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भारतीय मीडिया और दलित विमर्श:सर्वे आधारित खुलासे

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 16, 2013 | शनिवार, फ़रवरी 16, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।

पुस्तक समीक्षा: मीडिया में दलित ढूंढ़ते रह जाओगे 
मीडिया में दलितों की हिस्सेदारी का सवाल

समीक्षक डा. ध्रुव कुमार


मीडिया में दलित ढूँढते रह जाओंगे।
संजय कुमार
सम्यक प्रकाशन, 32/3, 
पश्चिमपुरीनई दिल्ली-110063
मूल्य: र 75/- (पचहत्तर रुपये)


आज से लगभग एक सदी पूर्व उत्तर भारत में एक संत हुए स्वामी अछूतानंद। उन्हें दलितों के नवजागरण के एक नायक के रूप में याद किया जाता है। आम्बेदकर से पूर्व अछूतानंद ने ही दलितों को पढ़ने-लिखने और छपने के प्रति जागरूक किया। दलितों की पत्रिकाएं निकालीं। उन्हें पोस्टकार्ड पर लिखकर साईमन कमीषन के समक्ष अपनी राय रखने को प्रेरित किया। आदि हिंदू स्कूल, आदि हिंदू छात्रावास खोलकर दलितों में पढ़ने-लिखने का अभियान चलाया। उनके इस आंदोलन से कई लोग अत्यंत प्रभावित हुए और बाल्मिकानंद बांकी, चंद्रिका प्रसार जिज्ञासु, पेरियार सलई सिंह ने दलित जागरण के अभियान को आगे बढ़ाया। 1928 में स्वामी अछूतानंद की डा. आम्बेदकर से मुलाकात हुई और फिर इन दोनों ने मिलकर देष की आजादी के साथ-साथ दलित जागरण के आंदोलन को गति दी। लेकिन एक षताब्दी बाद भी आज लोकतंत्र के चौथे खभ्भे ‘‘मीडिया‘‘ में दलितों की हिस्सेदारी एक प्रतिषत भी नहीं है। जागृत दलित समाज की मीडिया से यह दूरी क्यों ? क्या वह इससे जुड़ना नहीं चाहते ? या फिर  उन्हें जुड़ने नहीं दिया जा रहा है ? आजादी के 65 वर्षों बाद इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब ढ़ूंढ़ने की कोषिष करती एक किताब ‘‘मीडिया में दलित ढूढ़ते रह जाओगे‘‘ ध्यान खींचती हैं। सम्यक प्रकाषन द्वारा प्रकाषित इस पुस्तक के लेखक है - संजय कुमार। वैसे तो संजय कुमार, भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ अधिकारी है, किन्तु उनकी पहचान एक सामाजिक चिंतक के रूप में है। उन्होंने समय-समय पर दलित समाज से जुड़े अनेक विषयों पर लिखकर हिन्दी पट्टी को झकझोरने में सफलता हासिल की है। इस नवीनतम कृति के जरिए उन्होंने एक बार फिर इस महत्वपूर्ण विषय की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।

