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डायरी:माणिक

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 15, 2014 | शनिवार, फ़रवरी 15, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )               फरवरी-2014 

चित्रांकन:इरा टाक,जयपुर 
विविध विचार:(1) हड़माला के सत्ताईस बच्चे:सुनील है तभी से बकरियों में व्यस्त है जब से छोटा भाई हेमराज अपने बहिन के ससुराल चला गया.पैंतालीस दिन की अनुपस्थिति से कुछ दूर है.एक चम्पालाल है जिसे 'विनोद' कहो तो चहक उठता है.तीसरी मधु है जिसका घर स्कूल के ठीक सामने है हर दो कालांश बाद कब घर को थप्पी दे आती है पता तक नहीं चलता है.चौथी ममता है जिसकी छब्बीस जनवरी के लिए लाई गयी नयी-की-नयी ड्रेस उत्सव में पहनने के बाद मम्मी ने फिर से पेटी में रख दी है.ये ऊपर के चारों पांचवीं में पढने के नाम पर पोषाहार खाते हैं.सभी को मालुम है पास होते ही दूसरे स्कूल में जायेंगे.उन्हें ये भी मालुम है वहाँ भी पोषाहार है.कुछ ढंग के माड़साब है.कक्षा छ: है.छात्रवृति है.स्कूल की पैदल दूरी है.

चौथी में दो है.दोनों लड़कियां,दोनों डफर.दोनों बातूनी.दोनों चिड़चिड़ी.एक पूजा है जिसे साध पाना नौ दिन के व्रत रखने के बराबर का तप है.एक बेचारी सीधी है कंचन.बेवजह हंस देना उससे पूछे गए प्रश्न का उत्तर है.तीसरी में आठ बच्चे हैं.अंजली दिखने में छोटी है जब भी आती है सज-संवर कर आती है साथ में अपनी छुटकी बहन माया को लाती है.एक भारती है जिसके कान-नाक फोड़ा दिए है.उसकी एक भी बात उसके ननिहाल 'गंगापुर' के ज़िक्र के बगैर नहीं होती.एक शिवलाल है एकदम गोताखार लड़का.हर तीन दिन बाद एक दिन गायब रहता है.शांत मगर शातिराना रवैया अख्तियार करने में दो मिनट.तीसरे मिनट में तो उसकी फ्रीक्वेंसी देसी गालियों पर आ टिकती है.एक भेरी है जो अब ड्रॉपआउट की सूची की शान बढ़ा रही है.एक सुगणा है जिसे पढ़ने के नाम पर साँप सूंघ जाता है.ज्यादा किया तो चूंटी भरते ही दे धड़धड़ रो पड़ती है.एक चन्दा है जिसे हर सातवे दिन घर जाकर न्यौतना पड़ता है.है सीधी-सटक मगर घर से निकले तब ना.एक सुमन है जो बाकी तमाम लड़के-लड़कियों से दिखने में लम्बी और समझदार है.सुमन एकदम घरेलू अंदाज़ में स्कूल की देखभाल करती है.

दूसरी में भी एक से एक अजूबे.एक कन्हैया लाल है जिसे जब देखो नाक में आया सेबड़ा अवर कर रखता है.नाखून एकदम कोयले के इंजनछाप.एक सीमा है जो रोज स्कूल आती है.ननिहाल में ही रहती है.उसका घर ,स्कूल के ठीक पीछे ही है.छूट्टी के बाद भी स्कूल की तबीयत का ख़याल सीमा ही रखती है.रीना भी सीमा की पक्की वाली दोस्त है.पेन्सिल-रबर-शोपनर वाली दोस्ती से आगे.एक केसर है चम्पालाल की बहन.भोलेपन का मानक स्वरूप.एक मिनट लगातार देख लो रो पड़े.होमवर्क का शाब्दिक अर्थ उसके लिए वह नहीं है जो हम पढ़ाकू टाइप के लोग समझते हैं.एक गोरी है मा-अल्लाम लडकी.सभी शिकायतों में उसका अपराधलिप्त होना तय माना जाए ऐसे हालात है.पहली में चार चुज्जे टाइप के बच्चे हैं.सभी मस्त.सभी लाडले.निशा,फोकरू,संतरा और हीरालाल.एक से एक बढ़कर.क्या कहें.ये ही है ताज़ा तस्वीर हड़माला के सत्ताईस बच्चों की.

(2)यूट्यूब के सहयोग से तिल्लाना की रिकोर्डिंग को आधार बनाकर बेटी अनुष्का अपने मन से नृत्य कर रही हैं.मैं कभी तिल्लाना सुनता हूँ तो कभी बेटी को देखता हूँ.कभी अब तक जीवन में देखी तिल्लाना की सजीव प्रस्तुतियों की स्मृतियों में खो जाता हूँ .बेटी दर्पण देखती हुयी नृत्य में मगन है.कभी मुझे देख लेती है तो मुस्करा देती है फिर वापस नृत्य में जुट जाती है.डॉ एम् बाल मुरली कृष्णन कर्नाटकी शैली में गा रहे हैं इधर शब्द न मैं जानता हूँ न अनुष्का.मगर आनंद लेने में हम दोनों ही एक दूजे को पीछे छोड़ने की होड़ में हैं.भारत की शास्त्रीय विरासत के साथ हमारा यह एका बड़ा आल्हादकारी है.उधर आवाजें इतनी दूर तक जा रही है कि रसोई में रोटी बेल रही नंदिनी भी इससे अछूती नहीं है.नंदिनी को ये भी मालूम है कि अनुष्का क्या लटके-झटके लगा रही होगी.हमारा ये एकल परिवार काल-समय के झंझट में पड़े बगैर जब भी मन करता है किसी भी राग को सुनने बैठ जाता है.संगीत से तबीयत में चार चाँद लग जाते हैं.कोई आश्चर्य नहीं कि हम कभी भी तन्दुरे वाले कबीर भजन से अश्विनी भिड़े देशपांडे का शास्त्रीय राग सुनने लग जाएं.पता नहीं मगर हाँ सच यही है कि ये संस्कार हमारी रुचियों में घुसपैठ कर चुके हैं. चीजों को समझने के कई आचार-विचार हमने इन्हीं संगतों की जाजमें बिछाते-उठाते सीखें हैं.संगीत और नृत्य की साधनाओं के ताप समझने में हमने कई दिग्गज कलाविदों का रोड पर सर्दियों और बरसातों में इंतज़ार किया है.कई बार बेनर टाँगे और पोस्टर चिपकाए हैं

(3)प्रेस विज्ञप्तियों में मंच संचालन(आयोजन की दिशा और दशा के सूत्रधार)करने वालों के नाम लिखना अव्वल तो ज़रूरी नहीं समझा जाता,लिखें भी तो अंतिम पंक्तियों में कौने में कहीं चपेक दिया दिया जाता है जो बाद के स्तर पर अखबारी सेटिंग में कभी हाशिए में तो कभी कॉलम या पेज की सेटिंग में हटा दी जाती है.मंच संचालक, आयोजन के ख़त्म होते ही गैर-ज़रूरी हो जाते हैं.आयोजन के दौरान संचालक की आवाज़ पर सभी मोतबीर लोग करतब दिखाते हैं या करतब का बखान संचालक करता है.मगर आयोजन की समाप्ति पर मंच संचालक जाए भाड़ में.इक्का-दुक्का लोग सहृदयता दिखाकर चुटकीभर तारीफ़ भी चस्पा कर जाते हैं.भला हो उन कम लोगों का जिनके बूते ये सूत्रधार टाइप के लोग खुद को सर्वाइवकर जाते हैं.मगर स्वाभिमान को एक कौने में रखकर फिर यही संचालक उसी आयोजन में माइक जा पकड़ते हैं.सोचें तो मुआमला अपने कई स्तरों पर गंभीर है.मगर जब हम अपने देश के मामले में ही गंभीर नहीं है तो यह तो बहुत सामान्य और गैर ज़रूरी मसला है

