यहाँ-वहाँ से एक जगह कवितायेँ / विपुल शुक्ला - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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यहाँ-वहाँ से एक जगह कवितायेँ / विपुल शुक्ला

विपुल शुक्ला 
उनका ज़रूरी परिचय उन्ही  की ज़बान में
(किताब हूँ लेकिन खुली नहीं,अगर कोशिश करेंगे तो पढ़ सकें।
कहने को इंजीनियर हूँ और सहने को लेखक।
पढ़ने के दौरान पढ़ाई उबाऊ लगती थी 
जो इंजीनियरिंग कॉलेज में केमिकल इंजीनियरिंग 
पढ़ाते हुए भी उबाऊ ही रही।
ऊबकर इंदौर में रेडियो पर बक-बक की 
फिर से ऊब हुई तो एक एड-एजेंसी के लिए विज्ञापन बनाए। 
फिर बार-बार ऊबने से ऊब-सा गया 
और हाइडलबर्ग सीमेंट, दमोह में सीमेंट बनाने लगा।
फिर कुछ दिन लार्सन एंड टूब्रो लिमिटेड के साथ गुलबर्गा,
कर्नाटक में रहा और आजकल हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड 
के साथ चित्तौड़गढ, राजस्थान में हूँ। 
सोचता हूँ..कुछ दिन ठहर जाऊँ..बनने-बनाने पर ज़ोर नहीं,
कहने-कहाने पर यकीन है)



(प्रगतिशील कविता का युवा हस्ताक्षर है।पर्याप्त संभावना लिए एक ऐसा चेहरा है जिसमें जनपक्षधर होने के सभी भाव-ताव मौजूद हैं।ज़रूरत के मुताबिक़ गंभीर विपुल अभिरुचियों से लबरेज़ मित्र की तरह बरताव करता है। अपनी माटी पर उसका भरापूरा स्वागत।अभी अतिउत्साह में हम उनकी पूर्व प्रकाशित कवितायेँ ही यथायोग्य आभार सहित यहाँ छाप रहे हैं। जल्द ही कुछ अप्रकाशित मटेरियल भी उनकी तरफ से यहाँ आयेगा।ऐसा अंदेशा है-सम्पादक)




विस्तार जहां होता है खत्म
वहां होती है सीमा..
पर खत्म तो दृष्टी होती है
विस्तार नहीं !
विस्तार अनंत है।
अनंत’ शब्द बहाना है
अंत ना खोजने का..
तो अनंत’ स्वयं है एक सीमा
या कहें सीमा में है अनंत !
सीमाहीन कुछ भी नही
स्वयं सीमा के अलावा..
बस सीमा,सीमाहीन है ! 

खुली आंखों की सीमा है आसमान,
बन्द आंखों से देखे जा सकते है
उतने आसमान..
जितनी आती हो गिनती !
गिनती की सीमा नहीं..
पर गिनती आने की सीमा है !
वो कहती है.. करती हूं तुम्हे प्यार.
जितना तुम सोच भी नहीं सकते!
अर्थात
मेरी सोच के खत्म होते ही
शुरु होने लगती है
उसके प्यार की सीमा..
और सीमा के पार क्या है?
शायद नफरत..!

सोचता हूंब्रम्हांड के बाहर क्या है
किसके अन्दर है ब्रम्हांड ?
वो बाहर वाली वस्तु भी
कुछ के अन्दर ही होगी !
तो क्या है वो बाह्यतम सीमा..
जिसके अन्दर है सब कुछ !
यह कल्पना की सीमा है..
अगर सीमा कुछ नहीं होती
तो वो काल्पनिक है..
पर कल्पना की तो सीमा है ना ! 

दर्द की सीमा है मौत,
मौत की सीमा जीवन..
पर दर्द के लिये
ज़रूरी है जीवन होना..!
सोचता हूंगोल है सीमा
और हम सब
घेरे हुये हैं सीमा को
चारों तरफ से !

सीमा स्वयं नहीं होती
वो गढी जाती है..
अपनी ज़रूरतों के हिसाब से..
सीमा गढ लेने के बाद
हम रह जाते हैं एक बिन्दू !
और सीमा के बाहर से
शुरु होता है वास्तविक विस्तार।
चाहे कुछ भी हो..
सीमा,
दुनिया की सबसे ज्यादा
विस्तारित की जा सकने वाली वस्तु है !


(2)हम मरे !

लोग जीते गये, जीते गये, जीते गये,
कि एक दिन मर जायेंगे
हम मरते गये, मरते गये, मरते गये,
कि जियेंगे शायद कभी...
मरते हुए हर बार
अपनी बची ज़िन्दगी खत्म की हमने.
खत्म होकर नहीं
बाकी रहकर मरे हम.
आग से नहीं
धूप में जलकर मरे.
हम सपने में जी रहे थे
असल में सो रहे थे
आंख खुली तो मर गये.

