Latest Article :
Home » , , , , » राजस्थानी लोकगीतों में स्त्री :'दादासा म्हैं तो थांकी गाया की बछिया,बांधे जठे बंध जाऊं'

राजस्थानी लोकगीतों में स्त्री :'दादासा म्हैं तो थांकी गाया की बछिया,बांधे जठे बंध जाऊं'

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, दिसंबर 18, 2012 | मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

                   Copyright@ यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।


“ राजस्थानी लोकगीतों में नारी की स्थिति ”

मानव-समाज में नारी के हाल-चाल की बात तो मैं बाद में कहूंगी, उससे पहले यह बताना ज़रूरी है कि देवताओं के समाज, जिसे आज़ तक किसी ने भी देखा तक नहीं- में भी नारी की स्थिति पुरूष की दासी से अधिक बेहतर नहीं कही जा सकती । इसका प्रमाण है, हमारे शास्त्रों के अनेक उदाहरण, और उनके आधार पर छपे हुए चित्र और कलेण्डर, जिनमें भगवान विष्णु समुद्र के बीच शेषनाग की कोमल शय्या पर आराम से सोए हुए हैं, और उनकी पत्नी लक्ष्मीजी उनके चरण दबा रही हैं । यही काम सीता को भी करते रहना पड़ता था । हां, राधा के मामले में ज़रूर उल्टा विवरण भागवत व अन्य कृष्ण भक्ति ग्रंथों में मिलता है, जहां राधा के चरण कृष्ण द्वारा दबाए जाने का कई बार उल्लेख है । इसका कारण एक तो यह है कि राधा कृष्ण की पत्नी नहीं, प्रेमिका थी ओर प्रसंग वहां रास-लीला का है, गृहस्थी का नहीं । 

साथ ही, इस प्रसंग में एक बात यह भी बताना ज़रूरी लगती है सीता का रावण द्वारा हरण कर लिए जाने से रावण-वध के उपरांत अपने चरित्र की पवित्रता सिद्ध करने के लिए सीता को ही अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी, राम को नहीं । राम ने क्यों नहीं अग्नि-परीक्षा दी, जबकि वे भी सीता के बिना बरसों तक अकेले रहे थे? इस तरह, नारी के साथ अन्याय तो ठेठ ऊपर से अनादिकाल से चला आ रहा है । 

वैदिक काल में तो फिर भी नारी का रूतबा पुरूष के बराबर बना रहा, लेकिन मध्यकालीन भारत में तो नारी की हालत पुरूष के अधीन दयनीय ही रही । पुरूष को प्रातःकाल उठाने से लेकर उसे रात को सुलाने तक का प्रत्येक काम नारी के जिम्मे था । और तो और, मीराबाई के भजन इस बात के साक्षी हैं कि वह भी परमपुरूष श्रीकृष्ण की चाकर बनकर रहने की हार्दिक इच्छुक है । “श्याम महाने चाकर राखो जी” तथा, “म्हूं थारां चरणां की दासी” - हमेशा से पुरूष की गुलामी में नारी को सुख मिलने का मिथ्या प्रवाद, नारी के दिमाग में फिट कर दिया गया, जो आज़ तक नहीं निकला है । 

अब, राजस्थान में गाए जाने वाले लोकगीतों में इसके ज्यादा सटीक और विश्वसनीय उदाहरण आपको कदम-कदम पर मिल जाएंगे-

वानें आई छै सुखभर नींद । हर बालों बियाणा रिळयावणा
वांकी राण्यां जो जाय जगाईया
जागो जागो बाईसा रा बीर । हर बोलो बियाणा रळियावणा
पौढ्या जागो सासूजी रा लाल । हर बोलो ..........।