(4)अमूमन सामाजिक,साहित्यिक,सांस्कृतिक और धर्मनिरपेक्ष भाव वाली पंजीकृत संस्थाओं के पास धन की कमी होती ही है.शहर में एक होर्डिंग के आजकल चार से पाँच हजार रुपये और बेनर के डेढ़ हजार रुपये लगते हैं.क्या ऐसे में उन्हें अपने आयोजन का होर्डिंग आयोजन के ठीक पहले कुछ दिन लगाने के लिए नगर परिषद् की तरफ से कोई एक मुफीद जगह का होर्डिंग मुफ्त नहीं दिया जा सकता है.(जनता होर्डिंग के विज्ञापन से ही प्रभावित होने की आदी हो चुकी है ),चित्तौड़गढ़ में क्या आप कोई एक सार्वजनिक जगह सूझा सकते हैं जहां एक कक्ष या सभागार हो और नगर के बुद्धिजीवी,संस्कृतिकर्मी,कवि,लेखक,मिडिया के साथी कोई वैचारिक आयोजन कर सके ?(नोट जगह मुफ्त मिलनी चाहिए क्योंकि उपर्युक्त समूहों के पास घोषित तौर पर काला धन नहीं होता)सरे शहरों की खबरों में ऐसे स्थान सुने हैं इसलिए दिल दुखता है कि मेरे शहर में ऐसा क्यों नहीं?

(5)या तो मैं शास्त्रीय संगीत के पास चला जाता हूँ या शास्त्रीय संगीत खुद ही मुझे अपनी संगत में बुला लेता है.रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ भी नहीं हो सके तो भी साप्ताहिक संगत तो बिछा ही लेता हूँ उसी का मौक़ा हाथ लगा है .अभी बिस्मिल्लाह खान साहेब का बजाया राग भैरवी सुन रहा हूँ.सवेरे की तैयारशुदा चाय अभी घटकी ही है.खिड़की के बाहर कुहरे का पहरा बरकरार है.मैं डरपोक उसे कांच के परदे से देखता हूँ.मैं अगर प्रकाश खत्री जी होता तो अभी तक तो सुबह की पैदल सेर पर दूर जा चुका होता .आँखों के सामने फेसबुकी अपडेट्स सलामी ठोकते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं.अखबार नहीं आया मिडिया संस्थानों की भी कल छुट्टी थी शायद.भारतीय संविधान की पालना के जिम्मे के साथ ही इधर बेटी के लिए ग्लास में रखे दूध को फूँक मारकर ठण्डा करने का जिम्मा मेरे पे ही है.बेटी के रात को बाकी रह गए होमवर्क की चिंता घरभर को है.छब्बीस जनवरी का असर सताईस जनवरी पर कायम है ठीक उसी तरह जैसे हर छ; माही क़िस्त की तरह झंडे के दिन के बचे हुए लड्डुओं का अगले दिन बच्चों में वितरण बाकी रहता है.

(6)इस बीच बहुत सारे काम निबट गए.सत्य नारायण जी व्यास ने मुझे एक ऊनी काला जैकेट उपहार दिया.हमारी रेणु दीदी ने एक लम्बा वाला मफ़लर गिफ्ट किया.उदयपुर में जाकर एक सेमीनार में हम पुरुषोत्तम अग्रवाल जी, सी पी देवल, हेतु भारद्वाज को सुन आए.व्यास जी के साथ एक यादगार यात्रा हो गयी.राजेश चौधरी जी के साथ एक शाम चाय के साथ गप मारने में कट गयी.एक घंटा राजेन्द्र जी सिंघवी के घर आदतन टीक-टिप्पणी में गुज़री.दो जंगी और ज़रूरी डिनर निपटाए.गणतंत्र दिवस का जिला स्तरीय समारोह किरण जी आचार्य और सुशीला जी लड्ढा के साथ मंच संचालन करते हुए निपटाया.'परिकथा' में कविताएँ छप गयी.स्कूल में पोषाहार पकाने का सलीका आ गया.
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नयी पीढ़ी और संगीत:वक़्त की नजाकत देखते हुए खासकर शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में सेकण्ड जनरेशन को सुनना/देखना और पोषना बेहद ज़रूरी है.हालाँकि यह बात हर तरफ लागू होती है.वैसे लागू तो यह बात भी होती है कि सेकण्ड जेनेरेशन उतनी तपस्वी,सच्ची और ईमान के आसपास नहीं दिखती है.वैसे यहाँ मेरा जोर इसलिए दिख रहा है कि वक़्त के साथ घोर आर्थिक होते इस युग में हर व्यक्ति पूरी तरह से इन विधाओं में हाथ नहीं आजमाता है.उसे निश्चित परिणाम देने वाली डॉक्टरी,मैनेजरी या फिर अभियांत्रिकी जैसे पेशे चाहिए.

साहित्य की तरह यह भी एक रिस्की जोन है.सालों की रियाज़ के बाद भी कभी-कभी आदमी गच्चा खा जाता है.मुकाम नहीं मिल पाते.फस्ट्रेशन घेर लेता है.कभी-क आदतें भी आदमी को नीचले पायदान पर ला खड़ा कर देती हैं.घराने में पलने-बढ़ने वाले युवा कलाकार तो एक अलग अहमियत खुद ही पा जाते हैं इस तरह सेकण्ड जनरेशन के कुछ लोग तो तिर जाते हैं मगर पारिवारिक रूप से सांगीतिक माहौल का बेकग्राउंड नहीं होने के बावजूद अपना झंडा गाड़ने वाले हरी प्रसाद चौरसिया,रोनू मजुमदार कोई-क हो पाता है.मगर इस युग में योग्यता के लिए अभी कौने बाकी है जहां एक कलाविद अपने श्रोता और दर्शक पा सकता है.अपनी वीणा साध सकता है.बड़े नाम और इन कला विधाओं के दिग्गज बीते साल में बहुत तेजी से हमारे बीच नहीं रहे.वर्तमान परिदृश्य में सिर्फ यादें और उनकी रिकोर्डिंग ही बची रह गयी है.भला हो इस टेक्नोलॉजी का जो हम उन्हें बहुत हद तक जी सकते हैं.

तमाम विरोधाभासों के बाद भी हमें रूपक कुलकर्णी,प्रतीक चौधरी,सलिल भट्ट,दक्षिणा वैध्यनाथन,मोनिसा नायक,अनुष्का शंकर सरीखे कई-कई युवाओं को ठीक से समझना और गुनना होगा.यह युग हमें आव्हान करता है कि हम संजीव अभ्यंकर को जाने,उदय भवालकर को सुने.बहादुद्दीन डागर के ज़रिये ध्रुपद की उस विरासत का आस्वादन करने की तरफ बढ़े.विभिन्न शास्त्रीय विधाओं में वर्तमान के फलक पर ठीक-ठाक पहचान बना चुके ये चेहरे हमें बहुत कुछ कहना चाहते हैं.अपनी साधना के साथ ही अपनी प्रस्तुतियों के लिए मार्केटिंग का रवैया अख्तियार करना इनकी मजबूरी है और हमारे समाज के लिए यह एक तमाचा है.हमें असल की पहचान नहीं रही.समाज ने आगे की पीढ़ी तैयार करने के बारे में कुछ कम रुझान दिखाया है.संकेत निराशाजनक भी नहीं कहे जायेंगे.माहौल में आशाएं बाकी है.वक़्त-बेवक्त हमें भी हालातों का एक चिट्ठा तैयार करके अपनी प्राथमिकताओं में इन युवा साधकों की चर्चा करनी चाहिए.

