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जितेन्द्र ‘जीतू’के समसामयिक विषयों पर दो व्यंग्य

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, फ़रवरी 28, 2013 | गुरुवार, फ़रवरी 28, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।
                                                                    (1) बजट के बाद के सुख-दुख

इतिहास गवाह है कि वित्तमंत्री ने जब भी बजट बनाया है, गरीबदास नुकसान में रहा है और अमीर चन्द फायदे में। गरीबदास और अमीरचन्द दोनों एक ही शहर में रहते हैं। गरीबदास ‘पावर्टीलेन’ में रहता है जबकि अमीरचंद ‘गोल्डनलेन’ में। बजट के बाद जब भी अमीरचंद अपनी कार में निकलता, गरीबदास की कमर उसे और झुकी दिखाई देती। वास्तव में प्रत्येक बजट पर गरीबदास के कमर की एक हड्डी और टूट जाती। गरीबदास का आर्थिकशास्त्र हर बजट पर गरीबदास की रीढ़ की नई हड्डी टूटने का प्रत्यक्षदर्शी था। अमीरचंद नाक पर रूमाल रखकर जब ‘पावर्टीलेन’ से गुजरता तो उसे वहाँ के निवास देखकर बहुत आश्यर्च होता। वह अपने दोस्तों से फोन पर कहता- ‘कैसे लोग हैं, एक बजट तक डाइजेस्ट नहीं कर पाये?’’
    अमीरचंद की पत्नी प्रतिदिन काकटेल पार्टियों में जाती, नित नई-नई साड़ियाँ पहनतीं, कुत्ते को काजू खिलाती और मस्त-मस्त इठलाती रहती। बजट उसका कुछ न बिगाड़ पाता। बल्कि हर बजट के बाद वह और अधिक तरोताज़ा दिखतीं, उसका सौन्दर्य और अधिक निखर आता। उसका वजन भी बढ़ जाता और वह डाईटिंग की क्लास को पन्द्रह मिनट और ज्यादा देना शुरू कर देती। वास्तव में बजट आने पर ही उसका ‘वेट’ बढ़ता उससे पहले नहीं। मिसेज अमीरचंद को बजट से तकलीफ थी तो बस यही।

दूसरी ओर मिसेज गरीब दास का हाल यह था कि हर बजट के बाद हाथ तंग हो जाता, सब्जी अच्छी नहीं लगती, पानी कडुवा लगता, यात्रायें महंगीं हो जाती इसलिए न तो मायके ही जा पाती और न ही भाइयों के घर रक्षा बंधन पर। पति की आमदनी आधे महीने में ही दम तोड़ जाती, बच्चों की पढ़ाई महंगी हो जाती। इस प्रकार मिसेज गरीबदास को बजट से सैकड़ों तकलीफें थी।

मिस्टर अमीरचंद किसी छुट्टी के दिन गरीबदास से पूछते, ‘‘अमां यार, कार के दाम बढ़ गये, मेरी सिगरेट महंगी हो गयी, हवाई यात्रा महंगी हो गयी, तुम्हें क्या दिक्कत है? तुम तो न सिगरेट फूंकते हो, न कार मेन्टेन करते हो और न ही हवाई यात्रा का शौक रखते हो, फिर तुम्हें बजट क्यों नहीं डाइजेस्ट हो रहा है?’’ जवाब में गरीबदास सिर्फ मुस्कुराकर रह जाता।

अमीरचंद जी आगे कहते- क्या टाइम आ गया। ‘फाइनेन्स मिनिस्टर’ को बेवकूफ समझ रखा है। अगला अपने कीमती वक्त में से भी हमारे लिए समय निकालकर हमारे लिए बजट लेकर आता है और लोग है कि बजट को सम्मान देना तो दूर उल्टा डाइजेस्ट नहीं कर पा रहे है, बजट की ‘वोमिट’ कर रहे हैं।मिसेज अमीरचंद किटी पार्टी में अपनी सह अमीरियों से कहती- सच कितना अच्छा होता है न बजट! चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। हर चीज कास्टलीयर हो जाती है। अब इन चीजों को सिर्फ हम ही खरीद पाते है कोई गरीब नहीं। शापिंग का जितना एन्जायमेंट बजट के बाद आता है, उतना बजट से पहले नहीं; है ना? जवाब में सभी ‘लिपिस्टिक पुतियाँ’ अपना-अपना सिर हिलाती।