इससे कोई, षायद ही असहमत हो कि जनमत के निर्माण में पत्रकारिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। लेकिन दलित मुद््दों के पक्ष में जनमत निर्माण तो दूर मीडिया इसे छूने से भी कतराती है। इसका कारण यह है कि मीडिया संस्थानों से दलितों का जुड़ाव कम ही रहा है। मीडिया पर हुए राष्ट्रीय सर्वेक्षण से तो साफ है कि भारतीय मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर दलित न के बराबर हैं। यह पुस्तक बताती है कि राष्ट्रीय मीडिया के 315 प्रमुख पदों पर एक भी दलित और आदिवासी नहीं है। मीडिया स्टडी ग्रुप के सर्वे के अनुसार कुल जनसंख्या में आठ प्रतिषत वाली ऊँची जातियों का मीडिया हाऊस में 71 प्रतिषत षीर्ष पदों पर कब्जा है। इनमें 49 प्रतिषत ब्राह्मण, 14 प्रतिषत कायस्थ, वैष्य और राजपूत सात-सात प्रतिषत, खत्री-नौ, गैर द्विज उच्च जाति-दो और अन्य पिछड़ी जाति चार प्रतिषत हैं। इनमें दलित कहीं नहीं दिखते। पुस्तक में राजनैतिक रूप से जागरूक बिहार की राजधानी पटना के मीडिया घरानों में काम करने वालों का भी सर्वे है। पत्रकार प्रमोद रंजन द्वारा ‘‘मीडिया में हिस्सेदारी‘‘ सर्वेक्षण के हवाले से पुस्तक इस सच्चाई से रू-ब-रू कराती है कि यहां भी मीडिया में सुवर्णों का 87 प्रतिषत कब्जा है। इनमें ब्राह्मण, 34, राजपूत-23, भूमिहार-14 और कायस्थ-16 प्रतिषत है। षेष 13 प्रतिषत में पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और दलितों की हिस्सेदारी है। इनमें सबसे कम लगभग एक प्रतिषत दलित पत्रकार ही बिहार की मीडिया से जुड़े हैं। दलितों-पिछड़ों की पत्रकारिता में हाषिये पर मौजूदगी से लेखक चिंतित-व्यथित दिखते हैं। उनकी पीड़ा पुस्तक के प्रायः प्रत्येक अध्याय में झलकती है। पूरी किताब 14 अध्यायों में बंटी है। इनमें ‘‘कब दूर होगी दलित की षिकायत‘‘ ‘‘मीडिया में दलित ढूंढ़त रहे जाओगे,‘‘ ‘‘मीडिया भी जाति देखता है, ‘‘दलित सवालों की अनदेखी, दलितों से मुंह फेरती मीडिया,‘‘ ‘‘मीडिया में दलित आंदोलन के लिए जगह नहीं, ‘‘सोषल मीडिया पर दलित विरोध, ‘‘ और जाति की जय हो‘‘ षीर्षक वाले अध्यायों में ऐसे आंकड़े और उदाहरण भरे पड़े हैं जो इस सच्चाई से पर्दा उठाती है कि मीडिया में दलितों की स्थिति लगभग नगण्य हैं। कुछ अपवादों को छोड़़कर एक तो दलित कहीं दिखते नहीं और जो हैं भी, वह उपेक्षित हैं। ‘‘रेडियो से जुड़ते महादलित‘ और दलितों का हो अपना मीडिया‘‘ षीर्षक अध्यायों में लेखक ने उम्मीद की किरण खोजी है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के वेबसाइट सरकारी मीडिया में दलितों की हिस्सेदारी की जो तस्वीर पेष करती है, उससे यह पता चलता है कि सरकारी नीतियों के तहत सरकारी मीडिया में तो दलित आ रहे हैं, लेकिन निजी मीडिया में दलित नहीं दिखते और भविष्य की गुंजाईष भी नहीं दिखती।

पुस्तक यह सच्चाई बताती है कि दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाषाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेष भी पा लेता है तो उसे षीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढूंढें जाते हैं।

पुस्तक ऐसे कई दिलचस्प आंकड़ों के साथ यह सच्चाई सामने लाती है कि खास जाति के संपादक को अपनी जाति में ही प्रतिभा दिखती है। जाति-प्रेम का यह सिलसिला संपादकीय विभाग तक ही नहीं बल्कि गैर संपादकीय विभाग में भी दिखता है। अब ऐसी स्थिति में संजय यह सवाल एक चुनौती के रूप में समाज के समक्ष रखते है कि ‘‘मीडिया में दलित ढंूढ़ते रह जाओगे,‘‘ तो क्या गलत है।

पुस्तक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका और दलितों के प्रति उपेक्षा को जर्बदस्त तरीके से सामने लाती है और ध्यान खींचती हैं। पुस्तक उस ‘‘हीरा डोम‘‘ को समर्पित है, जिसने एक सदी पूर्व दलित संवेदना को कविता में पिरोकर दलितों की आवाज बुलंद करने की कोषिष की भी। कुल मिलाकर पुस्तक विचारोत्तेजक है और इसलिए पठनीय भी है।

          समीक्षक: डा. ध्रुव कुमार
          पी0 डी0 लेनमहेन्द्रूपटना-800006
          मो0- 08603335354
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