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अर्चना ठाकुर की लघु कथाएँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जनवरी 03, 2013 | गुरुवार, जनवरी 03, 2013

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

सहेली (लघु कथा)


उसने सरिता का साथ छोड़ दिया |आजकल वह रेशमा के साथ उठती बैठती है |पहले वह क्लास में जल्दी आने पर सरिता की सीट अपने साथ ही ले लिया करती थी पर आजकल रेशमा के लिये ले लेती है जैसे एक दिन उसने गीता को छोड़ कर सरिता को अपनी सहेली बनाया था |अब रेशमा रेशमा उसकी जुबान में नाम रट सा गया था |कभी कभी तो किसी और लड़की से बात करते करते उसे ही रेशमा कह बैठती है |रेशमा के साथ ही वह केंटीन जाती थी और उससे जाने किन किन विषयों पर चर्चा करती रहती थी |जो स्थान पहले उसके लिए सरिता का था |अब वहाँ रेशमा विराजमान थी |

अभी इस बात को मुश्किल से दो माह ही गुजरे थे की उसने देखा की रेशमा की दोस्ती अंकिता से हो गई है |वह अब उसके लिए सीट लेने के बजाए अंकिता के लिए जगह लेने लगी थी |अब रेशमा उसके साथ केंटीन भी नहीं जाती थी |रेशमा अंकिता के साथ ज्यादा समय बिताने लगी थी ,उसे ये बात बेहद खटकी |आज जब वह क्लास में देर से आई तो उसे सबसे पीछे की बेंच पर बैठना पड़ा|जबकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि वह क्लास में लेट आई हो पर उसके लिए पीछे बैठना ज़रूर नया था |

क्योकि आज रेशमा ने उसके लिए सीट नहीं ली थी |पीछे बैठी वह अपने पास बैठी मीनाक्षी से बात करने लगी -'मुझे रेशमा बिल्कुल अच्छी नहीं लगती ,कहाँ वह मेरे साथ पूरा समय रहती थी लेकिन आजकल तो उसकी सहेली मैं नहीं बल्कि अंकिता है ,मुझे वे लड़कियाँ बिल्कुल नहीं पसंद जो कपड़ो कि तरह सहेलिया बदला करती है |' मीनाक्षी सुनती रही |क्लास खत्म होने के बाद आज का दिन उसने मीनाक्षी के साथ बिताया और फिर वह रोज़ मीनाक्षी के साथ तब तक देखी जाने लगी जब तक उसकी दोस्ती नैना के साथ नहीं हो गई |


दूसरी माँ (लघु कथा )



देबू अपनी माँ के गुजरने के बाद से बहुत अकेला और चुपचाप सा हो गया था |देबू के दादा जी ने अपने बेटे को समझाया 'तुम्हें दूसरी शादी कर लेनी चाहिये ,हो सकता है तुम्हें पत्नी कि जरूरत न हों पर देबू को माँ कीजरूरत है '| नौ साल के देबू के पिता ने अपना फ़ैसला बदला और शादी कर ली पर देबू उसे अपनी माँ कि जगह स्वीकार न कर सका |वह जहाँ होती वहाँ देबू एक पल को भी न ठहरता |इस तरह के तिरस्कृत व्यवहार से मातृ हृदय से परिपूर्ण वह नारी हृदय तार तार हो जाता |विवाह के प्रथम दर्शन में ही उसने अपने पति को वचन दिया कि 'वह देबू को अपनी संतान मानेगी '| पर अपने इस वचन को चाह कर भी न निभा पाने से वहदुखी रहने लगी |यूं तो वह देबू के लिए हर कार्य करती फिर भी देबू उससे दूर ही रहना चाहता |

ये व्यवहार घर के बाकी सदस्यों से छुपा न रह सका |शाम की आरती के समय दादा जी ने यही विषय उसके सम्मुख छेड़ा |तो वह भी चुप न रह सकी और अपना दर्द कह सुनाया कि देबू किस तरह माँ का हृदय दुखा रहा है उसे दूसरी माँ कह कर |दादा जी को बात समझते देर न लगी |उन्होने कहा 'हो सकता है बहू देबू के नन्हें मन में कैकयी का पात्र बैठ गया हो क्योकि रामायण के पाठ के समय वह मेरे पास ही बैठता है '| तीस पर वह बड़ी नम्रता से कहती है -'हाँ, हो सकता है पिता जी ,दूसरी माँ का पात्र उसे बुरा ही लगा हो पर आपने उसे अधूरी ही कथा सुनाई है ,क्या आपने देबू को ये नहीं बताया कि सुमित्रा भी तो दूसरी माँ थी, उसने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया वो तो समय कि मांग थी जो किसी के तो मुँह से निकलनी ही थी ताकि श्री राम वन पहुँच कर मानव जाति का उद्धार कर सके ,यदि कैकयी आपने पति कि अति प्रिय रानी न होती और उसके राजा पर दो वचन शेष न होते तोनिश्चित ही वह सुमित्रा कि जगह होती '| कुछ पल रुक कर वह पुनः बोली 'क्या आपने उसे ऐसा नहीं समझाया ?' दादा जी निरुत्तर हो गए थे |वह एक पल रामायण को देखते है तो दूसरे ही पल अपनी बहू को |


