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''कला, साहित्य, संस्कृति से ही राष्ट्र का विकास'' - वेद व्यास

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012 | शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012


कला मेले में 08 संस्कृतिकर्मियों का सम्मान 


उदयपुर/28 दिसम्बर-2012 
राजस्थान साहित्य अकादमी और कला, साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में उदयपुर संभाग स्तरीय ‘कला मेले’ का शुभारम्भ एस.आई.ई.आर.टी. के मुख्य सभागार में पूर्वाह्न 11.00 बजे मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. इन्द्रवर्धन त्रिवेदी तथा अकादमी अध्यक्ष श्री वेद व्यास की अध्यक्षता में हुआ। इस अवसर पर उदयपुर संभाग की कला, साहित्य व संगीत के क्षेत्र की स्थापित व प्रतिष्ठित विभूतियों - श्रीमती मांगी बाई आर्य(गायन), प्रो. नंद चतुर्वेदी(साहित्य), शकुन्तला पंवार (लोक नृत्य), डॉ. महेन्द्र भाणावत(लोक संस्कृति), श्री श्याम माली (कठपुतली), डॉ. पूनम जोशी(कत्थक नृत्य-सितार वादन), श्री शैल चोयल(चित्रकला), श्री प्रकाश कुमावत (पखावज) को मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्वालय के कुलपति डॉ. आई.वी.त्रिवेदी तथा राजस्थान साहित्य अकादमी अध्यक्ष श्री वेद व्यास द्वारा सम्मान राशि 2100/-रु., शॉल, प्रशस्ति पत्र आदि भेंट कर संस्कृति सम्मान प्रदान किया गया। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो0 आई.वी.त्रिवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज हम ऐसे चौहारे पर खड़े हैं जहाँ मूल्यों में गिरावट हो रही है। मूल्यों की गिरावट को रोकने में साहित्यकार की महती भूमिका है। यह सत्य है कि जिस समाज व देश में साहित्यकार व कलाकारों की पूजा होती है, सम्मान होता है, उस देश का भविष्य उज्ज्वल होता है। श्री त्रिवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व-विद्यालय भी फरवरी, 2013 में स्वर्ण जयन्ती समारोह के तहत ‘साहित्य व समाज’ विषय पर दक्षिण राजस्थान के रचनाकारों को आमंत्रित कर विमर्श संगोष्ठी का आयोजन करेगी। 

इस अवसर पर सत्र की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष व प्रख्यात विचारक श्री वेद व्यास ने कहा कि राजस्थान का सांस्कृतिक पुनर्जागरण इस अर्थ में महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान के समक्ष सामाजिक, आर्थिक विकास की भरपूर चुनौतियां है तथा जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता जैसे अनेक प्रश्न समाज में विघटन और अलगाव को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारे राजस्थान में मीरा, दादूदयाल, महाकवि बिहारी, स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक, जयनारायण व्यास व अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जैसे अनेक सन्त व समाज सुधारकों ने समाज को संघर्ष के बीच बुनियादी भाईचारे व प्रेम का संदेश दिया है। श्री व्यास ने कहा कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। यह सत्य है कि आजादी के बाद साहित्य का हस्तक्षेप समाप्त हो रहा है। साहित्य व कला को पीछे किया जा रहा है, ऐसे में राजस्थान को स्वयं से पूछना होगा कि तुम क्या हो ? अपनी मीरां को क्यों भूल गए ? क्यों ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को पराया मानते हो। अपने वक्तव्य में लगातार श्री वेद व्यास ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि अकादमी का पूर्ण संस्थान समष्ठीपूरक है, यह व्यक्तिवादी नहीं है। अतः सामाजिक चेतना के विकास का उपक्रम जो अकादमी से जारी है उसमें सभी लेखक जुडे़ रहंे, यही मेरी कामना है। श्री व्यास ने कहा कि आज विचारों हेतु समर्पित लोगों की आवश्यकता है, प्रतिबद्धता से कलमबद्ध लोग जरूरी है। हमारी परम्परा, विचार शैली, विचार ज्ञान को हस्तान्तरित करने में संस्कृति, समाज सुधारकों, सन्तों, रचनाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। साहित्य व शिक्षा के जरिए बाजारवाद व अपराधी राजनीति के खतरों को हमें दूर करना होगा। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास से समाज का विकास नहीं होता, जब तक संस्कृति का ज्ञान नयी पीढ़ी को नहीं होगा, तब तक विकास सम्भव नहीं है। 

