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''उपनिषद को साहित्य सम्मेलन कहा जाये तो अत्युक्ति नहीं होगी।''-डॉ ओमआनन्द

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, फ़रवरी 25, 2013 | सोमवार, फ़रवरी 25, 2013

संतो ने सामाजिक असमानताएं दूर करने का काम किया
देश में व्याप्त अव्यवस्थाओं पर साहित्यकारों की चिंता
चित्तौड़गढ़ 24 फरवरी।
मध्यकालीन संतो के काव्य और मीरा ने भारतीय लोकजीवन के अन्तर्मन में गहरी पैठ ही नहीं जमाई बल्कि सनातन धर्म और संस्कृति को अक्षुण्य बनाये रखा। मीरा स्मृति संस्थान द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय उपनिषद के समापन समारोह में अध्यक्ष पद से बोलते हुए दिल्ली से आये लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल ने कहा कि इस संस्थान ने देश के साहित्यकारों, संतो और सभी प्रकार के धर्म और सम्प्रदाय के अध्येताओं को एक स्थान पर जोड़ कर देश में व्याप्त असमानता, रूढ़ियों, जातिपरक बुराईयों और साम्प्रदायिकता जैसे मूँह बाये प्रश्नों के समाधान के लिए मध्यकालीन संतो के योगदान को न केवल महत्वपूर्ण बतलाया बल्कि उन संतो की वाणी, विचार, काव्य और भजन आदि आज के परिप्रेक्ष्य में  वे प्रासंगिक हैं बल्कि इन असामनताओं को दूर करने के लिए आज भी संतों की ऐसी ही वाणी की जरूरत है जो देश में असामानताओं को दूर कर एक उन्नत और प्रगतिशील समाज का निमार्ण कर सके।

इस अवसर पर उपनिषद के सूत्रधार और संरक्षक डॉ ओमआनन्द ने कहा कि प्रत्येक प्रान्त, अंचल और भाषाई विवधता वाले संतो के साहित्य और उसके सामाजिक अवदान को प्रस्तुत करने वाले साहित्यकारों का समाज के सामने मुंह बायें खड़ी समस्याओं के समाधान हेतु मीरा की धरती चित्तौड़गढ़  में चिंतन करना न केवल ऐतिहासिक है बल्कि साहित्यकारों का चिंतन और समाधान इस दिशा में एक सन्देश है। उन्होंने कहा हांलाक उपनिषद के लिए सोचा यह गया था कि साहित्यकार मध्यकालीन संतो के सामाजिक बदलाव के विषय पर केन्द्रित हों किन्तु इसमें उपनिषद को अपेक्षित समाधान कम ही मिल पाये हैं और संतो के कार्यों पर सूचनाएं अधिक। इससे इस उपनिषद को साहित्य सम्मेलन कहा जाये तो अत्युक्ति नहीं होगी। यह संस्थान सांस्कृतिक कार्यक्रम तो लगातार कर रहा है परन्तु साहित्यिक गतिविधियां कम हो गई, इसलिये अब फिर से उपनिषदों का कार्यक्रम हाथ में लिया गया है तथा आगामी उपनिषद अधिक सोच और तैयारी के साथ किया जायेगा। 

समापन समारोह के दौरान खुली चर्चा भी हुई और वक्ताओं ने कहा कि भारत पहले से ही जातियों और उपजातियों में बटा हुआ था, संत सम्प्रदाय और मठों और धर्मां ने ऊपर से और सम्प्रदाय और जातियां खड़ी हो गई। अनेक जगह साधु भ्रष्ट हो गए और विकृतियाँ  आ गई। इस उपनिषद में जैसी अपेक्षा थी संत साहित्य से सामाजिक चेतना के स्वर गूंजते नहीं सुनाई पड़े। जहां कबीर ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया वहीं मूर्तियों का अम्बार लग गया। संतों की सुझाई चेतना को लोगों ने ग्रहण नहीं किया बल्कि आज के संत स्वयं बड़े-बड़े मठाधीश बन गए हैं वे करोड़ों की सम्पदा एकत्रित करते जा रहे हैं, और उनके ऐसे अवदान का मूल्यांकन कैसे हो। लोगों का विश्वास काम के बन जाने में हैं, वे धर्म का नहीं परिपाटियों का पालन कर रहे हैं। एक अन्य साहित्यकार ने कहा कि मध्यकाल में संत नहीं होते तो आज हिन्दू समाज सुरक्षित नहीं रह पाता। यह विडम्बना है कि अब मेकाले का समाज है, कबीर, सूर, तुलसी, रहीम और जायसी का नहीं। चीन, जापान और रूस आदि अनेक देशों ने अपनी निज भाषा को ही अपनाया और वे विश्व शक्ति बन गये हैं जबकि भारत में भारतीय अंग्रेजी तले दबे हैं और आज का नौजवान सोचता है बिना अंग्रेजी के वैश्वीकरण में कैसे जाएगें। हम 67 वर्ष से अंग्रेजी के पीछे पड़े हैं निज भाषा का नई पीढ़ी को ज्ञान ही नहीं है, तो कैसे संतो के अवदान को ये पीढ़ी सोच समझ पाएगी और देश को नेतृत्व देगी। 

