''मीरा और तुलसी की कभी भेंट नहीं हुई और न रैदास तथा हरिदास मीरा के गुरु थे। ''-ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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''मीरा और तुलसी की कभी भेंट नहीं हुई और न रैदास तथा हरिदास मीरा के गुरु थे। ''-ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल


समरसता और समन्वय से समस्याओं का निवारण
कथनी-करनी के भेद को मिटाएं-त्रिलोकनाथ चतुर्वेदी

चित्तौड़गढ़ 23 फरवरी। 

स्थानीय श्रीसांवलियाजी विश्रान्तिगृह में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय उपनिषद का उद्घाटन सत्र  सामाजिक जीवन में मीरा और मध्यकालीन भक्ति काव्य में सामाजिक क्रान्ति के उद्घोष पर चर्चित रहा। इस सत्र में मीरा के जीवन, भक्ति-प्रेम और सामाजिक विडम्बनाओं को रेखाकिंत किया गया और मीरा के जीवन से सम्बन्धित शोधपरक कुछ नई जारकारियां हांसिल हुई।  आगन्तुक विद्धानों ने व्यक्त किया कि दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक के मध्यकालीन संतों ने समूचे देश में भक्ति के साथ-साथ  अपने उपदेशों के जरिए जनमानस में सामाजिक क्रान्ति का शंखनाद किया। 

मां सरस्वती की तस्वीर पर दीप प्रज्जवलन और अतिथियों को माल्यापर्ण तथा शाल ओढ़ा कर सम्मान की औपचारिकता के उपरान्त सामाजिक सन्दर्भों में मीरा विषय पर बोलते हुए उपनिषद में दिल्ली से आये लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल ने कहा कि मीरा विषयक अनेक तथ्यों को अनेक इतिहास और संस्कृति विषयक तथा राजस्थानी स्त्रोतों पूरी तरह खोज बीन नहीं की गई, फलतः मीरा के सम्बन्ध में अनेक विवादास्पद प्रसंग सामने आगए। उन्होंने आज यहां विमोचन किए गए ‘मीराबाई प्रमाणिक जीवनी एवं मूलपदावली’ ग्रन्थ से सन्दर्भों की जानकारी देते हुए कहा कि मीरा के जीवन की प्रामाणिकता नारायणदास नाभा की पदावली में झलकता है। कलयुग में द्वापर जैसा प्रेम की गंगा बहाने वाली मीरा ने भक्ति और प्रेम को एकमेक और एकसार कर दिया था। उन्होंने कहा मीरा और तुलसी की कभी भेंट नहीं हुई और न रैदास तथा हरिदास मीरा के गुरु थे। नरसिंहजी का मायरा भी मीरा का नहीं है। उन्होंने कहा कि मीरा के वैधव्य के कारण तथा मेवाड़ की तत्कालीन सामाजिक विडम्बनाओं से विद्रोह कर मीरा ऐसा भक्ति मार्ग न अपनाती तो आज ऐसी मीरा जो घर-घर हर एक के कंठों में बिराजी है आज हमारे सामने नहीं होती। मीरा शालीनता और समरसता में विश्वास करती थी। उसने घर-परिवार और कुटुम्बियों का कभी अनादर नहीं किया। सांगा से मिली हुई उसे तीन लाख की जाग़ीर थी। उसने उस समय की व्याप्त परिस्थितियों से समझौता नहीं किया और न अपने पति भोज के साथ सती हुई।

