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'' रघुवीर सहाय को समग्रता में देखा जाना चाहिए''-मंगलेश डबराल

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, जनवरी 18, 2013 | शुक्रवार, जनवरी 18, 2013


अकादमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के कवि रघुवीर सहाय को समर्पित कार्यक्रम 'डायलाग' 
एक रपट - 29 दिसम्बर 2012 

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इस कार्यक्रम से दौरान दिल्ली में गैंग-रेप प्रकरण के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के कारण स्त्री-विमर्श चर्चा का विषय रहा और इस बहुप्रतीक्षित कार्यक्रम को भी स्त्री-अस्मिता और सुरक्षा को ही समर्पित किया गया। इस कार्यक्रम को 'दामिनी' और उस जैसी बहुत सी लड़कियों को समर्पित करते हुए, इसे भी विरोध प्रदर्शन का ही रूप दिया गया। मिथिलेश जी ने स्त्री-अपराध पर अपनी बात रखते हुए अपनी चिंताएं ज़ाहिर की, साथ ही उन्होंने रघुवीर सहाय की कविताओं को व्यवस्था-विरोध की कविताएँ कहा। उन्होंने कहा कि रघुवीर सहाय ने हमेशा अच्छा इंसान बनने, अच्छा समाज बनने पर बात की। कवयित्री सुधा उपाध्याय ने घटनाक्रम पर रोशनी डालते हुए उस दिन, और पिछले लगभग तेरह दिनों के बारे में बात की। दामिनी के बहाने इस आक्रोश को दिशा ही नहीं बल मिला, अपना गुस्सा, बेबसी आक्रोश जाहिर करने का एक उद्देश्य भी मिला है, जो जाने कब से अंतर्मन को मथ रहे थे। सभी ने मौन रखकर दामिनी को श्रद्धांजलि दी और उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। 



सबसे पहले डायलाग में वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने रघुवीर सहाय के काव्य-संसार पर बात करते हुए कहा, रघुवीर सहाय वे पहले कवि थे, जिन्होंने स्त्री को केंद्र में रखकर कवितायेँ लिखी, हालाँकि इससे पहले भी स्त्री-विमर्श पर कवितायेँ लिखी गयी थी, पर उनकी कविताओं में जो स्थान स्त्री को मिला वह अन्यत्र नहीं दिखा। बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी तमाम घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि रघुवीर सहाय ने वह दौर नहीं देखा लेकिन उनकी कविताओं में वह चुनौती बार बार आती थी। चुनौतियों से बचने की प्रक्रिया में कविता दीर्घगामी सरोकारों से बची रहती है। रघुवीर सहाय कभी भी किसी सरलीकरण में नहीं पड़े। रचना के घोषित रूप से प्रगतिशील होने से बचते हुए भी वे सरोकारों को कविता में लाते रहे, इस मायने में वे मुक्तिबोध के सच्चे उत्तराधिकारी थे। कवि उमेश चौहान ने भी रघुवीर सहाय पर एक आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि रघुबीर जी का स्पष्ट मानना था कि कविता को सिर्फ निराशा या नकारात्मकता से ही भरा हुआ नहीं होना चाहिए। आशा, जिजीविषा, मनुष्यत्व की जीत एवं शुभाप्ति-विश्वास ही कविता का लक्ष्य होना चाहिए। वे कविता को सिर्फ शब्दों का आडंबर बना देने के पक्ष में कतई नहीं थे। उनका मानना था कि कविता को जीवंतता से भरा होना चाहिए। उसमें जीवन का प्रवाह होना चाहिए। नैसर्गिकता होनी चाहिए। रघुबीर जी की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों, अन्याय व अत्याचार आदि के विरुद्ध प्रतिरोध व संघर्ष की व्याप्ति है। 



वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि स्त्री पर हो रहे अत्याचारों पर जो वह लिख रहे थे वह हमारी थाती है, हम प्रासंगिक हो सकते हैं, इस संकट को लेकर कि रघुवीर सहाय को स्त्रियों की कितनी चिंता थी। वरिष्ठ कवि त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि रघुवीर की कविताओं का विषय इतना व्यापक है की इसे जनवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनके यहाँ सत्य और उसके बखान की विडंबना को अलग अलग करने का विधान है। वहीँ सुप्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल का कहना था कि रघुवीर सहाय को समग्रता में देखा जाना चाहिए, जहाँ बात खड़े होकर खाने से लेकर राजनीति तक, अकाल में बचे रहने की ग्लानि तक चली जाती है। उन्होंने बुरी ख़बरों को लेकर बहुत सी कवितायेँ लिखी, यहाँ तक कि उन्हें 'खबरिया कवि' भी कहा गया। मंगलेश जी ने कहा कि दरअसल कविता इतिहास का अंतिम प्राप्त है। वरिष्ट कवि एवं अध्यक्ष अजित कुमार ने कहा कि रघुवीर सहाय साहित्य में पूरी तैयारी के साथ आये, वे छंद-निपुण भी थे। उनकी कविताओं का एक खास गुण रहा, कविताओं का याद रह जाना जो आज की कविताओं से खोता जा रहा है। रघुवीर सहाय की कविताओं में एक खिलंदडपन, कौतुक है जो उनकी बाद की कविताओं में खोता चला गया। वर्तमान परिदृश्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि रघुवीर सहाय ने हिंसा के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, यहाँ यह प्रश्न सामने आता है कि क्या कवि समाज को बदल सकता है। इसका जवाब है कि हाँ, जनता की साझेदारी से समाज बदलेगा। 



डायलाग में इस बार बहुत से कवि, लेखक, कहानीकार, मीडियाकर्मियों ने कविता पाठ किया। यहाँ कवि मदन कश्यप, कुमार अनुपम, अंजू शर्मा, विभा मिश्र, मिथिलेश श्रीवास्तव, सुनील मिश्र, मणिनाथ ठाकुर, देवेश त्रिपाठी, श्रीकांत सक्सेना, विपिन चौधरी, मनोज अबोध, लीलाधर मंडलोई, सुधा उपाध्याय, आदर्श शुक्ल, ममता किरण, रितिका श्रीवास्तव, राजीव वर्मा, आलोक तिवारी, त्रिनेत्र जोशी, प्रियदर्शन, अमिताभ खरे, हरनेक सिंह गिल, उपेन्द्र कुमार, असद जैदी, महेन्द्र सिंह बेनीवाल, संजय कुंदन, संजीव कौशल, सर्वेश मौर्य, विवेक मिश्र, मंगलेश डबराल और अजित कुमार ने क्रमशः रघुवीर सहाय के पांच काव्य-संग्रहों में से चुनिन्दा कविताओं का पाठ किया। मिथिलेश श्रीवास्तव के सुगढ़ सञ्चालन के साथ कार्यक्रम में रघुवीर सहाय से जुडी कई रोचक बातें भी सामने आती रही। अपनी विषय-वस्तु के चलते यकीनन ये आयोजन अपने आप में अनूठा रहा। अंत में कहानीकार एवं कवि विवेक मिश्र के धन्यवाद ज्ञापन से इस यादगार कार्यक्रम का समापन हो गया। 



अंजू शर्मा 
युवा कवयित्री हैं.
दिल्ली में रहते हुए साहित्य-संस्कृति के कई बड़े संगठनों से जुडी हुई है.
कविता रचना के साथ ही आयोजनों की अनौपचारिक रिपोर्टिंग के अंदाज़ के साथ चर्चा में हैं.
प्रिंट मैगज़ीन के साथ ही कई ई-पत्रिकाओं में छपती रही है.
वर्तमान में मैं अकादमी ऑफ़ फाईन आर्ट्स एंड लिटरेचर के कार्यक्रम 'डायलोग' और 'लिखावट' के आयोजन 'कैम्पस में कविता' से बतौर कवि और रिपोर्टर एक और पहचान है.
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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (19-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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