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डॉ.महेंद्र भटनागर जो छायावाद काल में भी प्रगतिशील रहे

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, दिसंबर 04, 2012 | मंगलवार, दिसंबर 04, 2012

यथार्थ के दर्पण में  : महेंद्रभटनागर-विरचित नवगीत
      मधुकर अष्ठाना
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डॉ.महेंद्र भटनागर
   
मूल रूप से ग्वालियर,मध्य प्रदेश के हैं.कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी के सहपाठी भी रहे.
फिलहाल सेवानिवृत प्रोफ़ेसर हैं. 
लिखने, पढ़ने, छपने में गहरी रूचि है. 
खुद को कविता रचना के सबसे करीब और मुफीद पाते हैं.
उम्र लगभग छियासी पार है.
कई किताबें प्रकाशित हुई और अनुदित भी.

पता-110,बलवंत नगर,गांधी रोड़,ग्वालियर,मध्य प्रदेश-474 002,फोन-0751- 4092908,ई-मेलब्लॉग फेसबुक


  
सम्वेदना का दूसरा नाम गीत है जो रागात्मक अन्तर्मन से स्वतः प्रस्फुटित होता है। छायावादी गीतों में जहाँ रहस्यवादी प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है वहीं छायावादोत्तर गीतों में व्यक्तिगत स्तर की प्रेमपरक, शृंगार प्रधान और कल्पना की अतिश्योक्ति के दर्शन होते हैं। स्वकीया अथवा परकीया पर आधारित वियोग-संयोग से पूरति रचनाएँ जिनमें वायवीयता और अवास्तविकता के साथ अंतरा की कोई सीमा नहीं होती थी एवं लम्बे मीटर के छन्द होते थे केवल अभिजात वर्ग के मनोरंजन की सामग्री तक सीमित थे। साहित्य में परिवर्तन की गति समाज जैसी नहीं है। साहित्य समाज से आगे चल कर परिवर्तन का मार्ग निर्धारित कर, दिशा देता है। किन्तु वही साहित्य जब मात्र कुछ लोगों के मनोरंजन के लिए लिखा जाता है तो वह अधोगामी हो जाता है। 

साहित्यकारों ने विश्व-स्तर पर इस तथ्य को समझा और साहित्य में व्याप्त लिजलिजे तत्त्वों को निष्कासन मिला। इसी क्रम में गीत भी अभिजात वर्ग की परिधि से निकलकर साधारण जनता के मध्य आया और उसमें साधारण जनता के सुख-दुख, शोषण-उत्पीड़न, जीवन-संघर्ष, जिजीविषा, त्रासदी, विसंगति, विषमता, विघटन, विद्रूपता, विद्वेष आदि का चित्रण होने लगा जो वास्तविक और यथार्थ था। तात्पर्य यह है कि साहित्य में भी समय के साथ प्रगतिवाद आया। जब छायावादोत्तर गीतों में प्रगतिवाद आया तो उसके परिवर्तित स्वरूप को नवगीत का नाम दिया गया। समय की गति के साथ नवगीत भी निरन्तर अपना रूप परिवर्तित करता रहा जिससे वह कालातीत के स्थान पर लगभग 60 वर्षों से समसामयिक रह कर अपने परिवेश से जुड़ा रहा। यद्यपि नयी कविता भी प्रगतिवाद की उपज है; किन्तु उस पर विदेशी प्रभाव अधिक है और मार्क्स से प्रारम्भ होकर माओवाद पर आकर ठहर गयी है; किन्तु नवगीत किसी ऐसे राजनीतिक वाद से नहीं जुड़ा है; बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्परा और संस्कारों में ही प्रौढ़ हुआ है। 

