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'' कविता लिखना पापड़-बड़ी बनाने जैसा उद्योग नही है। ''- चंद्रकांत देवताले

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, दिसंबर 25, 2012 | मंगलवार, दिसंबर 25, 2012

प्रसंग: साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार-2012
हमारे देश के कवियों की आवाज अपनी-अपनी जगह की बित्‍ता-भर धरती, भाषा और जीवन को बचाने की कोशिश है 
(पुरस्‍कृत कवि चंद्रकांत देवताले से ओम निश्‍चल की ये बातचीत मूल रूप से दैनिक जागरण के लिए की गयी थी जो 24 दिसंबर,2012 के सभी संस्करण में छप चुकी हैं।यहाँ 'लोभवश' फिर से पूरी बातचीत यहाँ साभार-सम्पादक)

ये फोटो फेसबुक से 'चुराया' हुआ है।
इस बार का साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार हिंदी के वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले के खाते में गया है। देवताले हिंदी के उन कवियों में हैं जिन्‍होंने 'अकविता' के अराजक समय के बाद आठवें दशक के राजनीतिक हालात को कविता के तीखे तेवर और मुहावरे के साथ व्‍यक्‍त किया। 1973 में पहचान सीरीज में प्रकाशित 'हड्डियों में छिपा ज्‍वर' से चर्चित हुए देवताले ने 'दीवारों पर खून से', 'लकड़बग्‍घा हँस रहा है', 'भूखंड तप रहा है' जैसे कविता संग्रहों से हिंदी कविता के ठंडे और पस्‍त पड़े मुहावरे में अपनी धारदार और चुस्‍त भाषा-संवेदना से गरमाहट पैदा की। 'कविता की वापसी' जैसे छद्म नारों से बचते हुए वे सदैव कविता को मनुष्‍य की शाश्‍वत वेदना से जोड़ने के लिए प्रयत्‍नशील रहे तथा 'आग हर चीज में बताई गयी थी', 'इतनी पत्‍थर रोशनी' तथा 'उजाड़ में संग्रहालय' जैसे बेहतरीन संग्रह हिंदी को दिए हैं।

जौलखेड़ा, बैतूल, मध्‍यप्रदेश में 7 नवंबर,1936 को जनमे और 'पत्‍थर फेंक रहा हूँ' कविता संग्रह के लिए अकादेमी पुरस्‍कार के लिए चयनित देवताले की लेखनी छिहत्‍तर वर्ष की उम्र में भी निर्बाध चल रही है। यों तो उन्‍हें मध्‍यप्रदेश के शिखर सम्‍मान, मैथिलीशरण गुप्‍त सम्‍मान, पहल सम्‍मान सहित कई सम्‍मान और पुरस्‍कार मिल चुके हैं किन्‍तु हमेशा की तरह विलंबित चाल की अभ्‍यस्‍त साहित्‍य अकादेमी का यह पुरस्‍कार उन्‍हें देर से मिला है। दस कविता संग्रहों और कई संचयनों के कवि व मुक्‍तिबोध के काव्‍य पर अपने अनूठे शोध के लिए चर्चित देवताले अध्‍यापन की लंबी पारी खेलने के बाद स्‍वतंत्र लेखन में रमे हैं और इन दिनों उज्‍जैन में रह रहे हैं। देवताले से रूबरू होते हुए कविता में उनकी यह बेबाकी मुझे अच्‍छी लगती है: 'ऐसे जिंदा रहने से नफरत है मुझे/ जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्‍छा कहे/मैं हर किसी की तारीफ करते भटकता रहूँ/मेरे दुश्‍मन न हों/और इसे मैं अपने हक में बड़ी बात मानूँ।' पुरस्‍कार की बधाई देने के बहाने उनसे हुई बातचीत के अंश।

ओम निश्‍चल: आपने लिखा है: 'मैं मरूँगा जहॉं वहीं उगेगा पेड़ आग का/उस पर बसेरा करेंगे पानी के परिंदे/परिंदों की प्‍यास के आसमान में/जहॉं थोड़ा सा सूर्योदय होगा/वहॉं छायाविहीन एक सफेद काया/मेरा पता पूछती मिलेगी।' ऐसी नायाब कविताऍं लिखने वाले कवि को पुरस्‍कृत किए जाने की घोषणा से हिंदी समाज बेहद खुश है, पर इसे 'देर आयद दुरुस्‍त आयद' कहा जा रहा है। आपको क्‍या लगता है?

