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डायरी:कहीं नहीं छपने लायक सामग्री /माणिक(चित्तौड़गढ़)

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, मार्च 15, 2014 | शनिवार, मार्च 15, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )               मार्च-2014 

चित्रांकन
वरिष्ठ कवि और चित्रकार विजेंद्र जी
 
दम तोड़ती दाबू छपाई:बीते साल हमने बस्सी की काष्ठ कला पर एक रूपक बनाया था.नटवर त्रिपाठी जी के साथ की वो यात्रा और प्रवीण कुमार जोशी के आलेख पर बना वो रूपक अब भी स्मृति में है.इधर हमने आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ के कार्यक्रम प्रमुख चिमनाराम जी के निर्देशन में बीते रविवार चित्तौड़ जिले के आकोला गाँव में दौरा किया.'आकोला की दाबू छपाई कला' पर केन्द्रित एक रेडियो रूपक का निर्माण हुआ.यात्रा बड़ी दिलचस्प रही.

सुबह के दस बजे.कार में ड्राइवर सहित चार साथी.चित्तौड़गढ़ से कपासन की तरफ का फोरलेन रोड.मस्त ड्राइविंग.चिमनाराम जी का दर्शन और बीच-बीच में माधुरी से गुफ्तगू.साथ में फिमेल आवाज़ के तौर पर माधुरी सोनी थी.माधुरी नागौर की है.बीते साल ही ब्याह के बाद चित्तौड़ आयी.पति इंजिनियर.फेक्टरी में बड़ी नौकरी.शुरुआती बातों में ही मैंने अपना पूंजीपति वर्ग और रईसी जीवन के प्रति विरोध जता दिया.फिर तो बातें करने में हमारी फ्रीक्वेंसी मेल खाने लगी.यहाँ रईसी जीवन शैली के विरोध से मेरा मतलब कॉन्सेप्ट में सही होना था कि जीवन सभी जगह है.आनंद और उल्लास वहाँ भी हैं जहां एक आदमी फेक्टरी की कोलोनी वाले फ्लेट कल्चर से रहित जीवन जीता है.जीवन वहाँ भी है जहां एक परिवार अफीम की चिराई-लुआई के दौरान खेत में ही जुगाड़ वाले घर में रहता-खाता और सोता है.खैर यहाँ विषयांतर होने के पूरे चांस हैं.फिर भी बता दूं कि हम आकोला जैसे गाँव में जा रहे थे. एक गाँव की यात्रा के लिए हमें गाँव के स्तर वाली फ्रीक्वेंसी पर जाकर सोचना और समझना ज़रूरी हो जाता है.


रास्ते में दीवाना साहेब की दरगाह पड़ती थी.नामचीन दरगाह.इस लोकप्रियता से हम भी अछूते नहीं थे.लगे हाथ दर्शनलाभ लिया.दर्शनीय धार्मिक स्थलों पर मेरा एकमेव आकर्षण आए हुए जातरियों की जीवन शैली देखना और निहारना ही रहा है.दर्शन का अर्थ मेरे लिए ज़िंदा आदमी से बातचीत से लिया जाना चाहिए.शाब्दिक और अशाब्दिक बातचीत.दरगाह बहुत अच्छी तरह से बनी हुयी थी.दे लम्बे-चौड़े चौगान,आरामघर,धर्मशालाएं,टट्टी-पेशाब के लिए पर्याप्त सुविधाएं.बहुत सारे कुसलखाने.भोजनशाला का बड़ा आँगन.इस तरह आस्था का सैलाब देख हम दरगाह संस्कृति पर देर तक बातें करते हुए हम कई सूफी संतों की चर्चा से गुज़रे इतने में भूपालसागर आ गया जहां से आकोला मात्र पंद्रह किलो मीटर था.यहाँ से सन्डे की छूट्टी पाकर हस्तीमल जी कोठारी भी हमारे साथ हो लिए.

गाड़ी सीधे एक संकड़ी सडक के सहारे मिनटों में ही आकोला जा पहूंची.बेडच नदी के किनारे.गाँव को दो फाड़ करती है बेडच.मगर बारिश को छोड़ यहाँ पानी देखने नहीं मिलता.स्क्रिप्ट का पहला-दूसरा ड्राफ्ट हम पढ़ चुके थे.रूपक लिखने वाले समाजशास्त्र के कॉलेज व्याख्याता डॉ हस्तीमल कोठारी का हमारे साथ होना एक बड़ी सहूलियत साबित हुआ.इस रूपक के बहाने मैंने पहली मर्तबा अपने ही जिले की बहुत ज़रूरी आर्ट को देखा और जाना. वहाँ के कारीगरों के यथार्थ से परिचय हुआ.उपरी आकर्षण के बीच के संघर्ष की कहानी है आकोला की दाबू प्रिंट.वक़्त के साथ मूल काम से फिसलते हुए दूजे काम धंधों की तरफ का निकास दिखाता है आकोला.ज्यादा मेहनत के बाद मिलने वाले कम दाम से दुखी कामगारों की स्टोरी है आकोला.और भी बहुत कुछ.पहला परिचय कारीगर सुरेश छिपा की घरवाली सुशीला से हुआ.लट्टे पर नेप्थोल छाप रही थी.उठी,हाथ जोड़े,कुशलक्षेम पूछी.कोठारी जी पूर्व परिचित थे.फिर बेटी पूजा आयी.कोई दसेक मिनट में चाय कपों में चाय आ गयी.बेटा नदी के पार कारखाने जाकर सुरेश जी को बुला लाया.बारी-बारी से हम इंटरव्यू लेने लगे.पूरा परिवार हमें किसी तारणहार की तरह ट्रीट करता रहा.अपनापन और पूरी सहजता.

गाँव में दो सौ घर छिपों के.सौ घरों में आज भी यही रंगाई-छपाई.यह जाति मेवाड़ राजवंश से ही यह पुश्तैनी काम करती रही.लोग गाँव छोड़ गए भी मगर काम भी यहीं छोड़ गए.दाबू प्रिंट के ज़रिये फेंटया,ओढ़नी,सलवार शूट,बेडशीट बनाने वाले कामगारों को रंगते-छापते और कुण्डियों में कपड़े जकोलते देखा.हर दूसरा घर और यही दाबू प्रिंट का राग-विराग.युवा कम ही दिखे.जवान और बूढ़े अधिक थे.यहाँ बूढ़े का मतलब अधेड़ उम्र ही हो क्योंकि इस मेहनती काम में मजबूत शरीर चाहिए ही.फिर हम एक दो कारखानों में और गए.यहाँ के अवार्डी कारीगर और लगभग अच्छे व्यवसायी भेरुलाल छिपा से मिले.कोई पचासेक की उम्र के होंगे. दो बेटे हैं दोनों इसी धंधे में लगे मिले.कपड़ों की गांठे बंधकर दूसरे शहरों में भेजे जाने के लिए तैयार थी.माल रखने के लिए एक बड़ा गोदाम था.नौकर थे,चाकर थे.बाहर एक बाड़े में कपड़ों को सुखाते,निचोड़ते मजदूर.छिपा के अलावा जातियां भी मजदूरी कमा रही थी.

यहाँ दाबू प्रिंट के बने फेंटये लोकप्रिय हैं.यानी गुर्जर,जाट और रेबारी औरतों के घाघरे.दौ सौ रूपए मीटर.सबसे छोटी साइज ही छ मीटर से शुरू.बारह सौ रूपए का एक घाघरा दो साल चलता है.मोटा कपड़ा जिसपर मेहरून और नीले रंग का कमाल फबता है.बड़ी ज्ञानवर्धक यात्रा.अमीर आदमी महंगा वाला घाघरा ख़रीदे तो भी कोई ढाई हज़ार से पैंतीस सौ रूपए तक पड़ जाता है.ज़माने के हिसाब से ये लोग अपने रंग,डिजाइन और उत्पाद बदलने लगे हैं.बंधेज का भी काम करने लगे हैं.प्राकृतिक रंगों से कुछ हद तक केमिकल रंगों पर सरक गए हैं.हम एक वर्कशॉप में गए वहाँ राजस्थान से बाहर के भी रंगरेज कामगार और मजदूर के रूप में लगे हुए मिले.आगरा का सुरेन्द्र मिला,फरीदाबाद का प्रवीण कुमार कश्यप मिला.गुना की संतरा बाई मिली.कोई दाबू बना रहा था,कोई कपड़ों से दाबू छुडा रहा था.कोई नेप्थोल छाप रहा था तो कोई मेहरून रंग के लिए कपड़ों की धुलाई कर रहा था.सब के पास बहुत सारा काम था और दिन था की शाम की तरफ बढ़ रहा था.सुपरवाइजर का डंडा कायम था.टार्गेट अलोट किए हुए थे.मेहनताना बंधा हुआ था.पेट की आग का सवाल था.रंगाई-छपाई का ये माल जो भी चाहे ख़रीदे और चाहे जितने में ख़रीदे इन कर्मचारियों को पगार से लेनादेना था जो कभी कभार ही बढ़ती थी.बाज़ार और बड़ी फेक्टरियों के दबाव में हस्तकला मर रही थी जिसके हम चश्मदीद गवाह थे.हमारा रूपक उनके घरों में रोशनी फूँक सकेगा यह मात्र आशा ही थी.वैसे भी आस के सहारे ही रास्ते कटते हैं.

