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छायाँकन:अमित कल्ला,जयपुर

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, दिसंबर 15, 2013 | रविवार, दिसंबर 15, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 

चित्रकार:अमित कल्ला,जयपुर 
(युवा और विचारवान चित्रकार अमित कल्ला, राजस्थान के जयपुर शहर से ताल्लुक रखते हैं. असीम सम्भावनाओं के खजाने के रूप में देशभर में अपने कला कौशल का लौहा मनवा रहे हैं.मॉडर्न आर्ट के ज़रिये वे जीवन से हुए अपने संवादों को बहुत सादे रूप में हमारे बीच रखते हैं और अपनी यात्रा में आयी मुश्किलों और कठीन सवालों को भी इसी जाजम पर रखते हैं.अब चर्चा और संवादों की बारी के लिए गेंद हमारे पाले में है.अमित के लिए चित्रकारी का यह शऊर महज खालीपन को भरने मात्र का शग़ल नहीं है. हमारी नज़र में यह भी अपने ढंग का प्रखर हस्तक्षेप है जिसे अमित ने बखूबी निभाया है. उनका विस्तृत परिचय यहाँ उपलब्ध है.-सम्पादक)

चित्रकारी और जीवन अनुभव को लेकर अमित कल्ला के विचार 
(1)
पेंटिग्स कई स्तरों पर संवाद करती है, वह अपने परिकर को बखूभी रच सतरंगी रंगों की उर्जा से पकाती है उसे। हर रोज़ जब भी मैं उसके सामने  होता हूँ तब-तब मुझसे कितना कुछ कहती हैरेखाएं अपने बन्धनों को खोलकर कितनी सहजता से आँखों की गहराइयों में उतरती, चकमक में छिपी उस आग - सी सीधे अपने आप को साबित करती मालूम पड़ती है। बहुत कुछ तय भी तो होता जहाँ "होने न होने के परे" के सच जैसा कुछ ।

जी हाँ ! आपाधापी के ये गणित और व्याकरण ज्यों की त्यों धरे रह जाते हैं, कितने बे-बुनियादी मालूम पड़ते सारे, ऐसे में उसका आकाश तो तय ही होता है, समर्थ है वह ओर क्यों न हो अनन्य भव की सम्पूर्णता जो है उसमे । अधूरे तो हम मनुष्य ही ...आधे अधूरे। सच ही तो है कि हमारे अपने भी बहुत से अबूझे सवाल होते हैं, जिनके उत्तर ये दीवारें देती हैं।  हम क्यों नहीं देख पाते  कैनवास पर उकेरे गए उस बिंदु के आगे, कितना कुछ होता है जिसके पीछे; होती उन अजन्मी विस्थापित दिशाओं  की कहानियाँ जिनका सीधा - सीधा ताल्लुक हम से है, खुली आँखों से देखे गए हमारे उन सपनों से हैं ।

(2)
नित्य कुछ नया रचने की कोशिश ही किन्ही अर्थों में अपने आप को हर रोज़ तोड़कर फिर से जोड़ने के मायने हैं ...मसलन अपनी कला को साधने की जद्दोज़हद करते हुए सृजन कर्ता के सामने कितनी सारी चुनौतियाँ होती हैं, जो शब्द और रंगों जैसी ही जिन्दगी का एक अहम हिस्सा होकर, समय रहते उसकी बैचेनी को एक सार्थकता देती है । परोक्ष - अपरोक्ष रूप में जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है या फिर किसी सोचे समझे चुनाव का हिस्सा ।


जी हाँ इस बात के अपने कई तार्किक पक्ष हैं जिन्हें एक कलाकार या फिर कोई कला-मनोवैज्ञानिक ही ज्यादा बेहतर ढंग से अनुभव कर सकता है।  इस यात्रा में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसका समाज में रहने वालों को सामान्यतया आभास भी नहीं हो पाता । जिन्दगी के रंगमंच पर कितनी ही बार हम उन्हें जन्मते मरते देखते हैं जहाँ उनकी वह उर्जा देह को पार कर असंख्य रूपकों में अभिव्यक्त होती नज़र आती है। किसी विषय वस्तु का अपने आप में होना ही उसे पाना होता है, यह कोई दर्शन के तत्त्वमीमांसा की बात नहीं बल्कि हम मनुष्यों की सामान्य चेतना से कहीं ज्यादा सरोकार रखती बात है, कभी - कभार बहुत से तंत्रों को एक साथ नियोजित करने वाले उस मन के निजान्तर्गत होने वाले सूक्ष्म संवाद की दिव्यता का एक हिस्सा भर।

(3) 
कला के माध्यम से हम अपने आप को अभिव्यक्त करते हैं, कितना मुश्किल होता है वहाँ कुछ छुपा पाना, सत्य किसी न किसी रूप में बहार आता ही है ।  कई - कई स्तरों पर अपने होने के समय से संवाद करती हमारी अवचेतन दिव्य मौलिकता, असामान्य मुखरता से कितना कुछ कहती है यक़ीनन उन छूटे हुए  अक्षरों को आकारों में पिरोकर प्रतीकात्मक बिम्बों के सहारे समूचे कैनवास पर बिखर जाती है ।

सीधे तौर पर हम कुछ धुंधला - सा आभास भर कर पाते हैं लेकिन यह बात तय है कि उन आभासों के मतले बड़े गहरे होते हैं । जी हाँ बहुत मुश्किल होता रंगों को लगाकर कुरेदना, परतें जहाँ एक दूसरे से सटकर बिछी होती हैं, ऐसा लगता, मानो समुद्र की लहरें अनायास ही बिना अपनी तासीर को बदले रेत बन गयी हो, लहर तो लहर ही ... बहना फितरत में जो उसकी, हर बार मर-मिटकर नया जन्म पाना, नयी देह के साथ यात्रा करना , सच जहाँ टूटकर फिर से नया बनने की कहानी लगातार चलती है।

साहिब हम तो सिर्फ अनुमान भर लगाते हैं, उन स्वप्नों को चरखी में समेटने सरीखा कोमल अनुभव तो किसी और के ही  हिस्से में जाता है। रंग रेखाओं के सहारे खड़े होकर अपनी छायाँ को पाकर हजारों हज़ार आँखों में धुंध की मार्फ़त घुलने लगते। वाकई किनारे ऋणी हैं, ऋणी हैं वे सारे, किनारे बनकर घुलने तक किये गए उस सफ़र के, उन लहरों के, और उन खामोश रंगों के जो आजीवन उसी फलक की चुनिन्दा पायदानों पर चढ़े अपनी चमकीली रौशन आँखों से हमेशा की तरह भिगोकर तराते हैं हमे। 

अमित के मॉडर्न आर्ट में रचे चयनित चित्र

 

 
 
 
 

 
 
 
 

 
 

 
 
 
 
 
 
 
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