‘किस घर-द्वार कबीरा जाएं ? बैठे सांड गली-गलियारे । Vaya प्रो. नंद चतुर्वेदी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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‘किस घर-द्वार कबीरा जाएं ? बैठे सांड गली-गलियारे । Vaya प्रो. नंद चतुर्वेदी


कला मेला - 2012 का समापन ‘कवि गोष्ठी’ से 

राजस्थान साहित्य अकादमी एवं कला, साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय कला मेले-2012 के आखिरी दिन ‘कवि गोष्ठी’ में नगर के प्रमुख साहित्यकारों ने गीत, ग़ज़ल एवं कविता की रस-वर्षा के विचार केन्द्र में नारी विमर्श को रखते हुए अप्रत्यक्षतः दिल्ली में दुष्कर्म के बाद मृत्यु को प्राप्त पीड़िता को भारी मन से अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी।

गोष्ठी में मुख्य अतिथि प्रो. नंद चतुर्वेदी ने उनका गीत - ‘किस घर-द्वार कबीरा जाएं ? बैठे सांड गली-गलियारे । इस रिश्तों में रीती काशी कांधे जो लोई धरे कबीरा’ प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। प्रो. चतुर्वेदी ने अपनी चतुष्पदी में नये वर्ष की शुभकामनाएं प्रेषित की - ‘किस तरह काटी अंधेरी रात हमसे क्या छिपा है?, चांद सूरज-रोशनी लाएं तुम्हारी जिन्दगी में, इस तरह शुभकामनाएं हों फलित चारों तरफ से, फूल से सुकुमार दिन आंए तुम्हारी जिंदगी में।’ आशा भरे स्वरों में अपनी दूसरी चतुष्पदी में कहा - ‘रुक गए है यात्राओं के मुहरत, हम कथावाचक नहीं इन अनसुनी के, इस निराशा की नदी पर पुल बनेंगे, जगमगाती जिन्दगी की रोशनी के।’ साथ ही वरिष्ठ कवि व साहित्यकार डॉ. भगवतीलाल व्यास ने अपनी कविता ‘आने वाले बच्चे के लिए’ में गर्भवती माँ की दूरंदेशी को दर्शाते हुए संवेदनायुक्त शब्दों में माँ की ममता को महिमा-मंडित किया व एक अन्य कविता ‘समुद्र’ के माध्यम से संघर्ष व समर्पण की गाथा पेश की।

वरिष्ठ कवि डॉ. ज्योतिपुंज पंड्या ने कविता - दामिनी अब जाग जाओ, पंच-तत्वों का महज संयोजन थी , जाग जाओ, मौन की हुंकार में अब जाग जाओ’ सुनाकर नारी जाति का नव - आह्वान किया व संस्कृति की विकृतियों पर कुठाराघात किया। लोककलाविद डॉ. महेन्द्र भानावत ने समय के यथार्थ पर चोट करते हुए अपनी कविता ‘कांटेदार बैंगन सा नया वर्ष’ में समय की चुनौतियों को दर्शाया। वरिष्ठ कवयित्री डॉ. रजनी कुलश्रेष्ठ ने अपनी कविताओं - ‘स्वप्नबीज व ‘मधुमती पृथ्वी’ के जरिए इस बदलते युग में संघर्ष व मनुष्य की जीजिविषा, संवेदना व स्वाभिमान को नई परिभाषा दी।’ डॉ. मंजु चतुर्वेदी ने अपनी कविता ‘बस-कुछ भी तो नहीं’ में आम भारतीय नारी की दैनिक दिन-चर्चा को बिम्ब बनाते हुए उसके त्याग, समर्पण व संघर्ष को नये तेवर व स्वर दिए, जिसे सबने सराहा।