घर का सारा काम-काज बस नारी करती रहे, घरधणी के बच्चों को जन्म देती रहे, उनका मल-मूत्र साफ करती हुई खटती रहे, नाम पिता का होता रहे- यही नारी की हालत राजस्थान के लोकगीतों में व्याप्त है । सभी यह कहते हैं कि उस भाई के बेटा/बेटी हुआ है, कोई यह नहीं कहता, आज़ भी कि उस भाभी के बेटा-बेटी हुआ है ।
जैसा कि सब जानते हैं, आर्थिक रूप से नारी का पराधीन होना सबसे बड़ा कारण है, नारी की बदतर हालात का । वह अपने आवश्यक सोहाग के चिह्न, चूड़ी-कंगन-क्लिप, पायजेब-बिछुआ आदि के लिए भी पति या भाई से याचना करती है, लगभग दीनतापूर्वक मांगने के स्वर में । देखिए-

बीरासा म्हारा माथा रे परवाणं रखड़ी घड़ाजो सा
बीरासा म्हारा हिवड़ा परवाणे तमण्यो घड़ाजो सा
बीरासा म्हाराओ सुसरासा री पाळ्यां मायरो पैराजो सा
बीरासा म्हारा केसरिया रे जोड़े ऊभी प्यारी लागूं सा ।

यही नहीं, राजस्थानी बहू के शादी के समय खड़ी हालत में घर यानी ससुराल में घुसने और मरने के बाद आड़ी होकर घर से बाहर निकलने वाली कहावत तो यहां जन-जन की जुबान पर आपको मिल जाएगी । ऐसी घुटनभरी जिंदगी में यदि वह कहीं यात्रा में बड़ों के साथ जाने की इच्छा जताती है तो उसे यह कह कर मना कर दिया जाता है कि सास-ससुर ही तीरथ हैं, इनकी सेवा करो । लोकगीत का यह अंश देखिए-

एक अरज म्हारी सुणोजी नवलबना
म्हाने करादो च्यारूं धाम
चारूं ही धाम बनी घर में समझलो, कुटम कबीलो परवार
सुसरासा ने बदरीनारायण समझलो, सासूजी गंगा को जी नीर
जेठ-सा जगन्नाथ समझलो, भाभीसा भागीरथि को नीर
देवरसा ने लक्ष्मीनारायण समझलो, दौराणी लछमी को अवतार
पति ने तो थैं परमेसर समझलो, थैं छो जी सतवन्ती नार
चारूं ही धाम बनी घर में समझलो, कुटम कबीलो परिवार ।

इस तरह, राजस्थान ही नहीं, देश के अधिकतर अंचलों में यही स्थिति नारी बारे में है । 

कन्या भ्रूण हत्या के पीछे मूल कारण राजस्थान की वह अहंकारी सामन्ती मानसिकता रही है, जिसमें बेटीवाले को, शादी के समय से लेकर आजीवन बेटेवालों के सामने करबद्ध झुके रहना पड़ता है। यहां पर “अरे, बेटी का बाप” किसी भी आदमी के लिए सबसे दयनीय गाली है । गीतों में यही बात है कि बेटा जन्म लेने पर ढोल-नंगारे बजाए जाते हैं, बेटी के जन्म पर डीमकी एक छोटा सा मामूली आवाज़ करने वाला बाजा । यही नहीं, सामान्य घरों तक में, शायद आज भी, बेटे के जन्म पर ढोल या थाली बजाने का रिवाज है, जबकि बेटी के जन्म पर छाजळा यानी सूंपड़ा बजाने का रिवाज है, जो कि अपमानसूचक है । यहां के हमारे लोकगीतों में इसका प्रमाण देखिए-

घर घर पन्ना मारू बाजे छै ढोल
कोई हम घर बाजै छै डीमकी जी म्हांका राज ।
मरूं य क जीऊं म्हारी मांय
लखपतिया मौसा बोलिया जी म्हांका राज
सूरज आगे करूंली पुकार
बेमाता आगे बीणती जी म्हांका राज
प्यारी घण ने लाग्या पूरा मास
प्यारी घण ने लाग्या नौ दस मास
चतुरभुज जनमियाजी म्हांका राज
दादासा रो बंस बधाईया जी म्हांका राज ।।