हमारे में से एक दो ने बेडशिट खरीदी,कइयों के मूल्य पूछे,कई सलवार शूट उलट-पुलट कर देखे,रंगते-छपते कपड़ों को छू कर देखा.घरों में नंग बांधती और बंधेज तैयार करतीं औरतें देखी.दिन का वक़्त था गाँव में बच्चे गायब थे.सन्डे के बावजूद दाबू के काम में बच्चे आसपास भी नहीं फटकते दिखे.मतलब उनकी रूचि साफ़ है.जितने लोग मिलें कमोबेश सभी के हाथ काले-कलूटे,मगर जाना कि इन रंगीन हाथों से भोजन करते वक़्त कोई नुकसान नहीं है.लोग बस अपनी रोटी के जुगाड़ में धंसे दिखे.कोई बड़ी रोनक नहीं थी.सरकारी मदद से किसी बड़े काम की आस वे कबके खो चुके थे.परिवारों के आपसे समीकरण उनके माथों और बातों पर साफ़ असर दिखा रहे थे.कइयों की बोलचाल बंद,कइयों का आपसी आवन-जावन बंद.कामगारों में अधिकाँश भाईबंद ही थे.कुल जमा तीन-चार गोत्र के परिवार.पूरा गाँव छिपों का आकोला था मतलब हर तीसरा घर छिपा जाति का.और हर दूसरा छिपा परिवार रंगरेज बना था.कारखाने लगाने की हिम्मत दो सौ परिवारों में से कोई पाँचेक ही जुटा सके.जहां कारखाना होगा वहाँ कुंडी होगी,पानी का टेंकर होगा.रंग की कुण्डियाँ होगी.बड़ी जंगी टेबलें होंगी,कारीगर होंगे,कामगार होंगे,मजदूर होंगे.


आख़िरी बातचीत अस्सी साल की बुढ़िया राधा बाई से हुयी थी शायद जो आज भी बंधेज के लिए कपड़ों पर नंग बाँधने का काम करती थी.कहती हैं आज भी मौका मिलता है तो नंग बाँध लेती हूँ मगर अब उतना काम नहीं होता.यहाँ आज की बहुएं ये काम कम ही करती हैं.खाने-पीने और बच्चों से फारिग होकर वक़्त मिलता है तो कर लेती है थोड़ा बहुत.पहले वक़्त दूसरा था जब मोहल्ले की सारी औरतें एक जगह बैठकर बातों के फटकारे उडाती हुयी नंग बांधती थी.गीत गाती थी.नंग हर समाज की औरतें बाँध लेती है.आते समय गाँव से चार किलो मीटर दूर बने कॉमन फेसिलिटी सेंटर की खंडहरी हालात देखी.योजना बंद,काम बंद,सोसायटी सुस्त,तालों,किंवाड़ों को जंग.ऊपर से शुभ-शुभ कहने और दिखने वाली आकोला दाबू प्रिंट के लिए आज भी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.खैर लौटते में हमने भूपाल सागर रेलवे स्टेशन के बाहर एक ठेले पर गरमागरम मिर्ची बड़े खाए और हस्तीमल जी को उदयपुर के विदा किया.मशगूल इतने हुए कि  हम भी भूल गए थे कि अपने घरों में किसी को सुबह छोड़ कर आए हैं.अपने-अपने घरों से फोन आने लगे थे.बस फिर तो हम चित्तौड़ लौट आये.ऐसे बीता एक यादगार दिन.आकोला के नाम.
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नगीन तनवीर की तरफ का रास्ता हबीब साहेब तक जाता है:नगीन तनवीर वो नाम है जिन्हें हबीब साहेब को नगीन-नगीन आवाज़ लगाते सुना है.नगीन जी का पहला रंगमंचीय अभिनय बनारस में देखा.ये बात साल दो हजार पांच-छ की होगी शायद.ठीक से गणित याद नहीं.गर्मियों के दिनों में बनारस के सात दिनी प्रवास में हबीब साहेब का निर्देशित बहु प्रसिद्द नाटक 'चरणदास चोर' देखा.रात के अँधेरे में एकदम खुले में देखा गया नाटक जो मेरे जीवन का पहला नाटक दर्शन था.उसी प्रस्तुति में नगीन जी को कई बारी गीत गाते देखा.छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के गाने वाले समूह में अगुवा थीं नगीन जी.बाद में सारनाथ घुमने में उन्हें अपने पिताजी के साथ टहलते देखा.वैसे हबीब साहेब के काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन सहित नया थिएटर के बाकी लोगों पर भी थी.नगीन जी प्रबंधन में उतनी सतर्क और तेज़ नहीं पड़ती जितने महारथ उन्हें अभिनय में है.स्पिक मैके में बाद के सालों में भी कोई तीन-चार मौके मिले जहां हबीब साहेब के काम को करीब से देखा.ऐसा एक भी अवसर नहीं था जब हबीब साहेब मिले और नगीन जी साथ ना हो.खुशकिस्मती ये कि हमने थिएटर का पहला और सम्पूर्ण स्वरुप ही हबीब साहेब जैसे दिग्गजों से जाना.खैर.ज़माना भले नगीन जी को 'पीपली लाइव' फिल्म के उस गीत से जानता हो जिसमें फिल्म के अवसान पर गाती हुयी सुनायी गयी है कि 'चोला माटी के लाल' मगर वे बहुत गंभीर और सधे हुए गले की गायिका हैं.

हबीब साहेब चल बसे.इस बीच नया थिएटर के बिखराव के पूरे चांस पैदा हुए मगर नगीन जी ने अपने ज़रूरी अवसाद से बाहर निकल तीसेक छत्तीसगढ़ी कलाकारों का वो नाट्य समूह सम्भाला.प्रबंधन में मंडली के बुजुर्ग साथी संगत करते रहे.यह वाकई सच है कि एक कलाकार कई बार प्रबंधन के झमेले संभाल नहीं पता है.कलाकार का अधिकाँश वक़्त सृजन और चिंतन में गुज़रना चाहिए मगर वक़्त के दबाव में आज देश के कई नामी कलाकार खुद के प्रबंधन के लिए सेक्रेटरी रखें को मजबूर हैं.क्योंकि इस घोर कलियुग में खाली कलाकारी से कुछ नहीं होता मेनेजमेंट भी उतना ही ज़रूरी है.चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल में भी एक बार नगीन जी के निर्देशन में हमने 'चरणदास चोर' का अभिनय कराकर अपने एक ज़रूरी सपने को पूरा किया.वो दिन वो कलाकारों की सेवा में गुज़री रात आज भी मिनटों में ही यादों के फलक पर तैरने लगती है.एकबार फिर भोपाल के भारत भवन में हमें हबीब साहेब के निर्देशन में उनके समय रहते पूरा नहीं हो सका नाटक 'कोणार्क' देखा.जगदीश चन्द्र माथुर के लिखे उस नाटक को देखने और समझने में हमें अपने वरिष्ठ मित्र और संस्कृतिकर्मी विनय उपाध्याय की मदद आज भी याद है.फिर ये जाना कि नगीन जी गाहे-बगाहे नाटक मंचन के अलावा भी गायन करती हैं.वे कुशल नृत्यांगना और संगीतकार के तौर पर भी अपनी भूमिका अदा कर चुकी हैं.ये बात उनके चित्तौड़ प्रवास के दौरान मैंने सूनी मगर कभी कोई रिकोर्डिंग ठीक से हाथ नहीं लग सकी.यूट्यूब पर उनके गाये गीतों की सामग्री कमोबेश नहीं के बराबर हैं.अभी पता चला होली के मौके पर भोपाल की प्रसिद्द और गंभीर कलाकर्म को पोसती पत्रिका 'कला समय' उनका एकल गायन करवा रही है.ये भी पता चला कि वे सुलोचना ब्रहस्पति जी की शिष्या हैं,फिलहाल भोपाल में ही यथासमय रमाकांत-उमाकांत गुंदेचा जी से ध्रुपद सीख रही हैं.
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बोलमा:एक रविवार परिवार के साथ बीत गया.लगता है ये बहुप्रतीक्षित रविवार था.ऐसे रविवार घरों में सुकून भर देते हैं शायद.अगर एक बहुधंधी आदमी अपना पूरा दिन परिवार पर कुर्बान पर कर दे तो समझो बहुत दिन तक के लिए घर में शांति और तसल्ली का वास हो जाता है.पत्नी की महीनों की नाराजगी एकदम काफूर.छुटकों-छुटकी की बहुत सारी मुरादें पूर जाती है.ऐसी ही शक्ल वाला लगभग सौ किलोमीटर की बाइक पर सवारी के नाम का रविवारीय दिन गुज़र गया.सड़क,पगडंडी,गाँव,बस्तियों से होकर गुज़रते हुए मस्जिदों और मंदिरों के पास से गुज़रते हुए.शुरुआती बोणी-बट्टा ही खराब हुआ गोया यात्रा का सबसे खराब हिस्सा चित्तौड़गढ़ से निम्बाहेडा तक बनते फोरलेन की उड़ती हुयी धूल,बेतरतीब चलते ट्रक-बसों से भेंटना था.सहसा याद आया कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर चलना आत्महत्या करने के माफिक होता है.