निरन्तर चिन्तन-मनन और परिवेशीय दबाव के परिणाम स्वरूप वह आम आदमी के और निकट आया है। गीत की छान्दिक भंगिमा और लय में परिवर्तन न करने के बावज़ूद वह गीत से पृथक है। प्रो. देवेंद्र शर्मा इन्द्रइसीलिए कहते हैं,‘‘नवगीत भी गीत ही है किन्तु हर गीत, नवगीत नहीं होता।’’ वास्तव में उनके कथन का मन्तव्य यही है कि नवगीत समसामयिक यथार्थ का निरूपण करने के साथ ही किसी भी परम्परा का अन्धा अनुयायी नहीं है; बल्कि आवश्यकतानुसार उसका खंडन भी करता है; जिससे नई परम्पराओं को पनपने, विकसित होने का अवसर मिलता है। गीत की भाषा, कथ्य और शिल्प से हट कर नवगीत वास्तव में वर्तमान सम्वेदना की सशक्त विधा है; जिसमें लक्षणा और व्यंजना को प्रधानता दी जाती है। जहाँ तक भाषा का प्रश्न है, इसमें देशज शब्दों, मुहावरों, लोकोक्तियों की वर्जना नहीं है और कथ्य अभिधा के स्थान पर प्रतीक-बिम्ब एवं मिथिकों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। छोटे छंदों का प्रयोग और दो-तीन बंदों तक ही सीमित नवगीत में दोहे की संक्षिप्तता, ग़ज़ल की कहन और आम आदमी का जीवन-संघर्ष एवं जिजीविषा के साथ मानव जीवन से संबंधित समस्त सुख-दुख की सम्वेदना व्याप्त है। इसके अतिरिक्त मेरी दृष्टि में नवगीत खौलती सम्वेदनाओं की वर्ण-व्यंजना है, दर्द की बाँसुरी पर धधकते परिवेश में भुनती ज़िन्दगी का स्वर-संधान है, वह पछुआ के अंधड़ में तिनके से उड़ते स्वस्तिक की कराह है। भावना के खेत में उपजे नवगीत की सिंचाई आँसुओं से होती है तो सम्वेदना की खाद पड़ती है। जिसके रागात्मक अन्तर्मन में आम आदमी के दैनन्दिन जीवन-संघर्ष के प्रति असीम करुणा हो अथवा वह स्वयं भुक्तभोगी हो, वही वर्तमान यथार्थ की अनुभूति से रू-ब-रू होता है, अतः वही नवगीतकार भी बन सकता है।

            वास्तव में नवगीतकार की भूमिका प्रत्यक्षतः सामाजिक परिवर्तन में नहीं दिखाई देती है; किन्तु वह अपने प्रतिकार एवं प्रतिरोधी स्वर के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का मनोवैज्ञानिक रूप से वातावरण निर्मित करता है। तीक्ष्ण व्यंजना, तेवर और व्यंग्य द्वारा दूषित व्यवस्था के प्रति आम जनता में आक्रोश उत्पन्न करता है। वर्तमान में नवगीत के कथ्य, कहन, संक्षिप्तता और न्यूनतम शाब्दिक संरचना के कारण दोहा, ग़ज़ल, नयी कविता आदि सभी विधाएँ बौनी हो जाती हैं। वस्तुतः अन्य विधाओं के सारे गुणों का पुंज एकमात्र नवगीत में ही दिखाई पड़ता है जो दिशा देने में सक्षम और सम्पूर्ण है और वर्तमान में हिंदी भाषा की मुख्य काव्य-विधा है। यद्यपि कोई विधा अपना अस्तित्व किसी भी युग में पूरी तरह नहीं खोती और किसी-न-किसी रूप में बनी रहती है; किन्तु वह मुख्य धारा से छिटक जाती है जिससे महत्वहीन हो जाती है।