इधर मिसेज गरीबदास कुढ़ती रहती। बजट के बाद उनकी रसोई गैस और महंगी हो जाती, चीनी, चाय की कीमतें बढ़ जाती, कैरोसीन के भाव बढ़ जाते। शाम के वक्त वह थक कर बड़बड़ा उठती- ‘‘यह बजट मुआ हर साल ही क्यों आता है। महंगाई हर बार ही क्यों बढ़ती है। वित्त मंत्री को और कोई काम नहीं है क्या? महंगाई बढ़ाये बिना उसे चैन क्यों नहीं पड़ता। हमारी तो रातों की नींद उड़ा देता है यह वित्तमंत्री। भगवान इसकी भी.....।’मिसेज अमीरचंद अपनी कामवाली की सैलरी बढ़ाते हुए कहती- ‘बजट को डाइजेस्ट करना सीखो, बजट से मार मत खाओ।’ फिर वह अपने कुत्ते को पुचकारती-कितना अच्छा होता है न बजट, बिल्कुल तुम्हारी तरह जैसे तुम हम पर नहीं भौंकते हो। तुम केवल गरीबों पर भौंकते हो, बजट भी गरीबों पर ही भौंकता है। कुत्ता जवाब में मिसेज अमीरचंद का मुँह जीभ से चाट लेता। रात को सोते समय मिसेज अमीरचंद पति से पूछती, ‘‘क्यों जी यह बजट हर महीने नहीं आ सकता क्या? मुझे अच्छा लगता है यह।’’

जवाब में मिस्टर अमीरचंद मुस्कुराकर पत्नी का गाल थपथपाते ओर कहते- क्यांे नहीं? मुझे सेक्रेटरी बनने दो, मैं कोशिश करूँगा कि बजट हम महीने आये। अब सो जाओ। और मिसेज अमीरचन्द बजट के स्वप्न देखते-देखते सो जाती।रात में मिसेज अमीरचंद सपना देखतीं- वित्त मंत्री उसके सामने खड़े मुस्कुरा रहे हैं और उससे पूछते है कि हम तुमसे खुश है, बोलो क्या मांगती हो? मिसेज अमीरचंद शीघ्रता से कहतीं- बजट। वित्तमंत्री चौंकते- अभी तो दिया था।

‘वह तो पिछले महीने का था?’ मिसेज अमीरचंद वित्तमंत्री को बताती है।
‘पिछले महीने का नहीं था, वह तो पूरे साल का है।’ वित्तमंत्री हंसते हुए कहते हैं।
‘हमें ऐसा बजट नहीं चाहिए जो साल में एक बार आये।’ मि0 अमीरचंद की संजीवनी इठलाकर कहती है।
और कैसा बजट चाहिए तुम्हें?’ वित्तमंत्री पूछते हैं।
‘एक महीने में एक वाला। सारे साल में बारह।’
‘बारह!’ वित्तमंत्री यह सुनकर गिरते-गिरते बचते हैं। ‘इससे तो महंगाई बहुत बढ़ जायेगी। इस देश के लोगों को साल में एक बजट डाइजेस्ट नहीं होता, तुम बारह मांग रही हो। कुछ और मांग लो।’