अच्छी चीज़ों को नज़रअंदाज़ करने की हमारे आदतें जारी रही तो आप बताइए कि कौन कमाल साबरी,शाबीर खान और सरवर हुसैन बनाना चाहेंगे.कौन होगा यहाँ जो संजीव-अश्विनी शंकर शहनाई फूंकेंगे.क्या इस नए दौर में मंजरी असनारे केलकर,मीता पंडित और श्रुति सेडोलीकर में फरक करने की हमारी मेधा जाती रही.सोचने के कई बिंदु मन आ रहे हैं.बाकी फिर कभी (प्रतीक चौधरी का सितार वादन सुन रहा था तो उनकी सजीव प्रस्तुतियों सहित युवा कलाविदों के साथ के दिनों से बहुत कुछ याद आ गया )
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सुरों की दुनिया:यूट्यूब का भला हो कि रात में सोने से पहले हमने प्रेरणा श्रीमाली जी का कथक देखा,बेटी ने अनुकरण किया.रात की लम्बी और अच्छी गहरी नींद के बाद जैसे ही उठे उस्ताद राशिद खान का गाया भजन 'पलना झूले नंदलाल' सुन रहे हैं.हमारा मानना है कि संगीत आपको 'लय' में रहना-जीना और आगे बढ़ना सिखाता है.हालाँकि बदलते वक़्त में 'संगीत' जैसे शब्द का अर्थ भी बहुत तेज़ी से बदल रहा है.फिर भी सार्थक और गंभीर किस्म के संगीत के मायने आज भी क़ायम हैं.भला हो हमारे दोस्तों का जिन्होंने हमें संगीत के सबसे ठीक पहलू के करीब लाया.वरना गफलत में पड़ जाने की प्रबल संभावनाओं वाले इस कलियुग में हम तो मर ही जाते.अभिरुचियों के वैविध्य वाले इस समय में सही रूचि को थाहना और उसके मुताबिक़ किसी विवेकी द्रोणाचार्य को ढूंढकर उनसे सीखना और अंगूठा कटवाना टेड़े कामों की सूची का हिस्सा होना चाहिए.

एक बार की बात है जो कल रात फिर याद आ गयी कि प्रेरणा श्रीमाली जी एक बार सैनिक स्कूल में स्पिक मैके के बहाने कथक की प्रस्तुति देने आयी हुयी थीं.सेवा-चाकरी में हम ही मुस्तैद थे.जनवरी की ठण्ड थी.ठण्ड वो भी चित्तौड़ी ठण्ड.बिजली के कट आउट का दौर था.शायद कोई सुबह के दस बजे प्रोग्राम होना तय था.भागादौड़ी में हम भूल ही चुके थे कि प्रेरणा जी से रात में विदा होते वक़्त ही कहना था कि आप थोड़ा जल्दी उठकर गीज़र का उपयोग कर सकती हैं,बाद में बिजली के अपने संकट हैं.सरकारी फरमान हैं कि दो घंटे बिजले कट आउट ज़रूर हो.हम तनिक डरे भी कि इतनी बड़ी कलाविद को जल्दी उठने की कहे तो कैसे.हमारी आशंका सही निकलाने के हित उन्होंने सवेरे के साढ़े आठ पर कॉल कर ही दिया.मैं,रमेश प्रजापत और एकाध कोई ओर स्वयंसेवक था शायद.सैनिक स्कूल गेस्ट हाउस पहुंचते ही हमने एक जुगाड़ लगाया. पता लगाके मेस पहुंचे, दो बाल्टी पानी कड़ायले में गरम करवाया.एक मोपेड पर पीछे बैठे रमेश ने दोनों हाथों में एक-एक के हिसाब से गरम पानी की बाल्टियां पकड़ प्रेरणा जी के कुसलखाने तक पहूँचाई.मुझे मोपेड चलाना नहीं आता था क्योंकि तब तक मेरी हैसियत और हकीक़त एक साईकल के आसपास ठहरती थी.खैर कहना यह चाहता हूँ कि वक़्त के साथ सेवा-चाकरी उर्फ़ 'स्वयंसेवा' जैसे शब्द अपने अर्थ खोते जा रहे हैं.यह कोई हर दौर के रोने-धोने जैसा नहीं सचमुच की हकीक़त है.स्पिक मैके आन्दोलन जिसने हमारे में 'निस्वार्थ स्वयं सेवा' का कॉन्सेप्ट रोपा,अफ़सोस वह आन्दोलन भी अब अपने क्षरण के साथ ही आगे बढ़ रहा है.कई बार लगता है आगे बढ़ना कोई प्रगति का सूचक नहीं है. जब तक कि उसमें एक विचार न हो,दिशा न हो और गुणात्मक किस्म का भाव न हो. हमारे दोस्त राजेश चौधरी कहते हैं कि माणिक क्षरण तो जीवन के प्रत्येक हल्के में हो रहा है इससे जो जितना बच सके उतना अच्छा.

इसी सेवा की अवधारणा में हमने आईआईटी के प्रोफ़ेसर डॉ. किरण सेठ से सीखा कि कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता.बहुत बाद में जाकर हमारे मगज में ये बात बैठी कि हम किसी आयोजन में सभागार के बाहर जाने-अनजाने लोगों की पगरखियाँ क्यों एक सीध में रखकर उन्हें इधर-उधर सरकाएं.बाद में ही जाना कि एक वोलंटियर कैसे किसी शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति के ऐनवक्त के आपातकाल में अपने ही पहने हुए बनियान को पौछे के माफिक व्यवहार करता हुआ मंच साफ़ कर देता है.सीखने के अनुभव कई बार कड़वे हो जाने की प्रक्रिया से भी गुज़रते हैं.अभी मैं भुला नहीं हूँ वैसे भूल भी नहीं सकता कि ओडिसी का जीता-जागता हस्ताक्षर विदुषी सोनल मानसिंह ने मुझे उदयपुर हवाई अड्डे पर किस कदर डाटा.खैर ग़लती तो मेरी थी ही.अभी तक याद है एक बारगी अपने रहने की व्यवस्था पसंद नहीं आने पर भरतनाट्यम की जानीमानी नृत्यांगना प्रतिभा प्रहलाद ने बहुत गलत-सलत कह डाला.हम बहुत छोटे और यों कहें तो ज्यादा बेहतर होगा कि संस्कारित स्वयंसेवक के परफोर्में में ही बंधे थे.सबकुछ सहते हुए सीखने की आदत पड़ चुकी थी.

