संजीव बख्शी का कविता संग्रह ''मौहा झाड़ को ही लाईफ ट्री कहते हैं जयदेव बघेल '' - अपनी माटी

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गुरुवार, जनवरी 24, 2013

संजीव बख्शी का कविता संग्रह ''मौहा झाड़ को ही लाईफ ट्री कहते हैं जयदेव बघेल ''


 यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है। 

(संजीव जी जैसे सृजनकर्ता ने अपने आदिवासी प्रवास को कविताओं और उपन्यास के ज़रिये बहुत ठीक तरीके से हमारे बीच साझा किया है।उनकी अनुभूति अब हम सभी की अनुभूति हुई जाती है।सम्पादक )

इसी संग्रह से
बस्तर का हाट का 
कवितांश 

एक पपीता लिए बैठी है
उसे बेचने
एक बाला
बैठी है उकडू सुबह से
सामने गमछा बिछा कर 
उस पर रखा है एक पपीता
कोई एक कटहल लिए बैठा है



(हिंदी के सुपरिचित  कवि संजीव बख्‍शी 
अपने कविता संग्रहों- 
तार को आ गई हल्‍की हँसी, 
भित्‍ति पर बैठे लोग
जो तितलियों के  पास  है
सफेद से कुछ ही दूरी पर पीला रहता था 
व 
के लिए जाने जाते हैं। 
हाल ही आदिवासियों के मिजाज 
पर आया उनका उपन्‍यास 
'भूलनकांदा' 
खासा चर्चित रहा है। 
1952 में खैरागढ़ छत्‍तीसगढ़ मे 

जनमे संजीव बख्‍शी 

का रिश्‍ता मशहूर निबंधकार 

पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी 
से रहा है जिनके बड़े भाई 
बैनलाल बख्शी उनके दादा थे। 
दिग्‍विजय महाविद्यालय राजनांदगांव 
से गणित में एमएससी 
बख्‍शी को कविताओं से बड़ा लगाव है। 
छत्‍तीसगढ़ शासन के 
संयुक्‍त सचिव पद से हाल ही में 
सेवानिवृत्‍त बख्‍शी ने 
एक सदगृहस्‍थ साहित्‍यिक का जीवन जिया है। 
बे बड़भागी हैं कि उन्‍हें हिंदी के 
जानेमाने कवि 
विनोदकुमार शुक्‍ल 
और 
रमेश अनुपम 
जैसे कवियों का 
रोजमर्रा का सान्‍निध्‍य प्राप्‍त है। 
कवि संजीव बख्‍शी का 

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