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डॉ सुनीता की कविताएँ :भांप बन उड़ गयी जिन्दगी बचा रहा नस्तर का आखिरी चुभता हुआ किल

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, फ़रवरी 07, 2013 | गुरुवार, फ़रवरी 07, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


(डॉ सुनीता की ये कवितायेँ अपने ढ़ंग का हस्तक्षेप और बहुत ज़रूरी दखल है। हमें लगता है कि इस तरह से दखल देते हुए हर रचनाकार को अपना फ़र्ज़ निभाना चाहिए।सुनीता जी इन कविताओं में हमें संवेदना  के स्तर पर बहुत गहरे तक झकझोरती है।अपनी माटी में उनका भरपूर स्वागत है -सम्पादक )


१-चलचित्र 
जब उनीदी आँखें खुलीं 
त्रिविमीय जीवन मिले  
मंचासीन हरवाहे से लेकर 
पत्थर तोड़ती सबला  
भूख के लिए बिखलते बच्चे 
और मौसम के नाजुक लम्हे 
नेह जोड़ते बदल,बिजली और बरसात   
यह सब कुछ
शहर में सिर्फ कागज़ी पैरहन में मिले 
जिसे देश-दुनिया ने  
चलचित्र के चक्षु से देखा,सुना और समझा 
उस नन्हीं गौरया के घोसलेनुमा आकाश की तरह 
जिसमें समाये हुए थे 
समयपट्ट पर 
लिखे,गढ़े और रचे गये किरदारों के शिलालेख  
उसी में सन्निहित थे 
अनेकों 
रंग,ढंग और ढ़ोंग भी 
वहीं-कहीं पर नब्ज टटोलती 
गुड़ियों से खेलती एक परी भी थी 
जिसके हाथों में जादू के झूठे छड़ी और सोटे थे 
गौर से जब देखा तो 
लहू के नीले,पीले बदरंग और 
बर्फीले बहारों के झूठे-सच्चे छायाचित्र दिखे 
चमक बिखेर रहे थे 
उन्हीं आधे-अधूरे नजारों में  
नजर आये विश्वमण्डल के सारे रंग 
हकीकत के मंच पर 
अभिनय करते 
माया-मोह से लिपटे लोग
फ्लैस करती रोशनियाँ  
वहां नहीं पहुँची 
जहाँ से धान के बोकले की तरह 
छिल-छिल के उतरती जिंदगियाँ 
रोटी-रोटी को लड़ते 
लाखों-लाख सांसें 
सहमें-सहमें से सड़कों पर 
जीवन बसर करते  
मिटटी-गिट्टी गारे ढ़ोते लोग  
लेकिन उसमें पैर रखने से भयभीत  
कुठिला में रखे 
चावल,गेहूं और अनाज के कई नर्सरी 
कंकड़-पत्थर की तरह
ठोकर खाते लोग भी दिखे... 

२-दंतेवाड़ा 
दंतेबाड़ा के घने जंगलों में 
गोलियों की गूंजती आवाजें 
मासूमों के चैन लूटे  
कराहते बूढ़े-बच्चे दिन-रैन भूखे 
भेद न खोले कोई बेकल भले हों डोलें  
कुहरे से काले मन के बादलों से घिरे 
उस दर्द के खाई की गहराई कोई न जाने 
जहाँ पर पलते हैं विषधर अनेक  
गोबर-खाद से सिंचित फसलों के जगह 
जाने क्यों बारूदें ऊग आयीं...

