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डॉ मनोज श्रीवास्तव की कहानी 'भूख का पुनर्जन्म'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012 | शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012

                                   यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

डॉ मनोज श्रीवास्तव की कहानी हमेशा अपने ज़बरदस्त 'लोकेल' के साथ पाठक को घेरती है।-सम्पादक 

प्रस्तुत है आज  'भूख  का  पुनर्जन्म'
                                                                      
जब तक नदी-नालों में पानी लबालब रहता है, आंखों में भी पानी का अकाल नहीं पड़ता। जरा-सी बात पर आंसू ऐसे भरभराने लगते हैं, जैसे माघ-फागुन में बिना हवा के पेड़ों से पत्ते झरने लगते हैं। पता नहीं, किन ताल-तलैयों से आंखों में इतना पानी भरता रहता है कि ऊं-आऊं किए  बिना ही गाल गीले हो जाते हैं? लेकिन जैसे-जैसे गांव-जवार में पानी सूखता जाता है और उपजाऊ जमीन पपड़ाकर दीयर में बदलती जाती है, वैसे-वैसे निचाट दुपहरी की धूप का डर हिहियाते भूत-सरीखा मन में उतरता जाता है। अगर कुआर-कातिक में दुपहरिया नहीं होती तो जमीन का पानी भी इस कदर सूरज का ग्रास नहीं बनता। शरीर का खून सूखकर, हाड़-मांस इस तरह चिचुक नहीं जाता। पेट, पीठ से चिपककर छिपली नहीं बन जाता। आंखें डेढ़ ईंच धंसकर गहरा कटोरा नहीं बन जाती। च्च,च्च,च्च, इस बुजरी लपट मारती हवा ने भी गला टीप रखा है। जब उसनती हवा फेफड़ों में उतरती है तो लगता है कि उसके करेंट से प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। एक पल में, मुंह से सारा खून भल्ल-भल्ल जमीन पर छितर जाएगा और बेदम देह वहीं गिरकर कायदे से छटपटा भी नहीं पाएगी।

खरबोटना को सबेरे-सबेरे खुद पर बड़ा तरस रहा था। कल आधी रात तक बंजर खेतों में डांय-डांय भटकता रहा। गड़हियों में सांप-छछुंदरों के बिलों में अपने लुआठ हाथ डाल-डालकर जोहता रहा कि कोई मूस भले ही हाथ लगे, लेकिन एकाध छछुंदर ही मिल जाए तो पेट की भड़सांय की थोड़ी आग बुझे। अंधेरे में जहां भी जरा-सा गड़हा नज़र आता, वह उसमें हाथ डालने की कोशिश करता। उसकी उंगलियां खुरपी से भी ज्यादा तेज चल रहीं थीं, पैर फावड़े से भी तेज चलकर मिट्टियां हटा रहे थे। लेकिन, बार-बार निराशा ही हाथ लगती। पर, उसे लग रहा था कि आज उसे कुछ कुछ जरूर मिलेगा। इसलिए, उसे पैरों में चुभने वाले बबूल के कांटों को निकालने की भी फुरसत नहीं थी। हाथ के नाखुनों में घुसी डेढ़ सेर मिट्टी की भी कोई परवाह नहीं थी। आखिर, दो दिनों से उसे खाने को कुछ भी नहीं जुरा था। परसों पौ फटने से पहले लुक-छिपकर कोठी के पिछवाड़े गया था और नाबदान से निकलने वाले पानी को एक गगरी में इकट्ठा करके और उसे चींकट अंगोछे से छानकर दो-तीन बार गटककर गला तर किया था। बस, तब से इतना ही खाया-पीया था।

" दहिजरवा, मुकुरजी-चौदरी के नूकर-चाकर सुबेरे से सांझ तक इहैं डेरा-डंडा डारे रहते हैं...हम खटिक-पासी जनों के बास्ते एक्कौ जिंदा मूस नहीं छोरते। एक तो ससुरों के लिए सहर से कलेवा आता है, उनके रिस्तेदारन के इहां से...दूसरे, उनके ये जने हमारे खाना-खुराक पर सारा दिन गरहन लगाए बैठे रहते हैं..."
उसे लगातार बुदबुदाते रहने से बड़ा संतोष मिल रहा था। बल्कि, इससे उसकी हिम्मत बढ़ती जा रही थी।

आज भिनसारे से खड़ी दुपहरिया के बीतने तक वह एक घूरे की ओट में खरहरी जमीन पर लेटे-लेटे बबुआनों के ढीठ नौकर-चाकरों को निहारता रहा है। उनके हाथ बड़ा माल-पानी लग रहा था। जिंदे मुसटंडे मूसों से उनकी बोरियां भरती जा रही थी। पास में ही उछलते-कूदते उनके लौंडे-लफाड़े कुछ मूस भुन-भुन लगातार खाए भी जा रहे थे। जब वे नाखुनों से निकोर-निकोर, भुने मूसों की खाल उतारते, तो उसके मुंह से लार टपकने लगता। भूख की बेहाली में, आंखें रो-रोकर और धंसती जा रही थीं। ऐसे में जी करता था कि वह खरहे की भांति कुलाचें-कलइया मारते हुए उन मूसखोरों के हाथों से सारे मूस एक ही झपट्टा में लूट ले जिन्हें वह गबर-गबर भकोसकर अपनी भूख मिटा ले। लेकिन अगले ही पल, उनके हाथों पिट-पटकर बेमौत मरने के ख्याल से उसके बदन में झुरझुरी सी होने लगती। बाप रे, बाप! उसे पलटुआ को मार खाकर मरने का दृश्य अभी भी बौखला देता है।

उसे यह तो याद नहीं है कि वह घटना कितने दिन पुरानी है। हां, पलटुआ के मरने के बाद से उसने कोई सात बार भरपेट सांप और मूस भुन-भुन खाया है। यानी, कोई तीन हफ्ते तो बीते ही होंगे। उस दिन सूरज खोपड़ी पर भट्ठी जैसा सुलग रहा था। वह और पलटुआ यह तय करके आए थे कि वे आज चाहे जो भी हो, उन लठैत मुसखोरों के बीच जाएंगे और उनके छौनों से भुने मूसों की पोटलियां झपटकर भाग खड़े होंगे।

लंगड़ा पलटुआ अपनी झोपड़ी से निकलकर रास्ते भर बतियाता जा रहा था। जवाब में खरबोटना अपना राग आलापने लगा, " लंठ जमींदारन के कमकर अपन को राय-ठाकुर से कमतर नहीं बूझते हैं... जमीन को अपने पुरखन की जमीन मानते हैं...कल तक इहां खेत-खलिहान रहा तो हमजने अपना मेनहत से सोना उगाते थे, मजे में लिट्टी-चोखा खाने का बंदोबस्त हो जाता था...लेकिन जब से बरखा के बिसुक जाने से इहां सूखा परा है, ' कुल जमीन दियरा बन गया है, हमारे बाप-दादा लोग अपना खेत-बार, गाय-गोरू इन ससुरों को कौरी के भाव बेंचके हमजने को लायक भी नहीं छोरा है कि हम अपनी ही माटी में से कीरे-मकोरे बिन-बिनके खा सकें...बस, एक दौरी जवार और एक झोरी बाजरा के बास्ते कहूं कागज पर अंगूठा टेप देते थे... ससुरे तो अपनी जिनगी का पगहा तुराके, सरग में बइठे मौज उरा रहे हैं ' हम चुतिए इहां घूम-घूमके अपना पेट जला रहे हैं...अब, इन मउगड़ों को देखो, दिनभर हमरे खेत से चूहा चिचोरते हैं ' रात में अपने मालिकन से गंड़मरौनी खेलते हैं..."

