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अतीत में चित्तौड़गढ़ वाया डॉ रति सक्सेना

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जनवरी 28, 2013 | सोमवार, जनवरी 28, 2013

  • 'कृत्या' पत्रिका की संपादिका और कवयित्री डॉ रति सक्सेना के संस्मरण 
  • मूल शीर्षक -दादी माँ जागी.. बनाम कला की ओर रुझान
  • 'मधुमती' से कट-कोपी-पेस्ट         
स्कूल कोई बुरा नहीं था, स्कूल की हेडमिस्ट्रेस सरला भार्गव हाल में ही जयपुर से आर्इं एक अविवाहित विदुषी महिला थी जो संभवतः अच्छे खासे परिवार से ताल्लुक रखतीं थीं.. उनके ऊपरी होंठ पर कटे का निशान था, रंग भी काफी साँवला था शायद इसलिए उनकी शादी नहीं हुई होगी.. लेकिन उन्होंने  स्कूल की तरक्की की तरफ काफी ध्यान दिया था। कक्षाओं में डेस्क और टाटपट्टियाँ  ही थी, नवीं -दसवीं की अधिकांश लड़कियाँ सफेद धोती पहना करतीं थीं. वह भी सीधे पल्ले की...कुछ सलवार -कमीज.. केवल मैं ही अकेली थी जिसके लिए स्कर्ट-ब्लाउज बनवाया गया था। टाइफाइड होने के कारण बाल भी कटवा दिए गए थे.. 

इस तरह अनायास ही मेरी गणना माडर्न लड़कियों में हो गई। किसी भी स्कूल में शुरु के दिन बड़े अजीब से होते हैं.. हर कोई अपरिचित .. हवा से लेकर दीवारे तक.. सहपाठिनियों से लेकर अध्यापिकाएँ तक .. इस अपरिचय का अपना रोमाँच होता है... अजीब सी थिरकन होती है.... धीमे-धीमे परिवेश में पैठना बड़ा आनन्दकारक होता है। क्लास की सबसे होशियार लड़की का नाम रेशम था , और विमला नाम की लड़की बड़ी स्मार्ट समझी जाती थी। दोनों ही सीधे पल्लू की धोती पहन कर स्कूल या करतीं थीं। स्कूल तक जाने के लिए कुछ लडकियों का साथ भी मिल गया था.. और पाकेटमनी के लिए सप्ताह में चवन्नी भी मिलने लगी...शायद मैं घर की सबसे सस्ती लड़की थी.. न बस का खर्चा न स्कूल की फीस ... सरकारी स्कूलों में लड़कियों की फीस लगा ही नहीं करती थी।

            एक दिन बड़ी बहन जी का बुलावा आया.. मैं डरते-डरते दफ्तर पहुँची तो उन्होंने खट से एक किताब सामने रख दी और एक पेराग्राफ पढ़ने को कहा... मुझे डिबेट वाली घटना याद आ गई .. बड़ी तन्मयता से पढ़ लिया.. बड़ी बहन जी ने घूर कर देखा और पूछा कि -- कभी किसी नाटक में भाग लिया है... मैंने डरते हुए बताया कि नाटक में तो नहीं डिबेट में जरूर लिया है, मेरा तपाक से सलेक्शन हो गया। दरअसल हेडमिस्ट्रेस बड़ी धूम -धाम से स्कूल का वार्षिकोत्सव मनाना चाहतीं थीं, उनका साहित्य से कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य रहा होगा, तभी उन्होंने "दादी माँ जागी" नामक लम्बा नाटक करवाने का निर्णय लिया। इस नाटक में रेशम दादी माँ बनी और विमला पिताजी ... बाकी पात्र छोटे-मोटे थे.. लेकिन एक पात्र डाक्टर सरोज का था जिसके बाल कटे थे और जो पेन्ट पहनती थी। पहली नज़र में मेरे चुनाव का एकमात्र कारण यही था कि नवीं -दसवीं की लड़कियों में केवल मैं ही एक अकेली थी जिसके बाल कटे थे। दादी माँ जागी की रिहर्सल शुरु हुई तो लगा कि मैं किसी दूसरी दुनिया में ही पहुँच गई। कोर्स का एक पेराग्राफ भी पढ़ना मेरे लिए मुश्किल होता था कि नाटक के संवादों को रटना इतना रोमांचक लगा कि मैंने पूरे नाटक के संवादों को ही रट लिया, अब स्थिति यह कि जहाँ कोई अपना संवाद भूला नहीं कि मैंने तपाक से उसका संवाद जड़ दिया...... सरोज एक मस्तमौला.. हंसने-हंसाने वाली लड़की का पात्र था... 

