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चार्ली चेपलिन की आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद-1 /सूरज प्रकाश

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, जनवरी 08, 2013 | मंगलवार, जनवरी 08, 2013

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।


सूरज प्रकाश यों तो एक बड़ा नाम है।मगर वे अपने आप को बहुत कम आंकते हैं।हम यहाँ उनकी ही अनुमति से उनके बहुत बड़े काम के रूप में याद किया जा सकना वाला अनुवाद कार्य 'चार्ली चेपलिन की आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद' यहाँ आंशिक  रूप में छाप रहे हैं।कोशिश करेंगे कि लगातार छाप पायें।अपनी अमूल्य सामग्री 'अपनी माटी डॉट कॉम' को सोंपने हेतु उनका बहुत आभार-सम्पादक 

चार्ली चैप्लिन होने का मतलब

फ्रैंक हैरीज़, चार्ली चैप्लिन के समकालीन लेखक और पत्रकार ने अपनी किताब चार्ली चैप्लिन को भेजते उस पर निम्नलिखित पंक्तियां लिखी थीं

चार्ली चैप्लिन को 
उन कुछ व्यक्तियों में से एक जिन्होंने बिना परिचय के भी मेरी सहायता की थी। एक ऐसे शख्स हास्य में जिनकी दुर्लभ कलात्मकता की मैंने हमेशा सराहना की है क्योंकि लोगों को हँसाने वाले व्यक्ति लोगों को रुलाने वाले व्यक्तियों से श्रेष्ठ होते हैं।चार्ली चैप्लिन ने आजीवन हँसाने का काम किया। दुनिया भर के लिए। बिना किसी भेद भाव के। उन्होंने राजाओं को भी हँसाया और रंक को भी हँसाया। उन्होंने चालीस बरस तक अमेरिका में रहते हुए पूरे विश्व के लिए भरपूर हँसी बिखेरी। उन्होंने अपने बटलर को भी हँसाया  और सुदूर चीन के प्रधान मंत्री चाऊ एन लाइ भी इस बात के लिए विवश हुए कि विश्व शांति के जीवन मरण के प्रश्न पर मसले पर हो रही विश्व नेताओं की बैठक से पहले से वे खास तौर पर मंगवा कर चार्ली चैप्लिन की फिल्म देखें और चार्ली के इंतज़ार में अपने घर की सीढ़ियों पर खड़े रहें। 

चार्ली ने अधिकांश मूक फिल्में बनायी और जीवन भर बेज़ुबान ट्रैम्प के चरित्र को साकार करते रहे लेकिन इस ट्रैम्प ने अपनी मूक वाणी से दुनिया भर के करोड़ों लोगों से बरसों बरस संवाद बनाये रखा और न केवल अपने मन की बात उन तक पहुंचायी बल्कि लोगों की जीवन शैली भी बदली। चार्ली ने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में बनायीं लेकिन उन्होंने सबकी ज़िंदगी में इतने रंग भरे कि यकीन नहीं होता कि एक अकेला व्यक्ति ऐसे कर सकता है। लेकिन चार्ली ने ये काम किया और बखूबी किया। 

दोनों विश्व युद्धों के दौरान जब चारों तरफ भीषण मार काट मची हुई थी और दूर दूर तक कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था न नेता न राजा न पीर न फकीर  जो लाखों घायलों के जख्मों पर मरहम लगाता याए जिनके बेटे बेहतर जीवन के नाम पर इन्सानियत के  नाम पर युद्ध की आग में झोंक दिये गये थे उनके परिवारों को दिलासा दे पाता ऐसे वक्त में हमारे सामने एक छोटे से कद का आदमी आता है जिसके चेहरे पर गज़ब की मासूमियत है आँखों में हैरानी है जिसके अपने सीने में जलन और आंखों में तूफान है और वह सबके होंठों पर मुस्कान लाने का काम करता है। इस आदमी के व्यक्तित्व के कई पहलु हैं। वह घुमक्कड़ मस्त मौला है भला आदमी है कवि है स्वप्नजीवी है अकेला जीव है, हमेशा रोमांस और रोमांच की उम्मीदें लगाये रहता है। वह तुम्हें इस बात की यकीन दिला देगा कि वह वैज्ञानिक है, संगीतज्ञ है, डट्ठूक है, पोलो खिलाड़ी है, अलबत्ताए वह सड़क पर से सिगरेटें उठा कर पीने वाले और किसी बच्चे से उसकी टॉफी छीन लेने वाले से ज्यादा कुछ नहीं। और हाँ यदि मौका आये तो वह किसी भली औरत को उसके पिछवाड़े लात भी जमा सकता है लेकिन बेइंतहा गुस्से में ही। वह  यह काम अपने अकेले के बलबूते पर करता है। वह सबको हँसाता है और रुलाता भी है। हम हँसे कई बार दिल खोल कर और हम रोये असली आँसुओं के साथ . आपके आँसुओं के साथए क्योंकि आप ही ने हमें आँसुओं का कीमती उपहार दिया है।