खरबोटना की बात से पलटुआ का ग़म पिघल-पिघल आंखों से बरसने लगा, "अरे मर्दवा, तुम ठीक कहते हो...जब से हमारे देस में सूखा परा है तब से हमारे माई-बाप के साथ-साथ खेत-खलिहान सब बिलाय गवा है... दिन हमे खूब याद है, जब हमार खन्दान दही-माखन से सूत-उठते नहाय लेता था। क्या मिजाल कि हम केहू दिन मूस-छुछुंदर खाए के बारे में सोचे हों? सतुआ तक तो हमजने खाते नहीं थे। माल-पूरी खाते थे। करेमुआ के साग संगे फरौंठा से नास्ता करते थे। अदरख डारि के छेरी के सुच्चा दूध का चाय चुसुकते थे। जब बिहाने बोस के पोखरा से हम बाऊ संग नहाय-धोके वापिस आते थे तो माई छिपली भर-भर कोदो का भात ' खेसारी का दाल हमसे ढेचकवाती थी। सांझी को इनार के आगे अलाव के नियरे बैठके आलू भूज-भूज, नून संग चांभते थे..."

खरबोटना भी लफड़-लफड़ भागते हुए, अपने सुनहरे अतीत में खोया हुआ था। उसने अपना याराना दिखाने के लिए अपना बांया हाथ पलटुआ के कंधे पर टिकाया हुआ था और दांए हाथ से गांड़ खुजलाते हुए बेहद भावुक हुआ जा रहा था।

"पलटुआ, हमका भी जमाना ना बिसरत है। दस-बारह बरिस में, हमनी का जिनगी दुस्वार होइ गवा। बरखा कइसन होला, हमें याद ना हवै। बस, याद हवै कि जब हौले-हौले खेतिहर जमीन झुराय के कड़कड़ाय-पथराय गइल, तब ओडिसा जिला के ताल-पोखरा पर लोग टूट परे। जब ताल-तलइया भी खरखटाइ गवा तो भूखे-पियासे लोग इनार में कूदने-फांदने लगे...अरे, हमजने कइसे कच्चा अनाज घुन ' किरौना संग फांक जाते थे...जब पानी के संग-संग दाना भी ना बचा तब हम आम के गुठली कचर-कचर चबाके गुजारा करने लगे। ओकरे बाद, हम पेड़-पल्लू के पाती चबाए, पेड़न के राल-लासा चाटे, दूसरे गाम में जाके गाय-गोरू के गोबर में से दाना बिन-बिन खाए। पेड़न के खोह में हाथ डारि-डारि के सारे चिरिया ' उनके अंडे-बच्चे उसन-उसन भकोस गए। फेन, दियरों में भागते-पराते खरहे-खटवास भी डकार गए। गुह खाए अऊर गरमी से पछाड़ खाके जो कउवा-चील्ह गिर-मरके सड़-गल गए थे, उनके मास खाए। बाद में, जब जंगल-जमीन सब जनावर से खाली होइ गवा तब हमजने मूस, छुछुंदर, बिच्छू, गोजर, सांप पर टूट परे। तब तलक, राय-चौदरी के भुक्खड़ नौकर-चाकर जाग गए थे। लोग अपना हक हमरी जमीन पर जमाने लगे ' उहां से हमें बेदखल कर दिया। सो, कीरा-मकोरा खाने का हमारा सपना भी टूट गवा..."

बोलते-बोलते खरबोटना की घिग्घी बंध गई। लेकिन, तब तक दोनों बतकही में खोए हुए तेज कदमों से खेतों के किनारे पहुंच चुके थे। सालों से तपती धूप के कारण, रेह का चमकता आवरण दूर तक फैला हुआ था जिस पर मूस पकड़ने वाले सैकड़ों काले-भुजंगे लोग गड्ढे खोद-खोद  मूस तलाश रहे थे। इधर-उधर उनके छटंकी बच्चे कलमुंहे बंदरों की माफिक आग में मूस भुन रहे थे। कुछ बच्चे भुने मूसों के छिलके उतारकर मजे से उन्हें करर-करर चबाकर चटाखारे ले रहे थे। दूर-दूर तक जलते मांस की गंध के कारण, खरबोटना और पलटुआ की भूख बेतहाशा बढ़ गई। पलटुआ ने उसकी आंखों में आंखें गड़ाकर देखा। फिर, उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए तसल्ली दी, "मर्दवा, इचको भर मत घबराओ, हम अबहीं हरामजादों से गरमागरम मूस छीनके लाते हैं।"

खरबोटना ने पहले उसे बड़ी आत्मीयता से छुआ। उसके बाद, मेढ़ के नीचे दुबककर, बदन सिकोड़ते हुए बैठने के अंदाज में लेट गया और लंगड़ा पलटुआ का करामात देखने लगा। उसे पूरा विश्वास था कि आज उसे पेटभर ताजा-भुना मूस भकोसने को नसीब होगा। पलटुआ चोर कदमों से, झुराए सरपतों की आड़ में और घूरों के पीछे लोटते हुए नेवले की तरह रेंग रहा था। वह पास में ही चांव-चांव करते बच्चों के एक झुंड के एकदम पास पंहुच गया। तभी अचानक, तड़ित दामिनी की भांति उसमें तेजी गई। उसने बिल्कुल उनके बीच छलांग लगाई और जमीन पर पड़े कोई दर्जनभर मूस हड़बड़-हड़बड़ बटोरकर उल्टे पैर भाग खड़ा हुआ। बच्चे तो हदसकर, "बाऊ-बाऊ" चिल्लाते हुए इधर-उधर बिखर गए। खरबोटना को पलटुआ की ढिठाई देख, जैसे सांप सूंघ गया। लेकिन, जब तक वह उसके पास पहुंचकर उसे गुहारता कि "दुम दबाके भाग रे, खरबोटना", तब तक वहां के सभी सयाने लौंडे और मर्द अपने-अपने हाथों में हंसुली, खुरपी, लाठी लिए चौकन्ने हो चुके थे। उन्हें यह कत्तई गवांरा नहीं था कि उनकी मेहनत की कमाई पर कोई ऐरा-गैरा दांत गड़ाए। सो, वे उसे धर-दबोचने के लिए एक-दूसरे को ललकारने लगे। पलटुआ और खरबोटना तो खतरों की सरहद लांघने के लिए जी-जान से भाग रहे थे। पर, कुछ पल बाद, खरबोटना ने पीछे घूमकर देखा कि गुस्से में बौराए कम से कम डेढ़ दर्जन मोटे-तगड़े लोग उनके बिल्कुल पास चुके हैं। बस, कुछ ही सेकेंड में वे उनकी पकड़ में जाएंगे। पता नहीं, वे उनके साथ कैसा सलूक करेंगे! उनके पास आने के एहसास से उन्होंने अपनी गति और भी तेज कर दी। लेकिन तभी, किसी ने अपनी लाठी उन पर फेंककर मारी जो पलटुआ के पैर में उलझ गई।

