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कवि-कथाकार संजीव बख्‍शी से ओम निश्‍चल की बातचीत:''सायास कुछ नहीं होता'''

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, जनवरी 13, 2013 | रविवार, जनवरी 13, 2013

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

(हिंदी के सुपरिचित  कवि संजीव बख्‍शी 
अपने कविता संग्रहों- 
तार को आ गई हल्‍की हँसी, 
भित्‍ति पर बैठे लोग
जो तितलियों के  पास  है
सफेद से कुछ ही दूरी पर पीला रहता था 
व 
'मौहा झाड़ को लाइफ ट्री कहते हैं जयदेव बघेल' 
के लिए जाने जाते हैं। 
हाल ही आदिवासियों के मिजाज 
पर आया उनका उपन्‍यास 
'भूलनकांदा' 
खासा चर्चित रहा है। 
1952 में खैरागढ़ छत्‍तीसगढ़ मे 
जनमे संजीव बख्‍शी 
का रिश्‍ता मशहूर निबंधकार 
पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी 
से रहा है जिनके बड़े भाई 
बैनलाल बख्शी उनके दादा थे। 
दिग्‍विजय महाविद्यालय राजनांदगांव 
से गणित में एमएससी 
बख्‍शी को कविताओं से बड़ा लगाव है। 
छत्‍तीसगढ़ शासन के 
संयुक्‍त सचिव पद से हाल ही में 
सेवानिवृत्‍त बख्‍शी ने 
एक सदगृहस्‍थ साहित्‍यिक का जीवन जिया है। 
बे बड़भागी हैं कि उन्‍हें हिंदी के 
जानेमाने कवि 
विनोदकुमार शुक्‍ल 
और 
रमेश अनुपम 
जैसे कवियों का 
रोजमर्रा का सान्‍निध्‍य प्राप्‍त है। 

लमही के जनवरी-मार्च-2013 
अंक के लिए की गयी 
संजीव बख्‍शी से
 डॉ.ओम निश्‍चल 
की 
यह बातचीत ओम जी ने विशेष रूप से 
अपनी माटी के लिए उपलब्‍ध कराया है।: 
संपादक: अपनी माटी।)
कवि संजीव बख्‍शी 
।। परस्‍पर ।।
गणित ने मुझे बेहिसाब न होने की सीख दी है

संजीव बख्‍शी से लंबा परिचय नही है। पर कविता  से रिश्‍ता है तो कवियों से एक खास किस्‍म का नाता बन ही जाता है। सो ऐसे ही सरे राह बख्‍शी जी की शख्‍सियत से मिलना हुआ और कुछ मुख्‍तसर बातें भी। फिर लगा कि प्रशासन में रँवा यह शख्‍स देखने में इतना सीधा है कि आदिवासियों पर उपन्‍यास भी लिखता है तो उसी आदर्शवादी ढांचे के अनुरूप और कहता है कि आदिवासी होते ही ऐसे हैं ओम जी । वे तीर कमान दूसरों को घायल करने के लिए नही रखते, अपनी रक्षा के लिए रखते हैं। उनकी नहीं, हमारी दृष्‍टियां मलिन हैं। बख्‍शी की ये बातें सुनीं तो अचानक हाल ही में पढ़ी विनोद कुमार शुक्‍ल की आदिवासियों के मिजाज और उनके हक़ को लेकर कई कविताऍं ध्‍यान में खिंची चली आईं और बख्‍शी तो विनोद कुमार शुक्‍ल के शायद सबसे अधिक चेहेते स्‍थानीय मित्र सरीखे हों। 

भूलनकांदा उपन्‍यास पढ़ कर लगा कि बख्‍शी का मिजाज तुलसी की इस अवधारणा से कितना मेल खाता  है: जाकी रही भावना जैसी/ प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। आदिवासियों के जीवन को लेकर जिस भोले भाव से बख्‍शी ने भूलनकांदा लिखा है, वैसी ही अनायास कवि-कल्‍पना उनकी कविताओं में आकार ग्रहण करती है। गणित के असाध्‍य प्रमेयों को साधने वाला यह शख्‍स भले ही छत्‍तीसगढ प्रशासन में कोई बड़ा ओहदा रखता हो, अपने रहन सहन में बिल्‍कुल सीधा सादा, परदुखकातर और अपने किए धरे के प्रति बेहद कृतज्ञ भी है। विष्‍णु खरे जैसे सख्‍त आलोचक से भूलनकांदा की  मुक्‍तकंठ प्रशंसा करवा लेना कोई सहज बात नही है और यह भी कि वे अन्‍य आलोचकों की तरह अगवा होने वाले नहीं हैं। इस उपन्‍यास को पढ कर सहज ही बख्‍शी के बारे में कुछ जानने की जिज्ञासा हुई। यह बातचीत उसी जिज्ञासा का परिणाम है। 

बख्‍शी जी, आप मूलत: कवि हैं किन्‍तु हाल में आए आपके उपन्‍यास 'भूलनकांदा' ने औपन्‍यासिक दुनिया में एक नई लकीर खींची है। इतनी देर से कथा संसार में दाखिल होने की वजह क्‍या रही ?

ओम जी, सायास कुछ भी नहीं हुआ या किया। शुरु से कविताएं लिखता रहा । संग्रह भी सभी कविताओं के हैं  भूलन कांदा  उपन्‍यास को छोडकर । विचार, दृश्‍य  कविता बन कर आते रहे टुकडों में और कविता लिखने में जो आनंद मिलना चाहिए, वह आनंद आता रहा सो यह काम चलता रहा । लगता कि जवाबदारियां पूरी कर रहा हूं। उपन्‍यास लिखने की कोई खास योजना नहीं थी, सोचा  नहीं था ,कोई विचार नहीं था कि ऐसा उपन्‍यास हो । बस्‍तर के गांवों के दौरों मे वहां रात विश्राम करना और गांव के लोगों के साथ ठंड के दिनों में आग जला कर अंगेठा तापते बातें करना यह सब भीतर कहीं जमा हो रहा था ।

       कविताओं में कई कई बातें ,कई हरकतें ,बहुत ही मामूली समझे जाने वाले दृश्‍य छूटते रहे , इनका जमा का नतीजा हो शायद यह उपन्‍यास भूलन कांदा । इतनी देर से कथा संसार में दाखिल होने का उत्‍तर दे चुका । मेरी समझ में न कविता, न उपन्‍यास, यह प्रयास से तो लिखा नहीं जाता ।एक खाका जरूर था कुछ थोडा  लिख कर रखा हुआ था  पर कहते हैं न जब समय आता है तब ही होता है। सो उसके बाद इस पर लगातार दो तीन साल लगा रहा और यह पूरा हुआ । 'बया' में पढ कर जब विष्‍णु खरे जी ने फोन किया और कहा कि 'मैं चकित हूं तुम्‍हारे इस उपन्‍यास से ,यह बहुत आगे जाएगा ।' तब मुझे लगा कि यह उपन्‍यास पूरा हो गया । रमेश अनुपम ने प्रारूप पढकर कहा कि अब इसे बया को भेज दें। मैंने भेज दिया ।  

बख्‍शी जी, 'भूलनकांदा' एक नए तरह का उपन्‍यास है। यह उस दृष्‍टि से बिल्‍कुल अलग है जिसमें आदिवासियों के शोषण की दास्‍तान यथार्थ के चश्‍मे से लिखी जाती है। आपका क्‍या  कहना है ?