हम थकने से नहीं मरे
बल्कि ना ऊबने से मरे.
नहीं मरे हम प्यासे रहकर
प्यास ना होने से मरे.
हम गिरे नहीं, धसके
खुद के मलबे में दबकर मरे.
दुख नहीं मार सकता था हमें
हम ना रो पाने से मरे.
इतने घुले, इतने घुले, इतने घुले
कि घुन की तरह मरे.
जब आह नहीं निकली
तो वाह कहकर मरे.
चुटकुले थे हम...
कह देने से मर गये.
गीत थे
ना गाने से मर गये.

हम सब्र थे
टूटते तो जी जाते
ना टूटने से मर गये.
बिजली गिरने से नहीं
बिजली होने से मरे हम.
ज़हर से नहीं
ज़हरीले होने से मरे.
हम क़त्ल होने से नहीं
खुद का क़त्ल करने से मरे.
हम इतने थे परेशान
नहीं मर सकते थे और परेशानी से
राहत मिलने से मरे हम.
ऐसे हुये, ऐसे हुये
कि होते-होते मर गये.
हम मन्दिर थे
बुत होने से मरे.

भरी दोपहरी में मरे जब
उस वक़्त रात थी
हम चाँद को नहीं
चाँद के गड्ढे देखते हुये मरे.
कील की तरह
खुद में गड़कर मरे हम.
अरे.. मरने से नहीं
ना जीने से मरे.
सड़े चूहे जैसी
दुर्गन्ध आती थी ज़िन्दगी से..
हम दम घुटने से नहीं
साँस ना लेने की इच्छा से मरे.
अपने आंसुओं को रोते हुये मरे,
मौत पर हंसते हुये मरे.

तारीख देखकर नहीं
तारीख बनकर मरे हम.

हाँ,
हम मरे !

(3)मुस्कराहट 


कई मुद्दतों बाद,
एक दोस्त मिला आज
वो मुस्करा रहा था 
मैं भी मुस्करा रहा था
हम दोनो मुस्करा रहे थे
मुस्करा रहे थे हम दोनो
यह जतलाने के लिये
कि देखो
मुस्करा रहे हैं हम !
मुस्कुराना ज़रूरी थातो मुस्करा रहे थे

अपनी मुस्कराहट को मैं समझता था
मुस्कराते हुये सोच रहा था
सोचते हुये डर रहा था
डरते हुये मुस्करा रहा था
और युं ही मुस्कराते हुये
मुझे हुआ एक शुबहा..
मेरा दोस्त, कहीं सच में तो नहीं मुस्करा रहा ! 


(4)पढ़ना 

अच्छी किताबों से मोहब्बत है उन्हें 
ज़ा सकते हैं किसी भी हद तक
उन्हें पढ डालने के लिये. 
पढ़ना उनके अस्तित्व के लिये 
ऐसे ज़रूरी है 
जैसे लूट के लिये अंधेरा. 
चाहते हैं वो 
सब कुछ पढ़ डालना.. 
भूले से भी छूट गयी कोई अच्छी किताब 
कभी भी पढ़ सकती है किस्मत उनकी 
तो हमेशा पढ़ते हैं वो 
सबसे पहले 
इतिहास में शायद ही रहा हो कोई ऐसा 
जिसने पढ़कर उनसे ज्यादा समझे हों मायने. 
वो हुक्मरान हैं 
पढ़ डालते हैं सब कुछ बिल्कुल दीक की तरह.



(5)समय

सदियों से चलते चलते 
फूल गयी है घडी की सांस
एक टिक के बाद 
दूसरी टिक की आवाज़ 
बरसों में आती है अब 
कुछ पक्षी जा रहे हैं 
पूरब की ओर कतार बनाकर.इस बार ना बौराने के कारण 
बौरा-सा गया है आंगन का आम 
आराम कुर्सी पर लेटा दर्द
पढ रहा हैनिरोग रहने के नुस्खे बडे ज़ोरों की लगी है भूख 
और रसोई में पकाने को 
बस ज़हर बचा है 
कलम खाली है,और सूख चुकी हैं 
स्याही की तमाम शीशियॉं 
ऐसे हालात में
जो दे सकती थीं हौंसलाउन सारी किताबों को 
पढ डाला है दीमकों ने. 
इतना खतरनाक हो गया है समय 
कि नशा होने की जगहहोश आता है अब 
शराब पीने से 
नींद पूरी होकर टूट चुकी हैरात आधी है, 
और आधी ही रहना चाहती है आज से 
सोना ज़रूरी हो गया है. 
मैनें नींद की गोली समझकर
निगल लिया है चांदऔर रात से मांगकर
पी गया  हूँ ढेर सारा अन्धेरा 
उम्मीद में..  
कि जब जागूँगा 
तो माथे पर चमकता मिलेगा सूरज

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी और मंजी हुई कवितायें एक युवा कवि को पढाना हमेशा से ही सुकून देता है मुझे और विपुल में बहुत संभावनाएं है क्योकि भाषा और विचारों के बीच संतुलन है और जिस पक्षधरता की उम्मीद हम कविता से करते है वो बहुत स्पष्ट इंगित हो रही है. लिखते रहो आगे मकाम और भी है.

    सस्नेह

    संदीप नाईक, देवास/होशंगाबाद

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