यात्रा में बहुत कुछ देखा जो आखों की पहुँच में था.फूलों की सफेदी से पास बुलाती अफीम की फसल का उफान और पीलेपन में अब बढाती सरसों का अवसान एकसाथ देखा.ठाठ यह रहा कि हम कभी बातों के हवाई पुल बुनते हुए आनंद विभोर जैसा कुछ अनुभव कर रहे थे या कि फिर कभी-कभी घुटनों पानी से रोज़ाना गुज़रते हुए किसानों की अनुभूति से एकमेक हो रहे थे.यात्रा असल में अपने मूल ससुराल मध्य प्रदेश के जावद कस्बे की थी.गौरतलब है कि कामधंधे की तलाश ससुराल वासियों को जावद सरीखे कस्बे से भोपाल जैसे 'लगभग महानगर' में खींच ले गयी.अपने पीहर आने से बहुत पहले से ही नंदिनी अपने बचपने के दिन याद करती हुयी दे लम्बी-लम्बी बातें सुनाने लगी.वही सब बातें जो वो मुझे कई बार सुना चुकी थी खैर मैं सुनता रहा क्योंकि वो अपने गाँव को लेकर पर्याप्त नोस्टेल्जिक थीं.ये वही नंदिनी थी जो मुझे कभी गाँव में खो जाने और कविताओं में गाँव का फेरा लगा देने पर घेरती रही थी आज खुद गाँव में उलझी थी.वो बोलती अच्छा है और मैं अच्छा सुनता हूँ ये अलग भात है कि मुझे हुंकारा भरने में कभी-कभार आलस आ जाता है.साफगोई से अपने बचपने की ग़रीबी बखानती रही नंदिनी का ये अंदाज़ मुझे फिर भा गया.यहाँ तक कि अपने ही मुफलिसी के उन दिनों को अपने कटाक्ष में लपेटती हुयी बड़े आनंद के साथ सुना रही थी.खैर.

देहातों में बढ़ते धर्मस्थलों के इस दौर में कहना यह चाहता हूँ कि जावद में ज्वाला माता का एक मंदिर है.मेरे ससुराल वालों की परम इष्ट स्थल.एकाध रतजगे में मैं भी शरीक हुआ.पत्नी नंदिनी की कोई बोलमा (मनौती ) बाकी थी जिसके बारे मैं अब भी नहीं जानता.मैं सिर्फ गिरस्ती धर्म निभाने के लिहाज से उसके साथ था.इसे आप सुविधाजनक आस्थावादी रवैया कहें तो भी हर्ज़ नहीं होगा.हाँ तो हम कहाँ थे ; तैयारी पूरी थी, थैले में दो चुनरियाँ,दो पेटीकोट के लिए समुचित कपड़ा, ग्यारह अगरबत्तियां, माचिस यही कुछ था जो हमारी सास ने हमारी अर्धांगिनी को कहा और कई बारी याद दिलाया.हाँ एक मुट्ठी (मुट्ठीभर गेंहू)भी ले आये थे.जावद आते ही हमने तीसेक रूपए के दो मालाएं और कुछ खुल्ले फूल, बीस का एक एक नारियल खरीदा. दरजी को पेटीकोट सिलने डाले.टेलर के कहे पर बीस रूपए की एक गोटा-किनारी ला के दी.पचास की नोट से चुकारा कर सिले हुए पेटीकोट में लच्छे की आंट डाली.यही कोई पौन घंटे के बाद माताजी के वस्त्र एकदम तैयार थे.लगे हाथ याद आयी तो वहाँ के प्रसिद्द हलवाई परबू कुम्हार के यहाँ से इक्कीस रूपए के मावे के पेडे लिए.अब हम 'बोलमा' उतारने के लिए लगभग तैयार थे.

मंदिर के पट बारह बजे बंद होने थे.हम पौने बारह पर मंदिर की चोखट पर थे.भोपाजी हाजिर-नाजिर थे.देखते ही पहचान गए 'भोपाल वाले प्रहलाद जी की बच्ची है तू तो? हाँ बीती नोरतां में जागण बहुत बढ़िया करवाया था उन्होंने'(यही बच्ची जिसे मैंने अपनी हमसफ़र बनाया था).भोपाजी ने माताजी को वस्त्र पहनाएं.मैंने अगरबत्तियां सुलगाई, तब तक पत्नी नंदिनी हाथ जोड़े माताजी की मूरत को देखती रही. अनुष्का भी नंदिनी के ही देखादेखी कर रही थी. जातरी आते-जाते रहे मगर हम अपनी बोलमा में ही रमे रहे. भोपाजी ने एक फूल दिया जिसे नंदिनी ने ही सम्भाला.उन्होंने बुहारी भी फेरी.बोलमा उतरते ही हमारा सन्डे सफल हो गया.हमारा मतलब नंदिनी का तो सफल हो ही गया.वो बहुत आस्तिक है मुझे उसके इस आस्तिकपणे से इस घर में बिलकुल कोई मतभेत नहीं है.हम दो विचारों के होकर भी बहुत समन्वय के साथ रहते हैं.समन्वय की यह कला मैंने शादी के सात साल में जाकर अब सीखी.वैसे यह कला है बड़े काम की.

आते में ससुराल के कई रिश्तेदारों ने दे चाय-पे-चाय के प्याले परोसे.हम आनाकानी करके भी बच नहीं पाए.शक्कर ज़बान पर देर तक चस्पा रही.कहाँ कहाँ नहीं गए ?सुनारों के साथ सुथारों, दर्जियों, बामणों, लाखारों, तम्बोलियों सब जगहों पर.वहाँ भी जहां भोपाजी रहते थे.वहाँ भी जहां पत्नी की सहेलियों के घर थे.सहेलियां अपने-अपने ससुराल चली गयीं मगर उनके घर तो थे ही.वहाँ भी जहां ढोली रहता था.राखी-दोड़े के भुवाजी के यहाँ भी.किसी ज़माने में कम बोलने वाले भाईबंधों से मिल आए.यह सभी कुछ हमारे सन्डे को यादगार बनाने पर तुले हुए चर्चे हैं.
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शुक्रिया स्पिक मैके:हमारी स्पिक मैके मंडली से आने वाले अपडेट्स में जाना कि संगीत कलानिधि आर. के. श्रीकांतन नहीं रहे।  एक बार फिर लगा कि यहाँ खबरों में मार्मिक खबरें बढ़ रही है या फिर मुझे ही ऐसा लग रहा है वैसे जान लो कि आजकल में ही 'ज़िंदगी और जोंक' वाले अमरकांत जी नहीं रहे, बांसुरी वादक पंडित रघुनाथ सेठ भी नहीं रहे।जब बड़े नाम वाले 'जानेमाने व्यक्तित्व' किस्म के लोग चल बसते हैं तो मैं उन्हें उनकी मृत्यु के बहाने उन्हें याद करते हुए फिर से उनका काम सुनने/देखने/पढ़ने लगता हूँ। यह आदत मेरे साथ ही है या फिर आप सभी के साथ भी, पता नहीं.ज़माने का दिलासेभरा वक्तव्य यही रहता है कि 'जीवन में आना-जाना लगा रहता है'।  फिर भी जब विचारक और कलाविद जैसे बड़े आदमी गुज़र जाते हैं तो यह असल में हमारे समाज के लिए एक बड़ा घाटा होता है। यह भी आभास हुआ कि इस तरह हमें अपनी ग़लतियों पर रोकने और टोकने वालों की कमी होती जा रही है।सोचो चोरानवे साला श्रीकांतन जी ने कितना सादगीभरा जीवन देखा होगा। मानवीयता के मायने और लगातार छीजती जाती संवेदनशीलता ऐसे लोगों को कितना विचलित करती रही होगी।एक अनुभूति यह भी सार्वजनिक करने काबिल है कि प्रतिदिन बदलते मानकों के बीच जीवन ठगा हुआ सा लगना लगा है।बाज़ार से विचलित हुए बगैर नाम कमाना और गंभीर किस्म का काम करते रहना ज्यादा मुश्किल और जोखिमभरा होता जा रहा है।

