''मैं हुण्यों हे के वे वणाने हेरता फररिया है, मूँ पुछु के वे गम्या कटे हे के वणाने हेरणा पड़े’’ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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''मैं हुण्यों हे के वे वणाने हेरता फररिया है, मूँ पुछु के वे गम्या कटे हे के वणाने हेरणा पड़े’’


चतुरसिंह जी की एक सौ चोतीसवीं वर्षगाठ
उदयपुर, 9 फरवरी

ईश्वर की तलाश में निकले लोगों पर बावजी चतुरसिंह जी कहते है ''मैं हुण्यों हे के वे वणाने हेरता फररिया है, मूँ  पुछु के वे गम्या कटे हे के वणाने हेरणा पड़े’’ भगवान और भक्त का सम्बन्ध आत्मा और आत्मा और परमात्मा का है। ’’आपा शास्त्र बणाया, नी आपाने शास्त्र’’ व्यक्ति की चेतना स्वयं शिक्षित है उसी चेतना से साक्षात्कार ही आत्मदर्शन या हरी दर्शन है। बावजी लोक सन्त चतुरसिंह जी की एक सौ चोतीसवीं वर्षगाठ के अवसर पर डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित परिचर्या में योगीराज चतुरसिंह जी वाणी व उपदेश बतलाते हुए हिन्दुस्तान जिंक के जनसम्पर्क सलाहकार तथा चतुरसिंह जी के जीवन पर पी.एच.डी. करने वाले डॉ. मांगीलाल नागदा ने व्यक्त किये।

डॉ. नागदा ने कहा कि लोक भाषा में सरल बात आम जन तक पहुंचानें वाले मनिषी बावजी चतुरसिंह जी को ब्राम्हसुत्र का ज्ञान था जो कालान्तर में स्वामी विवेकानन्द को भी हुआ था। आघ्यात्म में रचे बसे सन्त चतुरसिंह जी ने अलख पचीसी की रचना की जो आध्यात्म जगत में मील का पत्थर है। 

ट्रस्ट सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने कहा बावजी चतुरसिंह जी ने राजस्थानी भाषा में ही सारी रचनायें की है तथा बहुत सरल भाषा में गुढ और गम्भीर ज्ञान को आत्मजन के लिए प्रस्तुत किया है। बावजी ने संस्कृत भाषा की चन्द्रशेखराष्टक का मेवाडी अनुवाद कर आम जन को आल्हादित किया है। शिव उपासना का यह मेवाड़ी  श्लोक उन्हे मायडभाषा का शिखर साहित्यकार ही कहेगा  - 

’’चन्द्रधारक चन्द्रधारक चन्द्रधारक पालजे,
’’चन्द्रधारक चन्द्रधारक चन्द्रधारक राखजे,

अर्थात परमपिता शिव हमारी रक्षा करणा हमारा जीवन सुखी रखना। 

राजस्थानी भाषा आन्दोलनके महांमत्री डॉ. राजेन्द्र बारहट ने कहा कि बावजी चतुरसिंह जी ने आधुनिक राजस्थानी साहित्य के रत्न थे। वे गंभीर दार्शनिक चिन्तक एवं इतिहास और साहित्य के मर्मज्ञ थे। उन्हे युग बोध हो रहा था जिसका उन्होने अपनी कथनी व करणी में युग सन्देश दिया। ऐसे बिरले व्यक्तित्व समाज को ईश्वर के मार्गदर्शक के रूप में मिलते है। चान्दपोल नागरिक समिति के तेजशंकर पालीवाल ने कहा कि बावजी चतुरसिंह निर्गुणी सन्त थे तथा ईश्वर को निर्गुण में पूजते थे। चतुरसिंह जी राजपरिवार के होते हुये भी आमजन एवं गरीबों के मध्य रहते थे। वे आम जन के सन्त थे। संवाद का संचालन करते हुये कार्यालय प्रशासक नितेशसिंह कच्छावा ने कहा कि आज के सन्त रूप रंग से पहचाने जाने लगते है वही बावजी ने परिवार तथा समाज के मध्य रहकर आध्यात्म की ज्योति का चीर स्थाई बनाने में जीवन समर्पित कर दिया। 

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