माफ़ी (लघु कथा )



 'नारी सशक्तिकरण की आप बात करती है ,समाज सुधारक है आप, फिर भी आप ऐसी बात कर रही है |''बहू तू समझदार है - माफ़ कर दे उसको - एक गलती हो गई उससे - रात गई बात गई ये समझ भूल जा और नई ज़िंदगी की शुरुआत कर |' 'मम्मी जी - कितनी आसानी से आपने कह दिया की मैं आपके बेटे को माफ़ कर दूँ और भूल जाऊँ की उस शक्स ने मुझे ही नहीं छला बल्कि मेरे स्त्रीत्व को भी छलनी किया है - अपनी पत्नी के रहते पराई स्त्री गमन जान कर भी मैं उसे माफ़ कर दूँ - ऐसा आप स्वयं एक स्त्री होकर भी कैसे कह पा रही है !'
'जब मैंने आपसे आपके बेटे की काली करतूत की बात कही तो पहले तो आपने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया ,फिर जब सबूत दिखाए तो उल्टा आप मुझ पर ही लांछन लगाने लगी की मैंने ही पत्नी सुख न दिया होगा और जब मैंने ये भी साबित कर दिया की शुरू से ही आपका बेटा ऐसी हरकतों में लिप्त रहा है तब आप मुझसे कह रही है की मैं माफ़ कर दूँ उसे !'

'बहू, वो पुरुष है और पति का तिरस्कार स्त्री को नरक तक भोगना पड़ता है |' 'वाह मम्मी जी क्या खूब कही आपने - तो मेरी भी सुन लीजिए - श्री राम ने तो झूठे लांछन लगा कर सीता को त्यागा था लेकिन मैं आपके बेटे को पूरे सबूत के साथ त्याग रही हूँ |' 'बहू होश में रह कर बोलो |' 'आपको मेरी बातों पर आवेश आ रहा है पर आपने बेटे के कृत्यों पर नहीं आता |' 'बहू - !' 'आपके बेटे को तो अभी भी अपनी गलतियों का अहसास नहीं है और आप चाहती है की मैं ऐसे शक्स को माफ़ कर दूँ - जब सीता मैया ने अंतिम समय में भी धरती में समा कर अपने पति को माफ़ नहीं किया फिर मैं ऐसे शक्स को जिसे अपने कृत्यों पर जरा भी शर्म नहीं तो उसे तो मैं इस धरती पर जब तक हूँ कभी माफ़ नहीं करूंगी |'

'तू कैसी विवाहिता स्त्री है ,अपने सुहाग के लिए आपने पति के लिए ऐसे बोल  रही है - अरे औरत को धरती कहा गया है और पुरुष को आकाश - जब आसमान में रात होती है तो धरती में भी रात होती है - जब आसमान में दिन होता है तो धरती में भी दिन होता है फिर अकेले धरती का क्या अस्तित्व - धरती कभीआकाश में चमकते बुझते तारों की गिनती नहीं करती - तू अपने पति को माफ़ कर और अपने जीवन को उजड़ने से बचा |'
'वाह मम्मी जी - आप जैसी पुत्र मोही स्त्रिया समाज में है तभी तो ऐसे पुरुष है - आप कहती है तो मैं एक शर्त में आपके बेटे को माफ़ कर सकती हूँ की मैं भी किसी पराये पुरुष से संबंध रख कर छोड़ूँगी तब आपका बेटा मुझे
अपनाए - फिर मैं उसे अपनाऊँगी - |' 'नीच स्त्री - तू ऐसी बातें कर भी कैसे सकती है ?' 'क्यों अभी तो आपने कहा था की धरती आकाश में चमकने वाले तारों की गिनती नहीं करती तो आकाश  क्यों धरती में खिले रंग बिरंगे फूलों की अब गिनती करने लगा - |'उसकी बात समाप्त होते उनके पास अब न कोई दलील थी और न कोई आरोप सिर्फ अहसास था नारी सशक्तिकरण का |

अर्चना ठाकुर

  • कानपुर(उत्तर प्रदेश) में जन्म 
  • मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि,परामर्श में डिप्लोमा(ब्यूरो आफ साइकोलोजी) 
  • एच आई वी -परामर्श में डिप्लोमा ,
  • एम0 फिल  (मनोविज्ञान),
  • हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (अध्यनरत )
  • प्रकाशन : विभिन्न अंतरजाल एवम मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथा,यात्रा वृतान्त  आदि का प्रकाशन
  • सम्पर्क :तेजपुर ,सोनित पुर जिला ,आसाम, arch.thakur30 @gmail .com
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2 टिप्‍पणियां:

  1. लघु कथाये बेहद कटाक्ष पूर्ण बन पड़ी हे ...अच्छी लगी ...बधाई !

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