युवा कवयित्री व पत्रकार तरुश्री शर्मा ने अपनी कविताओं में ‘स्त्री और बेटियों की ताकत को हुंकार दी।’ उनकी कविता- ‘ माँ-मुझे विद्रोह के स्वर दो’ व ‘विद्रोह की वीणा छेडूंगी’ कविता ने सबको छुआ। कवयित्री श्रीमती शकुन्तला सरूपरिया ने ग़ज़ल ‘घर बाहर जब देखूं लड़की डरी-डरी सी लगती है’ के साथ ही नज़्म भी सुनाएं। शायर श्री इक़बाल हुसैन ‘इकबाल’ ने ‘ ग़ज़ल - ‘शायरी में पुख्तगी गर चाहिए, सिर्फ अश्कों का समन्दर चाहिए’ के साथ कई अन्य ग़ज़लों से सभी ने दिलों को छुआ। शायर व गीतकार श्री पुष्कर गुप्तेश्वर की ग़ज़ल - ‘हौसला तोड़-तोड़ रखता है - वाह क्या खूब जोड़ रखता है? ने सभी को रिझाया। कवि व गीतकार श्री श्रेणीदान चारण ने दो गीत ‘ सत्य के बन सारथी रथ को बढ़ा के देखिए -मिट जाएगी सब दूरियां नजदीक आ के देखिए’ व ‘कलम है मेरे हाथ में स्याही है तूफानी’ सुनाकर रंग जमाया। कवयित्री वीना गौड़ ने कविता ‘ शी कम्प्यूटर के माध्यम से स्त्री की ताकत का परिचय कराया व नारी के आत्मसम्मान की ग़ज़ल - ‘रोक सको तो रोक लो मुझको-रुकने वाली  नार नहीं ’ प्रस्तुत की। डॉ. अरविंद आशिया ने कविता ‘राधा’ और ‘आपकर्मी’ के जरिए स्त्री संवदेना की मार्मिक अभिव्यक्ति दी । कवि मनमोहन मधुकर ने गीत ‘ कब तक मन की पीड़ा मुझको तड़पाएगी’ प्रस्तुत की । कवि जगदीश ‘आकाश’ ने सस्वर गीत और ग़ज़ल सुनाकर विद्रोही तेवर दिखाए। वहीं श्री नंदलाल आईना ने नए तेवर की ग़ज़लें सुनाकर प्रभावित किया। गीतकार श्री रामदयाल मेहर ने नवगीत ‘‘तुम्ही बोलो किसकी माने सब आते हमको समझाने’’ सुनाकर आज के हालात में मनुष्यता के समक्ष खतरों से आगाह किया। कवयित्री श्रीमती किरणबाला जीनगर ने अपनी रचनाओं - ‘मेरे मन चल/तुझे ले चलूं कहीं और’ तथा ‘माँ में हूं तुम्हारी परछाई’ सुनाई। गीतकार श्री किशन दाधीच ने सस्वर जाते हुए समय का गीत गया - ‘ एक और दिन गुज़र गया हमारे पास से’ की सुंदर प्रस्तुति दी। 

अकादमी अध्यक्ष श्री वेद व्यास ने अपनी कविता और गीतों - ‘सेाचता हँू मैं तो एक पवन चक्की हूँ,  मेरे तो पंख भी निष्प्राण हैं’ तथा ‘हस्ताक्षर करने हैं समय के गुलाबों पर’ से आल्हादित किया। गोष्ठी के अध्यक्ष अकादमी कोषाध्यक्ष श्री भोपाल सिंह चौहान ने ‘कला-मेले’ की पृष्ठभूमि विस्तार से प्रस्तुत की। इस अवसर पर एस.आई.ई.आर.टी. के पूर्व निदेशक डॉ. शरदचन्द्र पुरोहित ने शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के समन्वय पर जोर देते हुए प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का प्रारंभ श्री इकबाल हुसैन ‘इकबाल’ की सरस्वती वंदना से हुआ। गोष्ठी का संचालन श्री रामदयाल मेहर और श्री किशन दाधीच ने संयुक्त रूप से किया। ‘कला-मेले’ के समापन पर अकादमी सचिव डॉ. प्रमोद भट्ट द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

डॉ. प्रमोद भट्ट
सचिव
राजस्थान साहित्य अकादेमी,
सेक्टर-4,हिरन मगरी,उदयपुर-313002
दूरभाष-0294-2461717
वेबसाईट-http://rsaudr.org/index.php
ईमेल-sahityaacademy@yahoo.com                     

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