पलटुआ औंधे मुंह गिर गया। वे उस पर बाघ की तरह झपट पड़े। खरबोटना की तो जान सूख गई। वह भागता गया। उसने पीछे मुड़कर यह भी देखने की जुर्रत नहीं की कि उसके यार के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है। पलटुआ उनकी बेरहम पिटाई से ऐसे चींख-चिल्ला रहा था जैसे कोई सुअर जिबह किए जाने से पहले आग की लपटों के ऊपर झुला-झुलाकर झुलसाया जाता है और उस वक़्त वह बड़ा हृदय-विदारक शोर मचाता है। कुछ क्षण बाद ही उसका चींखना अचानक बंद हो गया। खरबोटना को उसकी एकबैक खामोशी से बड़ा अज़ीब-सा लगा। कोई आधा फर्लांग दूर जाकर जब उसे तसल्ली हो गई कि अब वह खतरे से दूर निकल चुका है तब उसने रुककर सांस ली और जिज्ञासा से नजर उठाकर पीछे देखा। उसका तो रोम-रोम कांप उठा। वे लोग उसे लात-घूसों से अधमरा करने के बाद, उस पर हंसिए, खुरपी और गंड़ासों से प्रहार कर रहे थे। खरबोटना सिसकारी मारकर चींख उठा। उसको यकीन हो गया कि उसके बचने की गुंजाइश ना के बराबर है।

उस घटना के बाद पलटुआ फिर कभी गांव-जवार में दिखाई नहीं दिया। मुंहचोर खरबोटना समझ गया था कि बाबूसाहबों के मरभक्क कमकरों ने पलटुआ को मारकर उसकी लाश को वहीं कहीं मैंदान में निपटा दिया होगा। मूस लूटने की उसे इतनी बड़ी सजा मिलेगी, उसने कभी ऐसा सोचा भी नहीं रहा होगा। वह देर रात तक जमीन टो-टोकर उसकी लाश जोहता रहता। उसका कहीं कोई अता-पता नहीं मिला। आखिरकार, थक-हारकर वह फिर अपने खाने के जुगाड़ में लग गया। उसने टोले में किसी को नहीं बताया कि पलटुआ के साथ क्या हुआ। वह सच्चाई बताकर अपनी जान सांसत में डालने की कबाहट मोल लेना नहीं चाहता था। जब लोग उससे पूछते कि तेरा यार तो तेरे साथ ही रहा करता था तो वह साफ-सपाट कह देता, "काजनी, कहीं मूस धर रहा होगा, नहीं तो चारा-पानी जोहते-जोहते कहीं अऊर चला गिया होगा..." उसके उत्तर से पलटुआ में गांववालों की दिलचस्पी खत्म हो जाती।

माहौल ही कुछ ऐसा बन गया था कि आए दिन कोई कोई अचानक ही गायब हो जाता और फिर दोबारा नजर नहीं आता। क्योंकि उन्हें किसी व्यक्ति की लंबी अनुपस्थिति से यकीन हो जाता कि वह या तो कहीं भूखा-प्यासा मर गया होगा या किसी दूर के शहर में भीख मांगने निकल गया होगा। आमतौर से, किसी को किसी के बारे में ज़्यादा सोच-विचार करने की मोहलत कहां थी? पेट के बारे में जो उन्हें आठोयाम सोचना पड़ता था।

लेकिन, खरबोटना के जेहन से पलटुआ कहां उतरने वाला था? उसका खयाल आते ही उसका मन मसोसने लगता। बिचारा अपने वंश का आखिरी वारिस था। पांच जनों के परिवार में वही अकेला बचा था। उसका बाप फुक्कन तो छः साल पहले ही स्वर्ग सिधार चुका था। तब, रोजगार की इतनी मारा-मारी भी नहीं थी। लोगबाग खेती-बारी से बहुत पहले ही हाथ झाड़ चुके थे। खेतों में मजूरी करना गोईंठा में घी सुखाने जैसा था। बोस-घोष काश्तकारों के नलकूपों के उधार के पानी से कब तक वे अपने खेत सींचते? ग्रामीण बैंकों से चालीस फिसदी कमीशन पर कर्ज़ लेकर कब तक घाटे की खेती करते? भूखे-प्यासे रहते हुए कब तक अपने पुश्तैनी धंधे से चिपके रहते? सो, फुक्कन भी एकदम आजिज   गया। 

एक दिन, उसने अपनी मेहरारू भकजोगनी से कहा, "अब, हम झुराए खेतन में, घाम में चाम झुलसाय-झुलसाय अपना गांड़ काहे सुखाएं? बात पक्का बूझ लो कि हम अपना खेत-बार बबुआनों के बेचके कौनो धंधा जमाएंगे। मखंचुआ सुझावत हौ कि 'बाऊ, तूं इक्का चलाने का धंधा चालू कर दो।' हमका उसका सुझाव जंच गवा है..."
भकजोगनी ने अपनी खामोश आंखें मिचमिचाते हुए, उसकी योजना पर अपनी मौन सहमति दे दी। फुक्कन तत्काल एक लोटा पानी गटागट पीकर बाहर निकल गया। उसके बड़े बेटे मखंचुआ का सीना चौड़ा हुआ जा रहा था। अब वह इतना सयाना हो गया था कि घर के अहम मामलों में उसके मशविरे को तबज्जो मिलने लगा था। पलटुआ अपने बड़े भाई के दर्प-भरे चेहरे को देख, एकदम जल-भुन गया। यह स्वाभाविक भी था क्योकि वे दोनों जुड़वा पैदा हुए थे। बस, मखंचुवा उससे कुछ ही मिनट पहले दुनिया में आया था। इसका खामियाजा उसे इस कदर भुगतना पड़ेगा, उसने ऐसा कभी सोचा भी नहीं था।

खैर, हफ़्ते भर के जद्दोजहद के बाद जब उनकी झोपड़ी के सामने घोड़ी से जुती नई-नवेली इक्कागाड़ी खड़ी हुई तब मखंचुआ ने पलटुआ को अपना फरमान सुनाया, "सुन छोटकू, तूं ' बाऊ, दोनों जने इक्कागाड़ी से रोजगार कमाओगे। टेसन से केवड़ा, जग्गीपुर ' ठकरौली गांव तक पसिंजरों का अप-डाउन कराओगे। हम इहां गिरहत्थी में माई का हाथ बंटाएंगे।"
इस हुक्म से मखंचुआ और बड़ा हो गया था। लिहाजा, पलटुआ उसकी अवळ्ाा करने की गुस्ताखी कैसे कर सकता था जबकि उसके माई-बाऊ दोनों मखंचुआ के निर्देश पर, मुंह सिले खड़े थे?

