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विश्व हिन्दी संग्रहालय एवं अभिलेखन केन्द्र में दस्तावेजीकरण जारी

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, फ़रवरी 28, 2013 | गुरुवार, फ़रवरी 28, 2013


विक्रम विश्वविद्यालयउज्जैन की हिन्दी अध्ययनशाला में नवस्थापित विश्व हिन्दी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र में संग्रहकार्य,सर्वेक्षण एवं दस्तावेजीकरण जारी है। विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हिन्दी के बहुकोणीय रेखांकन के लिए 2007 ई.  में स्थापित इस संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र में विगत एक हजार से अधिक वर्षों के हिन्दी साहित्य के महत्त्वपूर्ण पक्षों को प्रस्तुत करने के साथ ही साहित्यिक पत्रिकाओं के विशेषांक,देश-विदेश के विभिन्न भागों से प्रकाशित हिन्दी समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ, प्रकान सूचियॉं,अनुसंधान सूचनाएं एवं अन्य आधार सामग्री को सॅंजोया गया है।
        
विक्रम विश्वविद्यालय,उज्जैन के विश्व हिन्दी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र के संस्थापक- समन्वयक प्रो.शैलेन्द्रकुमार र्मा द्वारा परिकल्पित इस केंद्र में देशांतरीय हिन्दी साहित्य के साथ ही बसव समितिबेंगलुरु,आंध्रप्रदेश हिन्दी अकादमीहैदराबाद आदि संस्थाओं  द्वारा अर्पित साहित्यस्त्री एवं दलित विमर्शराजभाषा एवं प्रयोजनमूलक हिंदी से संबद्ध महत्त्वपूर्ण प्रकानों को संग्रहीत किया गया है। प्रदर्शनकारी एवं रूपंकर कलाओंसंस्कृत साहित्य से संबद्ध सामग्रीबालसाहित्यपर्यटन साहित्य,स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित साहित्य भी यहां संजोया गया है। हिन्दी की साहित्यिक एवं लघु पत्रिकाओं के दुर्लभ अंकों के  साथ ही वर्तमान में प्रकाशित हो रहीं पाँच  सौ से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के अंक भी अवलोकनार्थ उपलब्ध हैं।  यहॉं स्थापित श्री गुरुनानक अध्ययन पीठ की दृष्टि से भारतीय भाषाओं में भक्ति साहित्य एवं गुरुनानक देव के साहित्य के साथ ही गुरु ग्रंथ साहिब महत्त्वपूर्ण पुस्तकें तथा पत्र- पत्रिकाएं संजोयी गई हैं।

       अपने ढंग के इस प्रथम विश्व हिन्दी संग्रहालय में हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों पर एकाग्र वृत्तचित्रों के साथ ही लोकभाषा में निबद्ध गाथाकथा तथा गीतों की आडियो-वीडियोसीडी संजोयी गयी हैंजिनका समय-समय पर प्रदर्शन किया जाता है।यहॉं प्रमुख साहित्यकारों के चित्र,हस्तलेखपत्र आदि के डिजिटलीकरण की दिशा में कार्य जारी है। संग्रहालय में विभिन्न संस्थाओं साहित्यकारों एवं साहित्यरसिकों द्वारा भी महत्त्वपूर्ण सामग्री अर्पित की जा रही है। विश्व हिन्दी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र के लोक- संस्कृति प्रभाग में मालवी लोक-संस्कृति के  विविध पक्षों पर व्यापक कार्य जारी है। मालवी संस्कृति के समेकित रूपांकन एवं अभिलेखन की दिशा में विशेष प्रयास जारी हैं। यहॉं हिन्दी एवं मालवी के शीर्ष रचनाकारों के परिचयात्मक विवरणकविता एवं चित्रों की दीर्घा संजोयी गयी है । चित्रावणसंजामांडणाकठपुतली कला सहित मालवा क्षेत्र के विविध कलारूपों और भीली जनजातीय संस्कृति से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण सामग्री को भी इस संग्रहालय में संजोया गया है।हिन्दी और उसकी क्षेत्रीय बोलियों विशेषतः मालवी भाषासाहित्य एवं संस्कृति के विविध पक्षों से संबद्ध साहित्यलेख एवं सूचनाओं का दस्तावेजीकरण इस केंद्र में किया जा रहा है।भारत की प्रमुख लोकभाषाओं यथा- मालवीबुन्देलीहाड़ौतीमेवाडीमारवाडीभोजपुरीहरियाणवीकन्नौजीकनपुरियाअवधी,  ब्रजभाषानिमाडीभीलीभिलालीबारेलीसहरियागोंडी जैसी बोलियों के अभिलेखन की दिशा में भी कार्य जारी है।

