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दो नई लघु कथाएँ और सुबोध श्रीवास्तव

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, फ़रवरी 20, 2013 | बुधवार, फ़रवरी 20, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।



सहूलियत
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'आज फिर तुम देर से आए....?' फैक्ट्री में कदम रखते ही एक तेज-तर्रार स्वर उसका कलेजा हिला गया। 
मालिक साहब को देखकर वह कुछ संभला फिर बोला, 'सेठजी, कल से ऐसा नहीं होगा। पैदल आता हूं न, इसलिए देर हो जाती है।'
मालिक साहब कुछ पल चुप रहे फिर बोले, 'ठीक है। हम तुम्हें एक साइकिल अपनी ओर से दे देते हैं लेकिन अब देर नहीं होनी चाहिए।'
और दूसरे ही दिन उसे फैक्ट्री की ओर से नयी साइकिल मिल गयी, सेठ का मुंह लगा चपरासी जो था। अब वह पहले से और अधिक देर से फैक्ट्री आने लगा।
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सुकून
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सारे घर में कोहराम मचा था। परिवारीजनों की दहाड़ें सबके कलेजे कंपा रहीं थीं। कोई अपनी छाती पीट रहा था, कोई सर पटक रहा था। वह भी जी भरकर रोया। उसका बाप मर गया था।
पूरे घर का पेट बाप की कमाई पर ही तो चल रहा था। उस पर दोहरी चोट लगी थी। शाम को अर्थी फूंक कर वह घर लौटा। उसका मन अब बहुत हल्का था। लगा जैसे उसकी सारी चिन्ताएं दूर हो गयीं। उसके बाप के दफ्तर के बड़े साहब ने उसे एक हफ्ते बाद नौकरी पर आने को कहा था, बाप की जगह पर....!
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सुबोध श्रीवास्तव,
(नई कविता, गीत, गजल, दोहे, कहानी, व्यंग्य, रिपोर्ताज और बाल साहित्य  रूचि है। रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण के बहुतेरे अवसर प्राप्त रचनाकार)
संपर्क:-'माडर्न विला', 10/518,खलासी लाइन्स,कानपुर,(उप्र)-208001,मो.09305540745,ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ये दो लघु कथा अनकही बात को भी कह गई । इनको पढ़कर जो भाव पैदा हुए उनको शब्‍दों में अभिव्‍यक्‍त करना आसान नहीं लगा । आपको इसके लिये साधुवाद ।

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