खैर,मैं यह कहना चाह रहा था कि आर. के. श्रीकांतन जी दक्षिण भारतीय प्रदेश कर्नाटक में पैदा हुए एक बड़े शास्त्रीय गायक थे।बड़े मतलब बना नाम नहीं बड़ा और गहरा काम।सात्विक जीवन,आध्यात्म के करीब का चिंतन,मौलिक लेखन,कवितामयी जीवन और गायन की असीमित साधना और उससे जुड़े अगणित अनुभव।सबकुछ श्रीकांतन जी के साथ नहीं चला गया।हैदराबाद की प्रो. गंगादेवी जी की माने तो संतोष का विषय यह है कि उनके बहुत सारे रुचिशील शिष्यों ने उनसे वक़्त रहते सीखकर ज्ञान को सहेज लिया और अब गा/बजा भी रहे हैं।इस तरह की सूचनाएं कितनी सुखद होती है ना कि बहुत कुछ जो हाथ से छूट रहा था कुछ तो हमने सहेज लिया।मौलिकता और सृजन तो खैर सिखा नहीं जा सकता है फिर भी शैलीगत बदलाव और संगत से खुद में बहुत कुछ बदला जाता रहा है।श्रीकांतन जी कर्नाटकी शैली के गायन के ज़रिए नामचीन हुए और इधर हम देखते हैं कि हमारे देश में बहुत बड़ी विडंबना यह रही कि दक्षिण भारतीय कलाकारों को उत्तर भारत में उतना सुना और देखा नहीं जाता जितना कि चाहिए।आयोजकों के लिए उनके बहाने दूरियों और रुचियों पर आकर अटक जाते हैं।असल में यह मामला सोच और विवेक के साथ जानकारी का भी है।वैसे जता दूं कि मैं कभी श्रीकांतन जी को तो नहीं सुन पाया,यहाँ सुनने का मतलब उन्हें सजीव रूप में सुनना से ही लिया जाए।आजकल के लोग टीवी-फीवी और यूट्यूब पर सुनने/देखने को ही सजीव समझ बैठे हैं यह भी हमारे ही समाज की कई विडंबनाओं में से एक है।बार-बार गफलत में पड़कर जीने वाले इन्हीं लोगों के बीच यह विचार आता है कि हमें कला, सिनेमा, रंगकर्म, चित्रकारी, कविता, कहानी जैसी ओर भी बहुतकुछ समन्वयकारी चीजों पर चर्चे और पर्चे जारी रखने चाहिए।

शुक्रिया स्पिक मैके का जिसने मुझ जैसे हिन्दी-भाषी को कई दक्षिण भारतीय कलाकारों को सुनने/देखने न खाली आमंत्रित किया बल्कि शुरुआती दौर में तो जबरन बिठाया भी।याद आता है कि पहले पहल तो शास्त्रीय नृत्य भाता था, फिर धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के करीब आया।जब मुझे कर्नाटकी गायन के संगत में जाने का मौक़ा हाथ लगा तब जाना कि यह भी अद्भुत संसार है।मैं सहसा अपने ही देश के एक बड़े भूभाग से अपनापा अनुभव करने लगा।अलगाव की सीमाएं टूटती नज़र आयी।मैं तभी से समझ पाया कि मैं एक राजस्थानी होने के साथ ही भारतीय भी हूँ।यह भारतीयता मुझे संगीत और नृत्य की इन्हीं सभाओं-संगतों से मिली।दक्षिण भारत के कई दिग्गज और तपस्वी गायकों/वादकों को सुन चुका हूँ। कई बार भरतनाट्यम, मोहिनीअट्टम और कुड़ीयट्टम का नाच देखा है।कभी सोचा नहीं था कि पंचवाध्यम को जानूंगा।यह भी तो नहीं सोचा था कि मेरे ज्ञान में 'अम्मानुर माधव चाक्यार' सरीखे टेड़े शब्द भी शामिल होंगे।यह तो बिलकुल नहीं जाना था कि हम टुकड़े, परण, तिहाई करते-करते पल्लवी, त्रिभंगी और तिल्लाना जैसी शब्दावली से भी एकमेक हो जायेंगे।आज भी जब मृदंग सुनता हूँ तो उसकी थाप को तबले से ज्यादा प्रभावी समझने लगता हूँ।हालाँकि इस उत्तर भारत ने मुझे कथक की प्रस्तुतियां ज्यादा भेंट की है फिर भी झुकाव दक्षिण की तरफ बढ़ता दिख रहा है।यह नए को समझने और उसे पर्याप्त आदर देने की आदतों का नतीजा कहा जा सकता है।

कलामंडलम गोपी से लेकर कलामंडलम अमलजीत तक का कथकली देखा है।यादों में बहुत कुछ सहेज लिया है उसी को तरोताज़ा करने के लिए कभी-कभार स्पिक मैके के अंतर्राष्ट्रीय उत्सवों में कूद पड़ता हूँ। यही रूचि मुझे मार्गी मधु, मार्गी विजय कुमार, कपिला वेणु, रमा वैद्यनाथन को साथ लेती हुयी सुदूर दक्षिण में ले जाती है। कई बार की यात्राओं और संगीत सभाओं में अगर मैं तब की अपनी संकुचित सोच के चलते नहीं जाता तो शायद कभी भी डॉ. एम्. बालमुरली कृष्णन की साधनापरक आवाज़ सुन नहीं पाता। प्रो. टीवीएस शंकर नारायणन को कैसे सुन पाता जो आज हमारे कर्नाटकी गायन शैली के एक बड़े आयकॉन बने हुए हैं। यदि इन बेतरतीब रुचियों का झमेला नहीं पालता तो मैं स्वामी त्यागराज जी की एक भी रचना अपने कानों में नहीं उंडेल पाता। प्रादेशिक संकीर्णता ने ही मुझे बाँध दिया होता तो यक्षगान नहीं देख पाता।मैन्डोलिन, घटम, वायलिन, चित्र वीणा, मीराव, एडक्या तो कभी सुन ही नहीं पाता। यहाँ उन तमाम तकनीकों को शुक्रिया जिनकी बदौलत हमारी और हमारे बाद की पीढ़ी को यह साझी विरासत विडियो, ऑडियो और फोटोग्राफ्स के माध्यम से आंशिक खुशबू में ही सही मगर सुलभ हो सकेगी।
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आनंदीलाल जैन उर्फ़ डॉ. ए एल जैन:मेरे लिए चित्तौड़ का मतलब कभी-कभी डॉ ए एल जैन भी होता रहा है.बहुत लम्बे अरसे तक बापू नगर सेंथी का ए-चौसंठ,शुभम का अर्थ तो जैन साहेब का ही घर रहा है जहां से हमारी दौड़ शुरू और ख़त्म होती रही.यों उनसे कभी पढ़े नहीं मगर फिर भी वे हमारे गुरु हो गए.हम भी अच्छे वाले शिष्य निकले.सुझावों पर अमल करते,कहे पर हामी भरते और एक आदेश पर दौड़ जाने वाले चेले.उन्होंने कभी भी हमें अपना अनुयायी नहीं बनाया और खुद भी कभी मठाधीश नहीं बने.उनका काम ही मठाधीशी के खिलाफ खड़े होने से शुरू होता लगा है.विचारधारा के भंवर में वे कभी नहीं फंसे.जीवन में दोगलेपन से वे अमूमन दूर ही दिखे.शहर में एक सुविधाजनक आदमी के रूप में उनकी पहचान हमें उन पर फ़िदा करने में सहूलियत देती रही,आज भी हम उनके साथ महफूज समझते हैं.एक दिशासूचक की तरह वे हमेशा मशवरे देते हैं.यात्रा इतनी लम्बी चली कि हम उनकी ज़बान से कहे तो 'माणिक' से 'माणिक जी' हो गए.ऊँचें होते कद और समझ में बढ़ोतरी उन्हीं की बदौलत है.