ओम जी, यहां के आदिवासी बहुत ही सीधे साधे, भोले भाले, सदैव उत्‍तर में जी्ने वाले ,किसी प्रश्‍न पर मुस्‍कुरा देते हैं । यह मुस्‍कुराहट उनके चेहरे की बनावट की मुस्‍कान है । उनके चेहरे पर सहज ढंग से हमेशा बनी रहती है।

हां भूलन कांदा एक नए तरह का उपन्‍यास है। सहज ढंग से आदिवासियों के शोषण का दास्‍तान यथार्थ के चश्‍में से झांक कर लिखा जाता रहा है । यह सब सुनी हुई या लिखित को पढ कर भी लिखा जा सकता है ।  एक आदिवासी अपने आनंद में रहता है आनंद उसकी प्राथमिकता है , उसकी ताकत है और इसी आनंद में वह शोषण को शोषण नहीं मानता । हर किसी पर विश्‍वास कर लेता है ,ढगा जाने को ढगा जाना नहीं समझता, यह सब स्‍वभावगत है । इससे उसके शोषण की सारी परिभाषाएं बदल जा रही है। दुख इस बात की है कि उसके इस अमूल्‍य आनंद पर प्रहार हो रहा है । यह उनके लिए सबसे ज्‍यादा नुकसानदायक है । इनके यहां सामूहिकता की ताकत को यूं कोई नहीं जान सकता न नजरंदाज कर सकता । पर है यह । आम लोगों के बीच नृशंश हत्‍याओं  को लेकर जो दहशत है उसे  देख कर कोई फरिश्‍ता भी डर जाए यहां भी ऐसा होना स्‍वाभाविक है । भूलन कांदा उपन्‍यास में जिस सामूहिकता को दिखाया गया है और वह भी सामाजिक न्‍याय को बचा कर रखने के पक्ष में उसे लोगों ने पसंद किया ।

विनोद कुमारशुक्‍ल के साथ
 संजीव बख्‍शी 
 हमारे सुख और आनंद के विषय बिलकुल अलग हैं उनके यहां इसके कोई मायने नहीं है । यह भी विचारणीय है। हां यह जरूर है कि उनके लिए स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा के  इंतिजाम जो होने चाहिए थे वे पचास सालों के पहले पांच सालों में  क्‍यों नहीं हुए । इसका जवाब किसी के पास नहीं ।प्रश्‍न हम सब के सामने है । किसी सरकार पर हम ठीकरा फोड कर कहते है यह होना चाहिए, वह होना चाहिए । पर कहीं न कहीं हम सब भी तो दोषी हैं चाहे हम लेखक, कवि हों, सरकारी या गैरसरकारी आम आदमी । चुपचाप हमने सब कुछ उपभोग किया और पूछा नहीं कि एक भाई को यह नहीं मिला  ।  बस्‍तर में रामकृष्ण मिशन ने आश्रम में जो शिक्षा की व्‍यवस्‍था की है वह काबिले तारीफ है। सरकार का यह काम सराहनीय है । साधूवाद के पात्र हैं । सरकार ने इस क्षेत्र में चावल ,दाल नमक अत्‍यंत सस्‍ते दर में मुहैया करवा कर मानवीय होने का उदाहरण दिया है।

इस उपन्‍यास को आदिवासी अध्‍यययनों से जुड़े पाठकों लेखकों ने किस रूप में लिया है ?
अभी इस उपन्‍यास को आदिवासी अध्‍ययनों से जुडे पाठकों के द्वारा पढा जाना है। बंगलोर के एल बी एस कालेज आफ एजुकेशन में इन्‍हीं संदर्भों में इस उपन्‍यास पर एम फिल का काम हो रहा है यह प्रसन्‍नता की बात है मेरे लिए । मराठी और बांगला में अनुवाद भी चर्चा में है । मुझे लगता है कि अनुवाद के बाद पाठकों के लिए एक बडा क्षेत्र खुल जाएगा ।

'भूलनकांदा' पढते हुए लगता है एक आदर्शीकृत यथार्थ से हमारा सामना हो रहा है। इस सचाई से आप कितना मुतास्‍सिर हैं  ?
आप ठीक कह रहे हैं भूलन कांदा पढते हुए आज के समय में कोई भी अनुमान लगाता है कि यह आदर्शीकृत यथार्थ है। कुछ लोगों ने मुझे पूछा भी । छत्‍तीसगढ के जंगलों से लगे हुए गांव आज भी मिल जाएंगे जैसा उपन्‍यास में बताया गया है। थेाडे बहुत चरित्रों में हेर फेर के साथ ।समय के साथ कुछ रहन सहन पहनावा आदि में घालमेल हुआ है पर और सब तो अब भी है यहां । यहां जो सीधापन है ,भोलापन है वह जरा भी नकली नहीं है । जरा भी नहीं । यही स्‍वर पूरा का पूरा तो नहीं पर आम छंत्‍तीसगढियों का भी है जो यहां के मूल हैं उनमें ।आदिवासी झूठ नहीं बोलते, झूठ उनके पास बिलकुल बिलकुल नहीं है यदि कोई बोल रहा है झूठ तो निश्चित जानिए कि हमसे सीख कर वह ऐसा करने की कोशिश कर रहा है। सीख कर भी बोलना शायद उनके बस का नहीं । यह सारी की सारी अच्‍छाइयां है इससे उन्‍हें जो होना था लाभ, वह तो नहीं हुआ बल्कि यह एक तरह से उनकी कमजोरी हो गई । इसी कमजोरी का हर पक्ष फायदा उठा रहा है और पूरा क्षेत्र अशांत हो गया।   

इस उपन्‍यास पर फिल्‍म बनाए जाने की चर्चा भी है। इस दिशा में क्‍या प्रगति हुई है?
‘भूलन कांदा’ उपन्‍यास ‘बया’ पत्रिका में आते ही उसे पढ कर मनोज वर्मा ने अपनी इच्‍छा बता दी थी कि वे इस पर फिल्‍म जरूर बनाएंगे । इस पर स्क्रिप्‍ट का काम चल रहा है और साथ साथ और भी तैयारियां चल रही है ,उपयुक्‍त स्‍थान की तलाश आदि आदि । रायपुर के मनोज वर्मा इसके पहले सफल छत्‍तीसगढी फिल्‍म बना चुके हैं और इस फिल्‍म के लिए उत्‍साहित हैं । मेरे साथ उनकी कुछ बैठकें हुई हैं । यह उनकी पहली हिंदी फिल्म होगी । मुख्‍य किरदार में कुछ कलाकार मुम्‍बई के  हो सकते हैं ।फिल्‍म समीक्षक  जयप्रकाश चौकसे  अपने एक लोकप्रिय कालम में लिखते हैं कि भूलनकांदा में फिल्‍म बनने की पूरी संभावनाएं मौजूद हैं। विष्‍णु खरे ने लिखा ही है कि सत्‍यजीत रे की-सी दृष्टि चाहिए इस उपन्‍यास पर फिल्‍म बनाने के लिए । मेरी जानकारी है कि मुम्‍बई के वरिष्‍ठ निर्देशक  गोंविंद निहालानी ,अशोक मिश्र , पूर्वा नरेश, जयंत देशमुख  आदि इसे इस  लिहाज से पढ रहे हैं। मुझे लगता है मनोज प्रारंभिक काम करके मुम्‍बई जाएंगे और वरिष्‍ठ लोगों से संपर्क कर जैसा भी हो सकता है मार्गदर्शन प्राप्‍त करने से नहीं चूकेंगे ।  


