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यह जो व्यवस्था है उसमें आस्था रखना अज़गर के मुंह में हंसते-हंसते जानबूझकर खुद प्रवेश कर जाना है

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, फ़रवरी 06, 2013 | बुधवार, फ़रवरी 06, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।

              (यहाँ प्रस्तुत कवितायेँ विषय के स्तर पर अदल-बदल के सामने आती अनुभव होती है। एकाध कविता को छोड़ दे तो ये सारी प्रेम कविताओं की श्रेणी में की गयी ठीकठाक कोशिश है।बहरहाल इनका स्वागत और अब गेंद पाठकों के पाले में फैंकता हूँ।-सम्पादक )


1. प्यार करने वाली औरत

प्यार करने वाली
ऐसी होती होगी
वैसी होती होगी
कैसी होती होगी,
निःसंदेह, वह मशीन नहीं होती होगी
किसी आंतरिक ऊर्जा से
वह रेंगकर, खिसककर आती होगी
सूखे शरीर को सहलाकर
अपने गीले होठों से चूमती होगी
शरीर के हर सूखे प्रदेश में
अपने नलकूपी हाथ फेरकर
सींचती होगी
अपनी अंगुलियों के छोर से
प्रेम ऊर्जा उड़ेलकर

प्यार करने वाली औरत
महाकाव्य के दूरस्थ पौराणिक प्रदेशों से
मचल-मचल चलकर आती होगी.
 
2. बाज आ जाएं!
वह प्रेम, सौंदर्य और आदर्श नहीं हैं कि
कविताएं लिखी जाएं

जीवन की सहजता नहीं है कि
नाटक लिखे जाएं

तथ्यात्मकता इतनी तरल हो चुकी है कि
उन्हें समेटकर
उपन्यास लिखना भी दूभर हो चुका है

कवियों से कह दो कि
वे चाट की दुकान खोल लें

नाटककारों से कह दो कि
वे कोई और धंधा करें
यानी, पान-मसाला बेचें
या, पाठशालाओं के गेट पर चूरन

उपन्यासकारों से नहीं कहूंगा कि
वे आत्महत्या कर लें
लिहाजा, वे गाँवों के खेत-खलिहानों में
खेतिहर बन जाएं
और अपने बच्चों से कह दें कि
वे उन बच्चों से लंगोटिया याराना निभाएं
जिनमें शनैः शनैः
छात्रनेता, गुंडा, डान और नेता
बनने के अच्छे लच्छन मौज़ूद हैं.
 
       3.बकवास तंत्र 

ज़ाहिर है
इस बकवास तंत्र में
घुट-घुट कर जिंदा रहना
नरभक्षियों के मुंह पर
एक जोरदार तमाचा है

यह जो व्यवस्था है
उसमें आस्था रखना
अज़गर के मुंह में
हंसते-हंसते जानबूझकर
खुद प्रवेश कर जाना है

यह तंत्र भी क्या है
स्वार्थ की कैंची से कटते
निर्दोष-निरीह कपड़े जैसा है
जो अपने मुताबिक़ उसे
खद्दर के कुरते-पाजामें में
ढाल देती है
जिन्हें हमारे शहंशाह
पहनते हैं रोब से
और गलीचेदार राजसभाओं में
मंडराते हैं

4. प्रेत-शक्ति
दिशाहीन, निर्बोध
भौतिक बंधन-स्पंदन से मुक्त
जिस प्रेत को
सुना है, देखा है
आतंकित आँखों से चखा है
वह समय ही तो है
जो क्षण-रूपी नखनुओं से
खरोंच रहा है
वह सब कुछ
जो भौतिक है

अभौतिक से
भौतिक का क्षरण
यही है प्रेत-शक्ति
यह है समय-शक्ति.
 