केवड़ा गांव में, इक्कागाड़ी के बलबूते पर फुक्कन का परिवार बढ़िया खा-कमा रहा था। सो, गांव में उनकी धाक जमती जा रही थी। यों तो, पलटुआ अपने बाऊ के साथ पैसा कमाने में सुबह सात बजे से रात बारह बजे तक अपने हाड़-मांस गला रहा था, लेकिन घर में दाना-पानी के बंदोबस्त में मखंचुआ को कहीं ज्यादा मशक्कत करनी पड़ रही थी। भोर उठते हीे, उसे पानी की तलाश में कई कोसों दूर तक भटकना पड़ता था। चुंकि, गांव के बनिए अकाल का लाभ उठाकर अपने सामान दसगुनी कीमतों पर बेच रहे थे, इसलिए उसे भुजिया चावल, खेसारी की दाल, बाजरे का आटा, नून-मसाला, तेल-फुलैल वगैरह बीस कोस दूर, शहर से लाना पड़ता था--बाकायदा पीठ पर लादकर। पलटुआ के मन को बड़ी ठंडक मिल रही थी कि 'चलो, उसका भाई घर बैठकर मौज नहीं उड़ा रहा है, बल्कि उसे उससे ज़्यादा पसीना बहाना पड़ रहा है।'

एक दिन गजब हो गया। फुक्कन के नसीब को पहले से ही गांववालों की नज़र लगी हुई थी। जब वह कुछ यात्रियों को उनके ठिकानों पर छोड़कर, अपना खाली इक्का रेलवे स्टेशन के रास्ते पर दौड़ा रहा था तभी उसकी घोड़ी एकदम से बिदक गई। उसकी गुहार पर पलटुआ ने तो पहले ही छलांग लगाकर अपनी जान बचा ली। पर, फुक्कन घोड़ी की लगाम थामे हुए उसे पुचकारता रहा। लेकिन, इस फन में वह नौसिखवा होने के कारण, कुछ नहीं कर सका। उसकी घोड़ी पतंग की माफिक इक्के को उड़ाते हुए मुख्य मार्ग से हटकर मैदान में भागने लगी। बिचारा फुक्कन डरा-सहमा इक्के से चिपका हुआ उत्तेजित घोड़ी के शांत होने की प्रतीक्षा करता रहा। उसको यह भी समझ में नहीं आया कि उसे समय रहते  इक्के से कूदकर अपनी जान बचा लेनी चाहिए। इसका नतीजा बड़ा बुरा हुआ। उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। अगर वह इक्के के पीछे या बगल में गिरता तो उसके बचने की गुंजाइश होती। पर, वह तो इक्के के आगे औंधे मुंह गिरकर घोड़ी के पैर में उलझ गया जिससे रौंदाकर उसकी तत्काल मौत हो गई।

बिचारा फुक्कन तो मर गया। लेकिन उसकी मौत का ग़म भूख से जलते पेट के आगे बिल्कुल बौना पड़ गया। मखंचुआ जैसे-तैसे अपने बाप का क्रिया-कर्म निपटा करके दो रोटी कमाने के जुगत में लग गया। उसके सामने वही इक्कागाड़ी चलाकर रोजी-रोटी कमाने का एक आसान माध्यम था। मन में बड़ी हिचक भी थी क्योंकि उसी इक्के से गिरकर उसके बाप की मौत हुई थी। पर, उसने अपने मन को सख्त करके उस झक्की घोड़ी की लगाम सम्हाली। उस दुर्भाग्य में संघर्ष करने के लिए पलटुआ ने दाजाहिस्का को तौबाकर मखंचुआ के साथ इक्के में बैठ, यात्रियों से किराया वसूलने लगा। बहरहाल, भकजोगनी रोज रात को सपने में अपने मुए मर्द के भूत को देखकर नींद में ही बाऊं-बाऊं करने लगती। वह देखती कि फुक्कन का भूत उसी इक्के पर सवार होकर रेलवे स्टेशन की तरफ चला जा रहा है। वह एकदम आतंकित हो जाती। सुबह उठकर जब वह सपने वाली बात लड़कों को बताती तो वे ठठाकर हंस पड़ते। मखंचुआ तत्काल बोल पड़ता, "माई, बूझ लो कि हमार बाऊ मुई गए तो क्या हुआ, हमेसा हम सबन का रच्छा करते रहेंगे..." पर, उसकी बात से उसे कुछ क्षण के लिए ही ढांढस बंधता। वह चौबीसो घंटे उनकी सलामती के लिए भगवान से विनती करती होती और फुक्कन की आत्मा का ध्यान करके बड़बड़ाती रहती कि "तूं अब तो मानुस से देउता बन गए हो। सो, हमार बच्चन का रच्छा करना। हम बुढ़िया का उनहीं का आसरा है।"

लाख मिन्नतों के बावज़ूद, एक दिन उस सनकी घोड़ी का मिजाज फिर बिगड़ गया। जानवर तो जानवर ही ठहरा। सिर चटकाती धूप ने उसे फिर शैतान बना दिया। इस बार, वह तब मुख्य रास्ता छोड़, ऊबड़-खाबड़ दीयर में भाग खड़ी हुई जबकि उस इक्के पर कुल ग्यारह लोग सवार थे। उसकी लगाम थामे मखंचुआ का तो जैसे डर के मारे सारा खून ही जम गया इक्के के पीछे लटका पलटुआ पके आम की तरह चू गया। लेकिन, इसे भगवान का चमत्कार कहो या फुक्कन की आत्मा का जोर, जो इक्के का एक पहिया एकबैक धूप से फटी एक मोटी दरार में धंसकर फंस गया। इक्के पर सवार किसी यात्री का बाल भी बांका नहीं हुआ। पर, इक्के से उतरते ही मखंचुआ पीछे भागा, दर्द से कराहते पलटुआ की चोट सहलाने। पलटुआ की चोटहिल दशा देखकर वह दहाड़ें मार-मार रोने लगा। उसके पैर की हड्डी खिसक गई थी और खोपड़ी भी फट गई थी।

फुक्कन के परिवार ने कभी अस्पताल नहीं देखा था। बीमारी-अजारी में महाकंजड़ झुनका बैद से दवा-दारू कराते थे। लेकिन, पलटुआ के इतने बड़े घाव का इलाज झुनका कैसे कर सकता था? उसके तो देखते ही हाथ-पांव फूल गए। उसने खुद सलाह दी कि पलटुआ को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराओ। वे पूरे सोलह दिनों तक वहां रहे। माई भकजोगनी और बहिन मनरौतिया हाऊं-हाऊं रोकर अपनी पीड़ा दीवारों को बयां कर रही थीं। मखंचुआ ने इलाज के लिए कहां-कहां से पैसे उगाहे थे, उन्हें क्या पता? उसने पहले घोड़ी बेची, फिर इक्का। आखिर में, दो हजार रुपए पर अपनी झोपड़ी दादू मुखर्जी के हाथ गिरवी रख दी। बस, छोटकू की जिंदगी बचाने की ख़्वाहिश थी, और कुछ नहीं... जब पलटुआ चंगा होकर बाहर आया तो वह थोड़ा-सा लंगड़ा-लंगड़ाकर चल रहा था। लेकिन, उसे अपने लंगड़ेपन से उतनी शिकायत नहीं थी जितना अपने इलाज के कारण आई कंगाली से। वह माथा पकड़कर बैठ गया।
"भइया, हमका जिनगी देने के बास्ते तुमने इत्ते जनों का जिनगी मेट दिया है। तबियत से खाए को भी नईं जुरता था, अब ' घाम में उसनके ' राति में उघारे सोइके कइसे जिनगी गुजारेंगे?"

