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पंखुरी सिन्हा:-कविता का एक युवा चेहरा जो अपने वर्तमान को पैनी निगाह से ताकता है।

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जनवरी 16, 2013 | बुधवार, जनवरी 16, 2013

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

(वाकई पंखुरी सिन्हा, कविता का एक युवा चेहरा जो अपने वर्तमान को पैनी निगाह से ताकता है।सिन्हा के आगामी पथ हेतू हमारी असीम शुभकामनाएं। उनकी और भी कवितायेँ यहाँ साझा करने का मन है।-सम्पादक) 
(1) हुमायूँ की प्रार्थना


बाबर की नहीं,
हुमायूँ की है यह प्रार्थना,
ताजपोशी के बाद की,
शहंशाह करार दिए जाने के बाद की,
कि सब सूबे उसके हों,
सारे मनसब,
मनसबदार सारे,
घुड़साल सारे,
बगावत हो,
बग़ावत की इज़ाज़त हो,
इबादत है कि देश बने,
फतह कायम रहे,
मुलाजिम हाज़िर हों,
अमन चैन रहे।

दरबार रहे,
नौ रत्न रहे,
गाने से, बजाने से,
जलें दीपक,
आवाज़ में इतनी आग रहे।

कि अंगूठा कटवाया जाये,
कलाकार का,
कैद किया जाये बादशाह,
क़त्ल की जाये मलिका,
कि पहरे हों नूरजहाँ जैसे,
पहुँचने में उस किसी बेहद अज़ीज़ तक,
खुद शहंशाह तक,
न्याय तक,
तख़्त से मांगी जा सकने वाली रियायत तक,
और कि कुछ नए जवाब ढूंढें जायें,
कि क्यों है औरंगज़ेब आखिरी महान मुग़ल बादशाह?
कि मुग़लिया शान ख़त्म क्यों होती है,
औरंगज़ेब पर?
कि क्यों है 1803 का साल दर्ज़,
हमारे इतिहास में,
दिल्ली पर अंग्रेजी फतह का साल,
कि कहाँ थे घुड़सवार हमारे,
कहाँ थीं,
बंदूके?
कि क्यूँ है दर्ज हमारे रजवाड़ो के इतिहास का आखिरी अध्याय,
सिर्फ तोपों की सलामी में?
कैसे ढूंढें जाये,
फतह सम्बन्धी जवाब कुछ,
बाहर बाबरनामा से ?

(2) चोरी के मौसम में

वो फक्कड़ था,
आवारा था,
पढता भी इसलिए था,
कि चुरायी जा सकें बातें,
कार्टेजियन ट्रायल की,
रूप की, गंध की,
लड़कियों की खिलखिलाहट की,
सबसे ज्यादा बसने की,
बस जाने की,
खोलने की दराज़,
और पाने की हर चीज़ को नियत जगह,
यानि हर चीज़ की एक जगह का होना,
मसलन खुशबू की,
माखन की एक बड़ी सी डली की,
जिसे मकान मालकिन ने डाला है,
आज सुबह भी,
अभी, अभी,
आलू या गोभी के परांठे पर,
खुशबू उसके पिघलने की,
साबुन की टिकिया से भी ज्यादा मसृण,
झाग से ज्यादा गुदगुदी,
जो टिकिया भी इतनी महंगी है,
कि बहुत एहतियात से,
घिसी जा रही है,
कपड़ों पर।

पंखुरी सिन्हा
परिचय
संपर्क--- 510, 9100, बोनावेंचर ड्राइव, कैलगरी, SE, कैनाडा, T2J6S6
सेल फ़ोन0403-921-3438-
शिक्षा ---एम , इतिहास, सनी बफैलो, 2008,
पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे, 1998
बी , हानर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996

अध्यवसाय
  1. BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप, 1997-98,
  2. FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग, 1997-98,
  3. राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता, 1998—2000

प्रकाशन

  1. हंस
  2. वागर्थ
  3. पहल
  4. नया ज्ञानोदय
  5. कथादेश
  6. कथाक्रम
  7. वसुधा
  8. साक्षात्कार
  9. अभिव्यक्ति,                          
  10. जनज्वार
  11. अक्षरौटी
  12. युग ज़माना
  13. बेला, समयमान, आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें, प्रकाशित,
वेबप्रकाशन

  1. हिंदिनी
  2. हाशिये पर
  3. हहाकार

किताबें 

  1.  'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
  1. 'क़िस्सा--कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
  2. कविता संग्रह 'ककहरा', शीघ्र प्रकाश्य,


पुरस्कार-
  1. पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान,
  2. 'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला
  3. 'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार
  4. 1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

अनुवाद-
  1. कवितायेँ मराठी में अनूदित
  2.  कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ
  3. उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद 
सम्प्रति

  1. डिअर सुज़ाना’ शीर्षक कविता संग्रह के साथ, अंग्रेज़ी तथा हिंदी में, कई कविता संग्रहों पर काम
  2. न्यू यॉर्क स्थित, व्हाइट पाइन प्रेस की 2013 कविता प्रतियोगिता के लिए, 'प्रिजन टॉकीज़', शीर्षक पाण्डुलिपि प्रेषित
  3. पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम
  4. माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़
  5. एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम
  6. एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन
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1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय अशोक जमनानी जी, सबसे पहले तो आपके प्रोत्साहन के लिए अनेक धन्यवाद। और ये स्नेह भरे शब्दों में आपने कहा है कि मेरी और कवितायेँ आप साझा करना चाहेंगे कि मैं कृतार्थ हूँ. सचमुच कवि के लिए बहुत ख़ुशी की बात होती है ऐसा जानना, ऐसा सम्पादकीय सम्बल। नेट की दिक्कतों की वजह से देरी, माफ़ी चाहती हूँ. अभी भी आपका ईमेल नहीं मिल रहा, संस्थान के ईमेल पर भेजती हूँ. मुझे लगता है वहीं भेजी थी. और ढेरो बातें जल्दी। इस बीच, आपके और लीलाधर मंडलोई जी के असीम प्रोत्साहन से साहित्य भंडार से मेरा पहला कविता संग्रह रक्तिम सन्धियां आया है. आपको यथा शीघ्र भिजवाती हूँ.

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