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प्रदीप तिवारी की गज़लें:मुमकिन नहीं है कि न आये अब भी उबाल

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, फ़रवरी 13, 2013 | बुधवार, फ़रवरी 13, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


प्रदीप तिवारी
युवा हैं। 
दमोह (म.प्र.) में जन्मे हैं।
फिलहाल अकादमिक तौर पर बी.ई (सिविल), एम.टेक हैं।
भाषाई तौर पर हिन्ही, उर्दू, अंग्रेजी, बुन्देलखण्डी में दखल रखते हैं।
गजल, कहानी, कविता करते रहे हैं।
सम्पर्क-9755621252,
ईमेल-pradeept_2007@yahoo.co.in





एक 

      कभी खरीदता है कभी बिकता है
      वो शख्स जो फरिश्ता है।

ये तो हद है कि पलक भी झपक ली मैंने
माँ अभी तक मुझसे गुस्सा है।

जब भी गिरता है दोष मुझे देता है।
महज दुश्मनी नहीं है ये कोई रिश्ता है।
      
      मजहब की बाती और सियासत का तेल
नफरत का दिया क्या कभी बुझता है।

      मुमकिन नहीं है कि न आये अब भी उबाल
खून पानी सा कहीं से तो रिसता है।

वो कहते हैं हर चीज में खामी निकालता है
मैं बुरा हूँ, चलो अच्छा है।

      अब भी इबादत है, बुजुर्गों की नसीहत।
यहाँ सूरज कहाँ से उगता है।

      मुल्क की बरबादी में तुम क्यों रहो पीछे
हिन्दु मुसलमान सबका बराबर का हिस्सा है।

      अच्छाई बुराई से कभी हारी नहीं 
ये कहावत है कि कोई किस्सा है।

      चूल्हे नहीं घर जलते हैं ‘प्रदीप’
      अब धुआँ जब कहीं से उठता है।

                                             
                                           दो 
ये मौसम जो दिन-ब-दिन सर्द होता है।
किसी की मौज होती है किसी को दर्द होता है।

मैं अब भी प्यासा था और वो उफनाने लगा,
समंदर और दरिया में यही तो फर्क होता है । 

ये जख्म-ए-मोहब्बत है अलग है इसका इलाज भी,
इस बीमारी में मलहम से बेहतर मर्ज होता है  ।

सुना है सरहद पे था आया नहीं माँ को चिता देने
इक कर्ज से बढ़कर इक फर्ज होता है । 

अब अक्सर कूलते मिलता है जो पहले कहता था
जिसको दर्द नहीं होता वही मर्द होता है।

दुआ और दाद देने मे भी कंजूसी इतनी
तुम्हारी जेब से जैसे कुछ खर्च होता है  ।

सुनो कानून अब ये खुदखुषी पे पाबंदी क्यों
हमारे फायदे से भला, तुम्हें क्या हर्ज होता है  ।

‘प्रदीप‘ ये नाजुकए नादानए मासूम सा इष्क
बड़ा बेईमान होता है, बड़ा बेदर्द होता है । 

                          तीन 
पब्लिसिटी ना सेम्पेथी दी उसे
       वो भूखा है रोटी दो उसे । 

रात भर रोता है, लोरी थपकी के लिए,
नींद नही ंतो, बेहोशी दो उसे ।

वो बेईमान लालची, भूखा दूल्हा
बेटी नहीं, बोटी दो उसे ।

महज खुशामदी से खुश नहीं होता
ये जीव नेता है कुर्सी दो उसे ।

बड़ा गरीब है, रोटी भी जुटा नहीं पाता
तुम दो चार अपनी आँख के, मोती दो उसे ।

उजाला लाएगा एक दिन देखना
वो चिराग है तेल वाती दो उसे ।

दिल को बच्चे सा बहलाने के लिए
हसरतो की कोई टाफी दो उसे।

तुम्हारी अक्ल तुम्हारी डिग्रियाँ तुम्हे मुबारक
      वो जाहिल है तो पेन कापी दो उसे ।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. धरातल और हकीकत की बात बहुत अच्छे ढंग से पेश की है,,सार्थक प्रयास,,,

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये तो हद है की पलक भी झपक ली मैंने
    माँ अभी तक मुझसे गुस्सा है,,,,.बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं

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