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राजस्थानी भाषा ही राजस्थानी संस्कृति की पहचान है।

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, जनवरी 30, 2013 | बुधवार, जनवरी 30, 2013


राजस्थानी हमारी मातृभाषा है और हिन्दी राष्ट्रभाषा
भाषा के बिना राजस्थान की संस्कृति की कल्पना बेमानी

उदयपुर, 30 जनवरी। 
राजस्थानी भाषा राजस्थान के लोगो की मातृभाषा होने के साथ ही राजस्थानी संस्कृति की पहचान है। भाषा लोगो को बान्धे रखती है भाषा ही संस्कृति को आगे ले जाती है और भाषा के बिना राजस्थान की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। उक्त विचार संवाद के मुख्य अतिथि राजस्थान एसोसीएशन ऑफ नोर्थ अमेरिका(राना) के उपाध्यक्ष एवं विख्यात यूरोलोजिस्ट डॉ. शशी शाह ने डॉ. मोहन सिंह मेहता मेमोरियल टस्ट द्वारा आयोजित वृहत् संवाद में व्यक्त किए। डॉ. शाह ने कहा की आज  महात्मा गांधी का शहीदी दिवस है गांधी जी को मातृ भाषा से बहुत लगाव था। राजस्थानी हमारी मातृ भाषा है और हिन्दी राष्टभाषा। डॉ. शाह ने बताया कि  राजस्थानी को आठवी अनूसूची मे जोडने हेतु 25 अगस्त 2003 को विधानसभा में सकल्प प्रस्ताव पास किया गया जिसकी भूमिका 5 जुलाई 2003 के राना के न्यूयार्क के मेमोरेन्डम से बनी थी। डॉ. शाह ने कहा कि 30 मार्च को न्यूर्याक मे भी राजस्थान दिवस मनाया जाएगा। 

संवाद की अध्यक्षता करते हुए पाटवी राजस्थानी भाषा साहित्य एवं सस्कृति अकादमी बीकानेर के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देव कोठारी ने बतलाया कि वाईट हॉउस मे दिवाली उत्सव शुरू करवाने मे डॉ.शशी शाह एवं राना की सक्रिय भूमिका रही। राजस्थानी भाषा सम्मेलन जयपुर 2006 मे डॉ. शशी की भूमिका सक्रिय रही।संवाद का संचालन करते हुए राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रदेश महामंत्री डॉ. राजेन्द्र बारहट ने कहा कि आठवी अनुसूची में जुडने से प्रदेश के बच्चो को राजस्थानी तृतीय भाषा के रूप में लेने की सुविधा मिल जाएगी। भारतीय प्रशासनिक सेवा मे भी हिन्दी अग्रेजी के अलावा राजस्थानी भी माध्यम होगा। प्रदेश के सांसद विधायको को भी राजस्थानी मे शपथ लेने व संवाद की सुविधा मिल सकेगी। 

संवाद मे गांधी समृति के सुशील दशोरा, साहित्यकार डॉ. ज्योति पुंज, शकुन्तला सरूपरिया, डॉ. वन्दना जोशी, चांदपोल नागरिक समिति के अध्यक्ष तेज शंकर पालीवाल, वरिष्ठ नागरिग मंच के सोहन लाल तम्बोली, शिक्षाविद् बसन्तिलाल कुकडा, गोपाल राजावत, नितेष सिंह आदि ने भाग लिया।संवाद का धन्यवाद देते हुए ट्रस्ट सचिव नंदकिशोर शर्मा ने राजस्थानी भाषा की मान्यता की जरूरत बतलाते हुए राजस्थानी भाषा मे लिखे पद्म विभूषण स्व. डॉ. मोहन सिंह मेहता द्वारा लिखे भाईसा. रा पत्र की पुस्तके भेट की।
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