आज आदिवासियों के जो हालात हैं वे यह हैं कि न वे आधुनिक हो सके न अपने पुराने अस्‍तित्‍व की विशिष्‍टताओं को कायम रख पा रहे हैं । उल्‍टा वे अपने अधिकारों के हनन के बहुत क्रूरतम परिदृश्‍य से गुजर रहे हैं। ऐसे आदिवासी बहुल राज्‍य से आपका वास्‍ता भी है। इस हालात पर रोशनी डालने वाला कोई  उपन्‍यास लिखने की योजना है क्‍या ?
आदिवासियों के बीच यह दुविधा कभी नहीं रही कि वे आ‍धुनिक होना चाहते हैं या अपनी पुरानी पहचान को कहीं नष्‍ट होने दे रहे हैं । आधुनिकता के उपकरण इनके पास भी मिलते हैं पहले यहां के युवा कंधे पर ट्रांसिस्‍टर लटकाए साइकिल पर चलते आज कई  घरों मे टी वी है घरों में बिजली हैं । यह सब तो ठीक है पर जिन स्थितियों से अभी वे गुजर रहे हैं वह क्रूरतम है। यह लगातार बढता जा रहा है। इस ओर सबकी चिंता जायज है। सरकार भी लगी है और भी सब कि कोई रास्‍ता हो और फिर से शांति कायम हो जाए । एक एक दिन उनके लिए पहाड के सामान है। इन चिंताओं में रहते उसे लेकर कहानी, कविता या उपन्‍यास लिखना तो दूर कुछ ऐसा सोचना भी अमानवीय लगता है । सबका पूरा ध्‍यान इस ओर है कि यहां शांति कैसे बहाल हो ।

बख्‍शी जी, आपने उच्‍चतर तालीम गणित की हासिल की यानी एक पक्‍के गणितज्ञ । जीवन के गुणाभाग के लिए जाहिर है यही गणित काम आती है। किन्‍तु यह कविता और किस्‍सागोई से आपके रिश्‍ते के पीछे कौन सा गणित काम करता है। आम तौर पर गणितज्ञ धुनी और कुछ स्‍वभाव में कुछ रूखे-से होते हैं।  दूसरी तरफ साहित्‍य का रसायन ही अलग होता है----लोगों के अंत:करण से वास्‍ता रखने वाला। यह विरुद्धों का सामंजस्‍य आपने कैसे साधा  ?

विनोद कुमार शुक्‍ल,
संजीव बख्‍शी एवं
 रमेश अनुपम 
मैं गणित में एम एस सी हूं । प्रशासनिक अधिकारी हूं । पर इन दोनों ने कविता को नहीं बिगाडा । गणित ने यह सिखाया कि बेहिसाब न हुआ जाए चाहे वह जीवन जीने की बात हो या कविता लिखने की। गणितज्ञ धुनी होते हैं ,मैं धुनी हूं यह सहीं हैं पर रूखापन नहीं आने दिया कविता ने । कहानी, कविता, नाटक यह परिवार में पहले से था । मेरे पिता रमाकांत बख्‍शी छत्‍तीसगढी पहली फिल्‍म ‘कहि देबे संदेश’ में मुख्‍य किरदार में थे । एकांगी नाटक करना उन्‍हें पसंद था । उन्‍होंने ‘गबन’ का नाटक रूपांतरण कर स्‍वयं के  निर्देशन में खैरागढ में प्रस्‍तुत किया था उसकी चर्चा आज भी वहां होती है । वे शिक्षक थे, थोडे से वेतन में खुश रहने वाले । वेतन से कुछ रूपए प्रति माह अपने उस दर्जी को परिवार चलाने देते रहे जिसे कम दिखने के कारण  कपडा सीना संभव न हो पा रहा था । 

कम उम्र की आयु में पिता नहीं रहे ,मैं उनसे जीवन भर सीखता रहूंगा हम सब उन्‍हें  दादा जी कहते । घर में साहित्‍य का असर तो होना ही था  साहित्‍य वाचस्‍पति डा पदुम लाल पुन्‍ना लाल बख्‍शी मेरे दादा के छोटे भाई थे । बचपन में मेरा उनसे संपर्क रहा हालांकि कविता लिखना और उस पर गंभीरता के साथ प्रकाशन के लिए पत्रिकाओं को भेजना बहुत बाद में हुआ ।  घर में  वातावरण  था । मेरी दादी जिन्‍हें हम सब बुआ कहते , पढने की शौकीन रही उस समय  ‘चंद्रकांता संतति’ के सारे खंड बाईंड करवा कर रखी हुई थी । कुछ बाईंड मैंने पढे थे ।‘भूलन कांदा’ का  प्रारूप पूरा होते ही अम्‍मा ने इसे पूरा पढ लिया ।  रायपुर में विनोद कुमार शुक्‍ल जी का सामिप्‍य और स्‍नेह मिला और इस उपन्‍यास को लेकर विष्‍णू खरे जी ने जैसा कहा मेरे जैसे नए लोगों के लिए  यह सपने की तरह था।

मैंने नौकरी की शुरूआत बस्‍तर से की । दस बारह साल वहां काम करने का सुअवसर मिला । जगदलपुर में साहित्यिक वातावरण था । विजय सिंह वहां छोटे बच्‍चों को लेकर एक नाट्य शिविर करते और उनसे सुंदर नाटक करवाते ,सूत्र पत्रिका और बाद में सूत्र सम्‍मान प्रारंभ हुआ यह सारी गतिविधियां होते रहती थी । कोंडागांव में हरिहर वैष्‍णव मिल गए और फिर उसके बाद कांकेर में तिलक पटेल ,बहादुर लाल तिवारी का साथ हो गया । रायपुर आने के बाद तो सारे मित्र मिल गए । इन सबका लाभ मिला ।

साहित्‍य में भी कविता एक सूक्ष्‍म विधा है। बेस्‍ट वर्ड्स इन बेस्‍ट आर्डर। और आपके अब तक पॉंच कविता संग्रह आ चुके हैं। कविता की इस यायावरी में क्‍या सुख मिलता है ?
मेरे पहले संग्रह ‘तार को आ गई हल्‍की सी हंसी’ की इस शीर्षक की कविता में कुछ यह भाव है कि ‘एक सितार वादक सितार बजा रहा है,डूबा हुआ है और लगातार बजा रहा है,धुन में मस्‍त है कि उसे महसूस होता है‍ कि सितार के एक तार को आ गई हल्‍की सी हंसी । श्रोता इस क्षण के इंतिजार में थे सब ने बजा दी तालियां ।‘  कविता लिखते लिखते संगीत में रियाज करने की तरह लगे रहने से ऐसी स्थिति कभी आती है कि लगता है यह पंक्ति ,यह शब्‍द संयोजन या यह  भाव, यह शिल्‍प कुछ ऐसा बन पडा है जैसे सितार के किसी तार से हल्‍की सी हंसी आ रही है । कवियों  के साथ अकसर यह  होता है कि उसके जीवन में कोई समय ,कोई क्षण कविता के लिए सबसे अच्‍छा हो जाता है ।   वह सबसे अच्‍छी कविताएं इस काल में लिखता है ।  