हाल के दकों में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में एक साथ कई दिशाओं में शोध कार्य हुआ है, जिनमें हिन्दी भाषा-साहित्य एवं संस्कृति के विविध आयामों के साथ ही हिन्दी कम्प्यूटिंग,वेब पत्रकारितादृश्य जनसंचार-माध्यम,शीनी अनुवादराजभाषा हिन्दी आदि के अधुनातन संदर्भ उल्लेखनीय हैं। यहॉं विश्वभाषा हिन्दी के साथ ही लोकभाषा मालवी के साहित्य एवं संस्कृति को लेकर महत्त्वपूर्ण काम  हुआ है और आज भी जारी हैं। यहॉं स्थापित मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति केंद्र के अंतर्गत मालवी और उसकी उपबोलियों-सोंधवाड़ीरजवाडीशोरीउमठवाडीनिमाडी आदि पर महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। यहॉं स्थापित भारतीय लोक एवं जनजातीय संस्कृति केंद्र के अंतर्गत बुन्देलीहाडौतीमेवाडीभोजपुरीहरियाणवीअवधीब्रजभाषानिमाडीभीलीबारेलीसहरियागोंडी आदि पर भी उल्लेखनीय कार्य हुआ है। 

मालवी लोक-संस्कृति के विविध पक्षोंयथा-व्रत पर्व उत्सव पर केंद्रित लोक साहित्यलोकदेवतासाहित्य, पर्यावरण , श्रृंगारपरक लोकगीतहीड काव्यमाच परम्परासंजा पर्वचित्रावणमांडणाविरद बखाणगाथा साहित्यलोकोक्ति आदि पर भी महत्त्वपूर्ण अनुसंधान एवं अभिलेखन जारी है। हिन्दी अध्ययनशालाविक्रम विश्वविद्यालयउज्जैन हिन्दी के साथ ही भारत की विविध बोलियों के लोक-साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में कार्य के लिए कृत- संकल्पित है। इसदिशा में रचनात्मक सुझावों का सदैव स्वागत रहेगा। इस प्रथम विश्व हिन्दी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र के समुचित विकास की दिशा में संभावनाओं के द्वार खुले हुए हैं। इस हेतु देश-विदेश की अकादमिक संस्थाओंसाहित्यकारों तथा विद्वानों से सहयोग का अनुरोध है।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आप का यह संग्रहालय अभूतपूर्व है । इसे कभी देखना मेरा सौभाग्य होगा । मैं भी संग्रहणीय सामग़ी दान कर
    सकता हूँ । मेरी २८ प़काशित पुस्तकों के साथ मेरे द्वारा सम्पादित एवम् प़काशित पत्रिका "सहज कविता " के
    समूचे अंक भी हैं । मैं ने सन १९९४ में सहज कविता का आग़ह किया था । इसे अपनी दो पुस्तकों में दुहराया
    और इस की प़तिक़िया अनेक पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में भी प़कट हुई । यह सामग़ी संग्रहालय को सौंप कर
    मैं बहुत प़सन्नता का अनुभव करूँगा ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय, धन्यवाद आपका आगमन हमारा सौभाग्य होगा। कृपया अपनी ग्रंथ सूची प्रेषित करने का कष्ट करें।'सहज कविता' के अंक भी संग्रहणीय होंगे ।
    आत्मीय स्वस्तिकामनाएँ । मेरा संपर्क पता है-
    प्रो॰ शैलेन्द्रकुमार शर्मा
    प्रोफ़ेसर एवं कुलानुशासक
    विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन [म.प्र.] 456 010
    निवास : 'सृजन'
    407 , सांईनाथ कॉलोनी, सेठी नगर,उज्जैन 456010
    ब्लॉग लिंक :
    http://drshailendrasharma.blogspot.com/
    http://drshailendrakumarsharma.blogspot.com/

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