5. मोबाइल और गर्ल फ़्रेंड

अच्छी है मोबाइल
छूने से पहले
कोई शर्त नहीं रखती
चूमने से पहले
कोई नखरे नहीं दिखाती

कभी कहती भी नहीं कि
चलो, किसी फ़ाइव स्टार में
करते आएं डिनर

या, आओ! चलें लांग ड्राइव पर
किसी महानगरीय इलाके में
गुजार आएं आज की रात
रंगरलियों की मस्त बाँहों में

होठों पर लगाने से पहले
नहीं मांगती टिप्स
हजार दो हजार की

देर आने पर रूठती भी नहीं
मनाए और प्यार किए जाने के लिए

बहुत अच्छी है मोबाइल
पॅाकेट में शांत पड़ी रहती है
कंपन से गुदगुदाने
और गुनगुनाने का
कोई भाड़ा भी नहीं वसूलती.

6. शब्दों की पीढ़ियाँ

एक अरसे से
शब्दों की बदलती हुई पीढ़ियाँ
तलाश रही हैं
आदमक़द मायने

इस तलाश में
जेबकतरे अर्थ की लिबास में
शब्द, शब्द नहीं रहे
मुखौटे पहन
विदेशी तहज़ीब में
वे समझाते हैं
इतरों से सुवासित अर्थ
जिसके सम्मोहिनी इंद्रजाल में
होश खोती जा रही हैं
बुरके ओढ़ी शब्दाभ्यंतर की
सांस्कृतिक संकल्पनाएं
जिन पर चढ़ती
परत-दर-परत
शैतानी तहज़ीब की चकाचौंध निकिल
कायांतरित करती जा रही है
श्यामल अतीत को
कुष्ठग्रस्त वर्तमान में

च्च च्च च्च
उन दुर्लभ शरीफ़जनों की तरह
जो शब्द नहीं रहे
लिसढ़-लिसढ़कर चलते-घिसते हुए
दुर्घटनाग्रस्त हो कालकवलित हो गए
व्यस्ततम दुर्गम सड़कों पर
या आत्महत्या कर बैठे
प्रताड़ित हो रही नव-ब्याहताओं की तरह
या बदलाव के बारूदी विस्फ़ोटों से
राख और धूल चाट बैठे,
उन्हें फिर से जिलाया जा रहा है
बिजली का झटका देकर
उनकी डूबती तंत्रिकाओं को
झनझनाया जा रहा है
सरेआम नचाया जा रहा है
जानबूझकर नंगी नाच रही
बेशर्म औरतों की तरह
नुमाइश बनाया जा रहा है
खिड़कियों पर बैठी सजी-धजी वैध वैश्याओं की तरह

ऐसे ही नवजात शब्दों को
मंचों पर प्रदर्शित किया जा रहा है
बाक़ायदा उन पर उनके पुरखों की भस्म पोतकर,
बेशक! ये नवजात शब्द घिसी-पिटी भाव-भंगिमाओं में
याद दिलाते हैं उनकी
जिनकी देशभर वर्षगाँठ मनाई जाती है
लाल किलों पर चढ़कर
झंडे फ़हराकर
रंगीन गुब्बारे उड़ाकर
अभिव्यक्ति के दमघोटूँ आसमान में



डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com)

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1 टिप्पणी:

  1. आमतौर से मैं प्रेम कविता नहीं लिखता हूँ। प्रेम का जो भौतिक रूप आज समाज में दिखाई दे रहा है, वह एक बुद्धिजीवी के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। स्त्री-प्रेम का आत्मिक रूप कहीं नज़र नहीं आ रहा है। मुझे अंग्रेज़ी के मेटाफ़िज़िकल पोएट जॉन डन की कविताएं याद आ रही हैं जिनमें यह परिकल्पना की गई है कि प्रेम शारीरिक संबंध से होकर आध्यात्मिक संबंध में तब्दील होता है। पर, मुझे इस सिद्धांत में कतई विश्वास नहीं है। मुझे शंका है कि औरत अपने प्रेम कभी भी निश्छल नहीं होती। शायद, यही शंका उपर्युक्त एक कविता में ज़ाहिर की गई है। बहरहाल, ये कविताएं, सम्मानित पाठकगण पढ़ॆं और प्रतिक्रियाएं करें!

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