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गोरख पांडेय की कविताओं में अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ दर्शन और विचार पानी की तरह समाया हुआ है। -गोपाल प्रधान

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, जनवरी 30, 2013 | बुधवार, जनवरी 30, 2013


जनसंघर्षों की आवाज बन चुकी हैं गोरख की कविताएं
रचनाओं पर चर्चा 

गोरख पांडेय की
कविता
'क़ानून'
(कविता कोश  से साभार )

लोहे के पैरों में भारी बूट
कंधों से लटकती बंदूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डाल कर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायाधीश की, गलत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए खून की
व्याख्या कानून से परे कहा जाएगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बन कर समा जाएगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटाएगा
तो फिर समझिए कि आपका
पता नहीं चल पाएगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जाएगा
पैदा हो कर मिल्कियत की कोख से
बहसा जाएगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमका कर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जाएगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जाएगा

(1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे गोरख पांडेय ने अपनी कविताओं और गीतों के जरिए हिंदी साहित्य में विशेष पहचान बनाई। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिंदी के वे इकलौते कवि हैं, जिनकी रचनाएं सच्चे अर्थों में लोकगीत की तरह पूरे उत्तर भारत में प्रचलित हुईं और जल्द ही अन्य भाषा-भाषी प्रांतों में भी जनांदोलनों में उनके गीत सुनाई देने लगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। दिल्ली गैंगरेप कांड के खिलाफ भड़के आंदोलन के दौरान इंडिया गेट और जंतर मंतर से लेकर पटना, इलाहाबाद, गोरखपुर सरीखे कई शहरों में होने वाले प्रदर्शनों में भी गोरख के गीत सुनाई पड़े।) 

जन संस्कृति मंच के पहले राष्ट्रीय महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में उनके स्मृति दिवस 29 जनवरी 2013 को चारु भवन सभागार (शकरपुर, दिल्ली) में एक आयोजन हुआ। जसम की गीत नाट्य इकाई ‘संगवारी’ द्वारा आयोजित इस आयोजन में गोरख की समग्र रचनाओं का संपादन कर रहे युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि गोरख हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ दर्शन और विचार पानी की तरह समाया हुआ है। उनके जेहन में दिन-रात दार्शनिक प्रश्न और समय की चिंताएं चलती रहती थीं। 

कविता युग की नब्ज धरो/ आदमखोरों की निगाह में खंजर सी उतरो- ऐसी कविता बहुत कम कवियों ने लिखी है। शासकवर्ग के प्रति ऐसी प्रचंड नफरत और शोषित-उत्पीडि़त वर्ग के प्रति ऐसी संवेदनशीलता बहुत कम कवियों में मिलती है। वे कहते थे कि जनता को रोटी के साथ ही आला दर्जे की संस्कृति भी चाहिए, क्योंकि संस्कृति का निर्माण भी जनता ने ही किया है। और उसके द्वारा निर्मित हर चीज की तरह उसे संस्कृति से भी वंचित किया गया है। पोपुलर कल्चर के नाम पर परोसी जाने वाली घटिया चीजों के हैं विपरीत उन्होंने जनता की संस्कृति की बेहतरीन उपलब्धियों को लोकप्रिय तरीके से जनता तक पहुंचाया। अभी भी उनके कवि के असली महत्व को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता है। संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेवारियों के संदर्भ में भी गोरख से अभी बहुत कुछ सीखना होगा। 

पत्रकार और कवि चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख उन गिने चुने लोगों में से हैं, जिन्हें एक मिथक के समान दर्जा मिल गया है। अपने दौर के हिंदी साहित्य के वे चरम विंदु हैं। व्यक्ति और आंदोलन- दोनों को संबोधित करने की दृष्टि से उनकी कविताएं अद्भुत हैं। वे अलगावों में पड़े हुए लोगों को जोड़ते हैं। अपने पहले संग्रह ‘जागते रहो सोने वालों’ में उन्होंने लोकगीत का खंड ज्योति जी को समर्पित किया है और आधुनिक कविताओं का खंड बुआ को, इसके पीछे भी वही नजरिया काम करता प्रतीत होता है। गोरख ने गहरी तन्हाई की कविता भी लिखी। चंद्रभूषण ने कहा कि गोरख बार-बार नए रूप में हमारे सामने आएंगे और उनकी कविताओं की नई नई व्याख्याएं होंगी। फिल्मकार संजय जोशी ने कहा कि गोरख की कविताएं लोगों को उद्वेलित करती हैं। जल्द ही गोरख की आवाज में उनकी कविताओं की दुर्लभ रिकार्डिंग जारी की जाएगी।