खैर इस तरह के तमाम अनुभव मुझे 'माणिक' बनाने में अपनी तरफ से कुछ न कुछ जोड़ते ही रहे. इस बात का अहसास मुझे बहुत बाद के सालों में लग पाया.इस सफ़र में यह भी समझ आ गयी कि समाज और अपनी संगत में खर्च किया हुआ एक-एक घंटा कुछ लेकर ही उठता है.अपनी पसंद के मंचों पर अपने मनमाफिक शीर्षक वाले नाटक खेलने के एक भी अवसर मैंने नहीं खोये.जितना हो सका सुना.देखा.सीखा.साधा और बिना किसी बड़े लाभ के चक्कर में आये वे सभी काम किए जो सीधे तौर पर लाभदायक तो कम से कम नहीं ही समझे जाते हैं.हम बरसों तक ऐसे घनचक्कर बनने में ही सुखद अनुभव करते रहे जो हमें 'माणिक' बनाने में सहयोग कर सकते थे.'सार्थक' बनने की यह यात्रा अनवरत जारी है.शहर के सजग और चिन्तनशील मित्रों के साथ अब तो हिन्दुस्तान में भी इतना बड़ा समूह बन गया है कि मित्रों की संख्या अपार हो गयी है जिनसे मुझे अपनी दिशा तय करने में सहायता मिलती है.यह सारी अनर्गल कही जाने वाली रुचियाँ ही मुझमें 'लय' लाती है.आज सच कहलवाएं तो इसी 'लय' के बूते मैं अपने कदमों को इस उबड़-खाबड़ ज़मीन पर ठीक से रख पाता हूँ.

स्मृतियों में जाने के इस मौसम में कुछ हाल की संगतें भी मुझ जैसे अधूरे आदमी को पूरा करने का मन रखती है.सही और ग़लत की पहचान कराती है.इस तरीके से दिशा देने में वर्तमान का अपना अवदान है.चीज़ों को समझने में 'राजेश चौधरी जी के साथ चित्तौड़ के किले में एक दुपहरी' शीर्षक का एक पाठ भी जोड़ा जाना चाहिए.संगत का वो पाठ जिसे हमने पाडनपोल की एक घुमटी में फीकी चाय पीकर शुरू किया.यहाँ यह लिखना उचित नहीं है कि माचिस किसने जलाई और सिगरेट किसने फूंकी.गिरस्ती की बातों से लेकर हिन्दी साहित्य और फिर चित्तौड़ के इतिहास में गोते लगाते हुए हम मृगवन में ठेठ अंतिम छोर पर बने परकोटे तक जा आए.आते में जैन सात्बीस देवरी के सामने नीबू-जीरा की एक-एक गिलास ने हमें फिर से तरोताज़ा कर दिया.कुल जमा बीस रुपये राजेश जी ने दिए.उस यादगार दुपहरी राजेश जी को कुछ नया मिला हो या नहीं मुझे ज़रूर बहुत सी बातें नईं जानने को मिली और वैसे भी यही राजेश चौधरी से दोस्ती का फलन भी है.कम से कम बात लिखनी है कि जब चर्चा चली कि इस बार गर्मी के लम्बे और सरकारी अवकाश में कहाँ जाओगे? तो राजेश जी ने बड़ा मझेदार प्रत्यूतर ठेला कि वे सोचते हैं उन्होंने बहुत लम्बे समय से भारी मात्रा में कुछ अच्छा और चयनित गंभीर किस्म का साहित्य पढ़ा नहीं है तो वे सोचते हैं इस बार की छूट्टियाँ वे केवल और केवल पढ़ने के लिए बचाकर रखेंगे.उसी के तहत वे दिल्ली पुस्तक मेले के टिकट कटा चुके हैं. एक बार फिर यह बात पुख्ता हो गयी कि संगीत के साथ अच्छी किताबें भी आपमें 'लय' लाती है.
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संगीत और हम:हमारी सुबह कभी बिस्मिल्लाह खान साहेब तो कभी पंडित शिव कुमार शर्मा के सुरमई योगदान को सुनते हुए होती है और आपकी ? वैसे ये अलग बात है कभी-कभी उन सुरों में हमारी श्रीमती जी के बोले तीव्र सप्तक वाले सुर भी शामिल होकर हाहाकार मचा देते हैं.असल में हम कोई राजा महाराजा तो हैं नहीं वैसे भी अब लोकतंत्र में राजातंत्र रहा कहाँ? जो सवेरे की मंगलकारी धूने बजाकर कलाकार हमें शहनाई और नंगाड़े से मिलवाए.हम ठहरे आम आदमी, हमारी औकात वहीं तक जाकर रुक जाती है जहां हमारे एक इशारे पर इंटरनेट के अनलिमिटेड प्लान की बदौलत एक से एक बड़े कलाकारों की रिर्कोर्डिंग एक बटन की दूरी पर से हमारे सत्कार में बज उठती है बस.गफलत इतनी है कि हम समझ नहीं पाते हैं कि यह टेक्नोलॉजी की जयजयकार है या हमारी आम आदमीयत की ताकत. कुलमिलाकर सुबह सुरमई है.

ये सुर महज किसी रूचि को नहीं पूरते बल्की हमें स्मृतियों में ले जाने को भी मुस्तैद सुनाई पड़ते हैं.गिरिजा देवी जी की ठुमरी सुनता हूँ तो मुझे उनका दादी अम्मा वाला चेहरा याद हो आता है,माजरी आँखों के साथ उनके होठों पर बनारसी पान की ललाई क्या फबती है? और जब वे गायन के आगाज़ में पहला सुर परोसती है तभी से श्रोताओं को अपने आसन पर जमाना शुरू कर देतीं हैं.उन्हें सुनना स्वरों की मिठास से परिचित होना है.उन्ही शब्दों को दुसरे भेष में सुना जा सकता है जिन्हें हम बड़ी निर्दयता  के साथ कर्कश बनाते रहे.हमारे जीवन में यही कुछ वैविध्यभरी संगतें हैं जो हमें ठहर कर सोचते हुए आगे बढ़ना सीखाती हैं.जब हम हरिजी को सुनने बैठते हैं जो वो संगत बांसुरी वादन की एक बड़ी और यादगार प्रस्तुति से भी बहुत आगे का मसला होता है.हमें यह समझना चाहिए कि कलामंडलम गोपी जी का कथकली प्रदर्शन खाली एक नृत्य प्रस्तुति कैसे हो सकता है? प्रदर्शन के पीछे के आदमी का ताप महसूस करना किसी दर्शक या श्रोता का असली मकसद हो सके तो उससे बड़ी बारीक समझ हो नहीं सकती है.

इंटरनेट का ये आभासी माध्यम भी हमें जाने कहाँ तक सोचने को प्रेरित कर जाता है गोया जब मैं अब्दुल राशिद खान साहेब को सुनता हूँ तो कलकत्ता चला जाता हूँ , उस्ताद असद अली खान साहेब की रूद्र वीणा सुनते ही बाड़मेर-जैसलमेर की तरफ. बिरजू महाराज के नाम पर कई शहर याद आ पड़ते हैं जम्म, कोहिमा, सुरतकल, बनारस. डॉ एन राजम का ज़िक्र होते ही गाजियाबाद की वो रात्रिकालीन संगत याद आ पड़ती है. पंडित भाई राजन-साजन जी मिश्र के युगल स्वरों ने मुझे कई बार मणिपाल की याद दिलाई है.असल में इन बड़े नामों के साथ तनिक देर की संगत में उनकी सेवा में किए चंद काम भी इतने सालों तक याद रहेंगे सोचा न था.गंभीर किस्म की इन संगतों का ये सिलसिला कहाँ थमने वाला है ? पता नहीं.इस सूची में सोनल मानसिंह जी से लेकर केलूचरण महापात्र, गुलज़ार, शबाना आजमी, फारूख शैख़ से लेकर कुड़ीयट्टम की कपिला वेणु भी शामिल समझी जानी चाहिए.
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वरिष्ठ फ़िल्म एक्टिविस्ट संजय काक 
माटी के लाल:कल रात खिड़की से आती रोशनी बंद कर दी,परदे लगा दिए,खिड़कियाँ एकदम बंद,कमरे की रोशनी का स्विच ऑफ़,कमरे का एकमात्र दरवाज़ा भी बंद हो गया तो पास बनी रसोई से आती रोशनी भी जाती रही.एकदम गुप्प अन्धेरा,आँखों के सामने था कंप्यूटर और स्क्रीन पर यूट्यूब के सहारे बिना रुके चलती हुयी फ़िल्म 'माटी के लाल' जिसे एक्टिविस्ट फिल्मकार संजय काक ने बनाया था.एकदम थिएटर के माफिक अनुभूति.एकदम अकेले.मैं जो समझ पाया कि जितना आरामदायक पॉजिशन में मैंने बिस्तर में धंसे हुए ही इस फ़िल्म को देखा-विचारा-सराहा उतना ही असुविधाजनक था इस फ़िल्म का निर्माण.जंगलों की ख़ाक छनने के कई दृश्य.पंजाब और पंजाबी बेकग्राउंड से आगाज़ करती ये फ़िल्म मुझे सीधे 'पाश' और 'भगत सिंह' से जोड़ती हुयी बनी.और यह तो जगजाहिर है कि 'भगत सिंह' और 'पाश' जैसे शब्द हमेशा से ही असुविधाजनक साबित हुए हैं.नारे, आन्दोलन, मशालें, नुक्कड़ सभाएं, धरने और पोस्टरों के कल्चर से एक बार फिर मुखातिब कराती फ़िल्म है 'माटी के लाल'. 

फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपकी कल्पना शक्ति को झकझोरे, सब कुछ सचाई के आसपास ही था जो मुझमें आश्चर्य भर रहा था कि मेरे अपने देश में कितनी कुछ गड़बड़ हैं और मैं बेख़बर.एक-एक दृश्य और अपरिचित भाषा/बोली के लोक गीतों का वो घेरा जिसके बंधन में पाकर मैंने खुद को सुविधाजनक और ज्यादा सुरक्षित-जागरूक समझा .नियमगिरि की पहाड़ियों पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कब्जाने वाले षडयंत्र का खुलासा हो या फिर नक्सली आन्दोलन को बारीकी से समझाने वाले फिल्मांश.सबकुछ सधे हुए.दृश्य इतने साधारण-सहज-असंपादित कि जुड़ने में बड़ी आसानी अनुभव हुयी.बस फ़िल्म का मूल प्रिंट नहीं होने से लिखे हुए हिन्दी सबटाइटल पढ़ने में हुयी दिक्क़त खली.एक मुक़म्मल फ़िल्म के तौर पर संजय काक को इस फ़िल्म के बहाने समझा जाना चाहिए.साथियो,संजय भाई ने बहुत शोधपरक स्रोतों के साथ यह दो घंटे की डॉक्युमेंट्री हमें भेंट की है.विचार की दिशा को लगातार साफ़ करने में कई मित्रों का लिखा-छपा पढ़ा है अब यहाँ भी सार्वजनिक रूप से वरिष्ठ साथी संजय काक को इस प्रतिरोधी संस्कृति के एक प्रतीक 'उपहार' के लिए शुक्रिया.


आप लोग फ़िल्म देखेंगे तो खुशी होगी.ये वैसी फ़िल्म नहीं है जो हर शुक्रवार को रिलीज़ होती है.करोड़ों का बजट.अरबों की कमाई होती हो.ये फ़िल्म घाटे की फ़िल्म है.क्योंकि ये फ़िल्म समाज को गफलत में नहीं डालती.सचाई से परिचय कराती है और इधर लगातार सचाई सुनने/देखने वालों की कमी हुयी है.इन्हीं तमाम स्थितियों के बीच ऐसी फ़िल्में हमेशा बिजनस के आंकड़ों और बोक्स ऑफिस के गणित से परे ही रहतीं हैं.इस तरह की तमाम फिल्मों के साथ यही फोर्मेट काम करता है.अनुनय/विनय करके दिखाई जाती है.जो एक बार देख लेता है वो चल पड़ता है.अब चले रास्ते का विश्लेषण करने लगता है.दिशा को लेकर सोचने लगता है.सफ़र में ठिठकता हुआ चलता है
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फ़िल्मकार  मेघनाथ जी 
'गाड़ी लोहारदगा मेल':इस बात में रत्तीभर भी अचरज नहीं है कि हमारे आसपास की संगत हममें कुछ जोड़ती ही है.कभी-कभार ऐसा भी हो पड़ता है कि हम किसी बैठक में जाजम उठाने तक वह नहीं रहते जो संगत के शुरुआती बिंदु पर जाजम बिछाने के वक़्त होते हैं.कुछ न कुछ जुड़ ही जाता है.रात में रोज़मर्रा के काम निबटाने के बीच ही सहसा एक लिंक हाथ लगा.असल में ज़रूरी कागजात संभालते वक़्त बेतरतीब चीज़ों को अवेरते फोल्डर में उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल का एक ब्रोसर  हाथ लगा.फ़िल्मों की सूची में एक थी फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल' इसे हमारे हमविचार साथी 'मेघनाथ' और 'बीजू टोपो' ने बनाया था.

'मेघनाथ' और  'बीजू टोपो:दोनों से मैं मिला नहीं,बतियाया नहीं,इनका लिखा पढ़ा नहीं,इनके साथ चाय नहीं पी,न ही सिगरेट फूंकी और तो और इनकी शक्ल अभी तक तो नहीं ही देखी है.मगर एक आभास मेरे साथ है जिसमें लगता है इनके साथ एक बड़ी संगत हो चुकी है जिसका असर अब बहुत भीतर तक अपना रंग जमा चुका है.ज़रिया था सिर्फ सताईस मिनट की ये फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल'.सन दो हजार छ: में आयी ये फ़िल्म मेरे जैसे फिसड्डी के पास अब जाकर पहूंची.इस अंतराल और देरी का दोष सिर्फ और सिर्फ मेरे माथे ही पटका जाए तो मुझे तसल्ली होगी.

फ़िल्मकार बीजू टोपो जी 
इस बहुत विपरीत समय में बेहतर संगत ढूँढने के दिन लद गए लगते हैं जो कोई अच्छी अनुभूति और सही संकेत नहीं है.सही दिशासूचक मित्र,असलियत परोसती  फ़िल्में ,ग़लतियों पर डाटते गुरुजी,लफंगों के साथ टाइमपास करने की शिक़ायत पर गुस्सा होते पिताजी,अपनी तबियत को लेकर लापरवाही पर सलाहें देती माँ-बड़ी जीजी सबकुछ, बिसरे हुए बिम्बों की सूची का हिस्सा बन गए हैं.इस सूची के ओर लम्बे होने का ज़िम्मा हमें खुद पर ही लेना होगा.क्यों कि दोष हमारा ही है शायद.फिलहाल यही अहसास बड़ा प्रबल है कि बहुत तेज़ी से हमारे बीच एक आदमी होने के लिए स्थितियां लगातार कम पड़ती का रही है.आदमियत को ज़िंदा रखना या उसमें जान फूंकना वक़्त की बड़ी ज़रूरत हो गयी है.इसी तरफ इशारा करती है 'लुप्तप्राय' दृश्यों को जगाती यह ट्रेन केन्द्रित फ़िल्म 'गाड़ी लोहारदगा मेल' जो असल में अपने केंद्र में 'जीवन' को रख रही है ट्रेन तो एक बड़ा बहानाभर ही समझना.