मखंचुआ ने बकबकाते पलटुआ के कंधे पर हाथ धरा। "छोटकू, तूं तनिक भी मत घबरा, जब तलक हम जीयत हइ, तुम केहूं का कछु नहीं बिगरेगा। हम जी छोरके मेनहत करेंगे तुम जनों ' पेट पालेंगे।"

यों तो, सारा जिला-जवार अकाल और भूख की परवान चढ़ा हुआ था लेकिन स्वर्गीय फुक्कन दुसाध का परिवार जिन दुर्दांत परिस्थितियों से जूझ रहा था, उसका बयान करना बेहद तकलीफदेह है। वे दिनभर मेहनत-मजूरी करते और रात को गांव से लगने वाली सड़क के किनारे सो जाते। मर्दों का खुलेआम खरहरी जमीन पर सोना तो ज़्यादा अस्वाभाविक नहीं होता, लेकिन जवान लड़की का इस तरह सोना आने-जाने वालों को कहां सुहाता है? भकजोगनी भभकती जवानी से गदराई अपनी बेटी--मनरौतिया के अल्हड़पन से ऊबकर उसे पहले से ही बरजती रही है,  "गली-गली, अइसे चूची झुलावत के, डांड़ मटकावत के मत घूम, नईं तो गाम के बौराए बोंका तोहें चर जाएंगे।" उसने ठेकेदार मजूमदार के लफंगे लौंडों को उसके पीछे मंडराते कई बार देखा था और उसे हर बार उनसे आगाह भी किया था। मनरौतिया रातभर सड़क-किनारे सोते-सोते कसमसा-कसमसाकर करवटें बदलती और बार-बार उघारी हो जाती। ऐसे में, भकजोगनी अपना लुग्गा उतारकर उसके नंगे बदन पर डालती रहती। पर लाख कोशिशों के बाद भी, एक दिन अनहोनी घट ही गई। जिन वहशियों की आंखों में मनरौतिया की जवानी चुभ रही थी, वे उसे आधी रात को सोते वक़्त मुंह दबाकर निचाट में उठा ले गए। उसके दोनों जवान भाइयों को इसका खटका तक नहीं लगा। बिचारे भिनसारे से शाम के आठ बजे तक ईंट के भट्ठे पर सांचों में ईंट ढालते-ढालते इतने थक कर चूर हो गए थे कि वे नींद में गाफिल, जिंदा लाश बन गए थे।                                                                            

सुबह उठते ही वे अपनी बहिन के गायब होने पर हकबका गए। वे दोपहर तक उसे ढूंढते रहे। उन्हें यकीन हो गया कि उसके साथ जो नहीं होना चाहिए था, वह घटित हो चुका है। उन्हें बर्बरतापूर्वक लुटी-पिटी अपनी बहन की लाश दूर एक उजड़ी झोपड़ी में मिली, जिसे कुछ गीदड़ और सियार नोच रहे थे। मखंचुआ ने झट अपना मैला-कुचैला कुर्ता उतारकर उसके नंगे जिस्म को ढंक दिया। माई भकजोगनी की आंखें तो उसे देखते ही पथरा गईं। जीभ तलवे से चिपक गई। पलटुआ अपनी माई को खींचकर बोस के सूखे पोखरे की आड़ में समझाने-बुझाने ले गया। जाते-जाते उसने मखंचुआ को आंख मारकर इशारा किया कि मनरौतिया की लाश को कहीं ठिकाने लगाना ही सही होगा नहीं तो माई रो-रोकर पगला जाएगी। बिचारा मखंचुआ करता क्या? पलटुआ के जाने के बाद, वह लाश के आगे घिघियाकर घंटों रोता-बिलखता रहा। फिर, उसने वहीं एक गड्ढा खोदा और मनरौतिया की लाश को उसमें लुढ़काकर उसे मिट्टी से तोप दिया। उसे रीति-रिवाज निभाने का तो कोई ख्याल ही नहीं आया।

परिवार के छोटा होने पर, मखंचुआ को खाना-खर्चा के लिए थोड़ी कम मेहनत करनी पड़ती थी। जब तक मनरौतिया जिंदा थी, उसकी खुराक देखकर तो भकजोगनी की आंख ही निकल जाती थी। वह जोर से बड़बड़ाती, " डाईन ' पेट ' कि मराड़।" इस पर भी जब वह थाली नहीं छोड़ती तो वह उसे लतियाते हुए झोटा पकड़कर जमीन पर धकेल देती।
भकजोगनी की आंखें यह सब यादकर बरसने लगतीं। एक दिन तो वह एकदम भावुक हो गई। दहाड़ें मारकर रोने लगी, "जदि हमका मालूम होता कि मनरौतिया इत्ती जल्दी मू जाएगी, ' हम ओके आधा पेट खाना काहे खियाके सुआते रहते? बुड़भकई करके हम जने जिनगी भर पछतियाएंगे।"

उस वक़्त, दोनों लड़कों की आंखें भी छलछला गई थीं। मखंचुआ को कभी-कभार शहर भी जाना पड़ता था। पलटुआ का विचार था कि उसका बड़ा भाई वहां किसी रोजी-रोटी के फिराक में जाया करता है। लेकिन, एक दिन जब वह शहर से लौटा तो उसके साथ तीन छरहरे जवान भी थे, अजूबे से, जींस के पैंट-शर्ट पहने हुए। उसने पलटुआ के कान में फुसफुसाकर कहा, "छोटकू, लोग हमारे जानने वाले हैं...सहर में हम जब जाते हैं ' हमसे मुल्कात करते हैं, हमारे दोस्त हैं... का कहते हैं--कामरेड हैं...माने कि लोग नस्कल लोग हैं। गरीबन की सुभिस्ता के बास्ते कुड़बानी देते हैं। लोग हमसे कहते हैं कि तुम्हारे ऊपर जदि सेठ-सेठाड़ी लोग अतियाचार करते हैं ' हमें बताओ, हम उन हरामखोरन को सीधा कर देंगे।"

पलटुआ को पहले तो कुछ भी समझ में नहीं आया। वह इधर-उधर बकर-बकर ताकता रहा। लेकिन, जब उसने उनके थैले में झांककर तमंचा, करौली, फरसा आदि देखा तो वह बिल्कुल बौरा गया। वह अपने बड़े भाई की गरदन पकड़कर एक ओर खींच ले गया और आंखें तरेरकर गुर्राने लगा, "भइया, हमका तुमारे लच्छन ठीक नईं लगते हैं, तुम मनरौतिया के इज्जत लूटने वालन ' उसको मारने वालन को उप्पर पठाना चायते हो, ना। ठेक्दार ' महाजन के अवारा पूतों से दुस्मनी मोल लेके, अपनी नटई ओखली में देना चायते हो, ना। नस्कली जने बस लहू के पियासे होते हैं। आदमी को जनावर सरीखा काट देते हैं। हम तुमको बरज देते हैं कि जदि लोगन ने कछु उल्टा-सीधा किया ' हम जने में से केहू नईं बचेगा। लोग हमें निर्बंस कर देंगे।"

