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रिपोर्ताज: बस्तर जिले का ग्राउंड रिपोर्ट/अश्वनी कबीर (आशु)


                            
                         
                          बस्तर जिले का ग्राउंड रिपोर्ट


जब हम लोकतंत्र की बात करते हैं, तो प्रथम दृष्टया उसकी एक छवि हमारे जहन में बनती है, कि वहां पर सरकार अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए कार्य करती है,  वो सभी तबकों के लोगों को साथ लेकर चलती है, वो न केवल व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाती है बल्कि समाज मे एक सकारात्मक ऊर्जा से, विश्वास से भरा हुआ माहौल भी तैयार करती है। जहाँ व्यक्ति अपने आप को उस व्यवस्था से जुड़ा हुआ महसूस करता है,  अपने जीवन को उत्साह और उमंग से जीता है,  जीवन की संभावनाओं और क्षमताओं को लगातार बढ़ाने का प्रयास करता है। तो क्या ये व्यवस्था बस्तर क्षेत्र के लिए भी यही मायने रखती है? या बस्तर के लिए ये अर्थहीन व्यवस्था बन गई है? आखिर बस्तर के लिए लोकतंत्र है क्या? क्योंकि सरकार,  मीडिया और कुछ एन. जी. ओ. के दावों से तो लगता है कि बस्तर क्षेत्र में विकास की ऐसी बयार आई है, जिसमे व्यक्ति को जमीन पर ही मोक्ष मिल गया है। जरा सा अपने जीवन का समय निकालकर आदिवासियों के जीवन के असल नाटकों को समझने का प्रयास कीजिये,  जरा ठहरकर उस जंगल से बात करने की कोशिश कीजिये,  हकीकत आपके सामने होगी। 


1) किसी भी समाज की, व्यवस्था की बुनियाद होती है, वहां की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था, जो बच्चों के सपनों को उड़ान देती है, उम्मीद की किरण देती है,  उन्हें वो  हौसला और साहस देती है कि वो इस दुनिया को खूबसूरत बनाएंगे और इसमें अपने हाथों से मानवीयता का, संवेदनशीलता का रंग भरेंगे। यहीं उसकी कल्पनाएं हिचकोले खाती हैं, जिसमे उसके स्वपन और आदर्श जीवित रहते हैं, यही उसके जीवन की शुरुआती पाठशाला उसके भविष्य का और समाज के भविष्य का भी निर्धारण करती है। सरकार भी कहती है सबको शिक्षा,  समान शिक्षा और सार्थक शिक्षा सभी का हक हैलेकिन बस्तर को तनिक देख लीजिए वहां मूलतः चार आदिवासी समुदाय रहते हैं - गोंड़,  हल्बी, मुरिया और माड़िया। ये समुदाय सदियों से जंगल मे रहते आएं हैं।इनकी भाषा- गोंडी और हल्बी,  द्रविड़ परिवार की भाषा से पुरानी है हालांकि इनका कोई व्याकरण नही है तो इसलिए हम इन्हें बोली कहते हैं। विरोधाभास देखिए जितने शिक्षक बस्तर में नियुक्त किये गए हैं उनमें से 99 प्रतिशत शिक्षक गोंडी और हल्बी भाषा मे बात तक नही कर सकते तो वो बच्चों को क्या पढ़ा पाएंगे ये प्रश्न हम सब के सोचने के लिए काफी है। 

यही नही उन आदिवासी बच्चों को हिंदी नही आती क्योंकि वो तो सदियों से जंगल मे रहे हैं।जब संवाद ही नही हो रहा तो शिक्षा किसको मिल रही है, क्या मिल रही है ये प्रश्न आपके सोचने के लिए है। जिन बच्चों से अधिकतर बात करवाई जाती है,  वो शहर के बच्चे होते हैं और वो मुश्किल से 1 प्रतिशत से भी कम हैं। 