उपनिषद के मुख्य अतिथि पूर्व राज्यपाल, कर्नाटक तथा पूर्व नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक, सम्पादक साहित्य अमृत, दिल्ली ने अपने अनुभवों को समेटते हुए कहा कि सन्तों ने अपनी अनुभूतियों को समाज में बांटा और जीवन में उनकी कथनी-करनी में कभी भेद नहीं रहा। फलतः उनके सुझाए मार्ग को स्वीकार किया जाता है। देश में आज जो विषमता और विडम्बना व्याप्त है उसका एक ही कारण है कि हमारी कथनी और करनी में बहुत अन्तर आगया है। उन्होंने कहा कि मीरा के पदों में मीरा की सामाजिक चेतना ध्वनित होती है। सामन्ती व्यवस्था में नारी विमर्श के लिए आवाज़ सुनाई पड़ती है। उस समय भी और समूचे संत साहित्य में सौम्यता और शालीनता के साथ उनकी वाणी मुखरित होती है। सूफी संत और अन्य सन्तों की वाणी में समन्वयता और समरसता के दर्शन होते हैं। इसलिए भक्ति आन्दोलन के युग की लोकमंगल और लोककल्याण की भावना के लिए पंथों और आडम्बरों वाली भेदभावना से उपर उठना होगा तथा हमारी कथनी और करनी के भेद को समाप्त करना होगा। वर्तमान में भी समस्याओं का निवारण इसमें निहित है। 

समारोह के अध्यक्ष जिला कलेक्टर रविजैन ने कहा मीरा ने समपर्ण के जगति को मीरामयी बनाया, वह सब जगह है, संगीत में, भजन में, स्त्री-पुरुषों के कंठो में और यहां तक कि फिल्मों में। मीरा न मेवाड़ की है न मारवाड़ की। वह पूरे देश की है जिसने लौकिक को अलौकिक किया है। मीरा की तरह मध्यकालीन संतों ने देश में चेतना का प्रकाश जगया है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह उपनिषद देश और समाज को एक नई दिशा देगा। विशिष्ठ अतिथि हिन्दुस्तान जिंक के विकास शर्मा ने कहा कि वे प्रबन्धन का कार्य देखते हैं और संतो के वचनों को और उनकी सारभूत वाणी को वे प्रबन्धन का हिस्सा बनाते हैं।

    इस अवसर पर डॉ ओमानन्द सरस्वती ने कहा कि 14वीं सदी के मध्य से 18वीं सदी के मध्य भक्तिकालीन काव्य में जो उपदेशात्मक बातें सामने आती हैं, वे बेबाक उस समय के व्याप्त आडम्बरों, रूढ़ियों और वर्जनाओं पर प्रकाश डालती हैं। स्थाईत्व के लिए और समाज में गहरे तक सही विचारधारा को उतारने के लिए भक्ति काव्य के माध्यम से संतों की यह आवाज दक्षिण में गूंजी, तमिल, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और कश्मीर समूचे भारत में अलग-अलग संतो और पंथों के माध्यम से विस्तृत हुई। कबीर, दादू, पीपा और सूफी आदि लगभग 80 संतों ने प्रखर और बेबाक  आवाज़ में उस काल में व्याप्त सामाजिक भेदभाव व अव्यवस्थाओं को रेखाकिंत किया। 

मीरा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष भंवरलाल सिसोदिया ने अतिथियों का स्वागत किया और कहा कि देश के पतन के कारण मध्यकाल में संतो ने नवजागरण किया। संस्थान के सचिव सत्यनारायण समदानी ने संस्था का परिचय दिया और किए गए कार्यों का उल्लेख किया। सीमा श्रीमाली ने वैदिक ऋचा का गान किया। इस अवसर पर बाहर से आये तीन दर्जन से अधिक साहित्यकार, सेन्ट्रल युनिवर्सीटी के छात्र, शहर के साहित्य प्रेमी, सिन्धी, सिख, मुस्लिम और अन्य वर्गों के धर्मावलंबी तथा गणमान्य नागरिक तथा विद्यार्थीगण उपस्थित थे।    

नटवर त्रिपाठी
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com 
नटवर त्रिपाठी

(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं। पूरा परिचय 


1 टिप्पणी:

  1. यहाँ यह उल्लेख प्रासंगिक है की मेरा तथा राणा प्रताप बुआ-भतीजा होने पर भी आपस में कभी मिल नहीं सके थे.
    मीरा और अकबर-तानसेन की भेंट के विषय में सत्य क्या है? जानना चाहता हूँ।
    Sanjiv verma 'Salil'
    salil.sanjiv@gmail.com
    http://divyanarmada.blogspot.com

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