साथ गरीब और बेसहारा बच्चों की शिक्षा दीक्षा की श्री रामाशंकर कुशवाहा ने जो परवाह की है वह प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। आदर्शविहिन होते भारतीय समाज की विषमतापूर्ण स्थितियों में उनका यह कार्य युवाओं के लिए अत्यन्त प्रेरणास्पद है।

पुरस्कृत सामाजिक कार्यकर्ता रामाशंकर कुशवाहा ने पीयूष किशन की स्मृति को नमन करते हुए कहा कि जिस काम के लिए मुझे सम्मान दिया गया है, इसकी शुरूआत हर शाम दोस्तों के साथ बिताए जाने वाले उस वक्त से हुई जिसे हम व्यायाम या गप्पबाजी में खर्च करते है, हमने ये समय उन बच्चों को दिया और बदले में उनके चेहरों पर झलकती खुशी ने हमें जो दिया है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। किसी के काम आना मुझे बहुत अच्छा लगता है और इस स्वान्त सुखाय काम से मुझे खुशी मिलती है। जब भी मैं इन बच्चों से दूर रहता हूँ अपने भीतर एक बेचैनी पाता हूँ कि पता नहीं बच्चे कैसे है? मुझे इनके साथ काम करके खुशी होती है। अगर इस काम में ऐसा कुछ है जिसे निर्णायक मण्डल ने सम्मान योग्य समझा तो इसका हकदार मैं अकेला नहीं बल्कि मेरी पूरी टीम है जिनके सहयोग से यह सम्भव हुआ। 

यह हम सबका साझा प्रयास है। मैं आभारी हूँ डीयू, जेएनयू और जामिया के विभिन्न कॉलेजों/संस्थानों के एन.एस.एस के छात्रों और सी.आई.ई के बी.एड. छात्रों का जिन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य 120 घण्टे हमें दिए और उसी का परिणाम है कि आज हमलोग दिल्ली में विभिन्न जगहों पर स्थित दर्जन भर सेण्टरों के 700 से अधिक बच्चों के साथ काम कर पा रहे है। इस काम में सहयोग के लिए हम स्थानीय नागरिकों, छात्रों, शोधार्थियों, अध्यापकों और तमाम सहयोगी मित्रों के साथ डीयू के मालियों, सफाई कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों के शुक्रगुजार है।

संवेद के न्यासी अखलाक अहमद ने कहा कि अपने काम के माध्यम से रामाशंकर ने युवाओं के लिए सामाजिक भागीदारी और जागरूकता का जो पथ निर्मित किया वह अनुकरणीय है। यह पुरस्कार एक तरह से पीयूष किशन का पुनर्जन्म है और उम्मीद करता हूँ कि हजारों रामाशंकर इसका अनुकरण करेंगे।

संवेद और सबलोग सम्पादक किशन कालजयी ने कहा कि पीयूष बेहतर विद्यार्थी, खिलाड़ी और कलाकार तो था ही, उसकी जिन्दादिली का भी कोई जवाब न था। युवता में पीयूष जो था और अब जो पीयूष बन रहा है वह हमारे घर से ज्यादा समाज का है, उनके सपनों को हकीकत में बदलने का है। मैं रामाशंकर कुशवाहा को एक लेखक के रूप में जानता हूँ और यह मानकर चलता हूँ उन्होंने जिस राह पर चलने का फैसला किया है, हम सबके लिए यह वक्त उस पर अमल करने का है। इस पुरस्कार के माध्यम से संवेद फाउणडेशन उनकी दृष्टि और जिजीविषा का सम्मान करता है और कामना करता है कि वे भविष्य में इसी पथ पर अग्रसर रहें और सफलता के शीर्ष को हासिल करें।

प्रखर समाजशास्त्री मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में बताया कि आज पीयूष किशन के जन्मदिन के साथ संवेद फाउण्डेशन के दर्शन का भी जन्मदिन है। पीयूष किशन का यह वाक्य कि यह मत सोचो कि जिन्दगी में कितने पल है, यह सोचो कि हर पल में कितनी जिन्दगी है संवेद फाउण्डेशन का, उसके क्रियाकलापों का और उससे जुड़े लोगों का दर्शन है। यह पुरस्कार उस दर्शन के लिए, उसकी सम्भावना के लिए है। पीयूष के निधन के बाद हम सबने यह महसुस किया कि उनकी स्मृति को, उनके दर्शन को जिन्दा रखा जाए और यह पुरस्कार उसी का परिणाम है। हर शख्स में अपने और अपने परिवार के लिए चिन्तित रहने की एक प्राकृतिक प्रवृति होती है लेकिन पीयूष समाज के लिए चिन्तित रहता था और यही चिन्ता रामाशंकर की भी है जिन्हें यह सम्मान मिला है। अभाव से भाव की ओर का संघर्ष हमें ऊर्जा प्रदान करता है और इसके दरम्यान का सृजन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है और यह पुरस्कार उसी सृजन को समर्पित है।

कथाकार सुरेन्द्र कुमार ने कहा कि यह अवसर पीयूष जैसे जिन्दादिल इन्सान को याद करने और रामाशंकर जैसे कर्मठ युवा कार्यकर्ताओं के सम्मान का है। इस अवसर पर पीयूष किशन के दोस्तों ने भी अपने संस्मरण साझा किए। डॉ. सन्तोष कुमार शुक्ल ने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि यह क्षण हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है कि पीयूष की स्मृति के माध्यम से हमारे समय के बेहतर युवा कलाकार, खिलाड़ी, लेखक या सामाजिक कार्यकर्ता को पुरस्कृत करने की शुरूआत रामाशंकर कुशवाहा के सामाजिक कार्यों के सम्मान से हुई है। अपने छोटे से जीवन को पीयूष किशन ने पूर्णता में जीया। उद्यम, साहस, बुद्धि और धैर्य में आगे बढते युवक का असमय चला जाना बेहद कष्टकर होता है। अपने छोटे से जीवन में अगर हम कुछ महत्त्वपूर्ण करेंगे तो याद किए जाएंगे अन्यथा भूला दिए जाएंगे। इस पुरस्कार का उद्देश्य ऐसे युवाओं के काम को आगे लाना है जो अपने समय और समाज के प्रति बेहद संवेदनशील और जागरूक और अपने काम के माध्यम से उसे बेहतर दिशा देने के लिए प्रयत्नरत है।

(रपटकार:सुरेन्द्र सिंह यादव,मोबाइल-09015432120,ईमेल-ysmalgudydays@gmail.com)
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