बीते दिन की शाम एक घंटे उनसे संगत हुयी तो कहना चाहता हूँ कि हमारे दिशासूचक डॉ.ए एल जैन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के कवर पेज अंतिम चरण में हैं.यह पुस्तक चित्तौड़गढ़ में जैन धर्म से जुडी समस्त तथ्यात्मक जानकारियों सहित चित्तौड़ दुर्ग का एतिहासिक दस्तावेज भी साबित होगी.यह पुस्तक जैन धर्मावलम्बियों के साथ ही आने वाले पर्यटकों के लिए भी उपयोगी होगी.पुस्तक में रोचक तथ्यों सहित चित्तौड़ में रहे-बसे जैन विचारकों का हवाला है. उस साहित्य का संक्षिप्त ज़िक्र है जो यहीं रहकर रचा गया. जैन आचार्यों और तात्कालिक बादशाहों के बीच के संबंधों को भी यहाँ पुस्तक में समुचित रूप से उकेरा गया है.जैन साहेब के ही शब्दों की उधारी में कहूं तो शक्ति और भक्ति की नगरी पर सरस्वती को धरती सिद्ध करने की एक जुगत भी यह पुस्तक साबित होगी.चित्तौड़ के दर्शनीय स्थलों की जानकारी सहित इसमें कई शिलालेखों की इबारतें और छायाचित्र प्रकाशित होंगे.पुस्तक को अंतिम रूप देने के प्रोसेज में मैं भी कहीं-कहीं इसमें शामिल होता रहा हूँ.संभतया कवर पेज चित्तौड़गढ़ के ही युवा चितेरे मुकेश शर्मा के चित्रों को आधार बनाकर बनेगा.गौरतलब है कि यह पुस्तक डॉ ए एल जैन के कई सालों की मेहनत और बीते एक साल के गहन अध्ययन का नतीजा है.इस बीच उन्होंने वीर-विनोद से लेकर गोरीशंकर-हिराचंद ओझा सभी को दो-दो तीन बार पढ़ा है.मूल रूप से केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर डॉ जैन की साहित्य में फोरी तौर पर रूचि रही है.वे पूछने या नहीं भी पूछने पर कहते रहते हैं मैं अपनी सीमा जानता हूँ मैं ज्यादा आलोचना-समालोचना और पाठालोचन जैसी गंभीर किस्म की शब्दावली साहित्यिक माहौल में पड़ना नहीं चाहता हूँ.हाँ समाज और धर्म के लिहाज से भी वे पर्याप्त रुचिशील ढ़ंग से अध्ययन करते रहे हैं.इस पुस्तक में उनके मतानुसार कुछ गहरी सेवा भावना के साथ काम कर रहे समाज के सेवकों का भी ज़िक्र आया है.

लगे हाथ थोड़ा सा अतीत में लौट लें.जैन साहेब से पहली मुलाक़ात सन दो हजार दो में हुयी थी.जब स्पिक मैके अपनी स्थापना के रजत जयंती वर्ष में था.मैं विद्या विहार जैसे निजी स्कूल में नौ सौ रूपए महीने की पगार पर टीचरी कर रहा था.अपनी बीए की पढ़ाई के दौरान स्वयंपाठी होते हुए भी महाराणा प्रताप पी जी कॉलेज में यदा-कदा जाता रहा(तब शायद इसका नाम महाराणा प्रताप नहीं था.).खासकर संस्कृत के वेदचयनम वाले पेपर के लिए विनय शर्मा मेडम की क्लास में.वहीं हरीश खत्री ने मुझे पकड़ा और स्पिक मैके में दाखिला दे दिया.हरीश ने नहीं सोचा होगा कि यही माणिक लम्बी रेस का घोड़ा साबित होगा.खैर तब डॉ जैन स्पिक मैके के अध्यक्ष हुआ करते थे.संपर्क बढ़ता रहा.अगले साल ही सचिव बना दिया.कॉन्सर्ट में आते-जाते रहे.पिकनिक  सरीखे सपाटे भी हुए.फिर तो उनके घर आना-जाना हुआ.हम जैसे गाँवड़ेल तब इसी बहाने आने-जाने,डोर बेल बजाने,सोफे पर बैठने,बड़े आदमी के सामने चाय सुड़कने के सलीके सिख रहे थे.वैसे वे हमेशा अपने बहुत गंभीर किस्म के अपीयरेंस में पेश होते तो हम अकसर डरे ही रहते थे.हाँ उनसे एक शर्म हमेशा से ही बनी रही.उनका हम में बड़ा अनुराग और स्नेह है.खासकर देहाती युवाओं के साथ वे अतिरिक्त अपनापा दर्शाते हैं.तब देहात का मतलब मैं खुद,अरनियापंथ का लालुराम सालवी और वहीं का गोवेर्धन बंजारा था.आज भी वही अपनापन बरकरार है.

कई बार शहर के बाहर भी उनके साथ यात्राएं की.डॉ जैन ने हमें रिश्तों की केअर करना सिखाया.अब भी वह स्नेह की डोर बहुत प्रगाढ़ रूप में तनी हुयी है.पंद्रह दिन बिना फोन-फान के बीत जाए तो डांटने के लहेजे में उधर से आवाज़ आती 'बड़े आदमी हो गए हो, फुरसत नहीं है क्या,हमारे रिश्ते ऐसे भी नहीं है भाई' .हम शर्म से लजा जाते.खैर हम बढ़े होते रहे.फिर तो स्पिक मैके में ही मैं उनका सचिव भी रहा,एक नहीं दो-दो बार.वक़्त के साथ उनके साथ रिश्ता ऐसा हुआ कि डर भांग(ख़त्म )गया.अब उतना डर नहीं लगता मगर आज भी एक अंतराल के साथ आँखों में शर्म बचा के रखी है जो हमारे संस्कारों की परिचायक है,होनी भी चाहिए.मुझे उन्होंने कई संस्थाओं से जोड़ा और ईनाम दिलवाए.वक़्त ने हमें भी समझने का मौक़ा दिया मगर ज़माने की कई टेड़ी परिभाषाएं मैंने जैन साहेब से ही सीखी.जब भी उनके घर जाओ एक-दो पुस्तकें रिकमंड करते दिखते.मतलब वे बहुत विस्तार के साथ पढ़ते हैं और उसी में से कुछ पढ़ा हुआ उनकी बातों में झलक ही जाता है.एकदम सात्विक किस्म के आदमी हैं जैन साहेब.एक भी आदत ऐसी नहीं कि खीज हो.'आकर्षण' क्या होता है उनके साथ खिंचकर चले जाने से ही समझे हैं.देश और समाज के बीच जीने का सलीका और बेहतर रास्ते हमें उन्होंने भी सुझाए हैं.

उन्होंने कभी सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल वाली नौकरी से वीआरएस लिया.मेवाड़ गर्ल्स कॉलेज में विजन स्कूल ऑफ़ मेनेजमेंट जैसे संस्थानों में प्राईवेट नौकरियाँ की मगर जल्द ही उब गए.असल में वे नियमों और उसूलों के आदमी ठहरे.सोचने-समझने और पूरे संयम से फैसले लेने वाले इंसान.कभी-कभार के उनके गुस्से के आगे कोई ठहर नहीं पाता था.अच्छे खासे की धूजणी छूट जाती.उनके सानिध्य में काम करना भी अलग आनंद का मसौदा रहा.उनका दख़ल मानव सेवा के क्षेत्र में भी रहा.वैसे उनकी रुचियाँ ग़ज़ल और शेर सुनने-कहने में रही है.वे कभी भी रोटरी-लायंस-जेसीस-भारत विकास परिषद् किस्म की संस्था से प्रभावित नहीं हुए.राजनीति और अफसरों से पर्याप्त दूरी ही उन्हें भायी.आज भी आयोजनों में उनकी शिरकत में उनके अपने सिद्धांत आड़े आते हैं तो वे नहीं जाते.अरे हाँ एकाध आँख-कान-नाक और दांतों के शिविरों में हमने भी सेवा की, प्रेस नोट दिए, फोटो खींचे, दरियां बिछाई, मेहमानों को लाये-ले गए, नास्ते-पाणी के कई आयोजन निबटाए, एक दो संगोष्ठियाँ उनके घर पर भी सजाई. कई बारी बैठकों के शुरू होने से पहले टेबले-कुर्सियां कपड़ों से पोंछी, पौछे लगाए, कई बार की रसोई-पाणी के कार्यक्रमों में आखिर में बर्तन-भांडे टेंट वाले के यहाँ पहुँचाने तक के काम में जैन साहेब हमारे साथ मुस्तेद रहते थे. यही अदाएं हैं उनकी जो हमें उनसे प्यार करने को प्रेरित करती हैं.वैसे यही उनका काम करने का जुदा तरीका है.एक तरह का पर्सनल टच. कई बार ऐसा भी हुआ था कि असमय की भूख के बीच हमने उनके साथ चाय-बिस्कुट-सेव-नमकीन से वक़्त गुज़ारा.कुल मिलाकर एक सुविधाजनक और आत्मीय व्यक्तित्व की छाया में हैं हम.शुक्रिया जैन साहेब हमें अपने इतना करीब रखने के लिए
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राजकुमार रिज़वी के बहाने:ज्यादा पुराणी तो नहीं फिर भी बीते सालों की बात है एक बार राजकुमार रिज़वी साहेब मीरा महोत्सव में चित्तौड़ आये थे.ग़ज़ल कहने वालों में एक बड़ा नाम.राजस्थान के लगभग रेतीले इलाके का एक फनकार जो खूब छाया रहा मगर आलोचक डॉ दुर्गा प्रसाद अग्रवाल की माने तो उतनी तवज्जो नहीं पा सके जितनी के वे हक़दार हैं.खैर,तब उनका पूरा कार्यक्रम डॉ ए.एल.जैन साहेब के देखरेख में होना था.हुआ भी.मैं भी घंटे-अधघंटे के लिए गया.असल में मैं ग़ज़ल का उतना शौक़ीन नहीं हूँ जितना हमारे मित्र कौटिल्य भट्ट हैं जितना नितिन सुराणा हैं.डॉ ए एल जैन हैं.एक हमारे अध्यापक मित्र तरुण लोठ हैं, भगवती लाल सालवी हैं.मैं तो खाली ग़ज़ल के नाम पर कुछ चुनिंदा आमफ़हम ग़ज़ल-गो के नाम ही जानता हूँ। नुक्ता लगाना अभी सीखा ही है.नामों की सूची से आगे अगर कोई यह पूछ बैठे तो गड़बड़ा जाता हूँ कि कौनसी ग़ज़ल किसने गाई और किसने लिखी है.खामियां है निकलते हुए ही निकलेगी.शेर,शाइर,मतला जैसी शब्दावली से अभी-अभी मुलाक़ात हुयी है.अच्छी जान-पहचान में वक़्त तो लगेगा ही.अभी मेरे लिए ऐसा वक़्त नहीं आया कि जगजीत सिंह को छोड़कर बाकी की आवाज़ एकदम से पहचान सकूं.ग़ज़ल की दुनिया भी कितनी खुबसूरत है इस बात का अहसास एक फिर तब हुआ जब चित्तौड़ के जिंक नगर में उस्ताद राजकुमार रिज़वी को सुना.ये मौक़ा हमारे साथी विपुल शुक्ला और जीएनएस चौहान ने सुझाया था.बाद में जाना कि यह जाजम हमारे यहाँ के रुचिशील एसपी प्रसन्न कुमार खिमेसरा और जिंक के यूनिट हेड विकास शर्मा ने बिछाई.शोर्ट नोटिस पर हुआ एक अच्छा आयोजन.इस शहर में ग़ज़ल के नाम पर दो-तीन साल में जाकर कोई ढंग का आयोजन आकार लेता रहा है.बेहतर रुचियों के लिए वैसे भी माहौल उतना उत्साहभरा नहीं है.फिर ग़ज़ल के शौक़ीन भी अपने-अपने घरों में ही दुबके हैं शायद.खैर यहाँ विषयांतर होने से बचाते हुए आगे बढ़े.

