मातृ भाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है। - अपनी माटी

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शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

मातृ भाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है।

उदयपुर 

मातृ भाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक है। यह दुखद् है कि राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिलने से आज भी इस वीर प्रसूता धरती पर मातांए, शहीदों की विधवांए,औद्योगिक विकास व प्रगति में योगदान करने वाले प्रवासी राजस्थानी और राजस्थान गौरवशाली इतिहास को लेखन व सृजन से दुनिया के समक्ष रखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया, रानी लक्ष्मी कुमारी चुण्डावत की आत्मा उन्हें आज के दिन कचोरती व दुःख देती होगी। 

उक्त विचार डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विषयक संवाद में राजस्थान मोट्यार परिषद के प्रदेशाध्यक्ष शिवदान सिंह जोलावास ने व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले 10 वर्षो में केलेण्डर के पन्ने बदलते गए किन्तु सरकार की उदासीनता से इस बड़े प्रदेश की आत्मा अपनी मायड़ भाषा और उसका गौरव प्राप्त करने से वंचित रही है। यह नेतृत्व क्षमता की असफलता नहीं है वरन् आम आदमी की मानवीय मूल्यों पर तुशारपात हैं। 

गांधीवादी सुशील दशोरा ने राजस्थानी भाषा की मान्यता की जरूरत बताते हुए कहा कि ‘‘धन खोयो, खोयो धरम, खोई कुल री लाज परभाषा परनार रो, चूम चूम मुख आज’’।भाषा और भूषा दोनों ही संस्कृति के वाहक है इन्हे संजोने की महती आवश्यकता हैं। विद्याभवन पॉलोटेक्निक कॉलेज के प्राचार्य अनिल मेहता ने कहा कि मातृ भाषा बालक की अपनी मेद्या को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। मातृ भाषा के बिना, अपने देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। चांदपोल नागरिक समिति के अध्यक्ष तेजशंकर पालीवाल ने बतलाया कि हमारी मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती हैं और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती हैं। मातृ भाषा आत्मा की आवाज हैं तथा देश को माला की लड़ियों की तरह पिरोती है। 

ट्रस्ट सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने कहा कि मां के आंचल में पल्लवित हुई भाषा बालक के मानसिक विकास को शब्द व पहला सम्प्रेषण देती हैं। मातृ भाषा ही सबसे पहले इंसान को सोचने-समझने और व्यवहार की अनोपचारिक शिक्षा और समझ देती हैं। मातृ भाषा का सम्मान जिन प्रदेशों, देश ने किया है वे साहित्य, समाज व आर्थिक रूप से सम्पन्न, संगठित रहें है। बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा में ही करानी चाहिए। 
सवांद का संयोजन करते हुए ट्रस्ट के नितेश सिंह कच्छावा ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर प्रकाश डालते हुए मातृभाषा के संरक्षण और उसके साहित्य को आमजन तक पहुंचाने की महत्ती जरूरत बतलाई। 

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