३- क्यों 
आस्मां से जिरह करते बूँदें 
धरती पर टपकने से पहले 
कुलकुलाते हुए कुछ फुसफुसाए  
नाक-भौ सिकोड़ते हुए चिल्लाये 
ऐसे में  
उस बच्चे से लगे जो 
अभी-अभी धरा पर चरण धरे  
धरते ही चीख-पुकार के साथ ही 
अंगड़ाई लेते हुए 
लेटे-लेटे 
गोल भूमंडल के आकार में कसमसाये 
क्योंकि उसके जेहन में 
माँ की उदर की गोलाई 
लड्डू सरीखे बरकरार थी  
औचक ही बूंदों के विद्रोह 
शब्द मचल उठे  
हौले से सूरज के कलम मुस्कुराए 
बोले नाथ हम क्या करें ?
बादलों ने आज विद्रोह कर दिया 
उस चाँद के खिलाफ 
जो अभी उगा ही नहीं 
बल्कि पफनने के कगार पर है 
खरपतवारनुमा विचारों से लदे-फदे
तारों ने उन्हें बरगलाया 
मुझे लगता है 
उन नाशुक्रों के विरोध में 
जो थाली में खाने के बाद छेद कर देते हैं 
उन छिद्रों से रिसते पानी ने 
एक भ्रम सा तबाही मचा रखा है 
झूठा इल्जाम बादल के 
कोरे बूंदों पर थोपा गया 
क्यों न कोई... 
उनके दर्द को सुने,समझे और फिर समझाए 
यह जीवन चक्र है 
जहाँ से जिंदगी मिलती है 
छिनी नहीं जाती
पेड़ों,पत्तों और पहाड़ों से 
छन-छन कर जाने वाले 
बूंद ही जीवन संसार के पोषक हैं 
क्यों
यह नहीं समझते 
सम्भल जाओ समय रहते 
श्रम ही पहचान है 
निठल्ले,निरीह और निरंकुश 
किसी काम के नहीं माने जाते 

४-
कुछ तो बोलो   
निस्तब्धता के आंचल में बैठकर 
कुछ फ़ैसले सुनाये गये 
फ़ौरन शमशीरें तन गयीं 
उस बाघिन की तरह 
जो अपने ही शावक को मार कर 
किसी आड़े वक्त में निगल जाती है 
कोई कुछ नहीं कर पाता 
बल्कि निश्चेष्ट निगाहों से देखते हैं 
मौका मिलते ही 
तुक्ष प्राण को बचाने के 
जुगत में निकल पड़ते हैं 
परवाह नहीं करते 
किसी अपने का और ना उस खुनी रिश्ते का 
जिसकी डोर गर्भनाल से बंधे थे 

५-नस्तर 
किसी के मिलने पर 
किसी को भुला दिया 
वह भी एक मॉस की लोथड़ा थी 
जिसे मगरूर मक्कारी के भेंट चढ़ा दिया   
आखिरी वक्त में
नस्तर चुभोते अतीत खड़े हुए 
जब सांसें समय से पहले साथ छोड़ रही थीं  
राज खोलते हुए हौले से बोले 
और खौलते हुए पानी में तब्दील हो गये
भांप बन उड़ गयी जिन्दगी 
बचा रहा नस्तर का आखिरी चुभता हुआ किल 

६- साए 
काले रंगों के घने साये से 
बादलों के रंग लगे 
किसी लावण्या के जुल्फों के सघन साये में ढले 
उसमें से तड़कती बिजुरी नुमा 
आँखों के तेज से मिलती-जुलती 
शर्म के चिलमन को परे हटाते हुए आगे बढ़ी 

७-नाता 
डालियों से बिछुड़े हुए 
एक मुसाफिर हैं 
हमारे आँखों के सुकून 
होंठों के मुस्कान ड़ाल 
विरह से बिछुरे प्रेमी हैं
यही 
पानी और पत्ते का गहरा नाता है  