फ़िल्म में चार डिब्बों की रेल हैं,कैमरे के सामने आती संभवतया नैरो गेज की पटरियां हैं ,मटमैला इंजन है , पुराने टाइप के सिग्नल, देसी ख़ुशबू देते गाँव, आरामतलब सवारियां और डिब्बों की खिड़कियों के बाहर लटके सब्जियों के टोकरे-दूध की टंकियां ही हैं.फ़िल्म में यों तो कहानी गायब है मगर फिर भी इसमें एक कहानी तो है जिसे हर दर्शक अपने ढ़ंग से तैयार करता हुआ पूरी करता है और समझता भी है.फ़िल्म में अमूमन फिल्मों की तरह कोई एक हीरो नहीं है.विलेन तो बिलकुल भी नहीं.एक रंगीन और जीवंत संस्कृति का परिचय देती फ़िल्म है 'गाड़ी लोहारदगा मेल'.

लाईट-कैमरा-एक्शन जैसी शब्दावली से कोसों दूर बिना किसी तामझाम के यह डॉक्युमेंट्री हमें उस देशज कल्चर से एकमेक कर देती है.फ़िल्म में लगभग बिना वाद्ययंत्रों के बजने वाले गीत शामिल हैं.गाने और सुनने वालों में सभी हम जैसे ही हैं.एक भी चेहरा हाई प्रोफाइल कलाकार का नहीं.एक बारगी लगा हमारी ही तरह का आदमी हमारी फ़िल्म कह रहा है.आम आदमी को बयान करती हुयी इस मूवी में सामान्य यात्रियों की बतकही ही है.ट्रेन रुकती है,लोग चढ़ते हैं,स्टेशन पर पापड़-भुंगड़े-फुल्लिये बेचते घुमक्कड़ व्यापारी ट्रेन के नजदीक आते हैं,खरीद-फरोख्त होती है,सीटी बजती है और ट्रेन फिर चल देती हुयी फ़िल्म को आगे बढ़ाती है.सबकुछ बहुत कम आपाधापी के बीच  ही संपन्न होता है..सबकुछ बहुत धीमे-धीमे. पूरे सताईस मिनट में कोई दो चार स्टेशन और वहाँ की चहल-पहल ही फ़िल्म का मसौदा बन पायी है.एकदम यथार्थ.हमारे देश के ही एक हिस्से का लोक.सबकुछ पहली दफा और लगभग आश्चर्य के करीब का-सा.विश्वास करने को थोड़ा मुश्किलाना.
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दायें या बाए:एक बहु धंधी आदमी के साथ अकसर ऐसा होता है कि बाक़ी रहे कामों की सूची हमेशा दिमाग में पलटे मारती रहती हैकभी-क ऐसा भी हो जाता है कि हम किसी ज़रूरी काम में उलझे होने के बावजूद किसी दूसरे बाकी काम के लिए एकदम उत्सुकता के साथ कूद पड़ते हैं।यही उल्लास मैंने खुद में तब देखा जब सहसा बेला नेगी की फ़िल्म 'दायें या बाएं' हाथ लगी।असल में यह फ़िल्म मेरे लिए छूटे हुए कामों में से लगभग आवश्यक की शरनी वाली ही थी।यों टॉकीज में जाकर फ़िल्म देखे अरसा हो गया।मुमाला यह है कि बात साल दो हजार तेरह की है जब हिमांशु पंड्या भैया और उनके साथियों द्वारा किए दो दिनी सामलाती उत्सव 'उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल' में जाना हुआ।उत्साह तो बहुत था फिर भी पहले यानी एक ही दिन जाना हुआ।ठीक से फिल्मों को देखने-विचारने और समझने की कसक बाकी रही।'दायें या बाएं' फ़िल्म फ़िल्म की स्क्रीनिंग नहीं देख पाए क्योंकि अगले दिन रुकने या नहीं रुकने के निर्णय के बीच उलझे भी रहे।पहले दिन बेला नेगी जी से मुलाक़ात इतनी भर हुयी कि मैंने एक अनजान दर्शक की भूमिका में उन्हें 'नमस्ते' कहा।खैर हाँ मेरी अर्धांगिनी ज़रूर उन्हें देर तक देखती ही रही क्योंकि उनका आधुनिक और लगभग साहसिक व्यक्तित्व और पहनावा उसे बेहद पसंद आ रहा था।उदघाटन सत्र में उन्हें सुनना नाम मात्र की कानापुर्ती ही कही जाए तो बेहतर रहेगा।वे बहुत थोड़ा ही बोली थी शायद कि उनकी इसी फ़िल्म को लेकर बड़े मूवी हॉल और अच्छे शहरों में ठीक से स्क्रीन नहीं किए जाने का मलाल 'दायें या बाएं' फ़िल्म से जुडा रहेगा मगर अब छोटे और कस्बेनुमा शहरों में ऐसी स्क्रीनिंग से वे ज्यादा खुश हैं।तभी एक अहसास हुआ किया कि एक रचनाकर्मी अपने असली प्रशंसक पाकर कितना खुश होता है।खैर दिशा भ्रमित होने से ठीक पहले थोड़ी सी बात फ़िल्म पर

प्रतिरोध की संस्कृति वाली फ़िल्में देखना का यह चस्का उसी उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल और उसके राष्ट्रीय कर्ताधर्ता संजय जोशी जी के साथ एक चाय से लग चुका था। तभी से बदस्तूर जारी है बस जब भी मौक़ा मिला आँखें गड़ा देता हूँ। जब बेला नेगी जी की निर्देशित इस फ़िल्म पर पहुँचा तो अव्वल तो देखता ही रह गया कि बहुत खूबसूरती से उन्होंने हमारी ग्रामीण संस्कृति को हुबहू प्रस्तुत करने का बड़ा काम किया है। मैं खुद भी गाँव की पृष्ठभूमि से हूँ तो खुशी दुगुनी थी। फ़िल्म का टाइटल पूरी फ़िल्म में मन में हिचकोले खाता रहा कि अनिर्णय की यही स्थिति ही शायद नायक रमेश के साथ भी रही है जिसके चलते हुए ही बेला नेगी जी ने फ़िल्म में एक आदमी की दिशाहीन स्थिति पर व्यंग्य किया है। तभी रमेश में भारत का अमूमन आदमी नज़र आया जो इस बीच के मुश्किल समय में पूरी तरीके से न गाँव का रह पाया न शहर को समझ पाया। पहाड़ी जीवन में बीते बीस सालों में आये बदलावों को दर्शाने की एक कोशिश इस फ़िल्म का बड़ा विषय है

एक उत्तराखंडी पहाडी गाँव हैं जहां युवा रमेश किसी महानगर से थकहार कर उदास और बुझे हुए सपनों के साथ शहरी संस्कृति के प्रति एक विमोह लिए फिर से गावं लौट आया है।इधर परिवार गंवई खेतीबाड़ी, गाय-भैंस वाली बेतरतीब ज़िंदगी से परेशान है और अब शहर जाने को खासा उत्साहित है। परिवार की आपसी खटपट दिखाई गयी है। ठेठपन की ख़ुशबू को बनाए रखने की बहुत सारी कोशिशें इस फ़िल्म में मौजूद हैं। शायरी लिखने के बहाने एक इनामी योजना में रमेश के नाम खुली 'लाल रंगी कार' भी पूरी फ़िल्म में बहुत बड़ा स्पेस घेरती हुयी दिखाई गयी है। इधर फ़िल्म में दिए कई संदेश भी हैं गोया हरियाले पेड़ काटे जा रहे हैं। पहाड़ नाराज हो रहे हैं। गाँव का स्कूल वैश्विकरण के इस दौर में बहुत पीछे जा चुका लगता है शामिल हैंपहाड़ी जीवन की अपनी रोज़मर्रा की परेशानियां भी फ़िल्म में दिखी है।सीधे-सपाट बच्चे हैं।गाँव के रीति रिवाज़ हैं।गाँव की अड़ियल सरपंची है।सेठ साहूकारों की आमजन को साधन के रूप में काम लेने की प्रवृति पर व्यंग्य है।फ़िल्म में चुनावों के चलते गाँव की बहुप्रत्याशित मांग 'कला केंद्र' के खुलने की कहानी भी हमारी व्यवस्था पर बहुतेरे व्यंग्य कसती नज़र आती है

