'जयपुर साहित्य मेले' पर ओम थानवी जी की फेसबुकी टिप्पणी - अपनी माटी (PEER REVIEWED JOURNAL )

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मंगलवार, जनवरी 29, 2013

'जयपुर साहित्य मेले' पर ओम थानवी जी की फेसबुकी टिप्पणी

ओम  थानवी जी से बात करते हमारे सलाहकार दुर्गा बाबू।
 ( फोटो 
सुनीता सनाढ्य पाण्डेय की वॉल से उधार )
(ये टिप्पणी गैर फेसबुकी पाठकों हेतु जनहित में जारी-सम्पादक )

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की पूरी अवधि अपने शहर में बिता हम दिल्ली लौट आए। गुनगुनी धूप, कभी ठंडी कभी गरम बहसें, कुछ बात कुछ चीत कुछ शोर, हर तरफ लेखक ही लेखक और पाठक, कुछ तमाशबीन जो मेला है तो क्यों न होंगे। कुछ बोलने का अवसर, ढेर सुनने का अवसर, मित्रों अमित्रों और गैर-मित्रों (जो टेढ़ी नजरें लिए यहाँ भी डोलते दिखे!) से दुआ-सलाम, दाल-बाटी और बाजरे का चूरमा। दलाई लामा का उद्बोधन, "मैं" के अहं का विलय करने की सलाह देते हुए -- 

उन लेखकों को जिनमें ज्यादातर अपनी ही बात करते मिलते हैं! अपनी एक उक्ति को ठीक से न समझे जा सकने से व्यथित, पत्रकारों से मुखातिब आशीष नंदी। नक्सलवाद का समर्थन कर चर्चा में छाईं महाश्वेता देवी। सम्मलेन की अनथक आयोजक नमिता गोखले। सदा सहज फहमीदा रियाज। असहज शबाना और शर्मीला टैगोर। अनामिका, गगन गिल, क्षमा शर्मा, निरुपमा दत्त, इरा पांडे, उर्वशी बुटालिया, सरस्वती माथुर, लता शर्मा, गीताश्री, विभा रानी ... और हाँ, प्रेमलता थानवी (पाठकों के बगैर लेखक किस काम के!) ... सब सम्मलेन की स्त्री-शक्ति में इजाफा करती हुईं।


पांच दिन के प्रवास के कई रंग रहे। अशोक वाजपेयी के साथ मुकुंद लाठ के कवि अवतार पर गुफ्तगू। दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, नीलेश मिश्र और ईशमधु तलवार के साथ छूटते गावों पर चर्चा। जिसमें 'आओ गाँव चलें' नाम से राजस्थान पत्रिका के अभियान और उस दौर में अपने अनुभव समयाभाव के कारण साझा कर ही नहीं पाया। नन्द भारद्वाज के साथ समारोह की भंगिमा पर बात। फिर भानु भारती और नीलम मानसिंह चौधरी के साथ रंगकर्म की दुखती रग को जगाना। जयपुर के अनेकानेक लेखक और पत्रकार मित्रों से मुलाकात। पच्चीस साल बाद मिले राजीव तिवारी और नरेन्द्र सर्वोदयी से भी, जो राजस्थान पत्रिका में साथ हुआ करते थे। फेसबुक के प्रताप से मिले आदित्य नाथ के लाए भगत जी के लड्डू। 


अपने अपने अज्ञेय,मुअनजोदड़ो  
जैसी पुस्तकों से चर्चा में 
http://www.facebook.com/om.thanvi

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के घर गांधीवादी कार्यकर्ता एसएन सुबाराव और कुमार प्रशांत के साथ सादगी भरे सुस्वादु खिचड़ी-चपाती-दाल। महात्मा गांधी मेडिकल कालेज में गणतंत्र दिवस समारोह। डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल के साथ एलएमबी का थाल (थाली नहीं), रामबाग महल में अशोक वाजपेयी, मधु और डॉ नरेश त्रेहन, डॉ हरि गौतम आदि के साथ सुरम्य शाम। डिग्गी पैलेस से क्लार्क्स, आमेर तक सैकड़ों लेखक, हजारों पाठक। कुछ जमीनी, कुछ अभिजात। राजस्थान के लेखक, राजस्थानी के लेखक। दिल्ली के मित्र। हिंदी-अंगरेजी पर देसी ठाठ से सत्र चलाकर रात को अजमेरी गेट वाला पान मांगते रवीश कुमार, परदे पर कभी न मुस्कराते हुए पर बातचीत में हमेशा हँसते-हंसाते टांग-खिंचाई करने वाले आशुतोष (मेले में अन्ना हजारे पर उनकी किताब की बिक्री देखकर बहुतों को रश्क हुआ होगा), साहित्य अनुरागी अजीत अंजुम। दूर होते गावों में 'कनेक्शन' ढूंढ़ते नीलेश मिश्र। बाबाछाप टोपी में अजय ब्रह्मात्मज। प्रतिभावान अजय नावरिया, जिनकी कहानियों के अंगरेजी अनुवाद पर पाकिस्तान के लेखक मोहम्मद हनीफ की यह इबारत सबका ध्यान खींचती थी: पता नहीं आज के भारत को यह इलहाम है या नहीं कि उसे अजय नावरिया के रूप में दूसरा प्रेमचंद मिल गया है!! ...मेला आखिर मेला होता है। रंग और रूप। धूप और छाँव। सच और झूठ। लेकिन एक बात तय है: जयपुर साहित्य मेले ने दुनिया के लेखकों में और लेखकों की दुनिया में एक बड़ी पहचान बना ली है। जयपुर की तो वह एक नयी पहचान बन ही गया है।

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