कवि-कथाकार महाप्रकाश जी नहीं रहे - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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कवि-कथाकार महाप्रकाश जी नहीं रहे


जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि

मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश जी 19 जनवरी को हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका फेफड़े और किडनी में संक्रमण का इलाज चल रहा था, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली। सहरसा (बिहार) के बनगांव में 14 जुलाई 1949 को महाप्रकाश जी का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चौधरी के बाद वे मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। 

चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं। महाप्रकाश जी ने कहानियां भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गंभीर मूल्यांकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिंदी और बांग्ला में भी हुआ। महाप्रकाश जी ने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद विपक्ष पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूंजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वे निरंतर मुखर रहे। 

युवा पीढ़ी के रचनाकार महाप्रकाश जी के जबर्दस्त प्रशंसक रहे। उन्होंने कई नए रचनाकारों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। वे बहुत अच्छे वक्ता थे। गप्पें करना, संगीत सुनना और आत्मकथा पढ़ना उन्हें खासतौर से पसंद था। वे बेहद स्वाभिमानी और संवेदनशील थे। इस स्वाभिमान ने ही उन्हें जनसामान्य सा जीवन चुनने में मदद की और संवेदनशीलता ने प्रगतिशील विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाया। युवा कवि राजेश कमल के अनुसार वे अक्सर दुनिया जहान में घट रही घटनाओं को लेकर फोन करते थे और बताते कि क्या गलत है और क्या सही है। फोन पर वे अपनी कविता या कहानी के बारे में बात लगभग नहीं करते थे। 

महाप्रकाश जी के शव को 19 जनवरी को शाम में लोधी रोड, नई दिल्ली के विद्युत शवदाहगृह में अग्नि के हवाले किया गया। इस मौके पर उनके बेटों और करीबी परिजनों के साथ कहानीकार गौरीनाथ, आलोचक श्रीधरम, कवि रमण, युवा कवि खालिद, भाकपा-माले केंद्रीय कमेटी सदस्य प्रभात कुमार, सुधीर सुमन आदि मौजूद थे। आज 20 जनवरी को बिहार की राजधानी पटना में जन संस्कृति मंच के राज्य कार्यालय में महाप्रकाश जी की स्मृति में  एक शोकसभा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, कवि राजेश कमल, प्रतिभा, संतोष सहर, रंजीव, रंगकर्मी संतोष झा और समता राय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। मातृभाषा, साहित्य और प्रगतिशील विचारधारा तथा नई रचनाशीलता के प्रति अपने गहरे समर्पण के लिए महाप्रकाश जी हमेशा याद आएंगे। जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि। 

सुधीर सुमन, 
राष्ट्रीय सहसचिव, 
जन संस्कृति मंच
मोबाइल- 09868990959  

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