'समकालीन सरोकार' का मार्च-2013 अंक:आखिर क्यों लिखती हैं स्त्रियाँ - अपनी माटी

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शुक्रवार, मार्च 08, 2013

'समकालीन सरोकार' का मार्च-2013 अंक:आखिर क्यों लिखती हैं स्त्रियाँ


शब्दों में धड़कती समय की नब्ज़ 
                                                   समकालीन सरोकार
                                     विचार, साहित्य और अनुसंधान का जनपक्षधर मासिक पत्र 
बीते छ: माह में ही अपनी सशक्त शुरुआत, सम्पादकीय और प्रबंधकीय कुशलता के साथ चयनित लेखकों को छापती हुई मासिक पत्रिका 'समकालीन सरोकार' का पाठकों ने बहुत स्वागत किया है।यथाशक्ति अपनी जनपक्षधरता के लिए  पर्याप्त रूप से प्रयासरत पत्रिका बहुत आगे तक का रास्ता तय करेगी ऐसी आशा है।भयंकर किस्म के बाजारवाद के बीच बहुत कम विज्ञापनों के बाद भी अपने सार्थक कंटेंट के साथ बनी हुई इस पत्रिका की पूरी मंडली को बधाई।

मार्च-2013 अंक इसकी यात्रा में एक बड़े पड़ाव के रूप में अंकित किया जाना चाहिए जहां विश्व महिला दिवस के आसपास इस अंक में सम्पूर्ण सामग्री महिलाओं पर केन्द्रित हैं। 'आखिर क्यों लिखती हैं स्त्रियाँ ' शीर्षक से देश की चयनित महिला रचनाकारों से एकत्र सामग्री छापी गयी है।इस विशेष अंक का सम्पादन रजनी गुप्ता ने किया है। अंक में मैत्रेयी पुष्पा, नमिता सिंह, वन्दना राग, अर्चना वर्मा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, गीताश्री अनामिका अनिता भारती, पूनम सिंह, विपिन चौधरी, वीभा रानी, राजी सेठ, दीपक शर्मा जैसे लेखिकाएं शामिल हैं।

इसी अंक में सम्पादकीय 'दूसरा पहलू' और 'दो बातें' के अलावा सिनेमा और रंगमंच वाले कॉलम में राहुल सिंह, पुंज प्रकाश को पढ़ा जा सकता है। अंक में विनोद तिवारी, विमल कुमार, कृष्ण प्रताप सिंह का लेखन भी शामिल किया गया है।


पत्रिका संबंधी दूजी ज़रूरी जानकारियाँ

पंजीकरण 
UPHIN 2012/46217
ISSN 2319-5185

प्रबंध सम्पादक -रमेश चन्द्र मिश्र 
प्रधान सम्पादक-सुभाष राय
सम्पादक-हरे प्रकाश उपाध्याय
सम्पादन सहयोग-चंद्रेश्वर

सम्पादकीय संपर्क 

विनीत प्लाज़ा,फ्लेट नंबर-1 
विनीत खंड-6 
गोमतीनगर,लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मो-09455081894,08756219902
ईमेल-samaysarokar@gmail.com

मूल्य 

25/-एक अंक 
300/-वार्षिक 
500/- संस्थाओं के वार्षिक

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