‘नहीं। मुझे तो बारह बजट ही चाहिए।’
‘किसकी घरवाली हो- कितनी सेलरी है’ वित्तमंत्री पूछते हैं- ‘कैसे चलाती हो घर का खर्चा?’
    ‘आप सब कुछ जानते है मिनिस्टर साहब कि बजट के बाद घर का खर्चा सेलरी से नहीं चलता। अगर कोई यह कहता है कि वह बजट के बाद भी अपना खर्चा सूखी सेलरी से चला रहा है तो समझिये वह मूर्ख बना रहा है। जो लोग सूखी सेलरी पर निर्भर रहते हैं मिनिस्टर साहब, वो ज़्यादा दिन तक जिन्दा नहीं रहते। घर चलाने के लिए सेलरी नहीं समझदारी की जरूरत होती है। बजट दो प्रभु ताकि महंगाई बढ़े। गरीबदास की बीबी उस दुकान से शापिंग न करे जिससे मैं करती हूँ, वह न खाये जो मैं खाती हूँ, वह न पहने जो मैं पहनती हूँ, उसके बच्चे उस स्कूल में न पड़ें जिसमें मेरे बच्चे पड़ते हैं....।’
उधर गरीबदास की बीबी को भी एक सपना आया और वह चिल्लाकर उठा बैठी। गरीबदास ने देखा वह भयभीत थी और सहमी हुई थी।

‘क्या सपना देखा? कौन था?’ गरीबदास ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
‘वित्तमंत्री’। सुबकते हुए गरीबदास की बीबी ने गरीबदास के कंधे पर सिर रख दिया।


                                                              (2)महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति 

महिलायें लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे सुन्दर वस्तु हैं इसलिये इन पर राष्ट्रीय सहमति बनानी अत्यन्त आवश्यक है। एक बार राष्ट्रीय सहमति का ठप्पा लग गया तो फिर महिलाओं के साथ कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है और कोई भी जीवित व्यक्ति/पार्टी विरोध कारगर नहीं होगा।यूँ महिलाओं के लिये महिलाओं के विरूद्ध अभी भी काफी कुछ पुरूषों द्वारा किया जा रहा है। मसलन, वर्ष में एक दिन महिला-दिवस के रूप में मनाया जाता है उस दिन जहाँ सरकारी और संस्थागत तौर पर कई कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं वहीं ठोक उसी दिन गैर सरकारी और व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं का मानमर्दन/क्रियाक्रम सम्पन्न किया जाता है और इस धार्मिक अनुष्ठान में निर्धन और सम्पन्न दोनों प्रकार के पुरूष बराबरी से हिस्सा लेते हैं।

साहित्य जगत में महिलाओं पर काफी कुछ लिखा गया है और वर्तमान में भी कई जागरूक सम्पादक, महिलाओं पर अपनी-अपनी पत्रिकाओं के विशेषांक निकाल रहे है जो पूरी/अपूरी तरह महिलाओं की निजी समस्याओं और कभी-कभी निजी अंगों पर केन्द्रित होते हैं। इन पत्रिकाओं में लेखिकाओं के लेख भी छपते हैं जिनकी कोशिश यह रहती है कि औरतों की ज्यादा से ज्यादा समस्यायें पाठकों के समक्ष रखी जायें किन्तु उनका निदान पाठकों पर और राष्ट्र पर छोड़ दिया जाये।

मैं चूंकि महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के इस भव्य आयोजन में संयोजक का गैर ज़िम्मेदाराना कर्तव्य निभा रहा हूँ इसलिये सबसे पहले मेरा यह दायित्व बनता है कि मैं अपने मान्य विचार आप लोगों के समक्ष रखूँ।‘साथियों, चूँकि इस लेख को पढ़ने और पढ़कर समझने वाले ज़्यादातर मित्र पुरूष ही हैं और प्रत्येक के घर में एक ना एक अबला स्त्री होती है अतः क्यों न इस राष्ट्रीय सहमति की शुरूआत घर से ही की जाये। घर में पायी जाने वाली महिला चाहे वह बीवी हो, माँ हो या बहिन, उसे इस बात की कड़ी हिदायत दे देनी चाहिये कि वह वस्त्रों में क्या पहिने और क्या न पहिने। तकनीकी शब्दावली में उस पर ‘ड्रेस कोड’ तत्काल प्रभाव से लागू कर देना चाहिये। पति लोग अपनी पत्नी को साड़ी न बांधने के निर्देश दे सकते है क्योंकि साड़ी एक यौनोत्तेजक पोशाक है जिसे बांधकर शरीर के मध्य भाग की नुमाइश होती है। अतः सलवाज कमीज पहनें। कमीज का डिजाइन और उसकी कटिंग पति द्वारा अभिप्रमाणित हो। कड़ाई पेट से ऊपर न हो और गला, ज्यादा नीचा न हो। आस्तीन कुहनी से ऊपर बिल्कुल न जाने पाये क्योंकि इससे मित्रों से खतरा रहता है और पत्नी निज़ी नहीं रहने पाती।