फ़िल्म में मेला, गीत है, शादी-ब्याह के दृश्य हैं।टूटी हुयी सड़क है,पहाड़ी रास्ते से स्कूल जाते बच्चे हैं।बस स्टेंड पर कभी-कभार आती बसें हैं। पैदल  यात्राओं के बीच इक्का-दुक्का गाड़ी-घोड़ा हैं। कामचोर मास्टर-मास्टरनी हैं। चाय की एक थड़ी है। बिखरा हुआ बचपन और दिशाहीन बच्चे हैं। ताश-पत्ती खेलते बेरोजगार जवान छोकरे हैं।जहां एक तरफ अपनी नासमझी के चलते देहाती नाबालिंग लड़कियों के प्रेम प्रसंग हैं वहीं उनके अचानक घर से प्रेमी के संग भाग जाने के किस्से भी है। दारू पीकर जीवन गुजारते ग्रामीणों सहित फ़िल्म में संक्रमण काल से सामना करते गाँव को बहुत बारीकी से फिल्माया गया है। कुलमिलाकर इस युग में एक आदमी के लगातार गधे बनने के किस्से एक साथ पिरोये गए हैं जहां हँसी का पात्र बनता हुआ आम आदमी का प्रतीक रमेश आखिर तक बहुत कन्फ्यूज रहता है कि दायें जाएँ या बाएं। ग़लत दिशा में फिसलने की हद पार करता और फिर कर्ज चुकाने के बोझ से संघर्ष करता रमेश फ़िल्म का केंद्र बिंदु है।लगभग दो घंटे की इस फ़िल्म को भी देखा जाना चाहिए। वैसे ये डॉक्युमेंट्री के बजाय कोई रूपक या आर्ट मूवी टाइप का आवरण ओढ़े लगती है। हर फ़िल्म का अपना गणित और समीकरण होते हैं फिर भी संजय काक की 'माटी के लाल' देखने के दूसरे ही दिन इसे देखना एकदम असहज होने जैसा लगा फिलहाल बेला नेगी जी और उनकी टीम को बधाई
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अस्तित्व की लड़ाई लड़ता हुआ किसान:भारतीय सन्दर्भों में आज के किसानों का यथार्थ तय है कि सन तिरपन की दो बीघा ज़मीन जैसी फ़िल्म से एकदम जुदा है जो कई मायनों में बेहद सुखद अनुभूति देता है। अपने आसपास के चंगुलभरे माहौल को आज का किसान भांपने लगा है। पहले के मुकाबले उसे अपनी मेहनत की एवज में बेहतर मूल्य मिलने लगा है। भारत की आज़ादी के बाद से लगातार किसान और खेती-किसानी में चौतरफा बदलाव आया है। यह परिवर्तन फसलीय पैदावार में इज़ाफे के साथ ही कृषक वर्ग की सामाजिक-आर्थिक प्रगति की तरफ भी हमारा ध्यान खींचता है।कई सारी सुखद घोषणाएं भी हम देखते हैं जिससे हमारे किसान साथियों का चेहरा लगभग मुस्कराते हुए प्रतीत होता है। आज का किसान वक़्त के मुताबिक़ जागरूक और पर्याप्त रूप से अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुआ है। खेतीबाड़ी की नयी से नयी तकनीक का फायदा उठाने की बात हो या फिर बैंकों के चक्कर लगाकर लोन लेने का मसला। अब वह इन झंझटों से घबराता नहीं है। आशाजनक परिणाम यह भी हैं कि युवा किसानों की एक ज़मात किसान कॉल सेंटर से बतियाने और कृषि विभागीय वेबसाइटों पर सर्फिंग का सलीका भी सीख चुकी है। प्रगति की दिशा में बढ़ने के इस माहौल में कई अच्छी खबरें हैं गोया किसानों के मजबूतीकरण के लिए सरकारी प्रयासों के साथ ही कई गैर सरकारी संगठन भी अपने तरीकों से योगदान दे रहे हैं, यहाँ यह भी कहना महती ज़रूरी होगा कि आज भी उपज की सरकारी खरीद के मुआमले में सरकार को ओर ज्यादा हस्तक्षेपभरी भूमिका निभानी चाहिए ताकि किसानों को बेहतर क़ीमत मिल सके। यह भी सच है कि आज का किसान इस यात्रा में अब अपने भले-बुरे से वाकिफ हो गया है।वह ज़माने के मुताबिक़ चतुर है। खेती के परम्परागत साधनों की कारा (सीमा ) को तोड़कर अब वह वैज्ञानिक तरीकों से बेहतर रूप से खेतीकिसानी करना सीख गया है।

अपने शुरुआती दौर में हरित क्रान्ति और श्वेत क्रान्ति से बड़ा परिलाभ कमाने की तरफ अग्रसर किसान अब गाँव की चौपाल पर ही बैठे-बैठे देश-विदेश की तमाम ताज़ा खबरों के बीच अपनी स्थिति समझने लगा है। ज़माने की रफ़्तार के हिसाब से अब किसान अपने अनाज के रोपण, कटाई, भंडारण से लेकर बेचान तक के सफ़र में बिचौलियों, सेठों, साहूकारों और मंडियों की प्रणाली का गुणा-भाग समझने लगा है।फसल और पशु बीमा सरीखी सभी सरकारी योजनाएं अब उसकी पहुँच में आ गयी है। खाद की मात्रा, कीटनाशकों के नाम, बीज के नए और लाभदायक ब्रांड उसे मुंह पर याद हो गए हैं। किसान सम्मेलन, किसान भवन, किसान साथी, मिट्टी परीक्षण, ग्रीन हाउस, पॉली हाउस जैसी शब्दावली अब उसकी समझ से परे नहीं रही।ज़रूरत के मुताबिक़ कृषक वर्ग में पढ़ाई-लिखाई के प्रति बढ़ती चेतना से भी खेतीगत बदलाव आये हैं।एकतरफ नयी पीढ़ी किसानी के उन्नत तरीकों के लिए रुचिशील दिखाई दी है वहीं इसी युवा पीढ़ी के एक बड़े हिस्से में नगरीकरण और फैलती फेक्टरियों के आकर्षण में खेती से विमोह पैदा हो गया है।इसी बीच यहाँ यह लिखना भी आवश्यक हो जाता है कि बीते दशकों में किसानों को कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने महंगे विदेशी बीज और खाद मुहैया करवाए और नकदी फसलों के सुनहरे सपने भी दिखाए थे।मगर नतीजतन बहुत बड़ी मात्रा में आयी पैदावार के अचानक गिरे मूल्यों ने किसानवर्ग को समूल हिलाकर रख दिया। व्यापारिक फायदे के गणित वाली तमाम कम्पनियां अपने मकसद में क़ामयाब हो गयी। किसान गहरी निराशा में जा बैठा। आशा और निराशा के ये दौर आते-जाते रहे और आज भी किसान खुद को और अपनी ज़मीन को बचाने के संघर्ष में जुटा हुआ ही दिखता है।यही तो यथार्थ का एक पक्ष है जिससे आँख मिलाने से हम कई मर्तबा जी चुराते हैं। हम सच सुनना और देखना ही नहीं चाहते हैं। 