उन्नीस फरवरी की शाम-ए-ग़ज़ल का आगाज़ रात सवा आठ के आसपास हुआ.बास्केट बॉल के मैदान में ग़ज़लों की शाम.हवाएं इतनी ठंडी कि लोग जर्सी-कोट-मफलर-शॉलों में लिपटे चले आये.संख्या यहाँ भी ऋणात्मक लिंगानुपात की तरह ही थी.आगे की कुर्सियों पर बैठने की हिम्मत और संस्कार हममें नहीं थे.साइड की चारेक कुर्सियों पर जा चिपके.मैं,पत्नी नंदिनी,साथी कौटिल्य भट्ट और अनुष्का.कुछ देर में स्पिक मैके के दौर का लंगोटिया यार नितिन सुराणा और रमेश प्रजापत भी आ जुड़े.मुश्किल से पाँच मिनट गुज़ारे होंगे कि हमारे गुरु डॉ सत्यनारायण जी व्यास और साहित्य के साथ ही सिनेमा की पर्याप्त समझ रखने वाली रेणु दीदी भी आयी.इस सूची में पहचान के कई नाम बाद में जुड़ते गए.डॉ ए एल जैन साहेब, सत्यनारायण जी समदानी, भंवर जी सिसोदिया, कर्नल रणधीर सिंघजी, घनश्याम सिंह जी राणावत, जिला कलक्टर रवि जैन साहेब सब के सब फ्रंट रो में थे.आगे वालों को मंचस्थ कलाकार थे.जैसी उदघोषणा हुयी-के मुताबिक़ मेहदी हसन साहेब के पहले शागिर्द राजकुमार रिज़वी साहेब,उनकी अर्धांगिनी और विदुषी किशोरी अमोनकर की शिष्या इंद्राणी रिज़वी थी,साथ में उनकी बेटी नेहा रिज़वी।मुआफी चाहूँगा अमूमन होती ग़लतियों की तरह यहाँ मैं भी सितार, तबला, औक्टोपेड, सिंथेसाइजर पर संगतकारों के नाम याद नहीं रख पाया.कलाकारों के परिचय देने का अंदाज़ और ग़ज़लों की बारीक समझ पर विपुल शुक्ला की दाद देनी पड़ेगी।कॉन्फिडेंट बन्दा है।

ग़ज़लों का आगाज़ और नितिन के साथ गुफ्तगू एकसाथ शुरू हुयी।वाह-वाही के बीच हमने कई बार ठहाके लगाए.लगा कि दिनों बाद मैं खुलकर हँसा.शुक्रिया नितिन तू आता है तो मैं औपचारिक आवरण से बाहर निकलने का वक़्त जुटा ही लेता हूँ.पास बैठे कौटल्य जी से हमने बीच-बीच में ग़ज़ल की परम्परा के शोर्ट टाइम क्रेस कोर्स के टिप्स भी लिए.तभी यह भी जाना कि अच्छे शेर पर वाह या आह कहने का आनंद भी पास बैठे साथी श्रोता की संगत और समझ पर आ टिकता है.वहाँ कई ऐसे सुनकार भी मिले जो ग़लत जगह पर दाद परोस रहे थे.रिज़वी साहेब ने आठ-दस मुकम्मल गज़लें सुनायी.एक-से-एक मशहूर ग़ज़ल.तभी जाना कि तस्लीम फ़ाज़ली साहेब ने कितनी बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है 'रफ्ता-रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामान हो गए' .वहीं 'रंजिश ही सही' के ग़ज़लकार अहमद फ़राज़ साहेब को भी रिज़वी साहेब ने याद किया.'इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाउंगा' , 'तुझे प्यार करते-करते मेरी उम्र बीत जाए' , 'इश्क़ में हमसे बेदिली कब तक' , 'मैंने कहा तू कौन है'  भी सुनायी।  अमीर मीनाई की ग़ज़ल 'सरकती जाए रुख से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता' दिल को छू गयी. अंजाम-ए-इश्क़ का मजा हमसे पूछिए' , इंद्राणी जी ने  शायद तबियत खराब होने की वजह कुछ नहीं ही गाया समझा जाए जिसे लिख सकें। नेहा रिज़वी ने फ़ैयाज़ हाशमी की ग़ज़ल 'आज जाने की जिद ना करो' से माहौल में फरीदा खानम जी की याद दिला दी.बाद के दौर में राजस्थानी लोक गीतों पर उन्होंने ने गला आज़माया मगर हम लौट आये.क्योंकि हम ग़ज़ल सुनाने के मूड से ही जो गए थे.

शामियाने के बाहर चाय-पकौड़ी का इंतज़ाम था.हालाँकि पैसे जेब में थे मगर चौहान साहेब के आमंत्रण पर मुफ्त में खाने-पीने का आनंद और आकर्षण हम छोड़ नहीं सके.ग्रुप फोटोग्राफी भी हुयी.अफ़सोस वहाँ हमारे बुजुर्ग मित्रों के शुगर फ्री चाय नहीं थी मगर वे पकौड़ी के साथ तो रमे हुए थे ही.नितिन कैमरा लेकर नहीं आया होता तो सबकुछ हमारी स्मृति के भरोसे ही याद रखना पड़ता।आयोजन में कमीपेशी पर चुटकियों के साथ हमने ग़ज़ल की दुनिया के चर्चे छेड़ दिए.काहिर हम जैसे नौसिखिए  का तो ज्ञानवर्धन ही हुआ समझिएगा।पूरी संगत बिखरी तो जाना घर लौटते में भयंकर शीतलहर से भेंट हुयी।अरे हाँ इसी शाम में रात साढ़े दस तक की महफ़िल में कई साथी दिनों बाद मिले।असल में मिलने-मिलाने का भी एक मकसद कहीं न कहीं आयोजनों की बिसात का ही हिस्सा होता है भले ही वह मक़सद तयशुदा ना हो.मीडिया के दोस्त जे पी दशोरा भैया,मुकेश मुंदड़ा भैया , युवा छायाकार रमेश टेलर, संजीदा पत्रकार राजेश रामावत, मित्र डॉ चेतन खिमेसरा जी सब वहीं मिले।शुक्रिया रिज़वी साहेब।आप खूब जीयें।
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एक नास्तिक की महाशिवरात्रि:पहले से तय हुए मुताबिक़ आज की छुट्ठी में हमने अव्वल तो शहर में हिन्दी का एक केंद्र बिंदु हमारे दोस्त डॉ राजेश चौधरी के साथ अनुभव सुनने में बिताई.राजेश जी के लिए दस बजे मिलना मतलब दस बजे ही होता है.मेरी बीस मिनट की देरी पर मुझे उनके साथ रहने के कुल समय में से आधे घंटे की कमी का खामियाजा भुगतना पड़ा.डॉ राजेश जी पर्ची पर दवाई-गोली लिखने वाले डॉक्टर नहीं हरिशंकर परसाईजी पर पीएचडी किए डॉक्टर हैं. बातें भी स्टाइल मार कर करते हैं. पहले तो हम दोनों लगे हाथ डॉ सत्यनारायण व्यास जी के घर गए जहां हमने जी-भर कर पूरे देश के सामयिक परिदृश्य पर चर्चा की.शोध और आलोचना में फरक पर. लगातार आ रही पत्रिकाओं के कमजोर पक्षों पर, कथा और कविता के बीच की प्राथमिकता पर, पुस्तक मेले पर, शहर के साहित्यिक माहौल पर. प्रादेशिक साहित्यकारों और उनकी आदतों पर. तरह-तरह से बातें छिड़ी. ज्ञानवर्धन हुआ. मैंने दख़ल देने के बजाय सुना ज्यादा. चर्चा में रेणु दी और चन्द्रकान्ता जी व्यास भी शामिल समझी जाए. व्यास जी ने बड़ी गज़ब बात कही आजकल जिस तरह से विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, असोसिएट प्रोफ़ेसर होते हैं,उन्होंने एक दिन पहले ही उदयपुर में हुयी एक दिवसीय सेमीनार के अपने वक्तव्य में से कहा कि ''आजकल प्रोफ़ेसर दो तरह के होते हैं एक 'पदेन' और दूसरे 'ज्ञानेन'. ''