इस लोक को ही क्या दोष दें, हमारे शास्त्र भी पिछले हजारों बरसों से यही राग अलापते आ रहे हैं कि पुत्र के बिना गति नहीं मिलती और उसकी मुक्ति नहीं होती । उसी का दिया हुआ तर्पण और तिलांजलि पूर्वजों को स्वीकार होती है । “अपुत्रस्य गतिं नास्ति, लुप्त पिंडोदकः क्रिया ।”

कपूत हो, सपूत हो- बस बेटा होना चाहिए । बेटियां भले ही मां-बाप पर प्राण न्यौछावर क्यों न कर रही हों, पर उनको कोई श्रेय नहीं दिया जाता, कोई शाबाशी नहीं दी जाती, घर की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं दिया जाता, भले ही भारत के कानून में इसका प्रावधान क्यों न हो । गीतों में बेटे का जन्म मतलब उत्सव और समारोह, और बेटी के जन्म का मतलब उदासी, रोना-पीटना, भाग्य को कोसना और विधाता को गालियां देना । बेटे को पालणे में लाड़ से झुलाने का बार-बार वर्णन है, पर बेटी के लिए पालणा भी शायद अनावश्यक था । हरे बांस का पालणा बनाकर उसमें पूत को झुलाने की इच्छा देखिए- 

थूं तो जाजे रे खाती डूंगरां
थूं तो लाजे हरिया बांस
सूरजमल हीन्दे पालणे ।

बेटा सूरजमल है, बेटी आज भी घर वालों के लिए “घोड़ा रांड” है, बोझ है, भार है, पराया धन है, जोखिम है, लेणदार है इत्यादि । खिलौना लाएंगे तो बेटे के लिए, टोपी पोशाक लाएंगे तो बेटे के लिए,

नान्या रा दादासा दसावरां
वे तो गिया गुजरात, मांझल रात
नान्या रे टोपी मोलवे ।

जबकि, लड़की के लिए कंवारेपन तक कुछ लाना तो दूर की बात, उसके विवाह के समय भी पिता-काका आदि को बुलाना पड़ता है और वे बेमन से उसका लग्न-संस्कार कराते हैं- 

बेटी लग्न-मंडप में करूण स्वर में अपने पिता को आवाज लगा रही है कि उसे इस घर से परणाकर विदा कर दो-

घड़ी भर मांडा हेठे आवो रा दादासा
या छै धरम की बेळ्यां जी
धरम हमारो ये बाई करम तुम्हारो
कन्या परणाय-र जस लेस्यां जी ।

कई गीतों में यह भी दरसाया गया है कि लड़के वाले हमेशा बड़े लोग होते हैं, अतः उनके आगे हाथ जोड़कर प्रार्थनारूप में बात करनी चाहिए-

सोना रूपा रा दोय ओवरा
चनण जड़्या जी कंवाड़
ज्हां चढ़ सूता बाई रा दादासा
सूता य क जागो बाई रा दादासा
साजन ऊबा थांके बार
करो न साजणियां सूं बीणती ।

और देखिए, बेटी, अपने भाग्य पर आंसू बहाती हुई क्या कह रही है, अपने जन्मदाता से- 

दादासा म्हैं तो थांकी गाया की बछिया
बांधे जठे बंध जाऊं
कांई थांरो कर्यो मैं कसूर

सारांश यह कि इस तरह बेटे और बेटी में फरक और पक्षपात करते रहने से ही आज कन्या-भ्रूण हत्या की शर्मनाक समस्या से हम सबको जूझना पड़ रहा है । पिछली शताब्दियों से पति के साथ चिता पर सती होना भी कुलदेवी के रूप में पेजा जाता रहा है, जो सरासर अमानवीय है । कोई भला हमें यह बताए कि नारी ही क्यों सती होती रही, पुरूष क्यों नहीं सती हुआ । यह इतना महान कार्य था, पुण्यदायक था तो पुरूषों को भी पत्नी के निधन हो जाने पर उसके साथ चिता पर जलना चाहिए था, एक भी उदाहरण इसका नहीं मिलता। 

