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''हिंदी की अति गंभीरता और गहन दार्शनिकता उसे नयी नस्ल तक पहुंचने देने में बाधा ''-राजेंद्र यादव

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, दिसंबर 06, 2012 | गुरुवार, दिसंबर 06, 2012

बहुत जान बाकी है  हिंदी में 
http://www.kalamkar.org/

कलमकार संस्था का पहला आयोजन 
दो  दिसम्बर का सर्द दिन आईटीओ स्थित हिंदी  भवन में हिंदी की स्थिति को लेकर धुंआधार विमर्श से दिन भर गरमाता रहा। कलमकार संस्था द्वारा आयोजित एक दिवसीय सेमिनार "हिंदी विश्व भाषा 2050" कई मायनो में महत्वपूर्ण रहा। इसमें हिंदी की दशा पर विलाप की जगह हिंदी के सुनहरे भविष्य, हिंदी समाज की कमियों और कमज़ोरियों पर खुल कर बात चीत हुई और कई सुझाव सामने आए।
           वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव का मानना है कि हिंदी पहले के मुक़ाबले अधिक लोगों की भाषा बन रही है और इसमें  फ़िल्म का , टीवी धारावाहिकों की अहम भूमिका है लेकिन राजेंद्र यादव ने भी स्पष्ट किया कि हिंदी की अति गंभीरता और गहन दार्शनिकता उसे नयी नस्ल तक पहुंचने देने में बाधा की तरह है। उन्होंने हिंदी में अधिक हास्यबोध की ज़रूरत को अहम बताया।
          कवि, आलोचक अशोक वाजपेयी का कहना था कि आज़ादी के बाद हिंदी क्षेत्र दरिद्रता की ओर बढ़ रहे हैं आज़ादी के बाद हिंदी क्षेत्र हुसैन, रज़ा और रामकुमार जैसे चित्रकार देने में असफ़ल रहे है। संगीत के वो बड़े बड़े धराने जो हिंदीभाषी क्षेत्रों में थे अब ख़ात्मे की ओर हैं। यही नहीं हिंदी भाषा ने पिछले पचास सालों में बड़ा इतिहासकार, दार्शनिक, खगोलशास्त्री या वैज्ञानिक नहीं पैदा किया उन्होंने कहा कि एक सशक्त भाषा के लिये उसका प्रभावशाली होना ज़रूरी है और यह प्रभाव हिंदी क्षेत्रों की दरिद्रता ख़त्म होने पर ही पैदा होगा।
          नयूज़ चैनल आईबीएम7 के एडिटर आशुतोष ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदी भाषियों को अपनी भाषागत कुंठा को छोड़ना होगा। यह कुंठा हिंदी के विकास में बाधक है। उन्होंने इस तथ्य की ओर भी इशारा किया कि हिंदी एक ख़ास क़िस्म के जातिवाद के शिकंजे में  है जिसे तोड़ना ज़रूरी  है। महात्मागांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने इस ख़तरे  से आगाह किया कि हिंदी जिन भाषाओं से बनी है वो आज अलग अस्तित्व की आक्रमक मांग कर रही हैं जैसे भोजपुरी,अवधी,बृज। लेकिन अगर इन्हें अलग भाषा मान लिया गया तो हिंदी कमज़ोर ही होगी।
          समाचारपत्र नेशनल दुनिया के ग्रुप एडिटर आलोक मेहता ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हिंदी संस्थाओं को हिंदी के लोगों से ही नुक़सान हो रहा है। कई संस्थाएं तो इस खींच तान में बंद तक हो गयीं। उन्होंने इस ज़रूरत पर ज़ोर दिया कि धर्म के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च करने वाला समाज कुछ राशि भाषा पर भी ख़र्च करे तो हिंदी विश्व भाषा के रूप में जल्दी तरक़्क़ी करेगी।  नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने हिंदी को नयी तकनीक से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने इस सच्चाई पर संतोष जताया कि हिंदी समाचार पत्रों के पाठकों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। हिंदी किताबों के ख़रीदारों में भी बेहद इज़ाफ़ा हो रहा है।
          आईबीएन7 के पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने इस ओर आकर्षित किया कि इंटरनेट ने परिदृश्य बदल दिया है। तकनीक की वजह से ही खुद हिंदी वालों को उसकी ताकत का एहसास हुआ है। अब एक क्लिक से हिंदी में कुछ भी ढूंढा जा सकता है। प्रख्यात चित्रकार प्रभु जोशी ने  इस ख़तरे से आगाह किया कि हिंदी को चिंतन की भाषा बनने से रोक कर उसे बोली बनाने का षडयंत्र किया जा रहा है इसके लिये एक लाइन युवा वर्ग को रटाई जा रही है कि हिंदी को आसान बनाइये।
          विख्यात पत्रकार राहुलदेव ने भी इस बात पर नाराज़गी व्यक्त की कि अचानक कुछ लोगों को हिंदी कठिन लगने लगी है। उन्होंने उदाहरण दिया कि हमारी बोल चाल में अब शब्द भारत कम होता जा रहा है उसकी जगह इंडिया ने ले ली है। उन्होंने इस प्रक्रिया को एक षडयंत्र करार दिया। दूरदर्शन के निदेशक त्रिपुरारी शर्मा ने सरकारी हिंदी के बारे में कहा कि  सरकारी हिंदी के विकास में सरकारी अधिकारियों का भावनात्मक और वैचारिक लगाव लगभग नहीं रहा।
          सेमिनार में प्रकाशकों की भागीदारी ने हिंदी प्रकाशन के कई पहलुओं को उजागर किया। राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी, वाणी प्रकाशन के अरूण माहेश्वरी और सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने नयी तकनीक के प्रकाशन जगत पर पड़ने वाले प्रभाव को बताया। सेमिनार के  अलग अलग सत्रों का संचालन संजीव पालीवाल, भारत भारद्वाज, साधना अग्रवाल और अनन्त विजय ने किया।


दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के दाँव-पेच सीखने वाले कलमकार हैं.आई.बी.एन.-7 के ज़रिये दर्शकों और पाठकों तक पहुंचे अनंत विजय साल दो हज़ार पांच से ही मीडिया जगत के इस चैनल में छपते-दिखते रहें हैं.उनका समकालीन लेखन/पठन/मनन उनके ब्लॉग हाहाकार पर पढ़ा जा सकता है.अपनी स्थापना के सौ साल पूर चुकी दिल्ली के वासी हैं.-journalist.anant@gmail.com


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2 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्‍दी भाषा के ये विचार महत्‍वपूण है कि हिन्‍दी भाषा को क्षेत्रिय भाषाओं को अपनें साथ लेकर चलना होगा तथा भाषा के अवसर और समानता से ही ये सम्‍थव होगा । दूसरा भाषाओं को सत्‍ता और राजनीति से बचाना होगा ।

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  2. शुक्रिया महेंद्र जी इसी तरह अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियों से हमें नवाज़ते रहिएगा।

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