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ओम थानवी की फेसबुकी टिप्पणी बहुत कुछ कहती है।

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 10, 2013 | रविवार, मार्च 10, 2013

अगर आप यह सोचते हों कि मैं आदर्श का पुतला हूँ तो भूल कर रहे होंगे। न चाहते हुए भी कई बार समझौते करने पड़ते हैं। रेलवे का टिकट कोटे से मैं पक्का करवा लता हूँ, भला किस अधिकार से? बच्चों को भरती करवाने को किसी अधिकारी ता राजनेता की मदद ले सकता हूँ, अस्पताल में बगैर बारी के इलाज करवा सकता हूँ, सरकारी अतिथि गृह में रात गुजार सकता हूँ, किसी अधिकारी की कार से कहीं आ-जा सकता हूँ। न, इससे कोई इनकार नहीं। ... लेकिन मानता हूँ कि कहीं जाकर रेखा खींचनी होती है।


चंडीगढ़ में था, तब एकाधिक मुख्यमंत्रियों ने उनके कोटे से रियायती भूखंड लेने का खुद प्रस्ताव किया। पत्रकार के रुआब से आज लो, कल कई गुना दाम पर बेच दो। सरे आम भ्रष्ट आचरण का पैगाम। एक को मैंने हँसते हुए कहा कि ले भी लूँ तो उस पर मकान कैसे खड़ा करूंगा, पैसा नहीं है! उन्होंने 'समस्या' का निराकरण फौरन सुझाया: आप दो प्लॉट लीजिए, एक को बेचकर उसके सहारे पहले पर घर बना लीजिए। ठीक से याद है, यही बात हुई थी। हमारे संबंध बाद में ऐसे बिगड़े कि मुझे ठिकाने लगाने के लिए उन्होंने जनसत्ता को सरकारी विज्ञापन बंद किये, फिर इंडियन एक्सप्रेस का पंचकूला का प्लॉट भी निर्माण में विलम्ब बताकर कुर्क कर लिया। कहना न होगा, एक्सप्रेस ने मेरा ही साथ दिया।



हाल में ऐसा प्रस्ताव फिर मिला। एक सदाशय और शुभचिंतक मित्र का सुझाव था कि कोई विशेष योजना है जिसमें बड़े-बड़े पत्रकार जमीन ले चुके हैं, वे भी जिनके पास पहले से सरकारी कोटे के प्लॉट थे, तो मैं संकोच क्यों करूं। मजा यह कि जिन्होंने लिए, कईयों ने लेकर बेच भी दिए हैं।



सच बताऊँ? एक बार तो ईमान डिग गया। कुछ ही वर्षों में रिटायर होना है, आगे कैसे बसर होगी? मगर इस ऊहापोह से बाहर निकल आने के बाद मन बहुत हल्का है। शायद साफ भी। ईमान डिगता है तो आत्मविश्वास भी डिग जाता है। युवतर पत्रकारों को मेरे इस अनुभव पर गौर फरमाना चाहिए। दावे से कहता हूँ, कम साधनों में भी पछताएंगे नहीं।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. ओम जी आप पत्रकार कहते किसे हैं , सरकारी विज्ञप्ति लिखने वाले को, ..... आज इस देश में कितने पत्रकार निर्धारित योग्‍यता रखते हैं ? पहले तो न्‍यूनतम योग्‍यता ही बता दिजीऐ..?. देश में कितने पत्रकार हैं ? बात कडवी जरूर हैं पर ये देश राजनीति से नही पत्रकारिता के नैतिक पतन से दिशाहीन है पत्रकार कोई भी हो सकता है इसीलिऐ हाकर से लेकर मालिक तक सब वसूलबाज बन गऐ हैं थानवी जी ,बाते तो बहुत की जा सकती , सरकारे पुरे अखबार और चैनल के दफतर चला रही हैं व्‍यूरो प्रमुख अपने आदमी बैठा रही , पत्रकारिता विश्‍व‍ विघालय के कूलपति इनके प्रचारक हैं ......पर सवाल ये हैं कि मिशन कह कर डाक्‍टर, वकील तो नही बनाया जा सकता , बजाय टालने के इनका कोई निर्धारित मापदण्‍ड , योग्‍यता ,वेतनमान तो तय हो फिर बात इनके आचरण की हो जिसमें थानवी जी आप की जमात विफल है .......................

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  2. बहुत ज़रूरी सवाल उठायें हैं आपने टिप्पणी में

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