८-जल रही थी
मेरे पेट में जल रही थी 
एक आग 
वह आग धधकी  
जिसके लपटों के लपेटे में जल उठे 
कई बस्तियां 
एक तरफ धू-धू करके 
बस्तियां जल रही थीं 
सब तड़प रहे थे 
लपटों में घिरे बच्चे 
चीख रहे थे 
गौसाले में बंधे पशु 
निःशब्द देख रहे थे 
एक-एक करके सब नष्ट हो रहा था 
दूसरी तरफ सुरक्षा के नाम पर 
मोटी रकम हजम करने वाले हज्जाम  
भ्रष्ट व्यवस्था के रहनुमा 
खड़े-खड़े 
मुख पर रुमाल डाले 
तमाशाई थे 
इतना कुछ हो गया 
लेकिन 
सुबह के अखबार में 
इन हादसों का जिक्र न था 
जलन के बदबू न थे 
न ही चीखते भविष्य के सपने 
अगर कुछ छपा था तो 
उनके कपड़ों में पड़े सिलवटें 
चिल्लर और बालों में उद्धम मचाते जूं 
ताजुब्ब
खबर पहले पन्ने पर थे
इसमें अंतर बस इतना सा था 
कि वह सेलेब्रिटी थी 
बाकी  
झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले 
मैल-कुचैल,कुरूप और गंधाते 
गरीब-गुरबे थे
जिनके न जीने से किसी को फर्क पड़ता 
और न उनके मरने से कोई जगह खाली होती 
जिसे हथियाया जा सके 
जहाँ पर मक्कारी,फरेबी और दलाली के 
दूकान खोले जा सके 

९-निहत्थे 
अक्सर
रात तन्हाई में 
ख्याल तड़पते 
और सोचने लगते 
तुम आते थे 
रात में 
भेडिये की तरह 
दबे क़दमों से चुपचाप
चपल चकोरे की तरह 
चाँद-होंठों पर बोसा देते 
और लौट जाते 
डर के सूरज से  
कभी-कभी करके कत्ल 
निकल जाते हौले से 
हम आये दिन में 
तुम्हारा
करके चले गये शिकार 
देखते रह गए 
तुम्हारे रणबांकुरे
हाथों में लिए अत्याधुनिक हथियार 
होशियारी के धोखे में 
खोये हुए

१०-बिखरे 
नैनों के काले रंगों ने 
बिखरे भावों में घूल के 
शक्ल स्याही की इख्तियार की है 
अक्षरों ने झुक के शुक्रिया कहा 
शब्दों ने हर्फ़-ब-हर्फ़ पढ़ लिया 
दुनिया के चेहरे पर पड़े झुर्रियों को 
संवेदना के वाक्यों में ढ़ालकर 
बाजुओं में कसकर जकड़ लिया 
जेहन में बैठे दरिया के वर्फ पिघल उठे 
परवाज को प्रेरणा ने इस कदर धक्के दिया 
धरती-असमान की दूरियां मिट गयीं 
इसी क्षण कसमसाते अक्षरों ने 
विरोध किया 
मुझे दुनियावी जकड़नों से मुक्त रखो 

११-खुरदरे 
कड़क चट्टानों के खुरदुरे शब्द 
खोल देंगे 
सारे 
दबे शोलों के राज 
मखमल मत समझना 
मजबूत हथौड़े के भार 
घुमा देंगे पृथ्वी के कई चक्कर 
चौखट भूल जायेंगे 
सजा के शक्ल 

१२-लहर
सागर के लहरों सी जिन्दगी 
मेरी कहानी है 
मौजों की रवानी सी 
बनती निशानी है 
कुछ और नहीं 
यातना के आगोश की 
एक सताई रानी है  