ठेठ वैदिक काल से विवाहिता नारी को “पुत्रवती भव” का ही आशीर्वाद दिया जाता रहा है, “पुत्रीवती भव” का क्यों नहीं ? प्राचीन इतिहास से मध्यकालीन इतिहास में आते-आते तो नारी के सारे महत्वपूर्ण अधिकार छीन लिए गए । जैसे, नारी वेदपाठ नहीं कर सकती, जनेऊ नहीं पहन सकती, कोई भी धार्मिक अनुष्ठान स्वयं नहीं कर सकती, केवल पुरूष के साथ गठजोड़े से बंधी रहकर चुपचाप देख सकती है, उसमें दखल नहीं कर सकती । नारी को केवल इसलिए अनिवार्य सम्मान दिया जाता रहा कि वह पुत्रों को जन्म देती है, बंस को बढ़ाती है ।
राजस्थानी लोकगीतों में से एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगी-

म्हारी ऊंची मेड़ी जी चतरसाळ
जी म्हारे चौबारां दिवळो बळे
म्हूं तो जणीं चढ़ जणस्यूं जी धीय
जी म्हारे धीय जण्यां दुख ऊपजे ।
म्हारे आवेली जान-बरात
जी म्हारे पातर आवे नाचतां
म्हारे घर रीतो जी म्हारो पेट
जी म्हारी धीय जंबाई ले जासी ।
म्हारी ऊंची मेड़ी जी चतरसाळ
जी म्हारे चौबारां दिवळो बळे
म्हूं तो जणीं चढ़ जणस्यूं जी पूत
जी म्हारे पूत जण्यां सुख ऊपजै
म्हारी जावैली जान-बरात
जी म्हारे पातर जावै नाचतां
म्हारो घर भरियो जी म्हारो पेट
म्हारे सकल बुवां को झूमको ।
सरजिवजो राजा दसरथजी का जोध
जी म्हारे मन का मनोरथ पूरिया
सरजिवजो सजनां की य धीय
जी थैं बंस बधायो म्हारा बाप को ।

हालांकि अब राजस्थान में इक्कीसवीं सदी में इस मानसिकता में बदलाव आ रहा है, लेकिन गांवों में हालत जस-की-तस है । इसलिए, नारी को दोयम दर्जे की समझने की बीमार मानसिकता के लिए राजस्थान के लोकगीतों के इन भावों को भूलकर, उनके बजाय नये एमय, नई सोच ओर नए भावों के लोकगीत, लोकमानस से उपजें, ऐसा माहौल हम नारियों को ही मिलकर बनाना होगा। आज की शिक्षित और सुसंस्कृत माताएं, यह कार्य आगे होकर कर सकती हैं । मैं यही मंगल-कामना करती हूं ।
-  -  -
चन्द्रकान्ता व्यास
29 .नीलकंठ,
शहीद भगत सिंह कॉलोनी,
छतरीवाली खान के पास,
चित्तौड़गढ़,राजस्थान-312001
फोन-01472-241532,9530126115
 मेल renuvyas00@gmail.com

चन्द्रकान्ता व्यास
अपनी माटी वेबपत्रिका के प्रोजेक्ट के तहत 
लोक गीतों के इस संकलन का दस्तावेज़ीकरण किया जा रहा है.
डॉसत्यनारायण व्यास की माताजी लक्ष्मणा देवी 
की याद में संधारित इन गीतों में तमाम लोक गीत 
चन्द्रकान्ता व्यास के निर्देशन में संकलन और सम्पादन 
में तैयार हुए हैं.जिन्हें बाद के समय में चित्तौड़गढ़,राजस्थान 
में कमला देवी,दुर्गा देवी,उषा भट्ट,रामकृष्णा श्रोत्रिय 
की आवाजों में उनके सहयोग से रिकोर्ड किया गया.
जिनका अव्यावसायिक उपयोग किया जा सकता है.
उपयोग की जानकारी हमें भी देंगे तो अच्छा लगेगा.
इन गीतों के इस स्वरुप की 
परिकल्पना,संयोजन और सहगायन चन्द्रकान्ता व्यास का रहा है.



प्रस्तुत है वे राजस्थानी लोक गीत जो हम अपनी दादी-नानी से सुना करते थे 





















दस्तावेज़ीकरण-माणिक का है 
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template