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बेहतर होने से ठीक पहले की कवितायेँ / सुनील कुमार सलैडा

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013 | मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।
1. ललकार
रोकेगा कब तक तू मुझको अब,
मैंने भी भर ली है उड़ान अब,
पंख मैंने फैला लिए हैं हवाओं में,
उड़ान मेरी है अब आसमां छूने की,
है हिम्मत तो रोक ले तू मुझको अब,
के मैंने भी ठानी है दो-दो हाथ करने की अब,
उड़ना है मुझे भी मर्जी से अपनी अब,
कोई बाधा, कोई रूकावट अब न है मुझको सहनी,

दबा के कब तक तू मुझको रख सकता है अब यह है देखना,
कफन सर पे अब है मैंने भी पहना,
तोड़कर हर बाधा निकल जाँऊगी मैं,
के छीन लूँगी अपने जीने का हक अब मैं तुझसे,
गर है हिम्मत तो लगा ले दम अपना तू भी अब,
        देखना है रोक पायेगी अब कौन सी हवा राहें मेरी,
रूख मोड़ दूँगी अब उन हवाओं का मैं,
ये कसम अब है मैंने ठानी,
के रोकेगा कब तक तू मुझको,
अब यह है देखना....

2. अनजान राह
निकला हूँ घर से सब छोड़छाड़ कर मैं,
न मंजिल का है पता,
न रास्ते का कुछ ठिकाना,
अनजान डगर है,
अनजान हैं सब लोग मेरे,
जाना है किस ओर न है मुझको पता इसका,
पाना है मंजिल को अपनी,
किस पर करूँ एतबार समझ कुछ न आये,
इन इंसानो के शहर में अक्सर सुना है मैंने,
के वास यहाँ केवल हैवानों का है,
फिर भी न जाने क्यों,
दिल को यह एतबार है मेरे,
के बाकी है अभी आशा की इक किरण कहीं न कहीं,
निकला हूँ खोज में उसकी,
के देखूँ तो सही छुपी है वो कहाँ,
विश्वास है मुझको के बदलेगी घटा इक दिन जरूर,
के कब तक चलेगा काले बादलों का बस सफेद धूप के आगे,
के हर अँधेरे के बाद निकलेगी आशा की इक किरण जरूर,
के निकला हूँ घर से आज सब छोड़छाड़ कर....’’

3. दर्द इक पेड़ का
बार-बार क्यों काटते हो मुझे,
गिरता है लहू मेरा भी तुम्हारी ही तरह,
होता है दर्द मुझे भी तुम्हारी ही तरह,
फिर यह क्यों न समझते हो तुम,
मुझसे ही तो जीवन है तुम्हारा,
रूक जाएँगी श्वासें तुम्हारी भी,
हो जाओगे बेदम,
गर मैं न रहा तो अस्तित्व,
तुम्हारा भी हो जाएगा क्षीण,
अगर समझते नहीं हो जरूरत मेरी,
तो क्यों आते हो शीतल छाँह में मेरी,
गर काटते हो तो लगाने का भी प्रयास तुम करा करो,
वर्ना दिन इक ऐसा आयेगा,
के चाहकर भी बचा न पाओगे,
खुःद को कभी तुम,
कभी वक्त मिले तो इस पर भी सोच कर देखो कभी,
अपनी इस संवेदनहीन होती जिंदगी में,
किसी और के लिए भी संवेदना जगाकर देखो कभी....’’

4 आज़ादी की खुशफहमी
मिली थी आज़ादी कितनी मशक्कत के बाद,
फैराया था ध्वज हमने बड़े चाव के साथ,
पहले सपनो के महल भी खूब बनाये हमने,
फिर टूटते उन सपनों को भी,
देखा इन आँखों ने,
सोचा था के न होगा कोई भेदभाव अब,
मिलेगी सबको समता यहाँ,
पर कितनी कितनी मिली समता,
यह तो ग्वाह है यह मौन वक्त,
फिर सोचा हमने के आएगी,
नई सुबह इक दिन,
निकलेगा सुरज हमारी भी आशाओं का इक दिन,
पर यह क्या,
आज भी मोहताज़ हैं हम अपने ही अधिकारों से,
फिर कैसे माने के आज़ाद हैं हम पूरी तरह,
मगर फिर भी यह खुशफहमी है,
के बदलेगी तस्वीर,
आएगी कहीं से अँधकार की गुफा से,
रोशनी की सुबह नयी,
मिटा देगी जो इस अंधकारमय रात को,
के ऐ व्यवस्था में बैठे देश के हितकरो,
कभी तो सोचो देश के हित की तुम भी कभी,
कब तक यूँ स्वार्थ की बलि चढ़ेंगे हम,
कभी तो निस्वार्थी हो जाओ तुम भी,
वरना दिन इक ऐसा आएगा,
के मिट जाएगी हस्ती अपनी,
खो जायेंगे हम....’’


सुनील कुमार सलैडा
(जम्मू विश्वविद्यालय में पी.एच.ड़ी. कर रहे हैं।)
संपर्क-
हिन्दी विभाग,
जम्मू विश्वविद्यालय,
जम्मू-180006,
मो.न. 09796036272
ई-मेल-sunilsaliada@gmail.com

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