चंद्रकांत देवताले: मुझे न भी प्राप्‍त होता तो कोई याद भी नहीं आता । पर अपनी भाषा के चाहने और जीवन से प्रेम करने वाले लोग जो मुझे भी चाहते हैं, उनकी खुशी देख कर मुझे सचमुच बेहद प्रसन्‍नता और सार्थकता का अनुभव हो रहा है। कविता मेरे लिए आवाज़ है और मुझे राहत मिली है कि यह आवाज बहुत ध्‍यान से सुनी गयी है। सुनने के बाद मुझसे हमेशा लगता रहा है कि आदिवासी जगहों, सीमांतों से मुझे सुना गया है, उसका रिस्‍पांस मिलता रहा है। आज के इस विद्रूप समय में जब संस्‍कृति स्‍वयं बाजार का हिस्‍सा बन गयी है , छपे हुए शब्‍द हाशिए में पडे हैं, पचहत्‍तर करोड अनपढ-असाक्षर और लाखों लोग कुपोषित हैं, समाज में अत्‍याचार और  हिंसा का बोलबाला है। ऐसी स्‍थिति में आज ई-बुक्‍स की बात हो रही है। वैश्‍वीकरण ने हमें विस्‍थापित करने में कोई कसर नही छोडी है। हमारे देश के कवियों की आवाज अपनी अपनी जगह की बित्‍ताभर जमीन, भाषा और जीवन को बचाने की कोशिश है । कविता गवाही ही तो दे सकती है। यह वक्‍त वक्‍त नहीं, एक मुकदमा है। हम गूँगे नहीं हैं।

आप अकविता के रास्‍ते से आए और जल्‍दी ही उससे मुक्‍त हो अपने वक्‍त के गुस्‍सैल मिजाज के कवि बनते गए। क्‍या आपकी कविता को प्रतिरोध की इबारत के रूप में पढ़ा जाना चाहिए?

मैं अकविता  का कवि कभी नहीं रहा, जब कहा जा रहा था, तब भी नहीं था। हॉं, मेरी कविता अकविता पत्रिका में छपी जरूर है। मैंने तो लिखा है: मेरी किस्‍मत में यही अच्‍छा रहा कि आग और गुस्‍से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा और मैने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया जो घृणित युद्ध में शामिल हैं और सुभाषितों से रौंद रहे हैं अजन्‍मी और नन्‍हीं खुशियों को। मुझ पर महानगर की छाया तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है। सतपुड़ा के जंगलों में पैदा हुआ। आदिवासियों के बीच। इसलिए आज भी मेरी जड़ें वहीं हैं।

--आपने कहा है हमारी विश्‍वसनीय संस्‍थाऍं राख और भूसे में तब्‍दील की जा रही हैं और सांस्‍कृतिक उद्योग करिश्‍मे दिखा रहे हैं। इसकी वजह क्‍या है?

इसकी वजह वैश्‍वीकरण और बाजारवाद है। हमारे जो नियामक हैं उनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है। वे आत्‍मकेंद्रित हैं और कब्‍जा जमाने में जुटे हुए हैं। देश एक बहुत ही अमूर्त चीज बन कर रह गया है। उनके लिए देश सत्‍ता, पूँजी, प्रसिद्धि है और भ्रम फैलाने वाली भाषा ही उनका कारोबार है।

--देवताले जी, साहित्‍य से बड़ी उम्‍मीदें की जाती हैं पर आपका कहना है, साहित्‍य महज मुट्ठी भर लोगों के विमर्श का बंदी है। समाज तो दूर, समझ ही नहीं बदल पा रहा है साहित्‍य। आखिर इतनी नाउमीदी क्‍यों है?