हम इस मामले में तकदीर वाले हैं कि  पूर्वज एवम वरिष्‍ठ  कवियों ने ऐसी कालजयी कविताएं अपने पूरे जीवन काल में लगातार लिखी है जैसे वे  सितार को हाथ लगाते कि सारे के सारे तार झनझना उठते । क्‍या मुक्तिबोध ,शमशेर ,क्‍या महादेवी निराला  अज्ञेय और क्‍या विनोद कुमार शुक्‍ल ,केदार नाथ सिंह, कुवर नारायण, विष्‍णू खरे, भगवत रावत, नरेश सक्‍सेना और कितने ही जिनके नाम गिनाएं तो बात खत्‍म होते नहीं दिखेगी। देश के अन्‍य भाषा के अथवा विदेशी कवियों के  जिनके अनुवाद पढने को मिलते  हैं वे अलग ,जिनकी कविता को पढते काव्‍यगत ईर्ष्‍या किसी को भी हो सकती है   । यह अपने अपने हिस्‍से की कविता लिख लेने का सुख है । मुझे किसी कविता के किसी ऐसी पंक्ति, किसी ऐसे शब्‍द को पाकर सुख मिलता है।बीच का काफी समय ऐसा भी रहा कि मैं कोई कविता लिख ही नहीं पाया चाह कर भी । कविता की यायावरी में आपने कहा यह अच्‍छा लगा । यही है यायावरी । यहां मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरी कोई कविता पूरी होती है तो सबसे पहली पाठक मेरी पुत्री श्‍वेता और पत्‍नी वीणा होती हैं। उन्‍हें दिखाते हुए मैं इस तरह से खुश हो जाता हूं कि यह मुझे अभी अभी मिला है ।

आप प्रशासक भी हैं। हुकूमत और अदब दोनों में कैसे तालमेल बिठाते हैं? यों तो कहा है किसी शायर ने कि 'जो हुक्‍म देता है वो इल्‍तजा भी करता है/ ये आसमान कहीं पे झुका भी करता है। पर आपका अपना फलसफा क्‍या है ? इस दुनिया को कैसे हॉंकते हैं और अदब में किस तरह से पेश आते  हैं ?
मैंने एक प्रश्‍न के संदर्भ में बताया है कि मेरे प्रशासक होने ने कविता को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाया है।  यह मेरा कहना नहीं बल्कि मेरे और मेरी कविताओं के बारे मे लिखते हुए लोगों ने कहा है। हां मेरा य‍ह जरूर कहना है कि कविताओं ने मेरे प्रशासक को अच्‍छा मदद किया  है और अपनी उपस्थिति हर जगह दी है। शायद यही कारण हो कि अनुशासन और कानून,ईमान, सचाई के साथ चलते रहने के बाद भी लोगों ने मुझे सदा पसंद किया । अन्‍यथा यह आज आम लोगों के पसंद की चीज नहीं रह गर्इ है। मेरी समझ में एक अच्‍छी छवि बन जाने के बाद और किसी अदब की जरूरत नहीं होती । दस बीस साल पहले जहां नौकरी में रहा वहां से जब लोग आकर मिलते हैं और कहते हैं कि आप थे तो प्रशासन था । यह सुनकर मुझे अच्‍छा लगता है वर्ना अदब के नाम से मैं जरा पीछे चलता हूं और कभी कभी अपना नुकसान भी करवा लेता हूं । लो प्रोफाइल में रहना भाता है और यही जीवन जीना आता है।

आपके संग्रहों के नाम से यह पता चलता है कि आपका हाथ कविता में खासा रँवा है। पर कविता की मुख्‍य धारा से छिटके होने के पीछे क्‍या वजह रही है ? जबकि महज दो तीन संग्रहों के बल पर लोग केंद्र में परिगणित हो रहे हैं !
संग्रहों के नाम मुझे चुनने थे । हर बार एक कविता लिख लेने की तरह खुश हुआ कि यह संग्रह इस नाम से ही  रहेगा । ‘सफेद से कुछ ही दूरी पर पीला रहता था’ संग्रह के नाम पर कुछ वरिष्‍ठ लोगों ने सुझाया था कि यह विनोद कुमार शुक्‍ल के आसपास का शीर्षक लगता है कुछ और हो तो अच्‍छा रहेगा , आवरण पर लिखते हुए केदार नाथ सिंह इस ओर इशारा करते  हैं।  जैसे मैंने पहले बताया कि यह तो एक कविता लिख लेने की तरह मुझे मिल गया था और मैं वैसा ही खुश हो चुका था इसे पाकर सो यही रहा नाम संग्रह का । इस तरह से कविताओं  के साथ संग्रह के नामों के लिए भी एक तरह का दीवानापन रहा ।  कविताओं में हाथ रंवा है या कितना रंवा है इसे आप  या सुधी पाठक अवगत कराते हैं तो जा‍हिर है मैं प्रोत्‍साहित होता हूं । मुझे लगता है कि बहुत काम होना बचा है ।  आगे की बात पर आता हूं कि पांच संग्रह के बाद भी मैं मुख्‍य धारा से छिटका सा क्‍यों रहता हूं । कुछ तो संकोच और किसी भी बात पर जहां दावा करने की जरूरत हो वहां से पीछे हट जाने का अपना स्‍वभाव । यह  शायद संस्‍कारगत है और यह भी कि कुछ अवकाश के साथ लिखना सुहाता है जो कि इसकी इजाजत नहीं देता जहां की और जिस मुख्‍य धारा की आप बात कर रहे हैं। कुछ मित्र सक्रिय हैं और लिख भी रहे हैं यह उनकी खासियत है।

गत वर्ष की बात है हेमचंद्राचार्य ज्ञानपीठ पाठण गुजरात से मुझे सूचना मिली कि मेरे  संग्रह सफेद से कुछ ही दूरी पर पीला रहता था को हेमचंद्राचार्य साहित्‍य श्री अलंकरण के लिए चुना गया है । इस पर मेरे ज्‍यादा ध्‍यान न देने को देखते हुए बताया गया कि यह सम्‍मान चार विभिन्‍न स्‍थानों के वाचनालयों के पाठक तय करते हैं । इसके लिए न आवेदन बुलाए जाते न अनुशंशाएं । यह मेरे लिए आश्‍चर्य करने का समय था । मैंने जाना कि एक सम्‍मान जनक राशि  भी वे देंगे और रायपुर आकर सम्‍मान देंगे ।  यह सब जानने के बाद भी मैंने उनसे पूछ लिया इससे पहले किन्‍हें यह सम्‍मान दिया गया है । नाम सुन कर मैं झेंप गया कि मैं इतनी तहकीकात क्‍यों कर रहा हूं वे नाम हैं 1925 के स्‍थापना वर्ष के बाद सबसे पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी और आगे की सूची में मैथलीशरण गुप्‍त ,माखन लाल चतुर्वेदी , महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, काका कालेलकर, रांघेय राघव , धर्मवीर भारती ,रामेश्‍वर शुक्‍ल अंचल और हरिशंकर परसाई आदि  । 

यह बताते हुए मैं यह कहना चाहता हूं कि हम किसी सम्‍मान के लिए या तो बिना कुछ देखे सुने भाग कर चले जाते हैं या फिर ऐसे ही कुछ पूछताछ ज्‍यादा ही कर लेते हैं । क्‍या किया जाए बात ही कुछ असमंजस की है। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह कि मुम्‍बई मुख्यालय में इस संग्रह की सौ प्रतियां प्रकाशक से मंगवाई गई और पता चला कि पाठकों ने एक दिन में सारी की सारी प्रतियां उठा ली । एक पान भंडार के मालिक की चिट्ठी मेरे पास आती है कि उसे कौन कौन कविता पसंद  आई । मुझे लगता है  किसी कवि के लिए यही असल सम्‍मान है।