गोरख की अस्वस्थता के दौरान उनके साथ रहने वाले और राजनीतिक कार्यों के सिलसिले में उनके संपर्क में रहने वाले भाकपा-माले के दिल्ली राज्य कमेटी सदस्य का. अमरनाथ तिवारी ने कहा कि वे तो जीवन में शामिल हैं। गोरख ने जिस बारीक तरीके से गरीबों और मजदूरों के जीवन को अपनी कविताओं में रखा है, लगता है जैसे वे जी रहे हैं उन चीजों को। वे मजदूर बस्तियों में जाकर भी अपनी कविताएं सुनाते थे। वे अपनी रचनाओं में सिर्फ सवाल ही नहीं उठाते थे, बल्कि हल भी सुझाते थे। गोरख जैसे कवि की आज भी जरूरत है, जनता ऐसे कवियों को पसंद करती है, जो उसकी बातों को कहे। उन्होंने बताया कि यह गोरख के विचारों का ही उन पर प्रभाव था कि उन्होंने अपनी विधवा बहन का विवाह करवाया, जिसके लिए समाज उस वक्त तैयार नहीं होता था।

वरिष्ठ माले नेता का. सुबोध सिन्हा ने याद किया कि किस तरह बोकारो में अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान गोरख ने अपनी एक कविता को मजदूरों को लगातार तीन दिन सुनाया और उनकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों के अनुसार उसे संशोधित करते हुए अंतिम रूप दिया। कवि श्याम सुशील ने गोरख की रचना ‘आशा का गीत’ से प्रेरित अपनी कविता और उनकी चर्चित कविता ‘बुआ के लिए’ का पाठ किया। 

संस्कृतिकर्मी गिरजा पाठक ने कहा कि आठ-नौ साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू किया, तो गोरख के गीतों से उन्होंने शुरुआत की। नैनीताल में जनकवि गिर्दा भी गोरख के गीतों को गाते थे। कविता-पोस्टरों में भी गोरख की काव्य-पंक्तियां केंद्र में रहती थीं। गिरजा ने कहा कि बाद में राजनीतिक कार्य के सिलसले में वे जिन राज्यों में भी गए, वहां गोरख के गीतों को आंदोलनकारियों की जुबान पर पाया। जसम के राष्ट्रीय पार्षद कपिल शर्मा ने भी कहा कि उन्होंने संस्कृतिकर्म की शुरुआत गोरख के गीतों से की। कोई गीत इतने सारे अर्थ समेटे हुए हो सकता है, यह गोरख के गीतों से ही मालूम हुआ। संस्कृतिकर्मी मित्ररंजन ने कहा कि आज जो जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ाइयां चल रही हैं, उसके लिए भी गोरख की कविताएं बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने उनकी कविता ‘स्वर्ग से विदाई’ का पाठ किया। कपिल शर्मा और असलम ने गोरख के गीतों और गजलों को गाकर सुनाया तथा नितिन ने उनकी कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ का पाठ किया। संचालन करते हुए समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि दिल्ली में हमने गोरख को खोया था, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यहां जनसांस्कृतिक आंदोलन को ताकतवर तरीके से आगे बढ़ाया जाए। सत्ता और कारपोरेट पूंजी आज जिस तरह साहित्य-संस्कृति को भी निगल लेने का प्रयास कर रही है और उसे अपना वैचारिक सहयोगी बना रही है, उसके बरअक्स जनता के सांस्कृतिक आंदोलन को विकसित करना वक्त की जरूरत है। 

सुधीर सुमन,
जसम राष्ट्रीय सहसचिव 
मोबाइल- 9868990959
s.suman1971@gmail.com
आयोजन में युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, प्रकाश चैधरी, पत्रकार शिवदास, प्रेम सिंह गहलावत, कलाकार विजय, प्रकाशक आलोक शर्मा, नसीम शाह, डिम्पल, ऋतुपर्णा विस्वास, रिजवान आलम, शहनवाज आलम, सोना बाबू, सैयद मजाहिर, श्योदान प्रजापत, मुस्तकिम, प्रकाश आदि मौजूद थे। 

29 जनवरी को बिहार के समस्तीपुर और मधुबनी तथा गोरख पांडेय के गृहजिला देवरिया (उत्तर प्रदेश) में भी उनकी स्मृति में आयोजन हुए। अभी दरभंगा, आरा, पटना, पूर्णिया आदि शहरों में भी आयोजन होने हैं।

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