            डा. महेंद्रभटनागर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे प्रत्येक युग में अपने सृजन-संसार में नव्य दिखाई देते रहे हैं। वे भविष्य की रचना करते हैं जो अपने समय से आगे होती है। वर्ष 1949 में सृजित उनकी रचनाओं में नव्यता के दर्शन होते हैं जो छायावाद काल में भी प्रगतिशील रहे और आज तक उन्होंने अपने सृजन की नव्यता को बनाए रखा है। उस काल की उनकी रचनाएँ बेहद लोकप्रिय हुईं जो अन्य भाषाओं में भी अनूदित की गयीं। उनकी नवगीतात्मक रचनाओं का शिल्प भी अनूठा है जो उनकी मौलिकता का संज्ञान कराता है। ज़जबात के तवे पर सियासत की रोटी सेंकती नयी कविता जो एक विशेष राजनीतिक सोच का मुखौटा बनकर रह गयी है, वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है और आम आदमी ने इस लय विहीन कोरी नारेबाज़ी को कभी स्वीकार नहीं किया, अतः रचनाकारों का भी मोहभंग हुआ है और इस रिक्तता की पूर्ति में वे सक्षम नवगीत को गले लगाने लगे हैं। इस तथ्य को महेंद्रभटनागर भलीभाँति समझते हैं जिससे नयी कविता से उनका नाता छत्तीस हो गया प्रतीत होता है। उनकी रचनाओं में लय के साथ वह सौन्दर्य-बोध की प्रतिरोधी भंगिमा भी है जिसका मार्ग नवगीत की झुग्गी-झोपड़ी तक जाता है; जहाँ निर्धनता, अशिक्षा, बेरोज़गारी, अंधविश्वास और भूख-प्यास का साम्राज्य है। 

जड़ों से उखड़ी ग़रीबी की ये फ़सलें अपने जीवन-संघर्ष और अदम्य साहस से महेंद्रभटनागर को अनुप्रेरित करती हैं, सम्वेदित और प्रभावित करती हैं तथा उनके सृजन की ऊर्जा बन जाती हैं। अस्सी वर्ष पार कर चुकने के उपरांत भी लेखनी की यह अबाध गति, इस साहित्यिक ऋषि की गहन अनुभूतियों की भवाकुल अभिव्यक्ति पाठकों को आकर्षित करती है तथा पठनीयता का अभिनव वातावरण भी बनाती है जो सामाजिक परिवर्तन की क्रिया को शक्ति प्रदान करती है। डॉ. महेंद्रभटनागर परम्परा में रहते हुए भी, एक सीमा तक उससे मुक्त हैं क्योंकि अपने बुद्धि-विवेक को जाग्रत रखने के साथ ही उन्होंने हर तथ्य की अपने दृष्टिकोण से जाँच-परख की है। उनकी रचनाओं में जीवन के विविध रंग सृजन की विविधता बनाये रखने में समर्थ हैं। जीवन की निस्सारता और क्षणभंगुरता पर उनकी रचना की निम्नांकित पंक्तियाँ उदाहरणार्थ दृष्टव्य हैं:

जीवन हमारा फूल हरसिंगार-सा / जो खिल रहा है आज,
कल झर जायगा ! / इसलिए, हर पल विरल
परिपूर्ण हो रस-रंग से, / मधु-प्यार से ! .....
मत लगाओ द्वार अधरों के / दमकती दूधिया मुसकान पर,
हो नहीं प्रतिबंध कोई / प्राण-वीणा पर थिरकते
ज़िन्दगी के गान पर ! / एक दिन उड़ जायगा सब ;
फिर न वापस आयगा !