पत्रकार सुरेन्द्र शक्तावत ने कहा कि उपनिषद में युवा पीढ़ी की गैर मौजूदगी समीचीन नहीं है। राष्ट्रीय कवि अब्दुल जब्बार ने अपने काव्य से रस परिवर्तन किया। एक और साहित्यकार ने कहा कि तुलसी साहित्य में राम और रावण दोनों के काम बताये  परन्तु उस साहित्य ने लोगों के मन में चेतना जगाई। व्यवस्था के खिलाफ नहीं लिखा। आज भी व्यवस्था परिवर्तन से काम नहीं चलेगा बल्कि व्यक्ति-व्यक्ति के मन की चेतना को जगाने का कार्य साहित्य और संतो को करना होगा। दक्षिणांचल कर्नाटक से आए साहित्यकार ने आंचलिक साहित्य को हिन्दी में और हिन्दी को आंचलिक भाषाओं में आदान-प्रदान करना होगा ताकि विविध प्रांतों के लोगों के मन में संतो के उपदेश गहराई से बैठे। यह भारतीयता को जोड़ने का असली काम होगा। उपनिषद में चित्तौड़गढ़ के साहित्यकार डॉ सत्यनारायण व्यास, चित्तौड़ी भगवतसिंह और स्वतंत्र लेखक नटवर त्रिपाठी ने भी अपने विचार प्रकट किए। समारोह के विशिष्ठ अतिथि शैलेन्द्र कुमार ने भी अपने विचार रखे। 

समापन समारोह से पूर्व पहले सत्र की अध्यक्षता कर रहे पंजाब के डॉ विनोद कुमार तनेजा ने कहा कि पंजाब से अनेक संतों ने देश को अपनी वाणियों और योगदान से समाज को भाईचारे और प्रेम के संदेश देकर सामाजिक भेदभाव और लिंग की असामनताओं को दूर करने का योगदान समूचे देश में दिया। मुहम्मद हजरत ने युग की मांग समझते हुए बहुदेवत्व का विरोध कर एक ईश्वर में विश्वास व दैनिक उपासना को प्रमुखता दी। सलम में शांति और समपर्ण का संदेश छिपा है।  जिस संदेश का प्रचार किया वह इस्लाम कहलाता है। ईस्लाम, परम शान्ति की वह स्थिति जिसे कोई अपने जीवन में केवल ईश्वर को समर्पित होकर ही प्राप्त कर सकता है। 

इसी सत्र के विशिष्ठ अतिथि जगमल सिंह ने पूर्वोत्तर क्षेत्र मणीपुर के प्राकृतिक सौन्दर्य और चारों ओर पहाड़ियों के बीच इस घाटी की खूबसूरती को बताते हुए कहा कि यह वह क्षेत्र है जहां सब तरह के जीवों की हिंसा जीवन का अंग था। संतो ंके प्रभाव से वहां श्रीकृष्ण प्रेम की धारा का  प्रादुर्भाव हुआ और आज  वहां जन-जन में कृष्ण प्रेम की धारा बह रही है। बाहरी दबावों और अतिक्रमणों के बावजूद वहां पूर्णिमा पर महारास होता है। एक बड़े तबके में मांस खाने पर स्वतः पाबंदी है और सभी हिन्दू रीति-रिवाज़ों और धार्मिक उत्सवों का प्रचलन है। यह प्रभाव बंगाल से आये संतों, भाग्यचन्द्र महाराज तथा अनेक सनातनी लोगों के वहां आने, सनातन धर्म का प्रचार ही नहीं करने बल्कि वहां से समाज में शादी-विवाह के सम्बन्ध जोड़ क एकमेक हो गये हैं। वहां के महाराजह धर्मानन्द ने सनातन धर्म को राजधर्म स्वीकार किया और स्वयं रासलीला में नायक बन कर मृदंग बजाया करते थे। उनकी बेटी विम्बावती नृत्य करती थी यदि संत परंपरा का वहां प्रकाश नहीं होता तो यह क्षेत्र धर्म की मूल धारा से विचलित हो जाता। उस अंचल की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रो. जगमल ने कहा कि अलगाववादी शक्तियां वहां बहुत अधिक सक्रिय है इसलिए आज फिर वहां संतो और देश के हितचिंतको को उस समाज में व्याप्त हो रही अलगाववादी शक्तियों को देश की मूलधारा से जोड़ने का अहं प्रश्न है।