१३-एक वह स्त्री 
माँ के बदले में मिली
लम्बें उलहनों,सिखों और शोधों के बाद 
जिसे नाम मिला  
सास 
चेहरा वही,मुहरा वही 
वदन के गठन भी ठीक वैसे ही 
जैसे माँ के शक्ल में दीखता है 
बिलकुल 
शबनमी बूंदों में भींगी 
कोमल कलियों सी 
कमोवेश शब्द के रंग भी वही 
लेकिन 
पद नया 
जिम्मेदारियां जरूरतें और विडम्बनाएँ नई 
कड़कती आवाज,बुदबुदाती सास 
हुनर सब माँ वाले 
मगर 
व्यवहार किसी दूसरे दुनिया के प्राणी सरीखे 
कभी पास बैठती 
मासूम पंखुड़ियों सी खिली-खिली 
कभी कौंधती बिजुरी सी
तड़-तड़ाते हुए चींखती 
कई बार समझ नहीं पाती 
कर्तव्य के रूप हैं 
या 
पद के साथ शामिल समय की अलिखित कहानियां 
जहाँ तक सोच की दुनिया जाती 
स्वरूप कई उभर आते 
जैसे चाँद को निगलता केतु 
ममता के मोह को छलता शब्दसेतु 
सास के स में तब्दील हुई राहू-केतु 
या 
म के महत्व से महरूम कोई बहरूपिया 

१४-एक वह स्त्री 
घूम आती है अंतरिक्ष में 
नापते हुए बादलों के रेशे 
पोर-पोर दुखता है 
फिर भी मुस्कुराते हुए 
अनुभव करती है   
हमारे अंदर भी एक भूमण्डल है 
जिसमें आकार पाते हैं 
भ्रूण
बाद में परिवर्तित हो जाते हैं 
एक विशाल वृक्ष और भूगोल में 

१५-अधूरे 
अधूरे ख्वाबों के 
खरोंचों ने 
जख्म दिए
दर्द दिए 
और आँसू भी
लेकिन अरमानों के 
कुछ टुकड़ों में बटें  
देश,धर्म-कर्म 
और कर्तव्य के
कुछ कडुवे अनुभव भी
वहीँ कहीं 
भस्मों के रूप में 
अनुभूति के प्रथम प्रहर में 
देखे अधूरे 
हिस्से जो शरीर के 
किसी कोन में पल रहे थे
उसे भी 
एक रंग,रूप और आकार दिए  

16-प्रगाश
‘प्रगाश’ के प्रयास पर प्रहार 
जब-जब हुआ 
वादिये-ए-काश्मीर में गूँजती 
बुन्द्कों की करतल ध्वनियाँ तेज हुई 
तोपों के तूफ़ान से जूझती जिंदगियां 
तड़-ताड़ते बिजलियों से आँखें चार की 
आते हुए तूफानों को अपने ही 
घने जुल्फों में कैद किया 
उसके बाद बर्बाद होते गुलों को आबाद किया 
अबाबील की ऊँचे मायारों पर 
बैठकर गुने और कुछ चुनते हुए 
चिराग को रौशन किया 

डॉ सुनीता
सन1982में चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे दिरेहूँ में जन्म। 
डॉ.सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता :स्वरूप एवं प्रतिमान’ 
विषय पर बी.एच.यू. से पीएच.डी., नेट,बी.एड. की हैं। 
अब तक देश के तमाम बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हैं।
ई-पेपर/पत्रिकाएं- शब्दांकन,जानकीपुल,लेखक मंच,नयी-पुरानी हलचल,चर्चा में आदि।
तनिष्क प्रकाशन से निकली पुस्तक ‘विकास और मुद्दे’ पुस्तक में शोधपत्र प्रकाशित। 
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनार,संगोष्ठी में शोधपत्र प्रेषित। 
भोजपुरी/मैथिलि अकादमी में मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम में सहभागिता। 
पेशे से हिंदी में सहायक प्रोफ़ेसर,हंसराज कॉलेज,नई  दिल्ली हैं।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. असली माटी से निकली प्रतिभा को 'अपनी माटी' के मंच पर पढ़कर बेहद खुशी हुई..

    बधाई और शुभकामनाएं ...!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपको छापने में हम हमेशा लालची साबित होना पसंद करेंगे।

    उत्तर देंहटाएं

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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सम्पादक:जितेन्द्र यादव

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