युवा अपनी बहिनों को और वृद्ध अपनी बेटियों को जींस न पहिनने दें। जींस एक पाश्चात्य पोशाक है और यह दूसरे को बहिन-बेटियों पर ही फबती है अपनी पर नहीं।तेजी से बढ़ता बच्चा लोग यह खेल अपनी-अपनी माँओं पर खेल सकते हैं। वे क्या पहिन-ओढ़ रही हैं इस पर गहरी नज़र रखें। बाप से चुगली करें और माँ को मनपसंद कपड़े पहिनने से रोकें। किन्तु तारिकाओं के ग्लैमरस् पोस्टर्स इकट्ठें करें और फिल्में खूब देखें। किसी भी मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति के लिये आमजनों का सहयोग परम् आवश्यक है और अभी तक आमजनों में महिलायें भी आती रही हैं। अतः महिलाओं के सहयोग के बिना महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति बनानी मुश्किल प्रतीत होती है। देश की कामकाजी महिलायें इस दिशा में अपने-अपने पतियों को अपनी-अपनी पसंद के ठोस सुझाव और दिशा-निर्देश दे सकती हैं। उन्हें चाहिये कि वे अपने पतियों के घर के बाहर उठने-बैठने-सोने में एतराज़ बिल्कुल न करें। घरेलू महिलाओं का दृष्टिकोण इस मामले में संकुचित हो सकता है किन्तु कामकाजी महिलाओं का सहृदयता दिखलानी चाहिये। पति को घर पर आने वाली कामवाली पसंद हो तो घर का मामला घर में ही निबटा लेना चाहिये।

राष्ट्रीय सहमति पर मैं जो यह अपनी बात कह रहा हूँ उसे कोरा भाषण मात्र ही न समझा जाये। महिलाओं पर राष्ट्रीय सहमति के व्यापक अर्थ हैं जिनमें प्रमुख हैं, महिलाओं की इज्ज़त उछालने पर राष्ट्रीय सहमति, महिलाओं की आबरू पर राष्ट्रीय सहमति, महिलाओं के चीरहरण पर राष्ट्रीय सहमति आदि-आदि। प्रबुद्ध और योग्य व्यक्ति इनमें अश्लील निहितार्थ भी निकाल सकते हैं। उनका स्वागत है। किन्तु एक बात तो तय है। एक बार समूचा राष्ट्र महिलाओं पर सहमत हो जाये तो फिर उनकी इज्ज़त भरे बाजार में उछालने अथवा पति परमेश्वर द्वारा सरेआम चप्पलों से इनके साथ प्रेम प्रदर्शन करने से कोई नहीं रोक सकता। खुद कोई महिला भी नहीं।’

जितेन्द्र ‘जीतू’

(अभी तक जितेन्द्र  भाई के चार व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं-1 आज़ादी से पहले, आज़ादी के बाद,2 शहीद को पत्र,3 पति से कैसे लड़ें,4 काँटा लगा,एक बाल संग्रह - झूठ बोले, कौआ काटे- के साथ बच्चों पर 3 अन्य किताबें भी आ चुकी हैं। )



ईमेल संपर्क-jitendra.jeetu1@gmail.com


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