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सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है। Vaya प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, दिसंबर 09, 2012 | रविवार, दिसंबर 09, 2012

  • पटना 
  • प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव 

जनता को अपने नायक और खलनायक के पहचान का विवेक देता है प्रतिरोध का सिनेमा: प्रणय कृष्ण 

चौथा प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव 7 से 9 दिसंबर तक आयोजित हुआ। जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने इस फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए काफी सुचिंतित और प्रभावशाली वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इषोपनिषद् में कहा गया है कि सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है। आज भी साम्राज्यवाद और पूंजी की सत्ता तथा उसके दलाल शासक वर्ग ने सच को स्वर्ण से ढंक रखा है। एक ओर युवा हृदय सम्राट राजनेताओं की भरमार हो गई है, वहीं दूसरी ओर देश में 15 से 25 साल के नौजवानों की आत्महत्या की दर बढ़ गई है। एक ओर विकास के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर देश के किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, एक ओर स्त्रियों के सशक्तिकरण के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर उसका उपभोक्तावादी इस्तेमाल किया जा रहा है, आज स्त्रियों पर होने वाले अपराध के मामले में भारत दुनिया का चैथा अव्वल देश बन चुका है।

साम्राज्यवाद और उसके दलाल शासकवर्ग ने ऐसी छवियों का संसार रचा है, जिसमें जनता को अपने आप से ही जुदा किया जा रहा है, सवाल यह है कि वह अपनी छवि किस दर्पण में देखे? ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ऐसा ही एक विनम्र प्रयास है, जिसमें जनता की उसकी अपनी छवि यानी उसके सच को दर्शाने की विनम्र कोशिश की जा रही है।’’ प्रणय कृष्ण ने कहा कि देश में जितने भी जनांदोलन हो रहे हैं, प्रतिरोध का सिनेमा उनका भी मंच है। संस्कृति का यही काम है कि वह जनांदोलनों को ताकतवर बनाए और मुनाफे पर टिकी जो अमानवीय सभ्यता है, उसे ध्वस्त करे और उसके प्रति कहीं कोई भ्रम या मोह है तो उसे भी नष्ट करे। आज जो जनता के नायक और खलनायक के बीच के फर्क, सच और स्वर्ण के बीच के फर्क को धूमिल करने की साजिश की जा रही है, उस साजिश के खिलाफ जनता के विवेक को मजबूत बनाना प्रतिरोध के सिनेमा का मकसद है। उन्होंने कहा कि जो महाराष्ट्र से राष्ट्र को खदेड़ते रहे और नौजवानों, मजदूरों और महिलाओं के विरोधी रहे, जिन्होंने सांप्रदायिक उन्माद फैलाए, वे जनता के नायक नहीं हो सकते। बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद जिस तरह से सत्ता और उसके तंत्र ने उन्हें महान बताने की कोशिश की वह भी सच का मुंह स्वर्ण से ही ढंकने की कोशिश है। सच तो वह है जिसे एक लड़की ने फेसबुक पर लिखा और सवाल किया कि क्या भगतसिंह और सुखदेव के मरने पर इसी तरह से बंद कराया गया था। उस लड़की के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई ही सत्ता का जनता के प्रति रुख का नमूना है। प्रणय कृष्ण ने कहा कि खलनायकों की जो छवियां स्थापित की जा रही हैं, उसके खिलाफ काउंटर छवियों को स्थापित करना, सही विकल्प और जनसंघर्षों के सही इतिहास को सामने रखना भी प्रतिरोध के सिनेमा का लक्ष्य है। उद्घाटन से पूर्व फिल्मोत्सव स्वागत समिति की ओर से पटना वि.वि. में इतिहास की प्रोफेसर डेजी नारायण ने कहा कि पूरे देश में अपने हक-अधिकार के लिए जनता के जो प्रतिरोध चल रहे हैं, उनकी एक मुकम्मल तस्वीर सामने आए, प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की यह कोशिश है। इस बार का पटना फिल्मोत्सव खासकर हिंदी सिनेमा के 100 साल और दलितों की जीवनस्थिति और उनके संघर्ष पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि चूंकि यह सत्ता और बड़ी पूंजी के जरिए किए जाने वाले फिल्मोत्सवों से भिन्न फिल्मोत्सव है और यह जनता के जीवन संघर्ष का सहयोगी है, इस नाते इसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। 

उद्घाटन सत्र में बाल ठाकरे और शिवसेना की मजदूर विरोधी-राष्ट्रविरोधी विचारों और कार्यों के खिलाफ रची गई बाबा नागार्जुन की तीन कविताओं पर आधारित कविता पोस्टर का विमोचन प्रणय कृष्ण ने किया। फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण प्रसिद्ध युवा फिल्मकार अजय भारद्वाज ने किया। इस मौके पर कवि आलोकधन्वा, वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, अग्निपुष्प, प्रो. भारती एस कुमार और मीरा मिश्रा भी मंच पर मौजूद थे। संचालन समता राय ने किया। प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सव का आरंभ अजय भारद्वाज की फिल्म ‘मिलांगे बाबे रतन दे मेले ते’ से हुआ। पहले दिन गौतम घोष की मशहूर फिल्म ‘पार’ भी दिखाई गई। नसीरुद्दीन शाह ने इस फिल्म में मजदूर नौरंगिया की भूमिका अदा की है और उनकी पत्नी रामा की भूमिका शबाना आजमी ने निभाई है। बिहार के ग्रामीण इलाकों में सामंतवाद के खिलाफ उभरते प्रतिरोध की कहानी इसमें कही गई है। 

दूसरे दिन 8 दिसंबर को मृणाल सेन की चर्चित फिल्म ‘भुवन शोम’ तथा तपन सिन्हा की फिल्म ‘ एक डाक्टर की मौत’ के साथ साथ कुडनकुलम परमाणु संयत्र के खिलाफ जनांदोलन पर आधारित रेडिएशन स्टोरी, पूर्वांचल में इनसेफलाइटिस पर केंद्रित खामोशी जैसी जनता की समस्याओं और संघर्षों पर आधारित डाक्युमेंटरी फिल्में दिखाई गईं। लघुफिल्में- दिस लैंड इज माइन, जीरो, दी अकार्डियन, दी ओल्ड मैन एंड दी सी को भी दर्शकों ने देखा। जनकवि बल्ली सिंह चीमा की गजलों को भी पटना के फिल्म और कलाप्रेमियों ने बहुत पसंद किया। आज तीसरे दिन दादा साहब फाल्के पर केंद्रित फिल्म ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ दिखाई गई। सिनेमा के 100 भारतीय डाक्युमेंटरी फिल्मों की निर्माण यात्रा संजय जोशी की ऑडियो विजुअल प्रस्तुति काफी जानकारीपूर्ण लगेगी। जोहरा सहगल केंद्रित एम के रैना निर्देशित फिल्म अभी थोड़ी देर में दिखाई जाएगी। दोपहर बाद दिखाई जाने वाली बथानी टोला जनसंहार पर केंद्रित कुमुद रंजन की फिल्म ‘आफ्टर दी आफ्टर मैथ’ और इज्जत के नाम पर की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ बनाई गई नकुल साहनी की फिल्म ‘इज्जतनगरी की बेटियां’ भी दर्शकों की संवेदित करने वाली फिल्में हैं।




सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959
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1 टिप्पणी:

  1. घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    । लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी है!
    सूचनार्थ!

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