महिला भू-अधिकार आंदोलन सशक्त रूप से देश में कोने कोने में चल रहा है। - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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महिला भू-अधिकार आंदोलन सशक्त रूप से देश में कोने कोने में चल रहा है।


आंमत्रण पत्र

भारतीजी की दूसरी पुण्यतिथि के उपलक्ष्य पर

महिला सशक्तिकरण केन्द्र की स्थापना के लिए प्रतिनिधि सभा

स्थान: भारती सदन, ग्राम नागल माफी, शाकुम्बरी देवी
जनपद सहारनपुर, उ0प्र0
दिनांक: 18 जनवरी 2013


प्रिय साथीयों,



जैसा कि आपको विदित है कि 18 जनवरी 2011 क्रांतिकारी साथी भारतीजी का निधन एक लम्बे संघर्ष के बाद हो गया था। उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी महिला अधिकार और खास कर के भूमिहीन महिलाओं एवं समुदायों के अधिकारों के संघर्ष में योगदान किया। आज देखा जाए तो महिला भू-अधिकार आंदोलन सशक्त रूप से देश में कोने कोने में चल रहा है। जिसका एक बड़ा कारण यह है कि अंग्रेज़ी शासन काल और आज़ाद भारत में सरकारों द्वारा जो विकास नीति बनाई गई उससे करोड़ों लोग विस्थापित हुए और भूमिहीनों की संख्या बढ़ती गई। जहां एक तरफ लोगों को उनके जल, जंगल और जमींन पर मालिकाना हक़ मिलना था वहीं उनसे नवउदारवादी अर्थनीति के चलते भूमि व अन्य प्राकृतिक आजीविका के साधनों को छीनने का काम शुरू हुआ। जिससे भूमिहीन बनने की प्रक्रिया और भी तेज़ हुई। इन नवउदारवादी नीतियों ने बड़ी संख्या में महिलाओं को खेतीहर मज़दूर बनाने का काम भी किया। 

दूसरी ओर हमारे देश के किसी भी राजस्व कानूनों में महिलाओं को स्वतंत्र रूप से खेती की भूमि को उपलब्ध करने के कोई प्रावधान नहीं है जबकि भूमिहीन किसान महिलाए खेती में 90 प्रतिशत का योगदान करती हैं। उनके भूअधिकारों को केवल सम्पति के अधिकारों से जोड़ कर देखा जाता है न कि आजीविका के अधिकारों के रूप में। ग़रीब महिलाओं के भूअधिकार, सार्वजनिक उपयोगों की भूमि पर अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार को राजसत्ता द्वारा मान्यता नहीं दी गई है। इस उत्पादक शक्ति को केवल परिवार की चार दीवारी के अंदर से देखा जाता है व उसके तमाम सामाजिक समानता व न्यायायिक अधिकारों को परिवार की मर्जी पर छोड़ दिया गया है। यह परिवार जो महिलाओं के मामले में गैरबराबरी, सांमती व उत्पीड़नात्मक सोच रखते हैं। 



इस पूरे दौर में तमाम किसान आंदोलन, विस्थापन विरोधी आंदोलन के बावजूद देश में भूमिहीनता बढ़ती गई। पिछले तीन दशकों में इसके खिलाफ महिलाओं ने तेज़ी से संघर्ष को शुरू किया। इसकी शुरूआत 70 के दशक में बौद्ध गया, बिहार में शुरू हुई थी। महिलाओं में एक सामूहिक चेतना बनी जिसके तहत वो तमाम जनविरोधी परियोजना के खिलाफ आंदोलनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही है और क्षेत्रीय स्तर में कई प्रतिरोध आंदोलन में एक सशक्त नेतृत्व भी स्थापित कर रही है। उ0प्र0, उत्तराख्ंाड़ और आस पास के राज्यों में भी महिला भू-अधिकार आंदोलन काफी तेज़ी से बढ़ रहा है। इन जनसंघर्षो में महिलाओं ने वैकिल्पक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए प्रयोग भी शुरू कर दिए है जिसमें सामूहिक खेती और सामूहिक वानिकी प्रमुख है। इन प्रयोगों का मुख्य आयाम प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखते हुए और उसका आजीविका के लिए प्रयोग है। संघर्ष और प्रयोग का यह अभूतपूर्व तालमेल नई दिशा की तरफ भी इंगित कर रहा है। रा0 वनजन श्रमजीवी मंच इस प्रक्रिया में पूरी तरह से शामिल है और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। जिसके तहत सहकारी समितियों को बनाना, बीजों का संरक्षण, प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण आदि जिसमें शामिल हैं। अब भूमिहीन व ग़रीब महिलाए सरकार से अपने स्वतंत्र भूअधिकारों व संसाधनों के अधिकार की मांग कर रही हैं।



भारती जी इस प्रक्रिया के शुरूआती दौर से शामिल रही और समुदाय के साथीयों को प्रेरित करती रही। इस प्रक्रिया को सशक्त रूप से आगे बढ़ाने के लिए महिला नेतृत्व को मजबूत करना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसी उददेश्य को पूरा करने के लिए रा0 वनजन श्रमजीवी मंच ने यह तय किया है कि क्षेत्रीय स्तर पर महिला सशक्तिकरण केन्द्र को स्थापित किया जाए। इन केन्द्रों में संघर्षशील महिला साथियों की नेतृत्व को विकसित करने का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस केन्द्र में प्रशिक्षण, आपसी तालमेल और नए प्रयोग के विषय में जानकारी हासिल करने के लिए आगामी कार्यक्रमों पर चर्चा की जाएगी। आंदोलन में महिला नेतृत्व के सशक्तिकरण के लिए परिवार, समाज और संगठन में महिलाओं के परिसर को बढ़ाना निहायत जरूरी है। महिला सशक्तिकरण केन्द्र इस विषय पर विशेष ज़ोर देगा। इसी कार्यक्रम के तहत नागलमाफी में पहले महिला सशक्तिकरण केन्द्र की स्थापना की जाएगी। ज्ञातव्य रहे कि 22 साल पहले सहारनपुर के इस वनाच्छिादित घाड़ क्षेत्र में महिला आंदोलन को मज़बूत करने के लिए विकल्प सामुदायिक केन्द्र की स्थापना की गई थी। जिसकी स्थापना में  भारती जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने कार्यकाल में उन्होंने इस केन्द्र में अपना बहुत समय बिताया। जिसके कारण पिछले वर्ष उनकी पहली पुण्यतीथि पर उनकी याद में इस समुदाय केन्द्र का नाम में ‘भारती सदन’ रखा गया। 

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