काव्य-लहरी:हरिओम कुमार की कविताएँ - अपनी माटी

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बुधवार, नवंबर 16, 2016

काव्य-लहरी:हरिओम कुमार की कविताएँ

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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काव्य-लहरी:हरिओम कुमार की कविताएँ

विडंबना

कोयलों की कूक भूले अब हमें बरसों हुये ,
अब सहज़ बैठे हैं हम कौओं की काँव-काँव में |

किस से पूछूँ,जो बताये; क्या बचा जब बाढ़ आयी,
भाग आये सब शहर में कौन ठहरा गाँव में |

उसको डूबना ही था जो चीखता नदी में मरा,
उसकी खातिर कौन जाता डूबती उस नाँव में |

कौन कहता मिट गया है,है मोहब्बत अब भी मुमकिन,
प्यार का इज़हार करना डॉलरों की छाँव में |

मूंदकर आँखे, झुकाकर सिर यूँ ही बैठे रहो तुम,
क्या नया है, है लगी जो द्रौपदी फिर दाँव में ||



आज भी है

यूँ बदला वक़्त बहुत लेकिन, चाहत का जमाना आज भी है ,
इक नज़र में प्यार हुआ तुम से,किस्सा वो पुराना आज भी है |

दिल कल भी तुम्हारा कायल था,दिल तेरा दीवाना आज भी है,
तेरे नाम से दिल जो धड़कता था,धड़कन वो सुनाना आज भी है |

कल भी इज़हार न कर पाये, दिल का शरमाना आज भी है,
तेरा नाम हथेली पे लिखकर, लिख-लिख के मिटाना आज भी है |

तुझे सोच के खुश हो लेते हैं, लब का मुस्काना आज भी है,
तेरी चाह में जो लिखी पंक्ति, मेरे लब पे वो गाना आज भी है |

कल भी तुझे रब से माँगा था, मुझे रब को मनाना आज भी है,
इक ख्वाहिश है तू मिल जाये, तुझे अपना बनाना आज भी है ||



नया आग़ाज़
गिले-शिकवे जो हैं इक-दूजे से सारे भुलाते हैं,
मेरी ऐ जिंदगी चल साथ में हम मुस्कुराते हैं|
यूँ कब तक रंजिशों की दौड़ में हम दोनों ही रोयें,
भुला सारे सितम चल साथ में महफ़िल सजाते हैं|
कभी समझा न पायी तू, कभी मैं ना समझ पाया,
ग़लतफ़हमी का ये आलम खुले दिल से मिटाते हैं|
गलत हूँ मैं गलत है तू, हुआ ये अब बहुत रोना,
गलत जो भी है, उसको आ सही अब हम बनाते हैं|
कभी अवसर कभी किस्मत का रोना रो लिया हमने,
जरुरत जिसकी है, अब बस कदम उस पर बढ़ाते हैं|
समझ मुझको तू मैं समझूँ तुझे ,आ हम गले मिल ले,
नये उत्साह से हम मिल नई राहें बनाते हैं |
आ मेरी जिंदगी बस कुछ कदम तू साथ चल मेरे,
नया सूरज सफलता के सिखर पे हम उगाते हैं  ||

रो के बरसात कर भी ले तो क्या
हम तुझे याद कर भी ले तो क्या, तुझसे फ़रियाद कर भी ले तो क्या,
दिल तेरा हो चूका है अब पत्थर , रो के बरसात कर भी ले तो क्या,
ख्वाब में भी महल नहीं उसके, फिर हकीकत की बात क्या करनी,
उसके हिस्से में सूखि रोटी है, काम दिन-रात कर भी ले तो क्या,
ले ली मासूम जानें कितनो की, अब तू क्या झूठ रोना रोता है,
पाप तेरे न धोये धुलने के, लाख ख़ैरात कर भी ले तो क्या,
उसके सीने में सिर्फ नफरत है, और धोखा ही उसकी फितरत है,
वो जुबां जंग की समझता है, प्यार की बात कर भी ले तो क्या,
हुक्मरां सारे एक जैसे हैं, जनता के दर्द-ओ-गम से इनको क्या,
पास इनके जवाब है ही नहीं, चंद सवालात कर भी ले तो क्या  !!! 

  • हरिओम कुमार,संपर्क:9718648757,11omkumar@gmail.com

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