उद्घाटन सत्र के पश्चात् ‘आंचलिक रचनाकार सम्मेलन’ का आयोजन किया गया , जिसमें डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर जिलों के 100 से अधिक रचनाकारों ने ‘राजस्थान के सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ मुख्य विषय के अन्तर्गत अंचल की सांस्कृतिक, साहित्यिक विशेषताओं पर चर्चा और विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर प्रमुख वक्ता डॉ. सत्यनारायण व्यास (चित्तौड़गढ़), डॉ. महेन्द्र भाणावत, श्री अम्बालाल दमानी (उदयपुर) व डॉ. रेणु शाह (जोधपुर) ने अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए। 

श्री सत्यनारायण व्यास ने कहा कि लोक का नवनीत है, संस्कृति। अगर लोक विरुद्ध बात कभी भी होगी तो वह खरीज कर दी जाएगी। हमारी संस्कृति केवल नाचने गाने की संस्कृति नहीं है। श्री व्यास ने कहा कि साहित्य संस्कृति का अंग है व जीवन में सम्पूर्ण अभिव्यक्ति का नाम संस्कृति है। इस अवसर पर डॉ. महेन्द्र भाणावत ने लोक संस्कृति के संरक्षण की चिन्ताओं को सार्थकता व अनुभवों के साथ प्रगट करते हुए कहा कि परम्परा व प्रयोगधर्मिता में अन्तर है। हमारी परम्परा व आदतें ही संस्कारणीय हैं। संस्कृति का इन्हीं आदतों से संरक्षण होता है। डॉ. रेणुशाह जोधपुर ने कहा कि आज राजनीति, सामाजिक, गैरबराबरी, जाति, धर्म व सम्प्रदाय को लेकर कई चुनौतियां है। इन चुनौतियों को हराकर 21वीं सदी में हमारी संस्कृति कैसी हो, उसे देखने की जरूरत है। हमारे यहां आस्था व विश्वास की संस्कृति चल रही है, ऐसे में हमें संस्कृति संस्कार को पुनर्व्याख्यायित करने की जरूरत है। 

श्री वेद व्यास ने बताया कि दिनांक 29 और 30 दिसम्बर को आयोजित संगोष्ठियों में राजस्थान के सांस्कृतिक पुनर्जागरण विषय पर राजस्थान स्थित विभिन्न विश्व विद्यालयों के कुलपति, विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों के प्रमुख, संस्कृतिकर्मी और साहित्यकार चर्चा-विमर्श करेंगे। कार्यक्रम का संचालन श्री धनपत सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अकादमी सचिव डॉ. प्रमोद भट्ट द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. रवीन्द्र उपाध्याय, निम्बाहेड़ा की प्रथम कविता संग्रह ‘ आकांक्षाएं’ का लोकार्पण भी किया गया।

डॉ. प्रमोद भट्ट
सचिव
राजस्थान साहित्य अकादेमी,
सेक्टर-4,हिरन मगरी,उदयपुर-313002
दूरभाष-0294-2461717
वेबसाईट-http://rsaudr.org/index.php
ईमेल-sahityaacademy@yahoo.com


उदयपुर में कला मेला 28-30 दिसम्बर, 2012
SIERT,Udaipur
28 दिसंबर को आंचलिक साहित्यकार सम्मलेन 
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