‘चुनी हुई कविताएं’ संग्रह का विमोचन रायपुर के एक जैन मंदिर में किया प्रकाशक ‘सत साहित्‍य प्रकाशन ‘मुम्‍बई ने इस समय ही इसकी एक सौ पचीस प्रतियां खरीद ली गई । यह   आश्‍चर्य का विषय था  और आश्‍चर्य कि इसकी सोलह हजार प्रतियां उनके सदस्‍यों को निशुल्‍क प्रेषित की गई देश के भीतर और बाहर । तय है और यह आप भी समझते हैं कि इन सबसे मुख्‍य धारा का कोई लेना देना नहीं  ।

आप उस महाविद्यालय से पढ़े जहॉं कभी मुक्‍तिबोध पढ़ाते रहे हैं। क्‍या कभी दोस्‍तों में, उन्‍हें लेकर कुछ बातें होती थीं। क्‍या वहॉं के लोगों को यह अहसास है कि इस जगह से हिंदी के एक महाकवि का रिश्‍ता रहा है ?
राजनांदगांव  के दिग्विजय कालेज में मेरी पढाई हुई वहां पहले मुक्तिबोध पढाते थे । मेरे बडे भैया को उन्‍होंने पढाया था । बडे भैया  बताते हैं कि क्‍लास में हिंदी पढाते पढाते मुक्ति बोध वहां पहुंच जाते जहां पीछा करते छात्र नहीं जा पाते खुली खुली  आखों से देखते रहते फिर क्‍या है कि छात्र प्रस्‍ताव रखते और उसके बाद छात्र के साथ मुक्तिबोध भी उनके चहेते चाय की दुकान जाते और चाय पीते।

राजनांदगांव में सृजन संवाद के नाम से एक दो सूट वाला भवन तैयार किया गया है । मुक्तिबोध जहां रहते थे उसके पास ही । यहां यह व्‍यवस्‍था होगी कि साहित्‍यकार आकर रूक कर अपना काम कर सकें । त्रिवेणी परिसर के नाम से सुंदर स्‍थल बनाया गया है यहां मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्‍ना लाल बख्‍शी और बल्‍देव प्रसाद मिश्र के स्‍मारक और संग्रहालय बनाए गए हैं । इस स्‍थल को देख कर विष्‍णु खरे नें  यहां तक कहा कि शेकसपीयर का स्‍थान भी इतना सुंदर नहीं है । मैं बताना चाहता हूं कि यहां मुक्तिबोध के होने का अहसास ही नहीं है बल्कि इस बात के लिए गर्व करते हैं यहां के लोग ।राजनांदगांव को इस वजह से संस्‍कारधानी के नाम से जाना जाता है।

आदिवासियों से आपका रिश्‍ता जगजाहिर है। आपने एक कविता 'घोटुल' पर लिखी है। क्‍या ऐसी परंपरा अभी जीवित है ?
घेाटुल कविता से जुडा एक छोटा सा प्रसंग है उसे मैं बताना चाहूंगा।  इस बहाने आदिवासियों के अध्‍ययन संबंधी कुछ बातें भी कहना हो जाएगा । कोंडागांव बस्‍तर में रहते हैं हरिहर वैष्‍णव और खेम दो भाई उनका  आदिवासियों के जन जीवन के सबंध में महत्‍वपूर्ण काम है । यहां वहां फैली हुई मौखिक कथाएं लक्ष्‍मी जगार आदि को इन्‍होंने संकलित कर उसे हिंदी हल्‍बी और अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित करवाया है इसमें रेखांकन खेम ने किया है ।घर में ही लक्ष्‍मी जगार करवा कर उसे पहले रिकार्ड किया और उसके बाद उसे लिखा गया ।  घोटुल की बात यूं हुई कि एक दिन मैं उनके यहां एक दो और मित्रों के साथ चर्चा करते बैठा था , घेाटुल की बातें हो रही थी । मैंने कहा कि घोटुल को लेकर अनेक कविताएं हैं पर वे केवल यह जानकारी देती है कि घोटुल क्‍या है ,वहां क्‍या होता है। या कुछ क्रिया कलाप की जानकारी । इसके अलावा किसी ने जिसे कविता कहना चाहिए नहीं लिखा है ।  घोटुल को लेकर जब कविता बने तब ही मैं लिखूंगा । उस दिन लौट कर आया और रात में ही यह घोटुल कविता लिख लिया । मैं यहां उन अंतिम पंक्तियों को यहां बताना चाहूंगा जिसके कारण इसे मैं कविता कहता हूं .............

तब था घोटुल
एक जश्‍न का नाम
अब घोटुल है एक प्रश्‍न का नाम
अब
जब जाती हैं मोटियारिनें हाट
जाते जाते
क्षण भर रूकती हैं
घोटुल के पास
रूकती हैं ताकती हैं
घोटुल के बंद दरवाजे को
उठाती हैं पत्‍थर के छोटे छोटे टुकडे
दरवाजे पर मारती हैं
नहीं खुलता बंद दरवाजा
खट की आवाज आती है
जिसे मोटियारिने सुनती है
जैसे वर्षोंसे बंद पड़े मांदर की आवाज है
सुनती है मोटियारिनें
एक साथ खिलखिलाकर हंसती हैं
और हाट चल देती हैं

'घोटुल' अपने मूल स्‍वरूप में अब नहीं है ।  कहीं कहीं दूरस्‍थ गांवों में यह है भी तो वह इसलिए कि लोग पूछते हुए देखने आते हैं और कोई आते हैं तो दिखाने के लिए व्‍यवस्‍था हो जाती है  । वहां पहले जो रौनक  थी ,जो अनुशासन था और रात भर गांव के युवा लड्रके लडकियां यानी उनके अनुसार चेलिक और मोटियारिनें नियमित रूप से आते वह सब अब नहीं है।

मई की तपती शाम
ठंडे पानी से
पत्तियों को पोंछते हुए
सोचता हूँ
इसकी चर्चा जड़ों तक ज़रूर होगी---

आपकी कविता पंक्‍तियॉं हैं ये। कविता कल्‍पना की जिन कोमल स्‍निग्‍धताओं की उपज होती है, उसकी नोक पलक आज के भयावह भौतिक परिदृश्‍य में किस तरह सँवारते हैं ?

