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कौन है जो एकाकीपन में घुस आता है इत्मिनान से Vaya डा. मनोज श्रीवास्तव

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 23, 2013 | शनिवार, फ़रवरी 23, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)
आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com)




(1 ) एकांत में भीड़ से मुठभेड़


बड़ा दुष्कर है
एकांतनाद से जूझना
उबरना और वापस
सामान्य ज़िंदगी में आना

कौन है जो एकाकीपन में
घुस आता है इत्मिनान से
अपराजेय युद्ध छेड़ने
और चाबुक लगाते हुए
अपने पीछे घसीट लाता है
चिल्ल-पों करती
चिचियाती-हुंकारती
जश्न और ग़मी मनाती
भीड़ का हुज़ूम

मुश्किल नहीं है एकांतितता में
बेचैन भीड़ में हरेक को पहचानना
उनका ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना
इसलिए, हर एक को चलता करो
किसी के चेहरे पर
ज़्यादा वक़्त जाया मत करो
वर्ना, वह तुम्हारी सुकून के बेड पर
आ-पसरेगा
फिर, तुम्हारी बाँह पकड़
खींच लेगा तुम्हें
अपने अफ़सानों के साथ
हमबिस्तर करने के लिए

तुम्हारी प्राइवेसी में उसकी दख़लंदाज़ी
हर लेगी तुम्हारा मनस्वी सुख-संतोष
तुम्हें उकसा ही लेगी गुप्त सूचनाएं लेने के लिए
तुम्हारी गर्लफ़्रेंडों से नाज़ायज़ ताल्लुकातों के बाबत
तुम्हारी गुप्तता नंगी और बेशर्म हो जाएगी
ऐसे में एकांत से बाहर आते ही
तुम आँसुओं का मानसून रोओगे

अरे! कितना बेरहम है एकांतनाद
वह सपनों को सरेआम एनकाउंटर कर
ठूँस देगा तुम्हारी कल्पनाओं की बोरी में
बेज़ा घटनाओं का भूँसा
तब, वह एक भी सपने का पौध उगने नहीं देगा
तुम्हारी ऊसर कल्पनाशीलता में

सो, तुम फटाक बंद कर दो
अपने समय का वह फ़ालतू द्वार
जिसमें वह घुस आता है
आवारा बिल्ली बन
जो छज्जे पर चोरी-छिपे डोलती रहती है
रसोई के निर्जन होने तक
और लपक पड़ती है
भयभीत भगौना-भरे दूध पर
या, सोंधी-तली मछलियों की दावत उड़ाने

अगर चाहते भी हो भीड़ से मिलना
उसे ऐसे ही एकांतनाद का चीड़-फाड़कर
गुजरने दो स्मृति-सड़कों से
जैसे ओवरब्रिज़ से ट्रेन गुजर जाती है
और तुम सड़क पार करते हुए
उससे बेख़बर रहते हो

(2) कमबख़्त हिन्दुस्तानी!

आगे थोड़ा और आगे औरऔर आगे उफ़्फ़! 
और आगे क्यों नहीं अरे-रे-रेरुक क्यों गए
ज़मीन पर आँखें गड़ाए क्यों खडे हो
हाँहाँकोशिश करो
सिर उठाकर सामने देखो
शाबाश! देखो ही नहीं क़दम भी आगे बढ़ाओ
ओह्! सिर दाएँ-बाएँ क्यों करने लगे सामने तो खुला रास्ता है
क्यों खुले रास्ते से डर लगता है
देखो! ऐसे करोगे तो...
शाम हो ही चुकी है
अब रात का घुप्प अन्धेरा भी पसरने लगेगा
फिरकैसे आगे जा सकोगे
आह! फिरवैसा ही करने लगे
खड़े ही रहोगे
अरे बैठ भी गये लेकिनलेटना मत! च्चच्चच्चलेट गये परसोना मत
हाय! आँखें क्यों बंद कर ली धत्त! खर्राटे भी भरने लगे
काहिल कहीं के!
अजगर ही बने रहोगे
कमबख़्त हिन्दुस्तानी!


(3 )पीछे जाने का मतलब?

क्यों पीछे?
उफ़्फ़! और पीछे?
इतना पीछे?
अरे, इतना और पीछे?
आखिर, पीछे जाने का मतलब!
अरे-रे-रे-रे! बड़ी बेवकूफ़ी है--
आगे देखते हुए पीछे चलना,
ठोकर से गिर जाओगे!

रुक भी जाओ!
हाँ-हाँ, रुककर समकोण पर देखो!
फिर आगे बढ़ो!
निगाहें गड़ाओ!
अरे, डरो मत!
कतराओ मत!
आगे सीधा रास्ता है
जो तुम्हें गंतव्य तक ले जाएगा,
बस! कहीं मुड़ना मत!

शाबाश! ऐसे ही आगे बढ़ो!
आगे, आगे ही बढ़ते जाओ!
हाँ-हाँ, तेज कदमों से,
आह! चौराहे पर रुक गए?
रुककर सोचने लगे?
अभी कहा था, ना कि
सीधे ही जाना है।
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