चित्तौड़गढ़ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर डॉ. राजेश चौधरी की माने तो मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान और फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आँचल वाले मेरीगंज से अब आज का ग्रामीण परिदृश्य और किसान बहुत बदला-बदला हुआ है।सेज प्रोजेक्ट के कई मुआमले हमारी नज़र में हैं जहां किसान के ज़मीन-प्रेम को लगातार हतोत्साहित किया जाता रहा है। अपनी ज़मीन से बेदख़ली के बाद किसान को बहुत कम मुआवाज़े में संतोष करना पड़ा है। परिणाम सिर्फ यही हुआ कि बैलगाड़ी वाला किसान अब ट्रैक्टर वाला हो गया है।गाँव में मोटरसाइकिलें आ गयी हैं। ऐसे में खेती के इस रखवाले में बहुत सारे चारित्रिक परिवर्तन आये हैं। वैसे भावपूर्ण वर्णन करने में हमें उसे अब गरीब, दीनहीन और कमजोर कहना बंद करना होगा क्योंकि यथार्थ कुछ अलग ही कहता है।युवा कथाकार कैलाश बनवासी की कहानी रामधन के बैल का ज़िक्र करना यहाँ ज़रूरी होगा जहां रामधन नीलामी बोली में किसी भी क़ीमत पर अपने बैल बेचना नहीं चाहता और इसके उलट उसी का छोटा भाई अपने बैल बेचने पर तुरंत उतारू दिखाया गया है,यही हमारे समय का सच यह है कि नयी पीढ़ी खेती में उतनी रुचिशील नज़र नहीं आती।

वक़्त के साथ इसी कृषक वर्ग ने बहुत सारे ऐसे बदलाव भी देखे हैं जहां हम कह सकते हैं कि यह दौर कई मायनों में खेती के लिए संक्रमण का समय साबित हुआ है। अब वैश्वीकरण के इस युग में किसान का मुकाबला सीधे बड़ी और बाजारू कंपनियों से हो गया है। किसान अपने सीमित संसाधनों के बूते प्रतियोगिता के इस खुले मैदान में खुद को ढाबने के मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। यहाँ हमले चौतरफा हैं।फसलों के कम दाम, भंडारण की सुविधाओं का अभाव, गंवई सेठों को अनाज बेचने की मजबूरी, मजदूरों के बढ़ते दाम, महंगे खाद-बीज जैसे कई समीकरण उसके विकास में आज भी आड़े आ रहे हैं। देश में लगातार बढ़ते और फैलते औद्योगिकीकरण की वजह से किसानों की ज़मीन बड़े-बड़े व्यापारिक घराने बहुत तेज़ी से खरीद रहे हैं। खेतीबाड़ी की ज़मीन पर फेक्ट्रियां उग आयी है। खेती-किसानी के लिए जोतों की संख्या कम होती जा रही है। निराशाजनक स्थिति के इन हालातों में कई किसान खेतीबाड़ी छोड़कर अब शहर में दूसरे धंधेपानी की जुगत में लग गए हैं। यहाँ हमें सिंगुर, नंदीग्राम और विदर्भ सरीखे शब्द याद आते हैं जो महज केवल शब्दभर नहीं हो सकते। गिरते हुए जलस्तर और जलवायु के दगाबाज होने की परिस्थितियों में किसान खुद को ठगा हुआ सा महसूस करने लगा है। सुनने और सोचने में कितना दर्द भरा वक्तव्य है कि किसान को अपनी मेहनत-मजूरी के बदले कभी भी सही दाम नहीं मिल पाया है।

माणिक
(सन 2000 से अध्यापकी।
स्पिक मैके आन्दोलन में 
बारह वर्षों की सक्रीय स्वयंसेवा। 
साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी की स्थापना। 
कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। 
ऑल इंडिया रेडियो से अनौपचारिक जुड़ाव। 
अब तक मधुमतीकृति ओर , 
परिकथा, वंचित जनता, 
कौशिकी, संवदीया  और 
पत्रिका सहित विधान केसरी  
जैसे पत्र  में कविताएँ प्रकाशित। 
कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित। 
माणिकनामा के नाम से ब्लॉग 
और माणिक की डायरी  का लेखन। 
अब तक कोई किताब नहीं, कोई बड़ा सम्मान नहीं। 
सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। 
मो-09460711896,
 ई-मेल manik@apnimaati.com  )
अभी भी किसान की माली हालत में सुधार की बहुत गुंजाईश है। इन्हीं तमाम स्थितियों के बीच हम सभी को मिलकर देश के इस प्रमुख आधार कृषक वर्ग के हित सुनहरे सपने देखने चाहिए क्योंकि अफ़सोसजनक सच यह है कि किसान और खेती आज भी किसी की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं है। जानेमाने पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बारगी अपने कॉलम में लिखा था कि किसान का सबसे अधिक लगाव उसकी ज़मीन से होता है और उसे ही उद्योगों में तब्दील करना कहाँ का हितकारी कदम है जहां खेती के लिए ज़मीन की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। यहाँ यह भी उकेरना ज़रूरी होगा कि जनवादी विचारों के पोषक नेतृत्वकर्ताओं को भी किसान के पक्ष में खड़ा नहीं देखा गया है उन्हें भी कृषि के बजाय उद्योगों में ही विकास नज़र आया है।भारत और इंग्लैण्ड में हमेशा फ़र्क रहेगा। एक विकसित देश की अर्थव्यवस्था की तरह हम भेड़चाल के तहत हिन्दुस्तान में भी खेती में एकाएक उस तरीके के बदलाव नहीं कर सकते जैसे इंग्लैण्ड ने किए हैं। वहाँ खेती एकदम ख़त्म हो गयी है सभी तरफ सिर्फ और सिर्फ फेक्टरियों का जंगल है। उनके लिए सारा अनाज आयात करके मंगाया जाता है।सवा सौ करोड़ के भारत में यह तकनीक और दिशा एकदम ग़ैरवाजिब लगती है।हमारे पास पर्याप्त मानव संसाधन मौजूद है तो हमें मानव केद्रित तकनीकी अपनाने की तरफ जोर देना चाहिए।खैर।सबसे आखिर में यही लिखना बाकी समझा जाए कि आज भी किसानों ने आस और भाग के सहारे खेती करना जारी रखा है जिसके कारण हम आज भी भरपेट अनाज अपने घर बैठे पा रहे हैं। किसान के हित अगर बिजली, पानी, सड़क, शीतग्रह, मंडी की सुविधाएं गांवों में पर्याप्त और बेहतर रूप में पहुंचे तो शायद उसका भला ज्यादा अच्छे से हो सकेगा। आओ हम सभी मिलकर अपने समाज में किसान और खेती के लिए जगह बचाकर रखें। किसान की मेहनत को आदरना सीखें।लहलहाती फसलों के बीच फोटो खिंचाई की रस्मों के समानांतर हम किसान की यथार्थपरक हालत के बारे में भी तनिक विचारें।बाज़ार के चौतरफ़ा आकर्षण और कंटीले समीकरणों में फंसे इस समग्र समाज में किसान का समाज भी कैसे सुरक्षित रहकर प्रतियोगिता में खुद को खड़ा रख सके, इस बारे में चिंतन करें।Print Friendly and PDF
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