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भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगांठ:आओ पीछे मुड़कर देखें।

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, जनवरी 27, 2013 | रविवार, जनवरी 27, 2013


                                                             ‘भारत’ से ‘इंडिया’ बनता हमारा देश
                                                                                 कौशल किशोर 


आज देश भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगांठ मना रहा है। देश भर में परेड होगा। झांकियाँ निकलेगी। अपने राष्ट्र का दुनिया की महाशक्ति बनने का प्रदर्शन होगा। प्रगति और विकास का बैंड बजेगा। पर कहां होगा इसमें देश का आम आदमी ? ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां आजादी के बाद से प्रगति व विकास हुआ है। समाज में ऐसे लोगों की अच्छी खासी आबादी उभरी है, जहां सम्पन्नता आई है। हम ‘गर्व’ कर सकते हैं कि दुनिया के सर्वाधिक धनाढ़य लोगों में भारतीय भी शामिल हैं। हमारी संसद अरबपतियों से रौशन है। 

लेकिन इसके बावजूद क्या इस सच्चाई से इनकार किया जा सकता है कि आजादी के अधूरे व अपूर्ण होने का अहसास भी लोगों के दिलों में गहराया है। भूख, गरीबी, महंगाई, दुख, नाइंसाफी व मुसीबतों के पहाड़ के नीचे दबकर बहुसंख्यक आबादी के अन्दर जो दर्द व कराह है, उससे आजादी का सारा अहसास  ही उसके अन्दर से हवा हो गया है। जनता मतदान करती रही। वह सरकारें बदलती रही। पर अपनी जिन्दगी में गहराते अंधेरे को नहीं बदल पाई। आखिरकार वह किस पर यकीन करे ? 

माना जाता है कि राजनीति का आधार विचारधारा और सिद्धान्त होता है। इसी से राजनीतिक दलों और राजनीतिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यदि गाँधी, अम्बेडकर व भगत सिंह हमें अलग नजर आते हैं तो इसके पीछे उनके राजनीतिक दृष्टिकोण व सिद्धान्त की भिन्नता है। यही राजनीतिक दलों की भिन्नता का भी कारण है। यह भी मान्यता है कि राजनीति त्याग, देशसेवा और जनसेवा का माध्यम है। अपनी वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद इन्हीं मान्यताओं के आधार पर राजनीतिक संस्कृति का निर्माण होता है। हमारे संसदीय जनतंत्र में पक्ष और प्रतिपक्ष मिलकर मुख्य राजनीति का निर्माण करते हैं। लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि ये तमाम सत्ता  की राजनीतिक पार्टिर्यों में बदल गये हैं। उसके अर्थतंत्र का हिस्सा बनकर रह गये हैं। जनता की खबर लेने वाला, उसका दुख.दर्द सुनने व समझने वाला और उसके हितों के लिए लड़ने वाला आज कोई प्रतिपक्ष नहीं हैं।

वैसे तो देश के आजाद होने के समय भी इस आजादी को लेकर सवाल थे और उस वक्त ही आजादी के चरित्र तथा यह आजादी किसके हित में है जैसे विषय पर विचार आने लगे थे। इस तरह के विचारों व भावों को सरदार जफ़री ने यूँ व्यक्त किया था - ‘कौन आजाद हुआ, किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी’। अर्थात देश के आजाद होते ही आजादी के अधूरेपन का अहसास महसूस किया जाने लगा था। हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान संघर्ष के रास्ते, आजाद भारत के मॉडल तथा उसके स्वरूप को लेकर मत वैभिन्न था और इस संघर्ष में कई घाराएँ क्रियाशील थीं। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों - गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डॉ अम्बेडकर आदि के बीच गहरे मतभेद थे। इसके बावजूद उनकी समझ व दृष्टि साफ थी।  भगत सिंह के लिए आजादी का तात्पर्य ‘गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों’ के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण नहीं था बल्कि मजदूरों व किसानों के हाथों में वास्तविक सत्ता का होना था। मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकार में हमें इन्हीं विचारों का दर्शन होता है जब वे कहते हैं कि ‘जॉन की जगह गोविन्द’ का शासन की कुर्सी पर बैठ जाना आजादी नहीं है। वे आजाद भारत को किसानों.काश्तकारों के राज में देख रहे थे। 