 चार्ली जीनियस थे। सही मायने में जीनियस। जीनियस शब्द को तभी उसका सही अर्थ मिलता है जब इसे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है जो न केवल उत्कृष्ट कॉमेडियन है बल्कि एक लेखक, संगीतकार,  निर्माता है और सबसे बड़ी बात, उस व्यक्ति में  उदारता और महानता है। आप में ये सारे गुण वास करते हैं और इससे बड़ी बात कि आप में वह सादगी है जिससे आपका कद और ऊंचा होता है और एक गरमाहट भरी सहज अपील के दर्शन होते हैं जिसमें न तो कोई हिसाबी गणना होती है और न ही कोई प्रयास ही आप इसके लिए करते हैं और इनसे आप सीधे इन्सान के दिल में प्रवेश करते हैं। इन्सान जो आप ही की तरह मुसीबतों का मारा है।

लेकिन चार्ली को ये बाना धारण करने में करोड़ों लोगों के चेहरे पर हँसी लाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। भयंकर हताशाओं के अकेलेपन के दौर उनके जीवन में आये। पारिवारिक और राजनैतिक मोर्चों पर एक के बाद एक मुसीबत उनके सामने आयीं लेकिन चार्ली कभी डिगे नहीं। उन्हें अपने आप पर विश्वास थाए अपनी कला की ईमानदारी अपनी अथिभव्यक्ति की सच्चाई पर विश्वास था और सबसे बड़ी बात उनकी नीयत साफ थी और वे अपने आप पर भरोसा करते थे। 

उनका पूरा जीवन उतार.चढ़ावों से भरा रहा। बदकिस्मती एक के बाद एक अपनी पोटलियां खोल कर उनके इम्तिहान लेती रही। जब वे बारह बरस के ही थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। मात्र सैंतीस बरस की उम्र में। बहुत अधिक शराब पीने के कारण। हालांकि वे लिखते हैं कि मैं पिता को बहुत ही कम जानता था और मुझे इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं थी कि वे कभी हमारे साथ रहे हों। उनके पिता और मां में नहीं बनती थी इसलिए चार्ली ने अपना बचपन मां की छत्र छाया में ही बिताया। चार्ली के माता पिताए दोनों ही मंच के कलाकार थे लेकिन ये उसकी ;मां की आवाज् के खराब होते चले जाने के कारण ही था कि मुझे पांच बरस की उम्र में पहली बार स्टेज पर उतरना पड़ा। उस रात मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर उतरा था और मां आखिरी बार।  वे अपनी पहली मंच प्रस्तुति से ही सबके चहेते बन गये और फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

''अभी मैंने आधा ही गीत गाया था कि स्टेज पर सिक्कों की बरसात होने लगी। मैंने तत्काल घोषणा कर दी कि मैं पहले पैसे बटोरूंगा और उसके बाद ही गाना गाऊंगा। इस बात पर और अधिक ठहाके लगे। स्टेज मैनेजर एक रुमाल ले कर स्टेज पर आया और सिक्के बटोरने में मेरी मदद करने लगा। मुझे लगा कि वो सिक्के अपने पास रखना चाहता है। मैंने ये बात दर्शकों तक पहुंचा दी तो ठहाकों का जो दौरा पड़ा वो थमने का नाम ही न ले। खास तौर पर तब जब वह रुमाल लिए विंग्स में जाने लगा और मैं चिंतातुर उसके पीछे.पीछे लपका। जब तक उसने सिक्कों की वो पोटली मेरी मां को नहीं थमा दी मैं स्टेज पर वापिस गाने के लिए नहीं आया। अब मैं बिल्कुल सहज था। मैं दर्शकों से बातें करता रहा मैं नाचा और मैंने तरह.तरह की नकल करके दिखायी। मैंने मां के आयरिश मार्च थीम की भी नकल करके बतायी।''

चार्ली का बचपन बेहद गरीबी में गुज़रा। वे लोग जो रविवार की शाम घर पर डिनर के लिए नहीं बैठ पाते थे उन्हें भिखमंगे वर्ग का माना जाता था और हम उसी वर्ग में आते थे। पिता के मरने और मां के पागल हो जाने और कोई स्थायी आधार न होने के कारण चार्ली को पूरा बचपन अभावों में गुज़ारना पड़ा और यतीम खानों में रहना पड़ा। 

''हमारा वक्त खराब चल रहा था और हम गिरजा घरों की खैरात पर पल रहे थे।''

मां पागल खाने में और भाई सिडनी अपनी नौकरी पर जहाज में, चार्ली को डर रहता कि कहीं उसे फिर से यतीम खाने न भेज दिया जाये वह सारा सारा दिन मकान मालकिन की निगाहों से बचने के लिए सड़कों पर मारे मारे फिरते लैम्बेथ वॉक पर और दूसरी सड़कों पर भूखा,प्यासा केक की दुकानों की खिड़कियां में झांकता चलता रहा और गाय और सूअर के मांस के गरमा-गरम स्वादिष्ट लजीज पकवानों को और शोरबे में डूबे गुलाबी लाल आलुओं को देख-देख कर मेरे मुंह में पानी आता रहा।