दो घंटे की इस संगत के बाद हम राजेश जी के घर आए वहाँ पुस्तक मेले से लगभग आठ हजार की राजेश जी की खरीदी गयी पुस्तकों पर फोरी तौर पर चर्चा की.एक बार फिर जाना कि उनकी रूचि कथा और उपन्यास में ही है.उनकी खरीदी गयी कृतियों में दो ही किताबें ग़ज़लों की थी.बाकी उपन्यास,कहानी संग्रह या संकलन,एक समानान्तर शब्दकोष भी लाए जो एनबीटी ने छापा है वो भी वे ले आये.कविता-वविता में उनकी रूचि नहीं है.खासकर समकालीन कविताओं में.वैसे वे कविताएँ पढ़ते रहे हैं मगर खरीदकर कविता संग्रह नहें लाये.उन्होंने संजीव, अल्पना मिश्र, वंदना शुक्ल के नए उपन्यास ख़रीदे. हिमांशु पंड्या के सम्पादन में स्वयं प्रकाश जी का नया कथा संकलन, रविन्द्र और ममता कालिया की प्रेम कहानियां, लोकोक्तियों और मुहावरों के कोश ख़रीदे. निर्मल वर्मा, यशपाल, अमरकांत के कथा संकलन, ग़ज़लकार अदम गोंडवी और राजेश रेड्डी के नवीनतम संग्रह और निराला संचयिका भी वे खरीद लाए.

किताबें उनसे मांगकर पढूंगा. पहले भी लिखा वे किताबें बड़ी सहेज और जमा कर रखते हैं.उनकी इस खरीदी पर सुमित्रा भाभी जी बोलीं एक आलिया और इन्होने कब्जा लिया और इसमें रखी सारी ट्रोफ़ियां ऊपर वाले आलिए में सरका दी,बहुत कंजस्टेड हो गया है ना.इन ट्रोफियों को कहीं दूसरी जगह सरकाना अही पडेगा.किताबों से जुडी उनकी यात्रा के चर्चों के बीच उनके और के एस कंग साहेब के बीच की फक्कड़ी के किस्से भी आते-जाते रहे.फिलहाल राजकमल की भेंटी सुन्दर डायरी उन्होंने मुझे चस्पा कर दी.ले आया , डायरी बड़ी सुन्दर है.वैसे राजेश जी भी बड़े सुन्दर हैं. उनमें बाहर के साथ ही भीतरी सुन्दरता भी कायम हैं और अच्छी बात ये कि वे उस भीतरी सुन्दरता के ही लगातार सचेत रहते हैं..उनका भीतर भी मुझे उनके करीब ले जाता है.


दुपहर में दाल-बाटी ने देर तक सुस्ताए रखा.गहरी नींद के बीच एक अधिकारी के फोन पर अगले सन्डे की प्लानिंग संपन्न जिसमें इसी ज़िले के आकोला गाँव में रंगाई-छपाई के कारीगरों पर एक रूपक बनाने जाना फाइनल हुआ.इधर सुबह कवि और चित्रकार विजेंद्र जी से दो-तीन बार बातचीत हुयी.मैंने समझा और देखा कि उनकी उम्र वाले लेखकों में अधिकाँश इंटरनेट आदि को तामझाम कहने वाले ही रचनाकार हैं.मगर वे एकदम नवाचारी और अपडेट हैं.युवा पीढ़ी के साथ इस युग में भी इन तमाम नए संचार साधनों से भी संपर्क साधने वाले विजेंद्र जी.डिहर बीते दो दिन में एक परेशानी में जी अटका था. मेरी एक डायरी नहीं मिल रही. छोटा सा घर है जाने कहाँ घूम गयी.असल में उसमें मेरी कुछ अप्रकाशित और अनसहेजी कविताएँ थीं.दिल उदास है.खैर,सृजन तो ओर कर लेंगे.चिंता नहीं है.बहुत दिन से कविता बुन रहा हूँ मगर कागज़ पर नहीं लिखी गयी.मन है कि भीलों और गाड़िया लुहारों पर एक श्रृंखला लिखूं.मौके और वक़्त के इंतज़ार में हूँ.इधर कुछ नयी पत्रिकाओं में कविताएँ भेजी है.इसी दौर में कितना अजीब है इधर मैं स्वयं कभी-कभी अपनी माटी के लिए सम्पादन करता हूँ और इसी के समानान्तर खुद की कविताओं के लिए पत्रिकाओं के संपादकों से संपर्क करता हूँ.दोनों पक्षों को ठीक से अभिनीत किया है मैंने.

आज महाशिवरात्रि का दिन था. मतलब अवकाश. मंदिर, आरती, यज्ञ, आकड़े के फूल, बिल्व पत्र, लम्बी कतार, लाउड स्पिकर, महाराज, चन्दन टिका, दर्शन, व्रत, उपवास सरीखा कुछ भी नहीं. सवेरे बना अफीम के दाने का हलवा दोपहर में दाल-बाटी. शाम को गिरस्ती का सवाल था खरड़ेश्वर महादेव के दर्शन कराने घरवाली और अनुष्का को ले गया. मैंने चप्पलों का ख़याल रखा. साबूदाने की खिचड़ी के प्रसाद वाले दोने हाथ में थामे रखे तब तक जब तक पत्नी मंदिर में भगवान् देख कर ना आयी.मैंने मंदिर के बाहर आते-जाते हजारों भगवान् को देखा, उनसे मुस्कराया, बतियाया उन्हें नमस्ते-सलाम किया. उनकी कुशलक्षेम पूछी. उन्हीं में से कुछ भगवान् मिलने वाले निकल गए. उनसे ज्यादा गपशप हुयी. वहाँ कतार थी, प्रसाद था, दस-दस के हिसाब से फूल-मालाएं और बिल पत्र थे. पुलिस थी, रेलमपेल थी, आस्थावान लोगों का हुजूम था.बेतरतीब गाड़ियां थीं. पैदल उपवासी लोग और खासी संख्या में महिलाएं थी. कइयों से दिनों बाद यहीं मिला.शुक्रिया महाशिवरात्रि 
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आओ जातिवादी अग्राहों को हतोत्साहित करें:एक शाम अगड़ी जातियों के दो शिक्षित मित्रों से मुलाक़ात हुयी बातों ही बातों में हम जाति, दलित विमर्श और ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे विचारोत्तेजक मुद्दे पर आकर बोलने लगे. मतलब आप समझ गए होंगे कि बहस में बड़ा आनंद आया.बहुत सारा समय तो हम आरक्षण के फेर में ही उलझे रहे.फिर आगे बढ़े तो गाँव और शहर में फरक पर जाकर अटक गए. उदाहरणों से ही इस शाम में हमने कई गलतफहमियाँ दूर कर डाली .कई बार आपस में उलझे.एक दूजे को पटकनी दी.बोलने का स्वर कभी एकदम ऊंचा भी हुआ जो स्वाभाविक ही था .मैं इतना बोला की दोनों को चुप करवा दिया.वे बार-बार बहस से भटके भी मगर मैं उन्हें ठीक करता रहा यह तारीफ़ मेरी नहीं भाई मेरे हाल के पढ़े साहित्य की होनी चाहिए कि जब हम लगातार सार्थक और ज़रूरी किताबें और पत्रिकाएँ पढ़ते रहे हैं तभी तो हमारी दिशा और सोच का दायरा और ज्यादा साफ़ हो सका है.वैसे बता दूं कि तथ्यामक होते हुए हम खुद को करेक्ट करते रहे हैं.किसी के गलत पर अंगुली उठाने की हिम्मत जुटा पाए हैं.यूंही हाँ में हाँ मिलाना भुलने लगे हैं.एक बारगी लगा इस शाम में बीते सालों की साहित्यिक मित्रों की संगतें काम आ गयी और इधर मैंने भंवरलाल मीणा द्वारा लिए वाल्मीकि जी के अंतिम साक्षात्कार को पढ़ा ही था.बीते साल की ही तो बात है जब हमने एक आयोजन तो पूरा ही  दलित विमर्श पर किया ही था.कौनसा विचार कहाँ काम आ जाए कह नहीं सकते.कुल मिलाकर ऐसे मुद्दों पर हमारी समझ का विकसित होना खासकर तब ज्यादा ज़रूरी हो जाता है जब हम पढ़ाने के प्रोफेशन में हों.