इस अवसर पर कर्नाटक के डॉ प्रभाशंकर ने दक्षिण संत बसवेश्वर ने गीता की कर्म अवधारणा को व कर्म कर्मठता को पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन से अधिक महत्व दिया। उन्होंने जाति-पांति, ऊंच-नीच के भेदभाव व सामाजिक असमानता के विरुद्ध विनम्र तथा सहज भाव से आन्दोलन खड़ा किया। इस तरह कबीर और बसवेश्वर के उपदेशों में कई मानों में उन्होंने समानता व्यक्त की। भीलवाड़ा राजस्थान के  गौरीशंकर असावा ने जायसी के ग्रन्थों में सामाजिक चेतना को रेखांकित किया।

आज रैदास जयन्ती का दिन होने से इस उपनिषद में सभी ने भक्त रैदास को याद किया और दिल्ली के ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल ने कहा कि रैदास का जन्म संवत् 1433 की माघ पूर्णिमा को है। रैदास चमार जाति से थे किन्तु उनकी भक्ति के कारण उस समय के हर वर्ग ब्राह्मण, क्षत्री और वैश्य सभी ने उनके गुरुत्व को हृदयगंम किया। उन्होंने कबीर को उनका बड़ा गुरु भाई बताया। रैदास पर उनकी एक नवीन कृति शीघ्र ही प्रकाशित होने को है। इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्र कुमार ने मीरा काव्य का लोकाधार एवं सामाजिक चेतना विषय पर बोलते हुए कहा कि मीरा का सामाजिक संरचना में अहं योगदान है और उसके प्रत्येक पद में लोकतत्व और लोकमंगल की छाप स्पष्ट है। 

डॉ धर्मदेव तिवाड़ी ने कहा कि यदि असम में धर्मदेव और उनके अनुयायी माधव देव उस कालखण्ड में न होते तो आज वहां भारतीयता की झलक देखने को नहीं मिलती। धर्मदेव के गीत, भजन और नाटकों का ही प्रभाव है कि वहां सम्पूर्ण भारत की चेतना निहित है। धर्मदेव न केवल भक्ति की, उन्होंने गीत गाये, नाटक लिखे और नाटकों का जगह-जगह स्वयं ने मंचन किया। उनके इस प्रभाव से वहां नरबलि, पशुबलि, अनाचार और व्यभिचार पर अंकुश लगा। उनके शरणियां धर्म ने लोगों में आस्था और प्रेम का संचार किया। डूंगरपुर से आई मलिका बोहरा ने गलियाकोट स्थित सन्त सैयदी फखरूद्दीन शहीदी की मान्यताओं और परम्पराओं की प्रस्तुति दी। सन्त नवल माधरी शरण ने चरणदास सम्प्रदाय पद्दति खण्डन-मण्डन का कोई स्थान नहीं है। वे निर्गुण और सगुण को समग्रता देखते हैं और लोकहित की वाणी के उपासक हैं। राजस्थान के खुले विश्वविद्यालय के संदीप कुमार ने सूरदास की सामाजिक दृष्टि विषय पर प्रकाश डाला।इस अवसर पर साहित्यकारों के अलावा, संस्थान के अध्यक्ष भंवरलाल सिसोदिया, नगर के जानेमाने साहित्यकार, समाजसेवी, पत्रकार आदि उपस्थित थे। उपनिषद के तीनों दिनों के 6 सत्रों का संचालन संस्थान सचिव सत्यनारायण समदानी ने किया। 

नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com 
नटवर त्रिपाठी
(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं। पूरा परिचय 

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