इसी शिक्षा व्यवस्था में एक और विडंबना देखिए और आप खुद ये तय करें कि क्या ये सभ्य समाज की नीति हो सकती है? हर बच्चे का हर दिन का राशन का 4.58 रु मिलता है और 20 पैसा गैस का आता है,  वहां शिक्षक बोलता है कि आपने तो धुआँ मुक्त स्कूल कहकर इनाम ले लिया। लेकिन स्कूल में क्या हुआ इससे आपको कोई मतलब नही। एक दो प्रतिशत स्कूलों को छोड़कर किसी भी प्राथमिक स्कूल में 10-15 से ज्यादा बच्चे नामांकित नही हैं, और उनमें से उपस्थिति मुश्किल से 4-5 होती है,  अधिकतर समय 1-2 बच्चे ही होते है, अब उनको 40पैसे की गैस और 9 रुपए में खाना बनाकर खिलाना है,  क्योंकि एक एप भी बनाया है,  रोजाना डेटा भेजना है, ये मिड डे मील स्कीम है। ये धुआँ मुक्त स्कूल हैं या जीवन मुक्त स्कूल आप लोग तय करें और इसका जवाब तलाशें। 


एक मिडिल स्कूल की शिक्षिका जो दंतेवाड़ा शहर से मात्र 6 किलो मीटर दूर स्कूल में पढ़ाती हैं, उन्होंने अपना दुख साझा किया, उन्होंने बताया की हमारे यहां 40-50 बच्चे नामांकित हैं अब वो छोटे बच्चे हैं उनको जैसे तैसे करके हम उनमे से करीब 20 बच्चों को स्कूल लेकर आते हैं,  उनको ज्यादा नही पता है, हर एक दो दिन में कक्षा में कोई न कोई बच्चा पोटी कर देता है,  यूरिन कर देता है  और उनको टॉयलेट का प्रयोग करना भी ठीक से नही आता वो भी गंदा कर देते हैं,  प्रश्न ये है हम क्या करें? क्योंकि कोई स्वीपर नही है,  हम तो साफ करेंगे नही और उसके माता पिता जंगल मे रहते हैं,  उनको कहाँ खोजें? साफ तो हम उसी बच्चे से करवाते हैं, अब जरा इस बात की कल्पना करिये एक पहली,  दूसरी,  तीसरी कक्षा का बच्चा किस मनोदशा से गुजर रहा होगा? ये तो एक प्रकार का उसको प्रताड़ित किया जाना हो गया। अगर हम तथाकथित सभ्य समाज के लोगों को ये पता लगे कि हमारे बच्चे ने पोटी कर दिया था और उसी से साफ करवाया गया तो शायद हम कोर्ट में केस कर देंगे बच्चों के अधिकारों के उलंघ्घन का, लेकिन बस्तर के उन बच्चों का क्या? और जब ये पता किया गया तो एक नया आंकड़ा सामने आया कि अधिकतर स्कूलों में यही हालात हैं। जब विभिन्न कोचिंग्स को कॉम्पिटिशन की तैयारी करवाने के लिए करोड़ों रुपए के टेंडर दे सकते हैं और वो भी उन्ही आदिवासियों के जंगल से खनन कर रहे कॉर्पोरेट सामाजिक उतरदायित्व के तहत मिले पैसे से तो क्या मिड डे मील योजना को लागू नही कर सकते?एक स्वीपर नही हो सकता