इसलिए है कि सिर्फ साहित्‍य पर आवश्‍यकता से अधिक भरोसा नही किया जा सकता। साहित्‍य आशावाद और समाधान नहीं दे सकता और गुमराह करने वाला आशावाद तो बहुत ही खतरनाक होता है। दरअसल, साहित्‍य समाज में आदमी की आवाज है जिसे सुना जाना चाहिए । आज हमारा समाज बीमार समाज है, वह भटका हुआ है। साहित्‍य ऐसे में कुछ नहीं कर सकता है। इसलिए कि हमारे समय में बुद्ध, अंबेडकर,गांधी, तुकाराम, नानक और, विकवेकानंद थे जिन्‍होंने जो साहित्‍य रचा वह कम था क्‍या! हमें ऐसी सीखें मिलीं कि जो आवे संतोष-धन सब धन धूरि समान। तो यह क्‍या कम है । आज करोड़पति करोड़ों की कमाई में मगन है। यदि समाज को बदलना होता  तो संत तुकाराम, नानन जैसे संतों से सीख लेकर हम देशी समाज बना सकते थे । पर हमने तो अपनी प्राथमिकताऍं तक त्‍याग दीं। विश्‍वास छोड़ दिए  हैं। जो आधनिक उपकरण, ससाधन हमारी मदद के लिए थे वे तो हमारा स्‍थानापन्‍न बन गए हैं। बहुत सी जगह आदमी की जरूरत नहीं रही । ऐसे में हमारी भाषाऍं, बोलियॉं दमित हैं। उनके प्रभावों को नष्‍ट किया जा रहा है। ये बातें ज्‍यादा हमारे लिए ज्‍यादा अहम हैं।

--आपने लिखा है,'मैं मनुष्‍य हूँ और कवि। न हाबी हार्स पर सवार, न घोड़ा रेसकोर्स का।' आज मनुष्‍यता और कविता की राह में आपको क्‍या खतरे नज़र आते हैं?

न मनुष्‍यता पेशा है, न कविता ही । जो कवि होगा वह हमेशा ही कवि रहेगा। ऐसा नहीं कि थोडी देर के लिए कवि है, बाद में कुछ और बन गया। उससे उसका कविपन कभी विलग नही हो सकता। कविता आकाश की तरह कवि के साथ हमेशा रहेगी। जैसे आकाश और समय हमेशा उसके साथ रहता है, उसका कविपन हमेशा साथ रहता है। ऐसा नही उसने कोट की तरह से अपनी कविताई उतार दी और धंधेबाज की तरह अपनी बंडी पहन ली।

--आप तादयुश रोजे़विच को उद्धृत करते हुए कहते हैं, 'कवि एक ही भाषा में बात करता है।' आपकी भाषा क्‍या है?
मेरी भाषा है जख्‍मों को दिखाना, जख्‍मों को उखेड़ना और मनुष्‍यता की खुशुबू, उसकी चाहत और आवाज़ को बिखेरना।

--इतिहास में पहली बार साहित्‍य अकादेमी में किसी हिंदी लेखक के अध्‍यक्ष बनने का रास्‍ता प्रशस्‍त दिखाई देता है। इससे अकादेमी की गतिविधियों पर क्‍या कुछ असर पड़ने वाला है?
बहुत अरसे से सुन रहा था कि अकादेमी बरबाद हो गयी है। अब उम्‍मीद है कि सही ढर्रे पर आ जाए। मैं तो संस्‍थाओं से बहुत दूर रहता हूँ। ये सब जानता भी नही । पर यह अच्‍छी बात है। ऐसा कभी का हो जाना चाहिए था।