जीवन की दीर्घता अनिश्चित है, इसे उन्मुक्त रहने दिया जाए। इस पर प्रतिबंध लगाना जीवन की रागात्मकता पर अंकुश लगाना है जो मानव के विकास के लिए बाधक है। विषमता और विघटन की प्रवृत्ति मानव-उत्थान हेतु अवरोध उत्पन्न करती है जो स्वस्थ समाज को रोगी बना देती है। स्वतंत्रता, समानता, प्रेम, सद्भाव एवं परस्पर विश्वास के वातावरण में ही संस्कृतियों को पनपने का अवसर मिलता है; किन्तु वर्तमान समय विसंगतियों का है जिसमें व्यक्ति केवल अपना हित ही देखता है। शोषण उत्पीड़न का बाज़ार गर्म है। चारों ओर बाज़ारवाद का ही बोलबाला है। रोटी तो छोड़िये, हवा और पानी पर भी प्रतिबंध है। गरीब और गरीब होता जा रहा है तथा अमीर और अमीर। पूँजीपति ही देश चला रहा है और सत्ता का प्रत्येक निर्णय उसी के अनुकूल होता है। ऐसी परिस्थिति में आम आदमी को जीवन चलाना ही असम्भव होता जा रहा है। यथा :

बिखरता जा रहा सब कुछ / सिमटता कुछ नहीं !
ज़िन्दगी: / एक बेतरतीब सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रहीं गाँठें / सुलझता कुछ नहीं ! .....
ज़िन्दगी: / बदरंग केनवस की तरह
धूल की परतें लपेटे / किचकिचाहट से भरी,
स्वप्नवत है / वाटिका पुष्पित हरी !
हर पक्ष भावी का भटकता है / सँभलता कुछ नहीं !
पर, जी रहा हूँ / आग पर शय्या बिछाये !
पर, जी रहा हूँ / शीश पर पर्वत उठाये !
पर, जी रहा हूँ / कटु हलाहल कंठ का गहना बनाये !
ज़िन्दगी में बस / जटिलता ही जटिलता है
सरलता कुछ नहीं !

            डॉ. महेंद्रभटनागर की व्यक्तिपरक रचनाओं में समाज की ओर उन्मुखता व्याप्त है। इस प्रकार व्यष्टि से समिष्ट तक जाती रचनाओं में पूरे समाज का चित्रा झलकता है। उनकी नूतन उद्भावनाओं, कल्पनाओं एवं अवधारणाओं का फलक विस्तृत है जिसमें मात्रा विसंगतियों की ही गाथा नहीं, रागात्मक अन्तश्चेतना से उपजे शृंगार के दोनों पक्ष, संयोग एवं वियोग का सौन्दर्य भी अनूठा है जिसमें एक प्रेमी के मन की वेदना पाठक को सम्वेदित करती है। उनकी कामनाएँ तो गगन में झिलमिलाते सितारों की भाँति हैं, उनकी वासनाएँ हिमालय से गिरती वेगवती भागीरथी की शुभ्रधारा की भाँति हैं, उनकी भावनाएँ मुकुलित पाटल से निर्मित रूपवान सद्यस्क हारों की भाँति हैं और यह सब उस अलौकिक शोभिनी को समर्पित हैं जो स्वर्णिम दीप की लौ से उनके हृदय के कक्ष को आलोकित कर रही है। डॉ. महेंद्रभटनागर की कल्पनाएँ अछूती और अप्रतिम सौन्दर्य का बोध कराती हैं जिसका उदाहरण काव्य जगत में खोज पाना सरल नहीं है। अभिरमणशीर्षक रचना में वे  लिखते हैं:

कल सुबह से रात तक / कुछ कर न पाया
कल्पना के ¯सधु में / युग-युग सहेजी
आस के दीपक बहाने के सिवा !
हृदय की भित्ति पर / जीवित अजन्ता-चित्रा... रेखाएँ
बनाने के सिवा !
किस क़दर भरमाया / तुम्हारे रूप ने ! .....
कल सुबह से रात तक / कुछ कर न पाया
भावना के व्योम में / भोले कपोतों के उड़ाने के सिवा !
अभावों की धधकती आग से / मन को जुड़ाने के सिवा !
भटका किया, / हर पल / तुम्हारी याद में अटका किया !
किस क़दर / यह कस दिया तन मन / तुम्हारे रूप ने !

