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बड़ा फर्क है तन और मन के बुढापे में Vaya डा. मनोज श्रीवास्तव

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, फ़रवरी 11, 2013 | सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।

   (डॉ मनोज की इन कविताओं में जहां स्वयं 'कविता' का मानवीयकरण किया गया है वहीं दूसरी तरफ रचना और रचनाकार के बीच के तादात्म्य को भले तरीके से संभाषित किया है।समय के आगे कौन चल सका है जैसे सार्थक वाक्यों को फिर से सार्थक करने की एक कोशिश भी यहाँ आपको दिखेगी।-सम्पादक )

(1)यातना

एक दु:सह्य यातना है
कविता को प्रसवित कर
खुद को कविता से अलग करना
और इससे पृथक
अपना स्वरुप पहचानना,
यातना है
अपनी रामकहानी के लिफ़ाफ़े को
दीमकग्रस्त कागजों के बीच दबा
दुनियावी तस्वीरों की
चित्रवीथि लगाना

बेहद दुष्कर शल्यक्रिया है
कविता से अपने अक्स को
काट-छांटकर
पके घावों की तरह
निकाल फेंकना--
उन कूड़ों में
जिनमें असामाजिक प्रेमियों के
राग-रोमांस के छीजन तक
इन कटे-फटे घावों के
कतरनों से परहेज़ करते हैं

दस्तावेज़ी सिंहासनों पर
जनसाधारण के लिए
कविताओं का पाठ्याभिषेक करना
कवि की एक आत्मघाती गुस्ताखी है,
जबकि सिंहासनारूढ़ कवितायेँ 
निर्ममतापूर्वक उसके तन्हा अक्स की 
अस्मिता पर फब्तियां कसती हैं,
उसे खुद के प्रति संवेदनशून्य होने पर 
उसके बौने होते कद को
उन कद्दावरों के सामने प्रस्तुत करती हैं
जिन्हें उसने अपने शब्दों और स्वरों से 
इस काबिल बनाया है
कि वे अपने को
चतुर्दिक प्रदर्शित कर सकें 

उफ़्फ़! कितनी बड़ी यातना है
अपनी हस्ती का  
कविताओं के हाथों 
मटियामेट होना,
कविता की सेहत के लिए 
अपनी संक्रमणशील बीमारी को
उससे बचाना
जबकि कविता उससे ही 
गर्भवित होकर
जन्मतीपलती और बढ़ती है
जवान होती है
और कलाकार के घातक विषाणु 
उसे छू तक नहीं पाते हैं. 
 
 (2)समय के समक्ष ढलान पर मैं

भीमकाय समय के कदमों पर
मैं खडा हूं,
हांखडा ही हूं
जमीन कोड़ता हुआ
और वह बरसों से वहीं खड़ा है
अपनी हथेलियों पर
भूतभविष्य और वर्तमान
की तीनों गेंदें
बारी-बारी से उछालते हुए
टप- टप टपकाते हुए

और मैं हूं कि--
ढलता ही जा रहा हूं
च्च-च्चच्च-च्च 
बुरी तरह ढलता जा रहा हूं

साल-दर-साल बूढे होते प्लेटफार्मों पर,
बरसों से खाली पडे खलिहानों और  
पानी को तरसती नदी तल पर,
वह खडा है--उसी तरह
अपने सिर  से आसमान भेदते हुए
अपनी काली-चमकदार मूंछों पर ताव देते हुए
यासडक-किनारे गुमटी के पास
गरमा-गरम चाय चुसुकते हुए
और ढल  रहे लोगों के हाथ में
अखबारों की सूर्खियां पढ़ते हुए

कप की चाय के बासी होते-होते
ये सूर्खियां रोज़ धुंधलाती जाती हैं
जबकि समय
अपने कसमसाते बदन पर
टी-शर्ट और जीन्स पैंट डाले
टप-टप टपाटप टहलते  हुए
ढ़लती  ज़िन्दगियों का
ज़ायज़ा लेता जाता है

नहीं पता
वह कब तक यहां जमा रहेगा
ताश खेलते हुए मवालियों पर
फ़ब्तियां कसते रहेगा,
जबकि मेरे साथ ढ़लता जाएगा
मेरा ख्यालजो बाद मेरे  भी
बूढे लोगों के दिमाग में बना रहेगा-- 
जेब में हाथ डाले हुए बाबुओं के होठों  पर
तिल-तिल कर दम तोड रही
       ---सिगरेट की तरह।


(3)बूढा होता मन

बूढा होता है
तन ही नहीं
मन भी

जीवन के धूप-छांव
कोशिकाओं पर लिखते हैं
उम्र की इबारतें

किन्तुज्ञेय नहीं होती
अकोशकीय मन की आयु

तन की वृद्धोन्मुख कोशिकाएं
हौले-हौले मृत्युनाद करती हैं,
शोकातुर होते हैं अपने प्रियजन
जब मृत्युदेवी झुर्रियाँ सहलाती हैं

परशोचनीय नहीं हैं
मन की झुर्रियाँ,
ये  ही हैं गर्भस्थल
कितने बुद्धईसा और गाँधी के

बड़ा फर्क है
तन और मन के बुढापे में

मन का बुढापा तन से नहीं आता
कालचक्र से नहीं आता
विस्थापन और थकान से भी नहीं आता,
आता है तो सिर्फ
दांतेदार अनुभव-चक्रों में
सतत-अनवरत पिसकर।



डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com)

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