मुझे लगा ही नहीं कि मैं कोई पात्र निभा रहीं हूँ... ऐसा लगने लगा कि मैं ही सरला हूँ.. दर असल मेरे भीतर जो सरला छिपी हुई थी वह इस नाटक के साथ ही पिंजरे से बाहर आ गई। इतनी स्वच्छन्दता , इतनी आजादी का अहसास इससे पहले कभी नहीं हुआ, जब नाटक स्टेज पर खेला गया तो पुरस्कार तो दादी माँ रेशम को ही मिला क्योंकि केन्द्र पात्र वही थी किन्तु जजों में से एक शहर के नामी-गिरामी डाक्टर ने सरोज के रोल के लिए ट्राफी देने की घोषणा की... उन दिनों ट्राफी मिलना बहुत बड़े सम्मान की बात हुआ करती थी। "दादी माँ जागी" के साथ ही भीतर का कलाकार जग उठा , फिर तो स्कूल के हर नृत्य , हर नाटक और हर कार्यक्रम भाग लेना मानों धर्म ही बन गया। पता नहीं और सभी बहनों के लिए इतने कठोर पिता इस बात को कैसे पचा गए। इस में कोईसन्देह नहीं कि नाटक में ट्राफी मिलने की खबर उन्हें भी अच्छी लगी.. इन दो सालो में इतना कुछ किया कि लगा कि एक पूरी जिन्दगी जी ली...         
       
             जब दसवीं में थी तो गाइडिंग की जंबूरी थी कलकत्ता में। राजस्थान से एक स्पेशल गाड़ी स्काउट -गाइडों को लेकर जाने वाली थी। सबसे पहले तो कलकत्ता जम्बूरी जाने की बात थी- गाइडिंग के सिलसिले में । एक महिने के टूर के लिए पिता किसी भी तरह राजी नहीं होंगे,, यह तो मालूम ही था.. अतः स्कूल में यह बात बता दी गई। उन्हीं दिनों हेडमिस्ट्रेस किसी काम से घर के करीब तक आर्इं थीं। उनके साथ अन्य अध्यापिकाएँ भी थीं। जैसे ही उन्हें मेरे घर के बारे में मालूम पड़ा तो वे घर चलीं आर्इं और पिताजी से बातें करतीं रहीं.. उन्होंने मेरी काफी तारीफ भी की । अन्ततः पिता जम्बूरी  भेजने को राजी हो गए। एक महिने की स्पेशल ट्रेन की यात्रा .. हर नए स्टेशन पर एक अजनबी गंध के साथ उतरना औऱ नई गंध बसाना ... एक अजीब सा अहसास था... राजस्थान  के हर प्रान्त को लेकर चली स्पेशल रेलगाड़ी अपने आप में ही विभिन्नता की मिसाल थी, उदयपुर के हिस्से में आए डिब्बों में चित्तौड़-गढ़ से आई हम चार लडकियाँ और एक अध्यापिका भी समा गर्इं। इतना अद्भुत सफर शायद ही कभी किया होगा। हर पड़ाव पर हम लोगों की गाड़ी यार्ड में टिक जाती फिर स्टेशन पर ही खाना -पकाना होता। दिन भर भ्रमण और रात को यात्रा ... इसी सुविधा के कारण उस छोटी सी उम्र में ही काफी शहरों के दर्शन हो गए। 

आज तो उस यात्रा की ज्यादा याद नहीं है। जम्बूरी में भी इतने सारे लोगों से मिलना बड़ा रोमांचक अनुभव था। बहुतों की तो भाषा भी नहीं आती, फिर भी न जाने कैसे संवाद हो ही जाता। रात को केम्प फायर के वक्त ढ़ेर से कार्यक्रम हुआ करते। वहीं पता चला कि दुनिया में एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं। नाचना-गाना मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी। इन दोनों कलाओं को मैं कभी भी नहीं सीख पाई। यहाँ पर आकर ऐसा महसूस हुआ कि यदि ये दो कलाएँ आतीं हैं तो किसी अन्य कला की ज़रूरत ही नहीं। जिन्दगी में आज तक एक कमी खलती है और वह है गाने -नाचने की कला का अभाव... फिर भी एक सन्तुष्टि है कि थोड़े ही वक्त के लिए सही... छोट से स्टेज पर सही... एक कलाकार की जिन्दगी तो जी ली... यही क्या कम है?