छोटी पंक्तियाँ, न्यूनतम शब्दावली और दो अथवा तीन बन्दों तक सीमित उनकी रचनाओं का शिल्प कुछ ऐसा है जिसमें लयात्मकता के साथ नवगीतात्मकता व्याप्त है और साथ-ही-साथ नयी कविता की भी झलक मिलती है और एक नया ही सौन्दर्य दिखाई पड़ता है। उनकी रचनाओं में अभाव, पीड़ा, संत्रास की अभिव्यक्ति आम आदमी के दर्द का एहसास कराती है। अनुदर्शनशीर्षक रचना में यह तथ्य स्पष्ट परिलक्षित होता है, जब वे कहते हैं: 

उड़ गये / ज़िन्दगी के बरस रे कई / राग सूनी / अभावों भरी / ज़िन्दगी के बरस / हाँ, कई उड़ गये!’ 

वास्तव में उनकी अन्तश्चेतना में भाव जिस रूप में जन्म लेते हैं, वे उसी रूप में व्यक्त भी होते हैं जिनमें बनावट या अनावश्यक शब्दों का जाल नहीं होता है। वे यथार्थ के निकट, तथ्यगत सृजन ही करते हैं जिसमें पाठक को अपना ही मन झाँकता प्रतीत होता है। वे नियतिशीर्षक रचना में लिखते हैं:

संदेहों का धूम भरा / साँसें कैसे ली जायँ !
अधरों में विष तीव्र घुला / मधुरस कैसे पीया जाय !
पछतावे का ज्वार उठा / जब उर में,
कोमल शय्या पर / कैसे सोया जाय !
बंजर धरती की / कँकरीली मिट्टी पर
नूतन जीवन / कैसे बोया जाय !

समाज में परस्पर प्रेम, सद्भाव का अभाव, कट्टरपंथी साम्प्रदायिक शक्तियों का विस्तार, विघटन और द्वेष की अग्नि ने समाज को विघटित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। ऊपर से राजनीतिक चालों और जातिवाद ने भी अपना सिर उठाया जिससे रहा-सहा सामाजिक सौहार्द भी मटियामेट हो गया। ऐसी परिस्थितियों में मानवीय मूल्यों में ह्रास और सांस्कृतिक पतन के साथ ही हताशा का वातावरण घना हो गया। परम्पराओं एवं रीति-रिवाज़ों के स्थान पर धर्मान्धता और पाखंड में अपार वृद्धि हुई। देश में जो भौतिक विकास हुआ, बाज़ारवाद पनपा और आदमी सूचना क्रांति के फलस्वरूप पूरे विश्व से जुड़ गया लेकिन वह अपने पड़ोसी के दुख-सुख से अनभिज्ञ रह गया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अकेला रह गया। वह समाज का सदस्य नहीं रह गया। ऐसे में पूँजीपति ही महान हो गया जिसने जी-भर गरीबों का शोषण-उत्पीड़न कर, अपनी तिजोरी भरी तो आम आदमी की ज़िन्दगी के विषय में सच्चाई को सम्मुख रखते हुए, महेंद्र जी ने लिखा:

आजन्म / अपमानित-तिरस्कृत ज़िन्दगी
पथ से बहकती यदिसहज; / आश्चर्य क्या है ?
आजन्म / आशा-हत / सतत संशय-भँवर उलझी
पराजित ज़िन्दगी
अविरत लहकती यदिसहज; / आश्चर्य क्या है ?
आजन्म / वंचित रह /अभावों-ही-अभावों में
घिसटती ज़िन्दगी
औचट दहकती यदिसहज; / आश्चर्य क्या है ?

