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'' मैं रमेश उपाध्याय से प्रेरणा पाता रहा हूँ और आज भी पाता हूँ।''-विश्वनाथ त्रिपाठी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 10, 2013 | रविवार, मार्च 10, 2013

रमेश उपाध्याय की नयी पुस्तक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’  के लोकार्पण के अवसर पर विचार-गोष्ठी 

1 मार्च, 2013 को नयी दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में सुप्रसिद्ध साहित्यकार रमेश उपाध्याय की आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्शों की नयी पुस्तक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ का लोकार्पण वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने किया।


अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि मैं रमेश उपाध्याय से प्रेरणा पाता रहा हूँ और आज भी पाता हूँ। उनका जीवन-संघर्ष और साहित्य सृजन आज के युवा लेखकों के लिए ही नहीं, हम जैसे उम्र में बड़े लेखकों के लिए भी प्रेरणादायक है। इस पुस्तक में उनके जीवन-संघर्ष और साहित्य सृजन का परिचय हमें ऐसी भाषा में मिलता है, जो जीवन के सत्य और समाज के यथार्थ को व्यक्त करने में सर्वाधिक सक्षम भाषा है। उनके लेखन में अभिधा प्रमुख है, जो सदा से ही बड़े साहित्य की एक प्रमुख विशेषता रही है। महान लेखन में बहुत-सी बातें सूक्तियों के रूप में कही जाती हैं। रमेश उपाध्याय की इस पुस्तक में जगह-जगह ऐसी सूक्तियाँ मिलती हैं, जो भूमंडलीय और भारतीय साहित्य की श्रेष्ठ परंपरा को सार्थक रूप में आगे बढ़ाती हैं। त्रिपाठी जी ने ऐसी कई सूक्तियों के उदाहरण पुस्तक में से दिये। 


वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि यह आत्मकथा नहीं, आत्मकथात्मक पुस्तक है, तो यह इस पुस्तक की विशेषता है। इसमें रमेश उपाध्याय का साहित्यिक और वैचारिक संघर्ष तो सामने आता ही है, उनका संघर्षशील व्यक्तित्व और यथार्थवादी रचनाकार का रूप भी स्पष्ट होता है। उन्होंने हिंदी साहित्य को भूमंडलीय यथार्थवाद की जो नयी अवधारणा दी है, वह भी इस पुस्तक से स्पष्ट होती है। रमेश उपाध्याय हिंदी के ऐसे रचनाकार हैं, जिनके कृतित्व में अपने समय और समाज के सर्जनात्मक और वैचारिक दोनों रूप बड़ी प्रखरता के साथ सामने आते हैं।
संज्ञा उपाध्याय 

प्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई ने पुस्तक में संकलित आत्मकथात्मक और साहित्यिक विमर्शों की चर्चा करते हुए इस पुस्तक के नये रूपबंध के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इसमें साहित्य की विभिन्न विधाओं के बीच की आवाजाही एक नये और सार्थक रूप में दिखायी पड़ती है।

युवा कहानीकार अल्पना मिश्र ने पुस्तक की कुछ ऐसी विशेषताओं को उजागर किया, जो आज के हिंदी साहित्य में दुर्लभ हैं। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक से पता चलता है कि रमेश उपाध्याय परिवार को अपनी सर्जनात्मकता का केंद्र मानते हैं और यह भी पता चलता है कि किस प्रकार सप्रयास उन्होंने अपने परिवार को जनतांत्रिक और सर्जनात्मक परिवार बनाया है। पुस्तक में संकलित ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’ शीर्षक रचना का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे परिवार का निर्माण करना भी एक सर्जनात्मक कार्य है, जो रमेश उपाध्याय ने किया है।


युवा आलोचक राकेश कुमार ने रमेश उपाध्याय की रचनाओं के संदर्भ देते हुए ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ में संकलित रचनाओं की वस्तुगत और रूपगत विशेषताएँ बताते हुए कहा कि रमेश उपाध्याय हिंदी के अकेले ऐसे रचनाकार हैं, जिनके कृतित्व में अपने समय और समाज के सर्जनात्मक और वैचारिक दोनों रूप बड़ी प्रखरता के साथ सामने आते हैं।विचार-गोष्ठी से पहले रमेश उपाध्याय के दो आत्मीय मित्रों--प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय तथा प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने उनके विषय में अपने कुछ संस्मरण सुनाये और कहा कि रमेश उपाध्याय अपने समय के सबसे जीवंत और कर्मठ साहित्यकारों में से हैं।

पल्लव 
इस कार्यक्रम की एक विशेषता यह भी थी कि यह रमेश उपाध्याय के इकहत्तरवें जन्मदिन पर आयोजित किया गया था। अतः वक्ताओं और श्रोताओं ने उनके जन्मदिन पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ दीं। कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत भाषण ‘कथन’ की संपादक संज्ञा उपाध्याय ने दिया और कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन युवा आलोचक पल्लव ने किया।

प्रस्तुति:अंकित
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