 जहां तक आज के परिदृश्‍य में कविताओं के बारे सोचने या लिखने की बात है संवेदनाओं के लिए अब हमारे जीवन में कोई स्‍थान नहीं रह गया है , व्‍यवहार में कितना कम रह गया हैयह । तय है कुछ ही सालों में इसे कविताओं से ही जानेंगे लोग। भयावह स्थिति में रहते और उसकी चिंता में रहते ऐसी कविताओं की कल्‍पना भी नहीं कर सकता कोई  पर कभी कभी ऐसा भी मौका हो आता है और कविताएं अपने साथ आशाएं लेकर कवि के पास आ जाती है ।

कविता लिखने का आपका मकसद क्‍या है।कविता के आज के परिदृश्‍य में वह क्‍या कुछ है जो संग्रहणीय और जीवन के लिए जरूरी है ?
कविता लिखने का नहीं इसे जीवन जीने का मकसद कहना चाहिए । सिर्फ कविता लिखने का कोई मकसद नहीं होता  । यदि होता है तो वह फिल्‍मी कविताएं लिखने जैसा भी हो सकता है या फिर वीर रस की कविताएं जो युद्ध स्‍थल में वीरों को सुनाई जाती थी या फिर हास्‍य रस की कविताएं जो मंच से सुनाई जाती है । हंसना भी सेहत के लिए उतना ही जरूरी है,कहते हुए । सो मकसद के लिए भी कविताएं हैं । और जीवन जीने के लिए भी । अपने आप यह मकसद बन जाए तो ठीक।  लोक को लेकर लिखी गई कविताएं अपने सभी  अर्थों और पूरी ताजगी के साथ हमारे सामने हैं। पर मकसद तय कर कविता लिखी जाए यह मेरे और मेरे जानने सुनने में जो कवि हैं उनसे नहीं हो सकता । मेरी समझ में मकसद या ऐसा ही कुछ कवि के सोचने में दवाब बना देता है । ऐसे किसी दबाव में कविता लिखना नहीं हो पाता ।  

छत्‍तीसगढ़ का साहित्‍यिक परिदृश्‍य कैसा है। रायपुर में प्राय: कैसी साहित्‍यिक गतिविधियॉं रहती हैं ?
       
किसी भी काल के साहित्‍य में उस काल के सबसे सुंदर को और जो सुंदर नहीं यानी खराब से खराब को भी दिखाया जाता रहा है । फैंटेसी की हद तक जाकर भी लोग उस काल से भलीभांति परिचित होते रहे हैं । तो इस बात का संकट नहीं कि क्‍या लिखा जाए । आसपास बहुत कुछ बिखरा  है।  जितना समेटिए, मिल जाता है । जीवन के लिए जरूरी वही है जो आसपास है और हमें दिख नहीं रहा है  । उसे खुद  देख लेना कविता लिखना है । छत्‍तीसगढ में साहित्‍य परिद़ृश्‍य अच्‍छा है संभावनाएं यहां हमेशा बनी रहेंगी  । कबीरधाम रायपुर से 117 किलोमीटर दूरी पर है वहां कविता एकल पाठ प्रारंभ किया है, कविता भोरमदेव के नाम पर । यह कार्यक्रम सर्जना संस्‍था ने प्रारंभ किया है । भोरम देव मंदिर है जिसे छत्‍तीसगढ  का खुजराहो कहा जाता है ,पर्यटन स्‍थल है यह छत्‍तीसगढ का । कबीरधाम वह स्‍थान है जहां धरमदास कभी रहे । पहला एकल पाठ मेरे से प्रारंभ हुआ है । साधुवाद सर्जना के नीरज मंजीत जी को जो साहित्‍य को लेकर अरसे से लगे हुए हैं । जो उनसे बन पडता है करना चाहते हैं।

रायपुर की साहित्यिक गतिविधियां अच्‍छी हैं कुछ न कुछ कार्यक्रम यहां होते रहते है। भारत भवन जैसा ही कुछ यहां भी हो सके तो यहां की साहित्‍यिक गतिविधियों को एक उड़ान मिले।

आदिवासियों पर होने वाले जुल्‍म और शोषण को लेकर जो कुख्‍याति इस राज्‍य की चौतरफा होती रही है, उसके पीछे का सच क्‍या है ?

सच और झूठ सब ओर बिखरा हुआ है सब अपनी अपनी पसंद से चुन ले रहे हैं। यहां तक कि मौके पर जाकर संबंधितों से सीधे बातेंकर भी कोई आश्‍वस्‍त नहीं हो पाता कि  यह सच है । सब घालमेल है। जो लोग कत्‍लेआम में लगे हैं ,आदिवासियों को दहशत में डाले हुए हैं ,भोले भाले आदिवासियों के बेटे, बेटियों तक को उठा कर ले जा रहे हैं, उनके साथ शामील  करने उन्‍हें मजबूर किया जा रहा है, यह सब विचारणीय है कि क्‍या यह भी आदिवासी के हित में है।  सरकार को या पुलिस को जो ऐसी हालात में आदिवासियों के साथ होना चाहती है उनको सुरक्षा देना चाहती है उन्‍हें  कई कई बाधाओं का सामना करना होता है।भय और दहशत के रहते कोई भी मदद करने सामने नहीं आता ।  

आप धीरे धीरे साठ के हो रहे हैं। इस उम्र तक आते आते आत्‍मकथा लिखने की उमड़ घुमड़ भीतर हलचल मचाने लगती है। ऐसी किसी कथा का आगाज होने वाला है क्‍या ? आपके आगामी लेखन लक्ष्‍य क्‍या हैं ? कविता-कथा की कोई बड़ी परियोजना ?

साठ का हो रहा हूं । संस्‍मरण  का काम भी हो रहा है पारिवारिक, सरकारी नौकरी, और कुछ साहित्यिक संस्‍मरण हैं इस पर काम करना चाहता हूं  । उपन्‍यास  पर काम होना है पर स्‍पष्‍ट योजना नहीं बनी है कहने लायक । कविताएं लिखना चाहता हूं । समाज सेवा के लिए  साथियों के साथ मिल कर कुछ छोटा मोटा करना चाहता हूं । आगाज जैसा कुछ नहीं है। दावा तो बिलकुल नहीं ।  बहुत ही साधारण कुछ ,जैसे रास्‍ता कोई पार नहीं कर पा रहा है उसे मदद कर उसे संबल देना और यह हो  समाज को एक मैसेज । या शायद ऐसा ही कुछ ।

एक बार पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर अचानक आग लग जाए तो आप अपनी कृतियों में क्‍या बचाना चाहेंगे? नेरूदा ने जवाब दिया था कि 'संभवत: कुछ भी नहीं ।   बल्‍कि मैं एक लड़की को बचाना चाहूँगा और किताबों में से पूछिए तो केवल जासूसी कहानियों के संग्रहों को जिन्‍होंने मुझे मेरी अपनी कृतियों से ज्‍यादा सुख दिया है।'
यही सवाल आपसे किया जाए तो क्‍या कहेंगे बख्‍शी जी?
ओम जी, कठिन सवाल है यह। पर अचानक आग लग ही जाए तो अपने सामर्थ्‍य भर जो कुछ बचा सकूंगा वह जरूर बचाउंगा। इस मामले में चाहे कोई स्‍वार्थी कहे पर अपने सभी संग्रह की एक एक प्रति जरूर बचाना चाहूंगा इसलिए नहीं कि लोग पढें बल्‍कि इसलिए क्‍योंकि मुझे कविताएं याद नहीं रहती ,बिलकुल भी नहीं । अन्‍य कुछ कवियों के भी संग्रह मुझे बचाने चाहिए जिनमें कविताई भरी पूरी है। कोई एक या एकाधिक कहने की बात हो तो विनोद कुमार शुक्‍ल का संग्रह ‘’वह  गरम कोट पहन कर चला गया विचार की तरह’’ या ‘’अतिरिक्‍त नहीं’’ बचाना चाहूँगा जो हाथ लग जाए  ।  कई कई संग्रह उठा कर देख लीजिए। कविता के भीतर कविता जैसी कोई बात नहीं, न शिल्‍प, न विचार, मैं सतर्क रहूंगा कि गलती से ये न बच जाएँ । यह तो दिमाग से कह रहा हूँ। पर दिल की सुनूं तो मैं संगीत को बचाना चाहूंगा  । जहॉं संगीत है, वहीं जीवन है; जहॉं जीवन है वहीं कविता है ।

कहते हैं , की कृतियों में ही उसका जीवन छिपा होता है। नेरूदा से उनकी कृतियों में उनके निजी जीवन की प्रतिच्‍छायाओं के बारे में पूछे जाने पर उन्‍होंने कहा था: '' निश्‍चय ही। कवि का जीवन उसकी कविता में प्रतिबिम्‍बित होना चाहिए। यही कला और जीवन का नियम है। '' आप अपनी कविताओं में क्‍या ऐसा कुछ महसूस करते हैं,जिसमें आपका सुख दुख, आपका व्‍यक्‍तित्‍व, निजी जीवन छन कर आया हो ?