            डॉ. महेंद्रभटनागर आम आदमी की ज़िन्दगी समाज के सम्मुख रख कर ही मौन नहीं रह जाते; बल्कि समाज को, सियासत को, पूँजीवाद को यह चेतावनी भी देते हैं कि इतना न दबाओ कि विस्फोट की स्थिति निर्मित हो जाए:

आदमी को / मत करो मजबूर !
इतना कि बेइंसाफ़ियों को झेलते — / वह जानवर बन जाय !
या / बेइंतिहा / दर्द की अनुभूतियों को भोगते
वह खण्डहर बन जाय !
आदमी को / मत करो मज़बूर इतना
कि उसको ज़िन्दगी लगने लगे
चुभता हुआ / रिसता हुआ / नासूर !
आदमी को मत करो यों / इस क़दर मजबूर !

            कवि के अन्तस पटल पर अतीत चलचित्रा की तरह उभरता है, उन चित्रों में उसे जीवन के अनेक रंग दिखाई पड़ते हैं; भूली-बिसरी यादें, अनुरागी अनुभूतियों की टीसों के साथ जाग्रत हो उठती हैं; ठीक उसी तरह कि गठिया के रोगी को पुरवैया टीसने पर विवश करती है। कभी अँधियारे जीवन में बिजली-सी कौंधती पूर्व छवि की स्मृतियाँ होती हैं और धीरे-धीरे उससे जुड़ी सारी मधुरिम घटनाएँ याद आने लगती हैं और कवि के हृदय से कविता का उत्स फूट पड़ता है। यथा:

आज तुम्हारी आयी याद, /मन में गूँजा अनहद नाद !
बरसों बाद / बरसों बाद !
साथ तुम्हारा केवल सच था, /हाथ तुम्हारा सहज कवच था,
सब-कुछ पीछे छूट गया, पर / जीवित पल-पल का उन्माद ! ...
बीत गये युग होते-होते, / रातों-रातों सपने बोते,
लेकिन उन मधु चल-चित्रों से / जीवन रहा सदा आबाद !
आज तुम्हारी आयी याद !

            डॉ. महेंद्रभटनागर वास्तव में शब्दों के जादूगर हैं। जहाँ जैसी भाषा की अपेक्षा होती है, वहाँ वैसी भाषा का प्रयोग करते हैं। प्रकृति के अभूतपूर्व रंग-चित्रा जो उनकी लेखनी की तूलिका से बनते हैं  — वे शब्द-चित्र वास्तव में मुग्ध कर देते हैं। कहीं काली घटा के छा जाने से तन की जलन शांत होने की चर्चा, तो कहीं सलेटी बादलों की रेशमी चादर का तन पर पड़ना आदि दृष्यों की मोहकता, तो कहीं चारों ओर घिरे अँधेरे और कुहरे के तम्बू तान देने की सौन्दर्य प्रधान स्थितियाँ, जो उनके काव्य-जगत में सर्वत्रा बिखर कर उनके कलाकार मन का संज्ञान कराती हैं। इसी क्रम में शीतार्द्रशीर्षक रचना उल्लेखनीय है:

उतरी धीमे-धीमे फिर-फिर ओस रात-भर !
हिम-शीतल सन्नाटा / छाया सुप्त धरा पर,
फूलों - पत्तों नाची / प्रीति-पुतरिका बनकर,
कारीगर कुहरे ने / किया सृजन कनात-घर !
यहाँ-वहाँ जगह-जगह / बिखरे जल-कण हीरे,
घात लगाये फिरते / पवन झकोरे धीरे,
पहरेदार सरीखा / जागा, हर प्रपात, झर !
ख़ूब जमी है महफ़िल / अध्यक्ष बनी रजनी,
प्रिय को कस कर बाँधे / जागी-सोयी सजनी,
किसी दिशा में दबका / बैठा, नव प्रभात, डर ! 