मखंचुआ पर उसकी बात का कोई असर नहीं हुआ। वह उसे "बोंका" कहते हुए फिर उन शहरियों के पास जाकर उनसे बतियाने लगा। पलटुआ उन्हें पलट-पलटकर घूरता रहा। थोड़ी देर बाद, वे कहीं चले गए। तभी, भकजोगनी कुछ गोईंठे और लकड़ी बिन-बटोरकर आई और मेढ़ की आड़ में लिट्टियां पाथ-पाथ सेंकने लगी। दोनों लड़के भी वहीं बैठकर नून से लिट्टियां चबाने लगे। सांय-सांय सन्नाटा दूर तक फैला हुआ था। पलटुआ ने तो जैसे कुछ बोलने की कसम खा रखी थी। अन्यथा, वह हमेशा पिटर-पिटिर बोलता ही रहता था। लेकिन, जब चुप्पी का लंबा होना सभी को अखरने लगा तब  मखंचुआ बरबस ही बोल पड़ा।

"माई, सहरी जने फेन आए थे।"
भकजोगनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। लेकिन, पलटुआ को समझ में गया कि माई और बड़कू के बीच पहले से कुछ पक रहा है।
"पलटुआ के भी अपना पिलान बता दे।"

भकजोगनी की बात सुनकर, पल भर के लिए दोनों की निगाहें परस्पर टकराईं। उसके बाद, पलटुआ बहटियाने लगा। भकजोगनी को यकीन हो गया कि पलटुआ को यह सब रास नहीं रहा है। लिहाजा, उसने साहस बटोरकर फिर कहा, "बचवा, तोहार भइया नस्कल पाट्टी में सामिल हो रहा है। चाहत है कि तोहूं ओम्में सामिल होके अपनी मनरौतिया का बदला ले..."

उसकी बात पूरी होने से पहले ही पलटुआ बरस पड़ा। उसकी इच्छा थी कि फिजूल के चक्कर में पड़कर किसी तरह मेहनत-मजूरी करके दादू मुखर्जी से अपनी गिरवी जमीन छुड़ा ली जाए। मौसम तो एक एक दिन करवट लेगा ही। फिर, बरखा होगी। खेत लहलहाएंगे। खलिहान सजेंगे। अनाज पछोरे जाएंगे। चावल उसनकर छाने-बघारे जाएंग। मजे से भाजी-तरकारी से दाल-भात जीमेंगे। खाली समय में पतंग उड़ाएंगे। गुल्ली-डंडा खेलेंगे। क्या राय-मुखर्जी, बोस-घोष से हमेशा उनकी दुश्मनी ही ठनी रहेगी? उनके लौंडे फिर आकर उनसे कहेंगे, "पलटुआ, चल, मछरी मारने चलें। मर्दवा, उहैं आग में भुन-भुन मछरी खाएंगे।"
उसका सुहाना दिवास्वप्न मखंचुआ द्वारा उसके कंधे पर हाथ रखे जाने से टूट गया।

"छोटकू, बूझ लो कि हमरा खून उहै दिन से जलि रहा है जौन दिन से हमार मनरौतिया का... बस, बूझ लो कि हम खून ' घूंट पी-पीके जी रहल हईं। हम ठेक्दार ' लौंडन ' उप्पर ' राह दिखाके मय-पलिवार सहर भाग-पराएंगे..."
पलटुआ फिर छिटककर भाग खड़ा हुआ। वह दूर से ही चिल्लाने लगा, "भइया, हम तुम्हार पिलान में कबहूं सामिल ना होंगे। हम इहैं रहैंगे। आपन जिनगी बबुआनों संग सुआहा कर देंगे। लेकिन, तुम्हार सहरियन ' साथ ना देंगे..."

मखंचुआ माथा पकड़कर अपनी माई के बगल में बैठकर बतियाने लगा। पलटुआ लंगड़ाते हुए पोखरे की ओर चला गया।
जब अंधेरा घिर गया तो वही नक्सली लड़के फिर आए। देर रात तक वे खुसुर-फुसुर बतियाते रहे। पलटुआ सोने का बहाना बनाकर उनकी बातें सुनता रहा। उसने तय कर लिया था कि वह अपनी माई और भइया के साथ शहर कभी नहीं जाएगा भले ही भूख उसका काम तमाम कर दे या ठेकेदार के गुंडे उसे मार डालें। जब नक्सली लड़के किसी योजना का पक्का होने का संकेत देकर चलने को हुए तो पलटुआ के कान खड़े हो गए। वह समझ गया कि इस भीषण गर्मी में गांव में कोई कहर बरपने वाला है। उसने नक्सलियों के काले कारनामों की रोमांचक कहानी कई बार सुनी है। उसे दुःख था कि उसका ही भाई एक ऐसी कहानी का मुख्य हिस्सा बनने जा रहा है।

उसके बाद, कई दिनों तक वे लड़के नहीं आए। एक रात, पलटुआ को कुछ अजीब सा आभास हो रहा था। वह लेटे-लेटे आसमान में टूटते तारों को गिन रहा था। उसे आश्चर्य हो रहा था कि मखंचुआ रोज की तरह लेटते ही नींद की चपेट में क्यों नहीं आया था। उसके हाव-भाव में बड़ी बेचैनी थी। माई भी उधेड़बुन में दूर बैठी हुई थी जैसे किसी का इंतजार कर रही हो। पलटुआ को किसी अनिष्ट का पूर्वाभास हो रहा था। जैसे ही उसने चींकट गमछे से अपने सिर को जोर से बांधा और पंजों को दो-तीन बार अपने हाथों से दबाया कि तभी उसे नींद ने दबोच लिया। फिर, उसकी नींद पर शामत तब आई जब कट्टों की फायरिंग से सारा आसमान दहल रहा था। उस वक़्त रात का तीसरा पहर था और सारा गांव नींद की जबरदस्त गिरफ़्त में था। वह हदस कर उठ बैठा। लेकिन, उसे अपनी माई और अपने भाई को वहां से नदारद पाकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। कुछ देर तक वह आँख मलते हुए स्थिति को समझने की कोशिश करता रहा। इसी दरमियान, मखंचुआ तीन लौंडों के साथ हड़बड़-हड़बड़ भागता हुआ वहाँ आया और उसकी बाँह पकड़कर घसीटने लगा।