                        चित्तौड़गढ़ में बीता समय संभवतः जिन्दगी का सबसे आल्हादकारी समय था। इन दिनों स्कूल में होने वाले सभी साँस्कृतिक कार्यक्रमों में जम कर हिस्सा लिया। डिबेट और नाटक - अभिनय के लिए तो स्कूल में धाक जम गई। दूसरे साल के वार्षिकोत्व में सरला भार्गव जी ने "नारी " विषय को लेकर एक थीम बनाई जिसमें  श्रद्धा से लेकर इन्दिरा गाँधी तक सभी तेजस्वी महिलाओं की सुन्दर झाँकियाँ थीं। इस झाँकी में मुझे कम से कम सात- आठ पात्र निभाने ही पड़े। कोई भी अभिनय जो किसी और से सम्भव नहीं होता मुझे करना पड़ता। उदाहरण के लिए रानी हाण्डा की झाँकी में जो सेवक रानी की निशानी लेने आता है उसे कैसी अनुभूति होती होगी  --- सरला मैडम बार-बार कहती कि सेवक के चेहरे पर भय, श्रद्धा और भक्ति के भाव तीव्रता से एक के बाद एक आने चाहिए। लेकिन कोई भी लड़की अभिनय नहीं पा रही थी। विषय की दृष्टि पात्र गौण था पर अभिनय की दृष्टि से इसका महत्व था। अन्ततः मेरी पुकार हुई, मेरे पास पहले से काफी काम था फिर भी कुछ मिनटो के इस पात्र को जीने में मेरी सारी इन्द्रियाँ सन्तृप्त हो गर्इं। दर्शकों ने भी इस छोटे से पात्र को सराहा।

             जिन्दगी का सबसे सुनहरा क्षण तब आया जब मुझे स्कूल के "बेस्ट स्टूडेन्ट " का पुरस्कार मिला। तलवों से लेकर दिल तक ऐसी सुरसुराहट मची कि अभिव्यक्त करना भी मुश्किल है। आज सोचे तो एक गाँवनुमा कस्बे के एक पिछड़े से स्कूल की बहन जी टाइप लड़कियों के बीच बेस्ट स्टूडेन्ट का पुरस्कार मिल भी गया तो कौन सा तीर मार लिया! किसी बड़े शहर के बड़े स्कूल में होती तो बोलती बन्द ही रहती...लेकिन सच पूछो तक वह पुरस्कार मेरी जिन्दगी की ऐसी अमोल थाती है जो यादों में ऐसी बसी है कि मरने के साथ ही खत्म होगी।

Dr. Rati Saxena


K.P.9/624, Vaijayant, 
Chettikunnu, 
Medical College P.O.
Trivendrum-695011
Kerala, India
Phone:91-471-2446243
M--09497011105

  • स्वतंत्र लेखिका,अनुवादक और कवयित्री हैं।
  • साल 2005 से द्विभाषी ऑनलाइन वेबपत्रिका 'कृत्या' की संपादिका हैं।
  • कृत्या इंटरनेशनल फेस्टिवल की निदेशिका हैं।
  • बचपन चित्तौड़गढ़ में बीता।
  • राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर से पी एच डी हैं 
  • 15 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद किया है।
  • हिन्दी और अंगरेजी में लगभग सात कविता संग्रह प्रकाशित हैं।
  • इनकी पुस्तकों का कई देसी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं।
  • संस्कृति में पर्याप्त दखल रखते हुए वेदों परआपने बड़ा काम किया है।
  • साल 2000 का केन्द्रीय साहित्य अकादेमी का अनुवाद सम्मान मिल चुका है।
  • वर्तमान में त्रिवेंद्रम में निवास।
  • ई-मेल-rati.saxena@facebook.com
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