चार्ली को चलना और बोलना सीखने से पहले पहले गाना और नाचना सिखाया गया था और यही वज़ह रही कि वे पांच बरस में मंच पर उतर गये थे और इससे भी बड़ी बात कि सात बरस की उम्र में वे नृत्य के लैसन दिया करते थे और इस तरह से होने वाली कमाई से घर चलाने में मां का हाथ बंटाते थे। बेशक हम समाज के जिस निम्नतर स्तर के जीवन में रहने को मज़बूर थे वहां ये सहज स्वाभाविक था कि हम अपनी भाषा.शैली के स्तर के प्रति लापरवाह होते चले जाते लेकिन मां हमेशा अपने परिवेश से बाहर ही खड़ी हमें समझाती और हमारे बात करने के ढंगए उच्चारण पर ध्यान देती रहती हमारा व्याकरण सुधारती रहती और हमें यह महसूस कराती रहती कि हम खास हैं।

चार्ली की स्कूली पढ़ाई आधी अधूरी रही। देखा जाये तो वे औपचारिक रूप से दो  बरस ही स्कूल जा पाये और बाकी पढ़ाई अनाथ आश्रमों के स्कूलों में या इंगलैंड के प्रदेशों में नाटक मंडली के साथ शो करते हुए एक एक हफ्ते के लिए अलग अलग शहरों के स्कूलों में करते रहे। चार्ली ने नियमित रूप से आठ बरस की उम्र में ही एट लंकाशयर लैड्स मंडली में बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू कर दिया था और बारह बरस की उम्र तक आते आते वे इंगलैंड के सर्वाधिक चर्चित बाल कलाकार बन चुके थे और जीवन की असली पाठशाला में अपनी पढ़ाई कर रहे थे फिर भी स्कूली पढ़ाई ने उन्हें जो कुछ सिखाया उसके बारे में वे लिखते हैं


http://www.surajprakash.com/

दो कहानी संग्रह हैं
अधूरी तस्वीर(1992)और छूटे हुए घर–(2002)
दो उपन्‍यास हैं
हादसों के बीच(1998) और देस बिराना(2002)
एक व्‍यंग्‍य संग्रह है
ज़रा संभल के चलो जो(2002)
एक कहानी संग्रह गुजराती में
साचा सर नामे(1996)
9 पुस्‍तकों का संपादन 
रेडियो पर प्रसारण लगभग 30 बरस से अनवरत
पूरा परिचय यहाँ 
''काश किसी ने कारोबारी दिमाग इस्तेमाल किया होता प्रत्येक अध्ययन की उत्तेजनापूर्ण प्रस्तावना पढ़ी होती जिसने मेरा दिमाग झकझोरा होता तथ्यों के बजाये मुझ में रुचि पैदा की होती अंकों की कलाबाजी से मुझे आनंदित किया होताए नक्शों के प्रति रोमांच पैदा किया होताए इतिहास के बारे में मेरी दृष्टिकोण विकसित किया होता मुझे कविता की लय और धुन को भीतर उतारने के मौके दिये होते तो मैं भी आज विद्वान बन सकता था। 

मात्र आठ बरस की उम्र में उन्हें जिन संकटों का सामना करना पड़ाए उससे कोई भी दूसरा बच्चा बिल्कुल टूट ही जाता। चार्ली काम धंधे की तलाश में गलियों में मारे मारे फिरते उस वक्त मैं आठ बरस का भी नहीं हुआ था लेकिन वे दिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे लम्बे और उदासी भरे दिन थे। 

ऐसे में भी चार्ली ने कभी हिम्मत नहीं हारी क्योंकि लक्ष्य उनके सामने था कि उन्हें जो भी करना है थियेटर में ही करना है। उन्होंने बीसियों धंधे कियेरू मुझमें धंधा करने की जबरदस्त समझ थी। मैं हमेशा कारोबार करने की नयी.नयी योजनाएं बनाने में उलझा रहता। मैं खाली दुकानों की तरफ देखता सोचता इनमें पैसा पीटने का कौन सा धंधा किया जा सकता है। ये सोचना मछली बेचने, चिप्स बेचने से ले कर पंसारी की दुकान खोलने तक होता। हमेशा जो भी योजना बनती, उसमे खाना ज़रूर होता। मुझे बस पूंजी की ही ज़रूरत होती लेकिन पूंजी ही की समस्या थी कि कहां से आये। आखिर मैंने मां से कहा कि वह मेरा स्कूल छुड़वा दे और काम तलाशने दे। 

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फिलहाल उसे उनकी वेबसाईट पर पूरा और मूल रूप में डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है। क्रमश : प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे।-सम्पादक 


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