            डॉ. महेंद्रभटनागर का अन्दाज़ेबयाँ समकालीन रचनाकारों से पृथक है जिसमें प्रतिरोध और प्रतिकार हेतु तीक्ष्ण धार तथा अनूठा तेवर विद्यमान है जो सम्वेदित और प्रभावित करता है। मूलरूप से उनकी रचनाओं में आम आदमी की पक्षधरता के साथ आक्रोश भी दिखाई देता है। प्रगतिवादी विचारधारा और विशिष्ट कहन तथा नूतन भाषा-शिल्प के फलस्वरूप उनकी रचनाओं में नवीनता एवं ताज़ापन है जो आडम्बर और बनावटीपन से अलग है। रचनाओं में व्याप्त समसामयिक यथार्थता में स्वाभाविकता एवं मौलिकता, उन्हें विशिष्टता प्रदान करती है। 

रचनाओं में विविधता के अनेक रंग हैं जो उनके दीर्घकालीन भोगे हुए सत्य को उद्घाटित करते हैं; जिसमें वेदना भी है और हँसी-खुशी के क्षण भी। प्रकृति-चित्राण की मनोरमता है तो शृंगार का उन्माद भी है। निर्धन की भूख-प्यास, आम आदमी का जीवन-संघर्ष और जिजीविषा, शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध आक्रोश, सामाजिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा, राजनीतिक व्यवस्था का पतन, अतिभौतिकता का दुष्परिणाम, विघटन और वैश्विक चिन्तन के साथ सभ्यता-संस्कृति का लोप आदि सभी कुछ उनके सृजन-संसार में पूरी आब और चमक के साथ मौज़ूद है; जो उन्हें परिपक्व रचनाधर्मी के रूप में स्थापित करता है। उनके सृजन की भाषा अधिकांशतः सहज, सरल, प्रवाहपूर्ण एवं बोधगम्य है जिसमें प्रसाद गुण की सम्पन्नता, रस-निष्पत्ति के अवरोधों को विनष्ट कर देती है। प्रत्येक दृष्टि से सम्पर्ण एवं सम्पन्न, प्रस्तुत नवगीत कृति की साहित्यिक जगत में आशानुकूल प्रतिष्ठा होगी और सुधी पाठक निश्चित रूप से रचना का स्वागत करेंगे।

समीक्षक 
मधुकर अष्ठाना
विद्यायन
एस॰ एस॰ 108-9, सेक्टर,
एल-डी- कॉलोनी, कानपुर रोड,
लखनऊ — 226 012 [उ॰ प्र॰]
फ़ोन : 9450447579   
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1 टिप्पणी:

  1. मधुकर अष्ठाना जी निश्चित ही बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने डा. महेंद्र भटनागर की नवगीत विधा पर इतनी सशक्त समीक्षा की है. निस्संदेह डा. भटनागर अद्वितीय कवि हैं जिनकी कविताओं में छंदों की लयबद्धता और शब्दों के माधुर्य के बीच मुखरित समसामयिक और आधुनिक प्रगतिवादी विचार और भावनाएं पाठक के साथ इतनी आत्मीयता से जुड़ जाते हैं. आजकल की ‘नई कविता’ में अधिकतर कथ्य इतनी प्रबलता से हावी होजाता है कि ‘कविता’ की सम्वेदना कहीं भीतर शुष्कपन से सिसक रही होती है. डा. भटनागर जैसे कवि उस ‘कविता’ में रस संचार करते दिखाई देते हैं. नवगीत इस मायने में ज़्यादातर पाठकों को नई कविता की बनिस्बत बेहतर तरीके और कोमलता से आंदोलित करते हैं. पर बहुत कम कवि ही अधिकारपूर्वक ऐसा लेखन कर सकते हैं, जो मेरी दृष्टि में नई कविता से कुछ अधिक दुष्कर है. ज़ाहिर है, ‘नए कवि’ अधिक होते हैं. पर शायद यह वैयक्तिक रुचि की बात ज़्यादा है.

    अष्ठानाजी को पुनः बधाई इतने सुन्दर आलेख के लिए और मानिक जी और ‘अपनी माटी’ को इसे यहाँ पाठकों तक पहुँचाने के लिए.

    कमलानाथ

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