2)  बिजली,  पानी और स्वास्थ्य, साफ और स्वच्छ पानी तो हर व्यक्ति के जीवन का आधार होता है, उसे तो हमारा मूलभूत अधिकार भी बनाया है। अब जरा बस्तर से इसकी तुलना कर लें,कैसे वहां जीवन दम तोड़ रहा है, आदिवासियों के लिए उनका जीवन ही अभिशाप बन गया है, वो किन परिस्थितियों में अपना जीवन जी रहें है, जरा कल्पना करेंगे तो जीवन की हकीकत को समझ पाएंगे। जिस समाज मे लोगों को पीने के पानी के लिए 9-10 किलोमीटर सर्दी में और 15 -17 किलोमीटर गर्मी में पैदल चलना पड़े और वो भी नदी के सबसे प्रदूषित पानी के लिए तो उस समाज को कोई हक नही कि वो अपने आप को सभ्य कहें। जहां एक तबके के लोग ऐसा पानी पीने को मजबूर हों जिसको पीने से उनका दिमाग बंद हो जाये, शरीर काम करना बंद कर दे और धीरे धीरे वो मृत्यु की और बढ़ते जाए। रोड का तो आपने कह दिया कि नक्सली उड़ा देते हैं, क्या वो पानी को भी उड़ा देते हैं? और मिट्टी का रोड है, जहां से आपकी गाड़ियां निकलती है, फिर उनको पानी क्यों नही मिल रहा आखिर वो किस बात का दुख झेल रहे हैं,  वो कई स्तर पर शोषण का शिकार है,  एक तो आदिवासी के नाम पर,  एक पिछड़े होने के नाम पर, एक मुख्य धारा से कटे होने के नाम पर, एक सादगी और सरल जीवन होने के नाम परजब तोयलंका के एक आदिवसी से बात की,  कि आप ये पानी पीते हैं इससे तो आपको बीमारियों ने घेर लिया है तो उसकी बात का हिंदी अनुवाद ये था कि उसके पुरखे सदियों से यही पानी पीते आए हैं,  अचानक से क्या हो गया पता नही शायद ये प्रकृति हमसे नाराज हो गई,  जिन लोगों को ये तक नही पता कि ये पानी इतना प्रदूषित बैलाडीला में लौह अयस्क के धुलने से हुआ है,  इतने सीधे लोगों के जीवन से ऐसा खिलवाड़ क्यों? एक मंत्री के दौरे पर करोड़ों रुपए खर्च हो सकतें हैं,  एक चाय पार्टी पे लाखों रुपए खर्च हो सकतें हैं,  कार्यक्रमों के विज्ञापन के नाम पर करोड़ो खर्च हो सकते हैं लेकिन उनको पीने का पानी नही दे सकते हैं।


स्वास्थ्य की हालत और बदतर स्थिति में है,  बोले कि दंतेवाड़ा में स्पेशल पैकेज देकर डॉक्टर्स को बुलाया गया है, जरा ये पता कीजिये कौन कौन डॉक्टर गए हैंउनकी क्या एक्सपर्टीज हैउनकी तन्खवाह क्या है?जिस हॉस्पिटल में हीमोग्लोबिन जांच से लेकर सी .बी .सी. जांच की सुविधा न हो, अधिकतर समय वो बंद या ओवर लोड ही बताये,  एम .आर .आई. और सिटी स्कैन की तो बात ही छोड़ दीजिये वहां एक्सपर्ट्स को बिठा रहे हैं, क्या मजाक चल रहा हैतोयलंका में एक बच्चा हर दिन अपनी मौत के इंतज़ार में सोया हुआ है, क्योंकि वो कुपोषित है और उसके जीवन की विडंबना देखिए उसके पास एक कागज था उसको भी दीमक खा गई क्योंकि सब कुछ मिट्टी का है,  कहीं कागज रखने की भी जगह नही है। वो अपनी नियति को कहां तक कोसेगा। उसके लिए इस दिखावे का क्या अर्थ है? वो कुपोषण का शिकार है और कुपोषण ऐसा की 2 -2 दिन घर मे कुछ नही बना,  अभी भी सुबह धान का पानी मिलता है और शाम में धान खाने को मिल जाता है। यही उसका जीवन है,  मौत ने उसको चारपाई से चिपका रखा है एक बार कोई भला आदमी रायपुर ले गया था बड़े हॉस्पिटल में लेकिन कुछ दिनों बाद उसने भी कहा आगे आप संभालें, घर पर मा बाबू जी झाड़ू बनाते है जो पैसा आता है घर चलाने में लग जाता है। 

