डॉ. रमेश यादव की कवितायेँ:-हमारा बदन भी एक तरह का भू–भाग ही तो है तुम्हारे लिए - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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डॉ. रमेश यादव की कवितायेँ:-हमारा बदन भी एक तरह का भू–भाग ही तो है तुम्हारे लिए

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


(स्त्री की पीड़ा,दर्द,कराह,संघर्ष और मुक्ति को बयां करती रमेश यादव की  ये 10 कवितायेँ बहुत से सारे मायनों में एक विमर्श की मांग करती है। स्त्री विमर्श को एक नयी दृष्ठि से देखने का प्रयास है इन कविताओं में।बहुतेरी नई उपनाएं यहाँ दृष्टिगत हुई है।फिलहाल कोई वादा नहीं मगर डॉ रमेश यादव का अपनी माटी परिवार में स्वागत करते हैं।-सम्पादक )


हमारा दिल तुम्हारा उपनिवेश और बदन साम्राज्य  
1

हमारा
दिल
तुम्हारा उपनिवेश है
और
बदन
तुम्हारा साम्राज्य
और
तुम
एक साम्राज्यवादी
तुम 
स्थापित करना चाहते हो अपना साम्राज्य
हमारी आजादी  
अधिकारों
भावनाओं   
संवेदनाओं    
संभावनाओं   
ख़्वाबों   
उड़ानों 
मन   
सोच
कोख   
चिंतन और चाहत पर   
करते हो कदम-दर-कदम आघात  
आखिरकार
हमारा बदन भी एक तरह का
भू–भाग ही तो है
तुम्हारे लिए 
जिस पर
तुम स्थापित करना चाहते हो
अपना साम्राज्य... 


2
हमारा 
बदन
तुम्हारे लड़ाई का मैदान है
और
तुम
एक लड़ाके
हमारे बदन से  
ठीक वैसे ही
लड़ते आ रहे हो
सदियों से 
जैसे लड़ता रहा है
अमेरिका
अफगानिस्तान,ईराक और इरान से...   

3

हमारा बदन
तुम्हारे लिए
पैर है
कभी धान का
कभी गेहूँ का
जिसकी
दौरी करते हैं
बैल अपने खुरों से
मैं भी तो तुम्हारे लिए
पैर ही हूँ
और
तुम
दंवरी करता हुआ बैल...

4

हमारा
बदन
तुम्हारे लिए
कभी उपजाऊ खेत है 
कभी खलिहान
जब भी
तुम्हें
अहसास होता है
हमारे
बंजर होने का
बदल देते हो
हमें
ठीक वैसे ही
जैसे बदले जाते हैं कपड़े
बदन के 
तुम्हें पसंद है
लहलहाती फसल
और उर्वरक जमीन...   

5
हमारी कोख
है
तुम्हारा   
नौमासा
फसल
उगाने की जमीन
जहाँ पैदा होता है
तुम्हारे
वंशवाद का बीज  
बदन हमारा
कब्जा तुम्हारा.


6
हमारा बदन 
एक पुल है 
और तुम
उस पर से गुजरने वाला लारी
पुल को कभी रोते हुए देखा है
जिसके ऊपर से गुजर जाते हैं
न जाने कितने बोझ 
पुल भी तो जोड़ता है 
दो राहों को 
दो गाँवों को 
दो शहरों का 
दो राज्यों को 
दो देशों  
और 
दो समाजों को 
हम भी तो जोड़ते हैं  
दो परिवारों 
दो पीढ़ियों 
और 
दो संस्कृतियों को 
सहकर तुम्हारा बोझ 

7
तुम्हारे लिए
हमारा बदन है 
कभी फुटबाल  
कभी खेल का मैदान
जहाँ
जीत सिर्फ
तुम्हारी होती है 
क्यों ?
यह उजाले की तरह साफ है  
प्लेयर भी तुम
रेफरी भी तुम...


8

हमारा
बदन गन्ना है
ताजिंदगी पेरी जाती हूँ
तुम्हारे
कोल्हू में 
गन्ने की तरह
इस पेराई में 
कितना सुख रस मिलता 
तुम्हें
हमारे बदन से
हमारे जीवन से
इसी रस से बनाते हो
कभी गुड़
कभी खांड़
कभी चीनी
हमारा जीवन भी तो 
कभी खीर है और कभी खिचड़ी...   

9
हमारी
आखें हैं
दर्द और पीड़ा से निकली
एक नदी 
कभी जेठ की तरह सूखती   
कभी सावन-भादों सी उफनती     
मगर 
तुम्हें
नज़र आती है झील...
  

10
हमारा
बदन है
श्रम से उपजा 
संघर्षों में तपा
समझौतों से दबा
बोझ से लदा
दर्द से भरा
घाओं से हरा
गुलामी में जकड़ा 
जंजीरों में बंधा

अब मैं
इस बदन को आज़ाद करना चाहती हूँ
स्वतंत्रता की नई जमीन तोड़ना चाहती हूँ
खुले आसमान में उड़ान भरना चाहती हूँ
तुम
उठाओ
कलम-कागज़
लिखो 
गाथा
स्त्री मुक्ति का...


डॉ. रमेश यादव

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,मैदान गढ़ी,नई दिल्ली 
स्थित पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ में 
सहायक प्रोफ़ेसर हैं
समसामियक विषयों पर निरंतर लिखते आ रहे हैं.   
संपर्क: E-Mail:dryindia@gmail.com
Cell 9999446868 

3 टिप्‍पणियां:

  1. अपने समय की बेहद गम्भीर,ज्वलंत और सामयिक स्त्री पीड़ा को अभिव्यक्त करती ये कवितायेँ समाज के कई पहलुओं को उजागर करती हैं...
    'अपनी माटी' हमेशा जमीनी हकीकत को मंच देता रहा है.इस कविता के माध्यम से भी यह काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं जिसमें स्त्री समाज का सरोकार झलकता है.
    लेखक और अपनी माटी को बधाई और ढेरों शुभकामनाएं..!
    सादर !

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  2. आदरणीय डॉ॰साहब,
    आप और अपनी माटी दोनों को बहुत-बहुत आभार!स्त्री देह के दर्द को अनुभव कर पुरुष मन पसीजे ऐसा बिरलै होता है ,वरना लोभ-मोह तो मनोवैज्ञानिक सत्य हैं ही ।चलो यहाँ तक तो गनीमत है । इससे भी आगे वासना की शिकार स्त्री जाए तो जाए कहाँ ? घर के भीतर से बाहर तक भेड़िए ही भेड़िए। लेकिन उस मर्म की अनुभूति एक ऐसा समाज सत्य जिसकी आज के संक्रमण काल में सख़्त ज़रूरत है। उस ज़रूरी संवेदना को जीती और नारी दर्द को पीकर पुरुष को शव से शिव बनाने की क्षमता रखती ये कविताएं निश्चय ही क्रूरता के कुहरे-चेहरे को चीरकर मानव मन के भीतर तक स्फुरण पैदा करती हैं। शत-शत बधाई भाई डॉ ॰रमेश यादव जी!

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