डॉ0 अम्बेडकर गैर बराबरी पर आधारित सामाजिक ढ़ांचे के विरुद्ध थे। उन्होंने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के समक्ष कहा था कि भारतीय गणतंत्र के रूप में 26 जनवरी 1950 को हम अंतरविरोधों से भरपूर जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हैं जहां हमारे पास राजनीतिक  समानता व स्वतंत्रता होगी, वहीं आर्थिक व सामाजिक जीवन में यह हमारे लिए दुर्लभ रहेगा। डॉ0 अम्बेडकर की ये शंकाएं निर्मूल नहीं थीं। आर्थिक व सामाजिक जीवन की कौन कहे, राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता भी आजाद भारत में क्षतिग्रस्त होती रही है। गाँधीजी से जब पूछा गया था कि आपके सपनों का भारत कैसा होगा तो उन्होंने कहा कि स्वराज्य को प्रत्येक गरीब की कुटिया तक पहुँचाना हम सबका काम होगा और मेरे सपनों का भारत ऐसा होगा जिसमें हर आदमी यह महसूस कर सके कि यह देश उसका है, उसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है। 

हमारी आजादी के नायकों में चाहे जितने मतभेद हों पर उन्होंने ऐसे आजाद भारत के बारे में कभी नहीं कल्पना की होगी कि जहां आवाज किसी की गूँजे तो वह दबंगों, धनपशुओं, राजनीतिक सौदागरों और अपराधियों की हो। हमारे शासकों ने जिन नीतियों पर अमल किया है, उनसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने जब देश गुलाम था तब लिखा था ‘स्वानों को मिलता दूध.भात/ भूखे बालक अकुलाते हैं/ मां की हड्डी से चिपक ठिठुर/जाड़े की रात बिताते हैं।’ पर यह आज भी हकीकत है। ऐसी व्यवस्था है जहाँ साम्प्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कॉरपोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी, बाहुबली व माफिया सत्ता की शोभा बढ़ा रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं, देशभक्ति का तमगा पा रहे हैं, वहीं इनका विरोध करने वाले, सर उठाकर चलने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, उनके लिए उम्रकैद है, जेल की काल कोठरी है। हम यह कहते हुए नहीं थकते कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यह किसानों का देश है। पर हमारे अन्नदाता की क्या हालत है ? उदारवादी नीतियों के पिछले दो दशकों में ढ़ाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। यहां महिलाओं को देवी का स्थान दिया गया। ‘जत्र नारी पूजयन्तो, तत्र रमन्ते देवता’ - इन सब ने अपना अर्थ खो दिया है। इस देश में आज महिलाएं असुरक्षित हैं। बर्बरता की संस्कृति हावी है। वे भ्रूण हत्या से लेकर सामूहिक बलात्कार की शिकार बनाई जा रही हैं। 

हमारी आजादी देश के बंटवारे की त्रासदी लेकर आई थी। पैंसठ साल बाद भी उसके घाव आज तक नहीं भरे हैं। उस दर्द की टीस अब भी बनी है। वहीं, उदारवादी नीतियों ने पिछले दो दशकों के दौरान देश का एक और विभाजन कर डाला है - इंडिया बनाम भारत। ऐसा ‘इंडिया’ जो साम्राज्यवादी नीतियों का अनुगामी है। देश का अमेरिकीकरण किया जा रहा है। यह ‘इंडिया’ पश्चिम के मूल्यों, संस्कृति, जीवनशैली के अंधानुकरण में लगा है। हमारी नौजवान पीढ़ी को तैयार किया जा रहा है कि वे अमेरिका व पश्चिमी देशों में ही अपना भविष्य तलाशें। दूसरी तरफ शोषित.पीड़ित.गरीब.दलित ‘भारत’ है जिसे जल, जंगल, जमीन और उसकी श्रम संपदा से लगातार बेदखल किया जा रहा है। इन 63 सालों में उसकी तकलीफों व अभावों की गठरी भारी होती गई है। सत्ता सम्पति से बेदखल गरीबों का कोई पुरसाहाल नहीं है। क्या देश के इन भारतवासियों के लिए आजादी, लोकतंत्र, गणतंत्र का कोई मायने बचा है ? 

समीक्षक 
मो - 08400208031, 09807519227
जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227

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