सौ फीसदी, यह आना भी चाहिए । मेरा जीवन ,व्‍यक्‍तित्‍व , सारा कुछ कविताओं में प्रतिबिंबित है और कुछ बचा हो वह भी जैसे तैसे आ जाएगा । यह इस हिसाब से  कह रहा हूं कि बनावटी जैसा कुछ नहीं है  । यह मेरी किसी कोशिश से नहीं है। ‘कवि का जीवन उसकी कविता में प्रतिबिम्‍बित होना ही चाहिए’,और यह कि ‘यही कला और जीवन का नियम है ’ नेरूदा की इन बातों का मैं सम्‍मान करता हूं । यहां यह बताना चाहूंगा कि  मेरे जीवन में और कविता में यदि कोई मेल है तो इसकी वजह शायद ईमानदारी हो   ।  किसी का नजरिया आसपास को देखने का वही होता है जो भीतर से कहीं बन कर आता है।

आपकी कविताऍं सुनकर लोग कैसी प्रतिक्रियाऍ करते हैं। क्‍या कविता अभी भी सुनने मेंअभी भी कविता सुनाए जाने पर वह सुकून देती है जैसा एक जमाने में समाज मे वाचिक कविता का वातावरण रहा है ?
कविताएं सुन कर कहा जाता रहा है कि यह बोलचाल की भाषा में है । यह कि  कविताओं में बोलचाल की भाषा को साधना ज्‍यादा कठिन होता है दरअसल यह कविता की बोलचाल की भाषा  है । सरलता से मैं कविताओं के जरिए सारी बातें कह जाता हूं आदि आदि भी कहा जाता है । भगवत रावत जी कहते थे कि कविताएं मंच से ठीक ठीक पढना और सब तक पहुंचाना जरूरी है। वे कविता पढते तो ऐसा लगता कि कविताएं ऐसा ही पढना चाहिए । मुझे लगता है कविताओं को लिखने के बाद पहली पहल सुनाने में तब सुकून मिलता है जब सामने वाला ध्‍यान से सुन रहा हो । भले यह दो के सामने ही कविताएं सुनाई जा रही हो। किसी एक कविता को  बार बार सुनाने का मन  नहीं करता । कोई नई कविता हो तो उसे सुनाने की बराबर इच्‍छा रहती है। अच्‍छा लगता है जब विनोद कुमार शुक्‍ल जी से मिलने कभी जाता हूं और वे पूछते हैं कि इस बीच कोई नई कविता लिखी है। मैं उन्‍हें जरूर कोई नई कविता होने से पढ कर सुनाता हूं । नरेश सक्‍सेना अपनी ही नहीं दूसरे कई कवियों की कविताएं याद रख लेते हैं और पूरी पूरी सुना सकते हैं। यह खासियत सबमें नहीं हो सकती । मुझे मेरी कविताएं बिलकुल भी याद नहीं ।

छत्‍तीसगढ़ आपके प्रशासन में ऊॅचे ओहदे पर रहते हुए बना। एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में इस प्रदेश को गढने - रचने में आपका अपना क्‍या योगदान है ?
पहले तो, मेरा कोई ओहदा ऐसा नहीं यह मैं साफ कर दूं । हां प्रदेश को गढने रचने में लगी टीम का मैं बहुत छोटा हिस्‍सा जरूर रहा । अभी मैं माननीय  मुख्‍य मंत्री जी के जनदर्शन कार्यक्रम को देखता हूं जिसमें आम लोगों के करीब होता हूं । यह मुझे कुछ गढने रचने जैसी संतुष्‍टि देता है । एक बेवसाइट के जरिए इस पर यहां अच्‍छा काम हो रहा है । आई एस ओ के लिए इस कार्यक्रम को चुना गया है ।

एक और छोटा कार्यक्रम मैंने अपने स्‍तर पर चलाया । मैं रजिस्‍ट्रार फर्म एवं संस्‍थाएं छ ग का काम भी कर रहा हूं, विभागाध्‍यक्ष हूं । गत तीन वर्षों से इस कार्यालय में सुबह 10 बज कर बीस मिनट पर कार्य आरंभ करने  के पहले मेरे कक्ष में सभी  अधिकारी कर्मचारी एक साथ बैठ कर  गांधी जी का प्रिय भजन ‘वैष्‍णों जन को तैने कहिए’   का श्रवण करते हैं । उसके बाद दस मिनट कुछ समसामयिक विषय में चर्चा होती है फिर जाते हैं सबके सब अपने काम पर । मेरे इस प्रयास के लिए विनोद कुमार शुक्‍ल ,सतीश  जैसवाल ,तेजिंदर और अन्‍य मित्रों ने  प्रार्थना में उपस्थित हो कर बधाई दी कि ऐसा कुछ कार्यक्रम सब ओर होना चाहिए ।  और भी लोगों ने इसकी तारीफ की । भले ही इन वर्षों में कुछ फर्क दिखना था वह मुझे नहीं दिखा । लंबी बिमारी है धीरे धीरे जाएगी पर एक मैसेज जो मुझे देना था वह मैंने दिया । जन जागरण के लिए सब ओर यह हो एक साथ तो यह भजन काम कर सकता है ।

सबसे जरूरी बात जो मुझे सबसे पहले अवगत करानी चाहिए था वह भूल रहा हूं । इटली बेलागियो की तरह राजनांदगांव में ‘सृजन संवाद’ भवन  बनाया गया है । इसके लिए मुख्‍य मंत्री जी की अध्‍यक्षता में एक ट्रस्‍ट भी बना लिया गया है । दो अच्‍छे सूट हैं ,डायनिंग किचन आफिस रूम और एक हाल सुंदर सा है । जाहिर है इसकी पहल मैंने की थी । योजना यह है कि निर्धारित समय के लिए साहित्‍यकार  यहां आकर रूके । लिखना पढना करें, यहां के साहित्‍यकारों से मिलें, छत्‍तीसगढ को नजदीक से देखें। ट्रस्‍ट जो निर्धारित कर ले कुछ राशि  प्रत्‍येक साहित्‍यकार को दे । साल में तीन माह तक अतिथि के लिए यह भवन सुरक्षित कर शेष समय के लिए निर्धारित शुल्‍क के साथ अन्‍य साहित्‍यकारों को ठहरने और लिखने पढने के काम के लिए सुरक्षित किया जाए । यह सब एक उप समिति बना कर उन्‍हें कहा जा सकता है कि कौन ठहरे कब से कब तक, आदि की योजना बना ले और समिति वैसी व्‍यवस्‍था करती रहे । बेबसाइट के जरिए निर्णय से संबंधितों को आसानी से अवगत कराने का काम हो तो यह अच्‍छा रहे। आजकल होता यह है कि एक दिन का बडा कार्यक्रम कर कई लोगों को एक साथ बुलाकर सारा पैसा खर्च कर दो, यह लोग चाहते हैं । इस चुपचाप चलने वाली योजना का प्रभाव स्‍थायी किस्‍म का है। इसके प्रति अभी तक लोगों का सोच नही बना है, सो यह कार्यक्रम कुछ रूक सा गया है । कुछ और प्रतीक्षा के बाद यह संभव हो सकेगा ऐसा विश्‍वास है।