"चल रे, पलटुआ, भाग इहाँ से। हमनी ' काम होइ गवा। जनावरों ' मय पलिवार उप्पर ' टिकिट कट गवा। हमार करेजा ठंडा होइ गवा। मनरौतिया ' आत्मा ' सांति मिल गइल..."
जब वह ठाँय-ठाँय हँस रहा था तभी पलटुआ अपनी बाँह छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ। मखंचुआ ने तीनों नक्सली लौंडों को मदद के लिए गुहारा, "अरे कामरेडों, हमार छोटकू ' धर लो। ओकरे बिना हम सहर ना जावेंगे..." तदनन्तर, वे कुछ देर तक पलटुआ को पकड़ने के लिए उसके पीछे ऐसे दौड़ते रहे जैसे बच्चे छुआ-छुअंता खेल रहे हों। पर, पलटुआ कहने को लंगड़ा था। वह तो चौकड़ी भर-भर उनसे कहीं तेज दौड़ रहा था। इसी दरमियान पलटुआ अंधेरे का लाभ उठाकर घूरों की खोह में छिपते-लुकाते अचानक दृश्य से ओझल हो गया। वे बेचैनी में काफी देर तक उसे ढूंढते रहे। आदमकद घूरों के इर्द-गिर्द उसे टटोलते रहे। पर, वह तो फुर्र हो चुका था। मखंचुआ मखाकर बिलखने लगा, " छोटकू कहवाँ बिलाय गवा? कहवाँ भाग-पराय गवा? जब माई पूछी कि 
छोटकुआ कहवाँ ' ' हम ओके का' जबाब देब..."

इसी बीच कुछ लोगों के आने की आहट पाकर उनके कान खड़े हो गए। वे टोही लोग जमीन पर लाठियाँ बजाते हुए, अपराधियों के निशान जोह रहे थे। एक कामरेड फुसफुसाया, "तेरे भाई के चक्कर में हम सभी जने धरे जाएंगे... लोग हमें बेमौत मार देंगे।"

लाचार मखंचुआ करता क्या? अपनी जान और माई की खातिर उसे उनके साथ दुम दबाकर भागना ही पड़ा।
अलहदी पलटुआ कई दिनों तक खरबोटना की मड़ई में सिर छुपाकर कथरी ओढ़, सोता रहा। उसने खरबोटना को झूठ ही बता दिया था कि ठेकेदार के गुंडे उसके भाई और माई को पीटते हुए कहीं लेते गए हैं। लेकिन, अकेला खरबोटना एक से दो होकर मन ही मन खुश हो रहा था। अब रात को अकेले सोते वक़्त उसे अपने माँ-बाप के भूतों से डर नहीं लगेगा। वह उसकी पीठ सहलाते हुए उसके बगल में बैठ गया, "मर्दवा, इचको भर मत हौंजियाओ, हम हईं न। तोहार पलिवार ना रहल ' का' भवा? हम तोहें भाई सरीखा मोयब्बत देब..."
उसके अपनत्व प्रदर्शन से अभिभूत पलटुआ घिघिया-घिघियाकर रो पड़ा। खरबोटना ने उसे स्नेहसिक्त बांहों में पुरजोर भेंट लिया।
          
उन बीती घटनाओं को यादकर खरबोटना एकदम भावुक हो रहा था। पलटुआ का याराना वह कैसे भुला सकेगा? वह अचानक बड़बड़ाने लगा, "जा रे, पलटुआ... दुनिया में तोहार गुजारा कइसे होता? तूं आपन पलिवार संग सरग में मऊज कर..."

उसने पलटुआ को घसीटकर ले जाने वाले वहशियों की ओर से अपनी निगाहें फेर लीं और दोनों हाथों से कान पकड़कर कसम खाने लगा, "अब इहाँ हराम के मूस-छछुंदर के फेर में कबहूं ना पड़ेंगे..." वह खुद से बेहद मोहाने लगा। उसने बार-बार अपने हाथ चूमे। काश! माई ने भी उसे इसी तरह प्यार किया होता! उसने चलते-चलते पिच्च से थूका, "हरामजादी, माई नहीं, डाईन थी डाईन... नागिन थी, जो अपने पलिवार ' कच्चे चबा गइल। बाऊ ओसे कित्ता मोयब्बत करते थे...हरदम जान छिरकते थे। लेकिन, सुच्चा पियार ' नतीजा निकला कि बुजरी ने अपने आसिक - रायचऊधरी से मिलके हमारे सोझभक बाऊ ' काम तमाम करवा दिया... राँड़ चऊधरी 'सामने कइसे मटक-मटक डोलती थी, हमरे बाऊ ' ओकरे चाल-चलन पर कबहूं सक नहीं किए...लेकिन हम जानत रहे कि हमार माई का' थी? ससुरी अपने गोर चाम पे कित्ता गुमान करती थी? खटिक जात में अइसन गोर मेहरारू कहूँ ' देखी। जरूर कौनों मुखरजी-टइगोर ' बीज से पइदा भई रही होगी, बुजरी..."

तभी जोरों की अंधड़ से खरबोटना की आँखों में रेह भर गया। एक तो गरम हवा, दूसरे, तेज धूप से उसका बदन सूखकर काँटा हुआ जा रहा था। सिर बुरी तरह टनक रहा था। जोरों की भूख से उसकी अंतड़ियाँ अंदर की ओर खिंची जा रही थीं। उसने फटे ओठों से बहते खून को जीभ से चाट-चाट साफ किया। लेकिन, उसका मन वहीं बैठकर सुस्ताने को कर रहा था। वह वहाँ बैठकर सारी बातें क्रम से याद करना चाह रहा था। वह जमीन पर रेह को खुरचने लगा। अचानक, एक अपराधबोध से उसने अपनी अंगुलियाँ हटा लीं और खुरचे हुए स्थान को रेह से भरने लगा। वह उजली रेह उसकी छोटी बहन की याद दिला रही थी। उसकी चमड़ी भी रेह जैसी चमकदार थी। तभी तो उसके बाऊ ने उसका नाम रेहवा रखा था। बारह साल की होते-होते वह और चिकनी-चुपड़ी हो गई थी। जिस्म का उफान बेकाबू हुआ जा रहा था। जवानी भभक रही थी। जब माई उसे अपने साथ बबुआनों के यहाँ काम के बहाने ले जाने लगी तो उसका मन किसी अळ्ाात भय और शंका से चिंतित रहने लगा था। पर, उसे पूरा भरोसा था कि रेहवा उसकी माई जैसी नहीं थी। उसने तन तो माई जैसा पाया था, लेकिन मन अपने बाऊ का। इसी कारण वह उसे बहुत मानता था। अपने बाऊ के बाद वही तो उसका बाप-सरीखा बड़ा भाई था। इस नाते उसे पता था कि उसे अपनी बहन की किस प्रकार हिफ़ाजत करनी है। जब बुरा समय शुरू हुआ तो भी वह उसके प्रति अपनी फ़र्ज़ अदायगी में कोई कोताही नहीं बरतता था। अपनी माई की बुरी छाया से उसे पहले ही मुक्त करा दिया था। इसके प्रतिशोध में, माई ने उनसे अपना नाता तोड़कर रायचौधरी की होकर रह गई थी। वहीं वह सारे कर्म करती थी। उसे अपने पेट के जायों को कभी देखने की इच्छा तक नहीं करती थी।

