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''बहुजनहिताय का अग्रणी भारतीय वांगमय समन्वयवादी है''-डॉ. राजेन्द्र सिंघवी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, फ़रवरी 27, 2013 | बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

दलितोत्थान के बिना राष्ट्रोन्नति नहीं

निम्बाहेड़ा 25 फरवरी
दलितोत्थान के बिना राष्ट्रोन्नति नहीं हो सकती। साहित्यकार शोषितों, पीड़ितों और दलितों की पीड़ा को अपने साहित्य में मुखरता प्रदान करें। उक्त विचार वरिष्ठ साहित्यकार श्रीधर पराड़कर ने विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में रविवार को प्रकट कियें।संगोष्ठी के मुख्य अतिथि इतिहासकार रघुवीरसिंह देवड़ा ने बताया कि दलितों व पिछड़ों का विकास करके ही हम भारत को विकसित राष्ट्र बना सकते है। विषय प्रवर्तन करते हुए युवा आलोचक डॉ. राजेन्द्र सिंघवी ने कहा कि बहुजनहिताय का अग्रणी भारतीय वांगमय समन्वयवादी है और किसी को अछूत नहीं मानता हे तथा सब को साथ लेकर चलने में विश्वास करता है।उन्होंने कहा की अगर भारतीय साहित्य में कहीं ऐसी उक्तियाँ है जो दलितों को ठेस पहुंचाती है तो उन्हें दूर क्या जाना चाहिए।यह भी सच है कि तात्कालिक परिस्थितियिओन में लिखे साहित्य वाली सामाजिक स्थितियां  अब बहुत हद तक बदल चुकी हों।इसलिए उसी साहित्य को आज के परिप्रेक्ष में ठीक मान कर उसकी व्याख्या कहीं न कहीं गलत होगा।बहुत कम रचनाएं ही होती है जो कालजयी हों,बाकी सभी तरह का साहित्य समय सापेक्ष होता है।

अजमेर से आये डॉ. बद्रीप्रसाद पंचोली ने कहा कि साहित्य को जाति और वर्ग भेद में विभाजित करना उचित नहीं है। बडौदा से क्रांति कनाटे तथा डॉ. रानू मुखर्जी ने शोध पत्र प्रस्तुत किये। ‘‘भारतीय वांग्यमय में दलितोत्थान’’ पुस्तक का विमोचन किया गया और श्रीधर पराड़कर तथा डॉ. शौकिन वर्मा को साहित्य श्री सम्मान व चौदह दलित सेवियों, शिक्षकों व साहित्यकारों को अभिनन्दन पत्र, स्मृति चिह्न एवं अंग वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया।  अतिथियों का स्वागत इकाई अध्यक्ष श्री पाल सिसोदिया व कैलाश सिंह  बड़ोली ने किया। कार्यक्रम संहयोजक और हिन्दी प्राध्यापक डॉ रवीन्द्र उपाध्याय ने दुसरे वर्ग के चिन्तकों द्वारा भारतीय समाज में वर्ग-संघर्ष व जाति-संघर्ष की संकल्पना को निर्मूल सिद्ध किया व साहित्य को सामाजिक सद्भाव व समरसता का संवाहक बताया ।

‘‘हौंसले बुलंद रखो घोंसले फिर बन जाएगे’’ पंक्तियों के साथ ग्वायर की कुंदा जोगलेकर ने इसी संगोष्ठी में रात्रि को आयोजित राष्ट्रीय कवयित्री सम्मेलन का शुभारम्भ किया।और सुधी श्रोताओं ने मध्य रात्रि तक काव्य के विविध रसों का आस्वादन किया। इससे पहले दिल्ली की डॉ. पूर्णिमा अग्रवाल ने ‘‘माँ’’ शारदे सुन पुकार ,देश को तू संवार दे ’’ पंक्तियो के साथ सरस्वती वंदना की । कवयित्री सम्मेलन की सूत्रधार क्रान्ति कनाटे ने नारी जीवन की विडम्बनाओं को प्रस्तुत करते हुए कहा कि तुम्हे मेरे कन्धे से बोझ उतारना था, तुमने मेरा सिर उतारकर अच्छा नहीं किया’’। अजमेर की कालिंद नंदिनी शर्मा ने नारी-पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘औरत रेत की मछली है , अपनी खुदी के लिए कसमसाती है। ’’ उनकी कविता ‘‘रिश्तों के बीहड़ में अकेली हूँ ’’पर सारे हाल में  सन्नाटा छा गया ।चेतना  उपाध्याय ने सुनाया कि ‘‘आज का आदमी इतना क्यों बेहाल है, भीतर से क्यों  कंगाल है ’’ 

तथा वाह तन्हाई, आह तन्हाई तेरी क्या बात है ’’से श्रोताओं को गुदगुदाया। रेणुका व्यास (नीमच) ने कविता ‘‘अगर बेटियां मारोगे तो बहु कहाँ से लाओगे़? सुनाकर कन्याभ्रूण हत्या के प्रति सावचेत किया।उन्होने दादरा सुनाकर मालवी लोकगीत की झलक प्रस्तुत की ।श्याम सोलंकी ने कहा ‘‘दुनिया को चलाने वाला क्यों  तू ताले में बंद हो गया ? पूर्णिमा अग्रवाल ने माडर्न बहु द्वारा सास का इन्टरव्यू तथा नशा विरोधी कविता प्रस्तुत की। डॉ. रानू मुखर्जी ने ‘‘बाबा की लाठी के माध्यम से बूढे बाप की पीड़ा प्रकट की।सम्मेलन में अर्चना कुलश्रेष्ठ,मीना मानावत,दीपिका शर्मा, प्रतिमा सहलोत ने काव्य रचनाएं प्रस्तुत की ।

कवयित्री सम्मेलन की मुख्य अतिथि शकुन्तलाकंवर बडौली थी तथा श्रीचद्र कृपलानी ने दीप प्रज्वलित कर उद्घाटन किया। कवयित्रियों का स्वागत नीलम सिंह भदौरिया,श्याम सोलंकी,कविता पारख, मिथिला वर्मा,सुनिता बोहरा, सुमित्रा भाटी, राजकुमारी पारलिया ने किया।  आभार संयोजक डॉ. रवीन्द्र उपाध्याय, इकाई अध्यक्ष श्री पाल सिसोदिया, सहसंयोजक पंकज झा ने प्रकट किया। संचालन क्रांति कनाटे ने किया ।
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