--क्‍या आपको लगता है कि हिंदी के लेखकों की बड़ी तादाद और विपुल व वैविध्‍यपूर्ण लेखन को देखते हुए हिंदी में अकादेमी पुरस्‍कारों की संख्‍या बढ़नी चाहिए?
हॉं, इस पर विचार किया जाना चाहिए। क्‍योंकि हिंदी बहुत से प्रदेशों की भाषा है। किन्‍तु लेखकों की तरफ से उद्योगपतियो से यह कहना कि वे भी पुरस्‍कार दें, यह कोई अच्‍छी बात नही है। साहित्‍यकार ऐसी मॉंग करें, यह ठीक नही है। ऐसे पुरस्‍कार समाप्‍त भी हो जाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्‍योंकि एक जमाने में राजाओं-महराजाओं द्वारा दरबारी लेखकों-कवियों को पुरस्‍कार दिए जाते थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।  

-- पिछले दिनों साहित्‍य में दलितों और स्‍त्रियों की आवाज़ मजबूती से मुखर हुई है। एक नया अनुभव संसार हमारे सामने खुल रहा है। इस बारे में आप क्‍या अनुभव करते हैं?
मेरा यह अनुभव है कि दलितों और स्‍त्रियों के बारे में साहित्‍य में हमेशा लिखा जाता रहा है। एक कविता है,सुखिया  की चाह । सियारामशरण गुप्‍त की। इसमें एक दलित बच्‍ची है जिसे चेचक हो गयी हैं जिसे गाँव में माता कहते हैं । किसी ने कहा कि मंदिर से एक फूल लाकर इसके सिरहाने रख दिया जाए तो यह ठीक हो जाएगी। बाप हिम्‍मत करके मुँह अंधेरे तड़के मंदिर जाता है और मंदिर से फूल लेकर लौट ही रहा होता है कि सवर्ण लोग देख लेते हैं तथा उसे इतना मारते पीटते हैं कि फूल हाथ से गिर जाता है।  ये कविता मैने 50 में पढी थी। इस कविता ने मुझे दलितों के प्रति चेतना और दृष्‍टि दी है। 

स्‍त्रियों के प्रति महादेवी वर्मा ने सहानुभूति से लिखा है। दलितों पर नागर ने लिखा है। बरसों से वर्ण व्‍यवस्‍था और वर्चस्‍ववादी प्रवृत्‍तियों के कारण इनकी उपेक्षा और अवमानना होती आई है। अब मराठी साहित्‍य का हिंदी साहित्‍य पर भी प्रभाव पड़ा है, यह अच्‍छी बात है। संत तुकाराम, कबीर, दादू, रैदास ये सब छोटी जाति के थे, पर उन्‍हें सदैव आदर से सुना गया। हमारे समय की विडंबना है कि कितने दलित शर्मा, वर्मा बन गए। पर उनके हालात अब भी वैसे ही हैं।  अभी तुलसीराम की आत्‍मकथा मुरदहिया  पढ़ी तो हिल गया। एक बार पढना शुरु किया तो खत्‍म होने तक हाथ से छोडा नही । बात भी करनी चाही तुलसीराम जी से लेकिन वे अस्‍वस्‍थ रहते हैं। बात न हो सकी। निर्मला पुतुल जैसी कवयित्री आदिवासी इलाके से ही आई है। पर उसकी रचनाओं में दाह है, दहकती हुई चिनगारियॉं हैं।

--हर सम्‍मान हमें कुछ देर के लिए भावाभिभूत कर देता है। ऐसे समय हमें कुछ लोग बहुत याद आते हैं। इस वक्‍त वे कौन हैं जिनकी ओर आप कृतज्ञता और अपनेपन से देखते हैं?
मुझे सबसे ज्‍यादा एकाकीपन लग रहा है इसलिए कि मेरी पत्‍नी नहीं रही। इस वक्‍त उनकी याद आ रही है। जब भोपाल में पुरस्‍कार मिला या भवभूति अलंकरण समारोह इंदौर में हुआ, उसमें राजेन्‍द्र यादव आए तो वे हमारे साथ मंच पर थीं। आज उसका घर में नहीं होना अखरता है। बातचीत की आवाजाही का अभाव कचोटता है। कचोटती है उसकी अनुपस्‍थिति। यह ऐसी बात है कि बात बनाए न बने। आपने पूछ ही लिया तो बताना पड़ा।