कविता लिखने की आपकी अपनी प्रक्रिया क्‍या होती है। किसी ख्‍याल को कविता में कैसे तरतीब देते हैं ?
कोई खास प्रक्रिया नहीं है। पर कविताएं दिमाग में आते ही उसे मैं कम्‍प्‍यूटर में डाल देता हूं ताकि भूल न जाऊँ। फिर समय समय पर उस पर काम होता रहता है । कभी एक  ही बार में कविता पूरी हो जाती है । कुछ में समय लग जाता है।

किन कवियों लेखकों का सान्‍निध्‍य मिला है आपको। किनसे लिखने की प्रेरणाएं मिलती रही हैं ?
विनोद कुमार शुक्‍ल ,केदारनाथ सिंह ,विष्‍णु खरे ,नरेश सक्‍सेना, भगवत रावत ,राजेन्‍द्र मिश्र और रमेश अनुपम आदि का सानिध्‍य भी मिला, स्‍नेह भी । इन सबसे एवं ज्ञानरंजन  और विजेंद्र के पत्रों के माध्‍यम से कुछ सीखना हुआ । बस्‍तर के सौंदर्य से प्रेरणा मिलती है यह मैंने वहां जाकर जाना ।  

इस सुंदर सुखी जीवन के लिए यदि किन्‍हीं तीन के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करनी हो तो इस कृतज्ञता के हकदार तीन लोग कौन होंगे।
तीन की संख्‍या में कई छूट रहे हैं । मेरी दादी ,अम्‍मा , पत्‍नी । 

अधिकार सुख बड़ा मादक होता है --- प्रसाद ने लिखा है। कभी इस मादकता का अहसास हुआ । या कभी यह अधिकार सुख भी ऐसा कंटकाकीर्ण लगा हो कि मन यह कहने कहने को हो आया हो : यह लो अपनी लकुटि कमरिया बहुतै नाच नचायो.....। जीवन में कभी ऐसे अवसर आए हैं...
कभी यह अहसास नहीं हुआ । साधारण रहना ,साधारण खान पान यानी सादा जीवन रहा हमेशा । पत्‍नी मेरे से दो कदम और आगे इन मामलों में । फिजूल खर्ची  और दिखावा बिलकुल पसंद नहीं  । बच्‍चे भी समझदार । जीवन में कभी ऐसा मौका नहीं आया कि कहने का मन हुआ हो ‘यह लो अपनी–––––––––‘

अब तक क्‍या किया ! जीवन क्‍या जिया! मुक्तिबोध के संशय हैं ये। आप का रिश्‍ता भौगोलिक तौर से और एक कवि होने के नाते मुक्‍तिबोध से है ही। मुक्‍तिबोध के ही इन संशयों की रोशनी में क्‍या कहना चाहेंगे संजीव जी  ?
अब तक क्‍या किया में कविता कहानी के अतिरिक्‍त  थोडा बहुत और कुछ है । जो भी हो पाया उससे मैं असंतुष्‍ट नहीं । सरकारी नौकरी में बस्‍तर में काफी लंबा समय रहने और बस्‍तर से बाहर रायपुर के गरियाबंद के कमार और कान्‍हा पार्क से लगे चिल्‍फी के बैगा गांवों में पदस्‍थ रहने से वहां काम करने का मौका मिला।  मैं जो भी कर पाया उससे मुझे खुशी है ।एक सूची बना कर नहीं बताया जा सकता कि ये मेरे खुश होने के कारण हैं । किस तरीके से यह सब निभाया जा सका वह है खुश करने वाला ।  उनके पास जा  कर उन्‍हें जानना भी एक जरूरी काम है। हम अपनी जरूरतों के हिसाब से उनका विकास करते हैं तेा इससे सीधा उन्‍हें कितना लाभ मिलेगा यह सोचनेकी बात है। आज  उनके बारे में सोच समझ कर उनके स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा की जो  योजना बनाई गई है और उसका क्रियान्‍वयन किया जा रहा है।उसका सीधा लाभ उन्‍हें मिल रहा है। 

मैं कोई बडा काम करके सं‍तोष करूं ऐसा नहीं ।कोंडागांव बस्‍तर में एस डी एम के पद पर था और दूरस्‍थ गांवों में कैम्‍प लगाया करता था तब मैं अपनी जीप में पीछे नर्सरी से आम कटहल अमरूद आदि के पौधे रख कर ले जाया करता । लोगों को पता होता । कीमत दे कर खरीदते, आकर पूंछते, देखते और बातें करते । ये पौधे नर्सरी में पडे रहते खराब हो जाते पर इस पहल से लोगों ने खरीद लिया और लगाया अपनी बाडी में । यूं निर्देश कर यह काम अधिनस्‍थों से करवाया जा सकता था पर मुझे यह  करने में जो  आनंद आया उससे मैं वंचित रह जाता ।  विपक्ष के एक पूर्व विधायक थे , कोंडागांव की बात है यह ,वे चाहते कि मेरे साथ  जीप में बैठ दौरे पर जाएं । पूछने पर साथ चल कर क्‍या काम कर सकते हैं, उन्‍होंने बताया कि वे पहले वन विभाग मे कार्यरत  रहे हैं सो कलम लगाना आता है । अगले बार से वे नियमित कलमी आम के ढेर सारे कलम के साथ आ जाते और जब तक मैं काम करता वे गांव के लोगों के साथ उनकी बाडियों में देशी आम के पौधे में कलमी का कलम बांध देते । उन्‍हें सिखाते भी कैसे कलम बांधा जाता है।उन महाशय की सुपुत्री आज यहां मंत्री हैं और अपने क्षेत्र को रोशन कर रही हैं। साधुवाद पिता और पुत्री को ।

मुझे लगता है कविताएं और उपन्‍यास को लेकर मैंने क्‍या किया यह पाठक पढेंगे तब बताएंगे । मुझे खुशी होगी जब मैं खैरागढ राजनांदगांव में कविता पढूंगा जहां मेरा जन्‍म हुआ है ,जहां मेरी पढाई हुई है , क्‍योंकि सबसे बड़ा सम्‍मान वही है जो आपको अपने घर में मिलता है। 'आन गॉंव का सिद्ध' कहलाने से मैं बराबर बचता भी रहा हूँ। 


समीक्षक  
बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,
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2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi accha sakshaat kar hai. Bakshi ji aur om ji ko badhayi.

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  2. आप को यह बातचीत पसंद आई। मेरा श्रम सार्थक हुआ। संजीव जी साठ के हो चुके हैं। अब वे साठोत्‍तर हैं। उनके सुदीर्घ जीवन साहित्‍यिक सक्रियता के लिए मेरी स्‍वस्‍तिकामना। लमही का यह अंक एक हफते में वितरित हो जाएगा। लमही साहित्‍यिक क्षितिज पर तेजी से जगह बना रही है। इसे प्रेमचंद के दौहित्र श्री विजय राय निकालते हैं जो स्‍वयं कवि और उत्‍तरप्रदेश मासिक के प्रधान संपादक रह चुके हैं। कविता का पर्यावरण उनका बेहतरीन कविता संग्रह है जो किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

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