कई दिनों बाद वह एक दिन अचानक आई। उन्हें बड़ा अचंभा हुआ। आते ही वह अपनी बातों से उनके कानों में शहद टपकाने लगी। पता नहीं, खरबोटना भी उसकी बातों में कैसे गया। रे़हवा तो एकदम से फुसलकर उससे चिपक गई। जब वह उसे अपने साथ चौधरी के घर ले जाने लगी तो खरबोटना को भी जाने क्या हो गया था कि उसने कोई ना-नुकर नहीं किया। वह रेहवा को रोककर करता भी क्या? उसे तो वह दो दिनों से ढंग का खाना भी नहीं खिला पाया था। पर, रेहवा के जाने के बाद उसका मन सशंकित रहने लगा। मालूम नहीं, उसकी माई के मन में कैसा विषैला ब्याल पल रहा था जिसके डसने से रेहवा बरबाद हो सकती थी। जब रेहवा की बाट जोहते-जोहते तीन दिन बीत गए तो खरबोटना का माथा ठनका। पैसे के आगे तो उसकी माई को कुछ भी नहीं सूझता था। कहीं माई ने रेहवा की इज्जत पर बट्टा तो नहीं लगा दिया! वह आंधी की तरह धड़धड़ाते हुए रायचौधरी के बेडरूम में घुस गया। वहाँ उसने अपनी माई को जिस रूप में देखा, उसे यादकर उसका मन आज भी घिन्ना उठता है। चौधरी उसकी सेवा के लिए रोज पाँच रुपए देता था, साथ में दो जून का खाना और पता नहीं क्या-क्या।

खरबोटना ने आँखें फेरकर बड़ी गैरियत से अपनी माई से पूछा, "रेहवा कहाँ हौ?" किंतु वह चुपचाप कुटिल मुस्कान से उसे देख रही थी। तभी चौधरी के इशारे पर उसके नौकरों ने उसे वहाँ से धकेलते-घसीटते हुए बाहर खदेड़ दिया। एक ने कहा, "तेरी माई ने उसे भुवनेश्वर भेज दिया है।" खरबोटना यह सुनते ही गुस्से में पागल हो गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसकी माई इतनी बुरी कैसे निकल गई कि सिर्फ़ थोड़े से आराम और सुख हासिल करने के लिए वह अपने बच्चों को नीलाम करने पर तुली हुई है।

लाचार और बेबस खरबोटना वापस अपनी मड़ई में गया। कुछ दिनों बाद, अफ़वाहों से पता चला कि उसकी माई ने रेहवा को महज चालीस रुपए पर एक खूँसट बुड्ढे को बेच दिया था। वह दाँत किटकिटाकर रह गया था।
   
                    
 वह बैठे-बैठे उकताकर, गरमी से पड़पड़ाती जमीन पर लेट गया। इससे उसे आराम मिला क्योंकि बवंडर उसके कान, नाक और आँख में डेढ़ सेर मिट्टी नहीं झोंक पा रहा था। लेकिन उसे अपनी इस हरकत पर बड़ी हँसी भी रही थी। आखिर, वह रेत और रेह से कब तक बचा रह पाएगा? एक दिन वह इसी का अभिन्न हिस्सा बन जाएगा। उस वक़्त जैसे-जैसे आँधी तेज होती जा रही थी, उसका मन भी बेहद चंचल हुआ जा रहा था। उसकी माई उसके दिमाग पर बुरी तरह हावी थी। पता नहीं, इस वक़्त वह कहाँ होगी। इस दुनिया में है भी या नहीं। जब लोगों ने उसे बताया कि उसकी माई रायचौधरी के घर से लापता है तो उसे बेहद सुकून मिला था। बाद में, उसने उसे बड़ी अलगरजी से इधर-उधर तलाशने की कोशिश की थी। फिर, उसने यह सोचकर उसका ख्याल लाना भी छोड़ दिया कि अगर वह होती भी तो वह उसके सामने कोई कोई बवाल खड़ा करती होती।

वह यकायक खड़ा हो गया। धूल-धक्कड़ बढ़ता जा रहा था। उसने हाथों से अपना मुँह ढँक लिया। खड़े होने की कोशिश की तो फिर जमीन पर लुढ़क गया। उसे हैरत हो रहा था। उसने अनुभव किया कि उसकी हालत अज़ीब-सी होती जा रही है। उसका सिर सुन्न होकर झन्न-झन्न कर रहा था। उसने बमुश्किल सिर घुमाकर अपने बाएं हाथ को देखा जिसे वह उठा नहीं पा रहा था। बड़ी कोशिश करके उसने अपना सिर एक पत्थर पर टिकाया परंतु तूफान ने उसे जमीन पर औंधे मुँह पटक दिया। वह बार-बार पटकनी खा रहा था। वह एकबैक भयभीत हो उठा। उसे लगा कि सूरज की किरणें उसके चारो ओर अंधेरा फैला रही हैं और धुएं सुलग रहे हैं। वह पूरे होश में था। उसने देखा कि एक काले से विशालकाय जानवर पर कोई दानवी शक्ति उसे जबरन उठाकर अपने पीछे बैठा रही है। वह रुआँसा होकर बेतहाशा चिल्लाने लगा, "ना, हम उप्पर ना जाइब, हम इहवैं रहब, रेत खाइब, रेत पीयब..."

बेशक, वह बेहद आतंकित होकर बड़ाबड़ा रहा था। तभी उस डर ने उसमें अज़ीब सी फुर्ती भर दी। वह उठ खड़ हुआ और इधर-उधर भागने लगा। फिर, बैठकर रेत फाँकने लगा। वह कई मुट्ठी रेत फाँक गया। उसके बाद उसने खड़ा होकर अपना शरीर सीधा करने की कोशिश की। पर, प्रचंड आँधी ने उसे धड़ाम से गिरा दिया। उसे लगा कि जैसे किसी राक्षस ने उसके मुँह और पीठ पर सैकड़ों झापड़ जड़े हों।

तूफान से भूचाल-सा गया। उसने देखा कि मड़इयों के छप्पर कई गज ऊपर उड़ने के बाद नीचे गिर-गिरकर ध्वस्त हो रहे हैं। पत्थरों के टीले धड़धड़ाकर धराशायी हो रहे हैं। सेर-सवा सेर वाले पत्थर कागज़ की तरह उड़ रहे हैं। सूखे ताड़ और खजूर के पेड़ जैसे गश खाकर गिर रहे हैं। उसने देखा कि रेत ऐसे बह रही है जैसे नदियों में ताबड़तोड़ लहरें चल रही हों। तभी उसने पहाड़ जैसे एक भारी धुंध को अपनी ओर आते देखा। उसने आँखें बंद कर लीं। रेत के उस पहाड़ ने उसे पूरी तरह ढंक दिया। उसे लगा की उसके ऊपर से रेत की नदी अविराम बह रही है और वह उसके नीचे आराम से लेटा हुआ है। इससे ज़्यादा उसे सुकून कहाँ मिलेगा? लेकिन, एक दिन उस नदी का बहाव जरूर थमेगा। तब, वह फिर उठ खड़ होगा--एक नए एहसास के साथ। भूख के साथ ऐसी ही धींगाकुश्ती करने के लिए।


डा. मनोज श्रीवास्तव

आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com)


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