इस गोधुली इतने सारे अनुभव सुना गया कि मैंने कब-कब दलितों की शादियों, मोसरों, नांगलों, मुंडनों में जाजम बिछाई और जीमने का मौक़ा पाया सब के सब.याद आया कि बचपन तो दलित परिवारों के मोहल्ले में ही बीता.वहीं हमारा घर था. था क्या आज भी वहीं है.टीचरशिप के डिप्लोमा की पढ़ाई के दौरान हमने कई बार जातिवादी आग्रहों का टूटना देखा था,जहां सुथार-बामण-तेली-सुनार सब एक ही थाली में रोटियाँ चपेकते थे.उस दौर के जड़बुद्धि मकान मालिकों के लिए वो सीन एक बड़े अचरज से कम नहीं होता था.वहाँ से आज तक मैं चला आया हूँ जहां अब मुझे जाति एकदम अनावश्यक लगती है.मेघवालों के घरों के बीच ही हमारा घर रहा.आमलिया बावजी का देवरा तो सालों तक हमारे खेल-मेल का केंद्र रहा ही.जहां गुर्जरों के माँगी लाल जी भोपाजी हुआ करते थे.याद आता है कि मैं शाम की आरती के वक़्त तो मेरे बचपन के दोस्त रूपलाल मेघवाल के घर जाता था जहाँ उनका अपना देवरा था.उसके पिताजी भोपाजी थे वे आरती उतारते, मैं नंगाड़ा बजाने की कोशिश करता और रूपलाल शंख बजाता था.शंख पर मैंने भी कई बार जोर आजमाया.झालर तो खैर बजा ही लेता था.कभी रामदेव जी बीज होती तो रात के बारह-एक बजे तक तन्दुरे पर निर्गुणी भजन सुनते.मेघवालों के भाटों-चारणों के आगमन पर तो मैं भी स्कूल से भागभुग कर वहीं नगाड़े पर उनके भजन-कीर्तन सुनते.क्या बेफिक्री और अपनापन था उस जातिविहीन माहौल में.

माणिक
(सन 2000 से अध्यापकी।
स्पिक मैके आन्दोलन में 
बारह वर्षों की सक्रीय स्वयंसेवा। 
साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी की स्थापना। 
कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। 
ऑल इंडिया रेडियो से अनौपचारिक जुड़ाव। 
अब तक मधुमतीकृति ओर , 
परिकथा, वंचित जनता, 
कौशिकी, संवदीया  और 
पत्रिका सहित विधान केसरी  
जैसे पत्र  में कविताएँ प्रकाशित। 
कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित। 
माणिकनामा के नाम से ब्लॉग 
और माणिक की डायरी  का लेखन। 
अब तक कोई किताब नहीं, कोई बड़ा सम्मान नहीं। 
सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। 
मो-09460711896,
 ई-मेल manik@apnimaati.com  )

मगर आज सोचता हूँ तो लगता है उन्हीं गांवों में कितना जातिवाड़ा आज भी मौजूद है.तब हमारे घर में नल और बिजली नहीं थी.पिताजी की कंजूसी की आदत के कारण आप देखिएगा किगाँव के भीलों के घरों में भी बिजली आ गयी उसके बाद हमारे घर में कनेक्शन हुआ. खैर यह बात विषयांतर की तरफ ले जाती है.माँ मेघवालों के नल से पानी भरती थी.पिताजी नारायण बा चमार के यहाँ से बकरी का दूध लाते थे.हम स्कूल के बाद के समय में कई बार नारायण बा के बारामदे में ही पड़े रहते थे खासकर जब वे रामायण का पाठ करते हम काना लगाकर सुनते थे.हमारे संगी-साथी बलाई थे, भाम्भी थे, रेबारी थे, गायरी थे, कुलमी थे, गुर्जर थे, चारण थे.एक दो तो भील भी थे हमारे मिलने वालों में.कमोबेश सब के सब पिछड़े वर्ग से सम्बद्ध.खुद के हालात भी वंचितों के समकक्ष ही मानिएगा.

दसवीं से बाहरवीं तक की यात्रा में तो मैं जिस मित्र-मंडली में रहा वहाँ पढाई-लिखाई के साथ जब जहां रोटी-सब्जी-दाल नसीब हो जाती खा लेते थे.सब जात का मेल-मिलाप था. पाटीदार से लेकर मेनारिया,तेली से लेकर आमेटा,तम्बोली से लेकर लखारा.सिंघवी से लेकर माली और कुम्हार तक.नाम के पहले शब्द से आगे सोचने का वक़्त ही नहीं मिला.आज के हालात भी एकदम दिलचस्प है.बीते सात साल से एक अध्यापक मित्र ने मुझे इस डर से अपने नांगल-मुंडन की कंकोत्री नहीं पहुंचाई कि कहीं मैं वहाँ चला गया तो लोग क्या सोचेंगे? बीते कुछ सालों से मुझे जहां तक याद पड़ता है मेरे घर में जटिया समाज के दोस्त के खेत से उपजे गेहूं, उड़द, मूंगफली आ रहे हैं.इन्हीं सालों में हमने बंजारा दोस्त के यहाँ ब्याव के लड्डू खाए, कई हरिजनों को अपनी रसोई तक बुलाया, चाय पिलाई, मित्रता सूची के पक्के वाले दोस्तों में कई सालवी हैं.खटीक हैं, मीणा है मगर मुझे उनसे मिलने और बात करने में याद रखकर भी जाति का ख़याल कभी नहीं आया. खुद ने अपनी जाति लगाना बंद कर दिया.बहुत ज्यादा ज़रूरी ही हो रहा हो तो ही जाति बताता रहा हूँ. सबकुछ याद आ रहा है दाल-बाटी और मक्की की रोटी के साथ उड़द की दाल के कई फटकारे तो हमने दलितों के यहीं लगाए हैं.रेगरों की शादी में खूब नाचे हैं.चमारों के यहाँ परोसकारी का आनंद आज भी नहीं भूले. सब में एक ही परमतत्व है फिर काहे का जातिगत विभेद.गज़ब दुनिया है जहां हम जी रहे हैं.सबकुछ कब सुधरेगा भाई.कबीर कहाँ हैं उनकी बहुत ज़रूरत है.कुछ वर्षों से सर्दियों में हर साल एक बार के दाल-ढोकले तो हम अपने मित्र के यहीं खाते हैं जो दलित समुदाय से आता है.अरे याद आ गया दो साल से हम जिन केरियों का अचार डाल रहे थे वह तो हमारे गोवेर्धन बंजारा के आम की थी. हंसराज, लालुराम, भगवती भैया कितने-कितने दोस्त हैं जिन्हें जानने और पसंद करने में जाति कभी आड़े नहीं आयी. इसी वर्ग के कई अधिकारी हैं जो अव्वल दर्जे के अपडेट और विवेकवान निर्देशक हैं.

यह वाकई सही बात है कि ज्ञान बढ़ने के साथ ही हम जाति,धर्म और समाज के समीकरणों को समझने लगते हैं मगर विवेक के सही दिशा में जाने से ही जात-पात का बंधन ढीलता है.दलित विमर्श में दिशाभ्रमित और तथाकथित ठेकेदारों पर तो खैर ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने भी कई जगह पर चुटकियाँ लेते हुए उनकी गतिविधियों को आड़े हाथों लिया ही है.मगर फिर भी मैंने अपने आसपास भी कई दिशाभ्रमित दलित समूह और साथी देखें हैं.यह सच है कि यह कु-व्यवस्था आज भी गांवों में बहुत अच्छे से कायम है जहां भेदभाव बहुत बड़े रूप में जारी है.इस बात का दर्द कई दिसतों के ज़रिये सुना और देखा भी है.यहाँ तो दर्द यहाँ तक भी है कि 'दलित' वर्ग में आने वाली समस्त जातियां ही अपने आपस में इतनी उलझे हुए समीकरणों के साथ सामने आती है कि दिमाग गच्चा खा जाता है.शहरों में वाकई हालात कुछ हद सुधरे हैं मगर अभी भी कई उदाहरणों में यह जातिवादी नज़रिया बहुत तीखे अनुभवों के साथ सामने आता है.पता नहीं हम अब भी किस संसार में हैं.जहां साक्षरता के आंकड़े बढ़ने के बाद भी लोगों में जातपात का भेदभाव कायम हैं.Print Friendly and PDF
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