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जानकारीपरक आलेख :कमरूद्दीनशाह की दरगाह

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, दिसंबर 04, 2012 | मंगलवार, दिसंबर 04, 2012

’’कौमी एकता की प्रतीक कमरूद्दीन शाह दरगाह’’
रमेश सर्राफ धमोरा

भारत विभिन्न धर्मों व बहुरंगी संस्कृतियों का देश है। यहाँ जगह-जगह पवित्र देवस्थल, मजारें व अन्य धार्मिक स्थल स्थित हैं। राजस्थान का इनमें विशिष्ठ महत्त्व है। विश्व प्रसिद्ध अजमेर दरगाह की तरह ही झुंझनू स्थित कमरूद्दीनशाह की दरगाह का अपना अलग महत्व है।राजस्थान के शेखावाटी अंचल के प्रसिद्ध झुंझुनूं नगर के पश्चिम में ऊँचे टीले पर बनी कायमखानी वंश के प्रसिद्ध सिद्ध पुरूष कमरूदीन शाह की दरगाह लगभग डेढ़ सो वर्ष पुरानी है। इसके बाहरी भाग में एक विशाल तालाब तथा सामने शहर का सबसे पुराना व गहरा कुआ बना हुआ है। यहाँ एक ऐसी चट्टान भी स्थित है जिसके बारे में कहा जाता है कि बाबा जब यहाँ आये तो इसी पर बैठे थे तब यह क्षेत्र महज एक जंगल था एवं ऐसे सुनसान स्थल में कोई तपस्वी सिद्ध पुरूष ही रह सकता था।

बाबा कमरूद्दीन शाह का जन्म सन् 1784 में नूंआ ग्राम के कायमखानी कबीले में हुआ था। वे बचपन से ही बेहद ईमानदार एवं संत प्रवृत्ति के थें वे बिसाऊ के राजा श्यामसिंह के यहाँ कार्य करते थे, जहाँ वे दिन में राजकाज में व्यस्त रहते तथा रात को खुदा की इबादत करते थे। धीरे-धीरे उनकी ईश्वरोपासना की चर्चा राजा के पास पहुँची तो राजा ने उन्हें संवेतन राजकाज से मुक्त करते हुये केवल ईश भक्ति की बात कही, लेकिन शाह ने बिना काम वेतन लेना पसन्द नहीं किया और नौकरी छोडक़र कई धार्मिक स्थलों से दीक्षा प्राप्त कर झुंझुनूं चले आये। 

उस वक्त शाह ने अन्तरंग मित्र सिद्धि प्राप्त संत चंचल नाथ जी थे जो दरगाह से कुछ दूर एक टीले पर रहते थे, जहाँ आज भी उनका मठ बना हुआ है। ये दोनों मित्र चमत्कारी और अद्भुत क्षमता वाले थे। इन दोनों के मिलने का किसी को पता भी नहीं लगता था। दोनों का मिलन एक सुरंग में होता था लेकिन अब शहर में ऐसी किसी सुरंग का होना नहीं पाया जाता है। किवदन्ति है कि एक बार शाह को धन की आवश्यकता हुई तो चंचलनाथ ने उन्हें एक सोने की अशर्फी दी और कहा कि इसे कुये में डाल देना, धन ही धन हो जायेगा। इस पर शाह ने भी चमत्कार दिखाकर दरगाह के पीछे स्थित पर्वत को सोने का बना दिया। इस पर चंचलनाथ ने शाह के चमत्कार की प्रशंसा करते हुए उन्हें कहा कि यह ठीक नहीं है। नगरवासी सोने का पर्वत देखकर कट मरेंगे। चंचलनाथ के कहने पर शाह ने पर्वत को पुन: पूर्ववत बना दिया। इसी कारण आज भी दरगाह के पीछे स्थित पर्वत सोने सा चमकता दिखता है। सन् 1859 में उनकी वफात हो गई।

दरगाह के भीतरी भाग में शाह का आस्ताना और उनके पास उनके गद्दी नशीन हादीशाह की दरगाह तथा उनके तीन शिष्यों के मजार शरीफ हैं। सामने महफिलखाना है जहाँ उर्स पर कव्बालियाँ होती हैं। दरगाह के बुलन्द दरवाजे का निर्माण शिम्भूखान द्वारा करवाया गया था। यह दरगाह अपनी सुन्दर बनावट व दिलकश दृश्यों के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम भाई-चारे की प्रतीक भी है। दरगाह की तरक्की व तामीर में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी बड़ा योगदान रहा है। दरगाह में अंकित भित्तिचित्र देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षक का केन्द्र बने हुये हैं।

नेहरा पहाड़ की गोद में सौ फीट ऊँचे रेतीले टीले पर शहर की सबसे ऊँची इमारत होने का गौरव लिए यह दरगाह मुगलकालीन व राजस्थानी वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। दरगाह के बुलन्द दरवाजे से पूरा शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। बिसाऊ राजा श्यामसिंह द्वारा प्रदत्त 137 बीघा भूमि पर बनी उक्त दरगाह में सालाना उर्स के मौके पर कव्वालों द्वारा कव्वाली के साथ भजन भी गाये जाते हैं।

इस दरगाह में प्रधानमंत्री एच.डी. दैवेगोड़ा, राजस्थान के राज्यपाल बलिराम भगत,मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई सम्मानित एवं महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ पधार चुकी हैं। हजरत की जीवनगाथा को लेकन हिन्दी, उर्दू में अनेकों पुस्तकें लिखी गयी हैं, जिनमें ’’वाक्याते कौम कायमखानी’’, ’’रिसाला सब चिराग’’ तथा सालिक अजीजी लिखित ’’तनवरे कमर’’ प्रमुख हैं।

प्रस्तुति:




रमेश सर्राफ
स्वतंत्र लेखक और रचनाकार 
झुंझुंनू,राजस्थान
मोबाईल-9414255034 
ई-मेल-rameshdhamora@gmail.com


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1 टिप्पणी:

  1. यह कौमी एकता की अनूठी मिसाल है । ऐसे लेख शान्‍ती और सौहार्द पैदा करते है तथा नई जानकारी भी देते है । आपको असीम धन्‍यवाद ऐसा सुखद प्रयास के लिये ।

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