--इन दिनों आपके कविता-करघे पर क्‍या कुछ रचा-बुना जा रहा है?
ओम जी, बुना हुआ कुछ पड़ा रहता है, पकड़ में नही आता कभी कभी। कभी कभी आ जाता है पर मैं उसके पीछे पड़ा नहीं रहता। कविता लिखना पापड़-बडी बनाने जैसा उद्योग नही है। मेरे मन में हेमिंग्‍वे की बात बसी हुई है । उनके पास एक युवा गया कि मैं साहित्‍यकार बनना चाहता हूँ तो उन्‍होंने पूछा, कि क्‍यों बनना चाहते हो। और यदि बनना ही चाहते हो तो बताओ तुम्‍हारे जख्‍म कहॉं है, घाव कहॉं हैं। तो खाए- पिए- अघाए मनमुदित जन का साहित्‍य कवि की दुनिया नहीं है।

--सरकारी नौकरी में तमाम कष्‍टप्रद जगहों पर रहना हुआ होगा। इस बीते हुए समय को कैसे याद करते हैं?
ओम जी, कालेज जीवन में मेरे 14 तबादले हुए। हर जगह अपना सामान चुपचाप उठा कर चला जाता रहा। एक बार राजस्‍थान की सीमा से सटे राजगढ़ में तैनाती हुई वह पत्‍थरों का गढ़ कहा जाता है।मैं वहॉं भी बेहद खुश था और जब वहॉं से हटाया गया तो ऑंख में ऑंसू थे। यह पत्‍थरों का गढ़ यानी राजगढ़ अब भी याद आता है।   पहाडी पर मेरा क्‍वार्टर था। एक पौधे को लगाने के लिए तीन बाल्‍टी पथरीली मिट्टी खोद कर हटानी पड़ती थी। यों किसान परिवार का हूँ। खेती बारी, किसानी देखी है। आदिवासियों से रिश्‍ता आज भी सघन है।

--इस उम्र में आवाजाहियॉ कितनी पसंद करते हैं?
ओम जी, बाहर अब मन नहीं लगता। आसपास की जगहों पर घूम लेता हूँ। वो क्‍या कहते हैं: सन्‍यंस्‍तं मया । अब सब कुछ छोड़ चुका। जैसे लोग काशी जाते हैं और कददू छोड के आ गए । तो मुट्ठीभर लोगों के बीच आवाजाहियों में अब आनंद नहीं मिलता।

बातचीत आखिरी छोर पर थी कि एक बैंककर्मी का फोन उन्‍हें आया, चोगे पर फोन रख वे उससे बात करने लगे । कहने लगे, यार तुम्‍हारी बहुत याद आती है। पासबुक देखता हूँ, या नोट गिनता हूँ तो तुम्‍हारी याद आती है। उन्‍होंने पूछा होगा क्‍या सुबह वाक पर नहीं जाते ? देवताले जी बोले, वाक पर तो नहीं जाता, पर टाक करता हूँ। गुरुद्वारे तक पहुंच गया तो मत्‍था नवाता हूँ, गुरुग्रंथ साहिब को नमन करता हूँ। बोले सो निहाल कहता हूँ और लौट आता हूँ। मैं सोच रहा था, जीवन की यह मस्‍ती केवल साहित्‍यकार को हासिल है। वह शब्‍दों,आवाजों की दुनिया का पैगंबर है। वह बोलता है तो सदियों तक उसकी आवाज गूँजती है।


समीक्षक  

बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,

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