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व्यास सम्मान,डॉ. नरेन्द्र कोहली,न भूतो न भविष्यति

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 23, 2013 | शनिवार, फ़रवरी 23, 2013

वर्ष 2012 के व्यास सम्मान के लिए प्रख्यात लेखक डॉ. नरेन्द्र कोहली के उपन्यास न भूतो न भविष्यति को चुना गया है. इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2004 है. यह निर्णय साहित्य के जाने-माने विद्वान और लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित की अध्यक्षता में संचालित एक चयन समिति ने किया है. इसकी सम्मान राशि ढाई लाख रूपये है.के.के.बिरला फाउंडेशन साहित्य के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय है. फाउंडेशन द्वारा हर वर्ष तीन बड़े साहित्यिक सम्मान/पुरस्कार दिए जाते हैं. संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित किसी भी भारतीय भाषा में पिछले दस वर्षों में प्रकाशित भारतीय नागरिक की एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति के लिए सरस्वती सम्मान ;राशिःसाढ़े सात लाख रूपये और राजस्थान के हिन्दी/राजस्थानी लेखकों के लिए बिहारी पुरस्कार ;राशिः एक लाख रूपये दिया जाता है.

एक अन्य पुरस्कार है व्यास सम्मान ;राशिःढाई लाख रूपये जो सरस्वती सम्मान के बाद सबसे अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है. यह भी पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित किसी भारतीय नागरिक की उत्कृष्ट हिन्दी कृति पर दिया जाता है. सृजनात्मक साहित्य के अतिरिक्त साहित्य और भाषा का इतिहास, आलोचना, निबंध व ललित निबंध, जीवनी आदि विधाएं भी इन सम्मानों/पुरस्कारों की परिधि में आती है. हिन्दी में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार हैं पर व्यास सम्मान की विशिष्टता यह है कि यह साहित्यकार को केन्द्र बिन्दु में न रखकर किसी एक साहित्यिक कृति को दिया जाता है.

                अब तक निम्नलिखित साहित्यकारों की कृतियों को व्यास सम्मान दिया जा चुका है:
    
    o’kZ       iqjLd`r d`fr                           ys[kd dk uke
1991      Hkkjr ds izkphu Hkkkk ifjokj vkSj fgUnh  MkW- jkefoykl “kekZ
         (rhu Hkkxksa esa) (vkykspuk)
   1992     uhyk pkan (miU;kl)        MkW-f”ko izlkn flag
   1993     eSa oDr ds gwa lkeus (dfork)                         Jh fxfjtk dqekj ekFkqj
   1994     liuk vHkh Hkh (dfork)                      MkW-/keZohj Hkkjrh
   1995     dksbZ nwljk ugha (dfork)                     Jh dqaoj ukjk;.k
   1996     fgUnh lkfgR; vkSj laosnuk dk fodkl          izks- jkeLo:i prqosZnh
            (lkfgR; dk bfrgkl)
   1997     mRrj dchj rFkk vU; dfork,a (dfork)        MkW- dsnkj ukFk flag
   1998     ikap vkaxuksa okyk ?kj (miU;kl)               Jh xksfoUn feJ
   1999     folzkeiqj dk lar (miU;kl)                   Jh Jhyky “kqDy
   2000     igyk fxjfefV;k (miU;kl)                   Jh fxfjjkt fd”kksj
   2001     vkykspuk dk i{k (vkykspuk)                  izks- jes”k pUnz “kkg
   2002     i`Foh dk d`.ki{k (dfork)                    MkW-dSyk”k oktis;h
   2003     vkoka (miU;kl)                             Jherh fp=k eqn~xy
   2004     dBxqykc (miU;kl)                         Jherh e`nqyk xxZ
   2005     dFkk lrhlj  (miU;kl)                     Jherh pUnzdkark
   2006     dfork dk vFkkZr~ (vkykspuk)                  izks-ijekuan JhokLro
2007     bl o’kZ ;g iqjLdkj fdlh dks ugha fn;k x;k-
   2008     ,d dgkuh ;g Hkh (vkRedFkk)                        Jherh eUuw HkaMkjh
   2009     bUgha gfFk;kjksa ls (miU;kl)               Jh vejdkar
   2010     fQj Hkh dqN jg tk;sxk (dfork)                 MkW- fo”oukFk izlkn frokjh
   2011     vke ds iRrs (dfork)                                   izks- jkenj”k feJ
        

                                डॉ.नरेन्द्र कोहली और उनका उपन्यास न भूतो न भविष्यति

डॉ. नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी, 1940 को पंजाब के सियालकोट में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. और पीएच.डी की है। हिन्दी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेन्द्र कोहली को ही जाता हैं। उन्होंने “पुराणों” पर आधारित साहित्यिक कृतियों की रचना कर लेखन की दुनिया में एक नई विधा का सूत्रपात किया। 1975 से वह हिन्दी साहित्य को अपनी लेखनी की अविछिन्न धारा से समृद्ध करते आ रहे हैं, इसलिए समकालीन आधुनिक हिन्दी साहित्य की यह अवधि “कोहली युग” के नाम से भी जानी जाती है। 

उनके कुछ उपन्यासों में समाज और परिवारों के जीवन को पेश किया गया है, लेकिन महज समाज के बारे में कहने या उसके दोषों का मखौल उड़ाने और दुविधाओं की प्रस्तुति से उन्हें संतुष्टि नहीं मिल रही थी। उन्होंने महसूस किया कि समाज के आधे-अधूरे, संकीर्ण और सीमित चित्रण से न तो साहित्य का लक्ष्य पूरा होता है ना ही समाज का हित होता है। मनुष्य की दुर्बलता और दोषों को सामने रखने से बुराइयों और दूषित प्रवृत्तियों को ही बढ़ावा मिलेगा। इसलिए उनका मानना है कि साहित्य को जीवन के महान, गौरवपूर्ण और नैतिक मूल्यों को ही व्यक्त करना चाहिए।

कालजयी कथाकार कोहली जी की अब तक लगभग 76 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कहानी, उपन्यास के साथ-साथ आलोचना, व्यंग, नाटक, संस्मरण व निबंध शामिल हैं। महासमर, तोड़ो कारा तोड़ो, अभ्युदय, क्षमा करना जीजी, अभिज्ञान, हत्यारे, आत्मा की पवित्रता, युद्ध एवं त्रासदियां उनके बहुचर्चित संस्करण हैं।डॉ. नरेन्द्र कोहली के उपन्यास न भूतो न भविष्यति ;वर्ष 2004 में प्रकाशितद्ध को वर्ष 2012 के व्यास सम्मान के लिए चुना गया है। न भूतो न भविष्यति  देश के इतिहास और संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ने वाले स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और उस युग पर लिखा हुआ ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास में समकालीन जीवन के मूल्यगत विभ्रम को डॉ. नरेन्द्र कोहली ने ऐतिहासिक कथ्य के माध्यम से पौराणिक शाश्वत मूल्यों पर चिंतन करते हुए अंकितन किया है। अपनी रचना में उन्होंने आस्था, सत्य, मर्यादा, नैतिकता, संस्कृति तथा धर्म के सात्विक स्वरूप से सम्बद्ध अनेक बुनियादी प्रश्नों को भी उठाया है।पुरस्कृत  उपन्यास में .धर्म और जीवन की जटिल गुत्थियों तथा ईश्वर संबंधी जिज्ञासाओं को लेखक ने इतनी सहजता और सरलता से समझाया है कि पाठक को भी उस सत्य का कलात्मक साक्षात्कार होने लगता है। 
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