कहने को नजदीक एक उप स्वास्थ्य केंद्र है, गदापाल जो लगभग 8 किलो मीटर होगा जंगल से पैदल आना होगा क्योंकि एम्बुलेंस तो बड़े लोगों के लिए है उनके लिए कहाँ,   जब गदापाल जाकर देखा तो स्थिति ज्यादा खतरनाक थी बेचारे आदिवासी भी सोच रहे होंगे घर मे मर जाएं तो सही हो क्योंकि अन्दर अस्पताल में तो उस कर्मचारी ने अपने रहने का अस्थाई आवास बनाया था, बेचारे उन अदिवासियों को तो बाहर इतनी सर्दी में जमीन पर लेटना है।पूछने पे पता चला कि इसको धूप खिला रहे हैं। ये वहां स्वास्थ्य की स्थिति है, जहां अधिकतर लोग घर के बजाय अस्पताल में दम तोड़े तो उनको भी लगेगा की शायद घर मे रहेंगे तो बच जाएंगे। उनके नाम की दवाइयां कर्मचारियों के घर,  परिवार,  मित्र,  रिश्तेदारों के घर मिल जाएंगी और इंजेक्शन बाहर मेडिकल स्टोर पर।

अगर उस बड़े- बड़े पैकेज की जगह आदिवासियों को केवल साफ पानी और प्राथमिक चिकित्सा ही उपलब्ध करवा दें  तो 90 प्रतिशत से ज्यादा मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।

3) सामाजिक सुरक्षा सेवाएं-- सामाजिक न्याय के प्रश्न को बस्तर के अलावा समझने की और कोई पाठशाला हो ही नही सकती,आदिवासी अपने जीवन को शायद अपने ऊपर बोझ समझने लग गए हैं और ये एहसास हम हर दिन उनको करवा रहे हैं,  जिस समाज में 4 साल के बच्चे को पानी मे 8-10 दाने धान के मिलाकर पिलाना पड़े,  जहां महिला के तन पर केवल एक कपड़ा हो,  जहां हर साल बहुत से लोग सर्दी में उस पुलाव से जलकर मर जातें हो जो सर्दी से बचने के लिए जलाया था।


जरा एक एक दावों की पड़ताल करते है,  सबसे पहले बात करते हैं मनरेगा की अर्थात रोजगार गारंटी कानून की,  लेकिन क्या ये बस्तर के लिए भी है या वहां के लिए महज एक मजाक है? ये बात तब असल साबित हुई जब दंतेवाड़ा के कुम्हाररास में मुरिया समुदाय के  एक मजदूर " जोगा" से बात हुई वह शहर के नजदीक होने के कारण ठीक ठाक हिन्दी बोल और समझ लेता है। जोगा ने बताया कि हम लोग पेट के लिए काम करते हैं जब मजदूरी ही नही मिलेगी तो भला कोई काम करेगा क्या? मुझे काम किये हुए एक साल होने को आ रहा है,  मुझे अभी तक पैसा नही मिला है, सरपंच और सचिव बोलते हैं कि ऊपर से नही आया है। मैं जब मर जाऊंगा तब उस पैसे का क्या करूँगा,  मेरे पास जमीन का पट्टा भी नही है,  दुसरे के यहां मजदूरी ही कर सकता हूँ,  अबकी बार इमली भी अच्छी नही लगी,  वो एक महीने तक चलती है रोज 10-15 रुपये मिल जाते थे,  वो भी नही हो रहा। तेंदूपत्ता इधर नही होता वो तो नारायणपुर और कोंडा में होता है। जंगल से लकड़ी ले आते हैं,  खाने के लिए धान इधर उधर से मांग के लाते हैं पूछने पे बताया कि महज 50-60 रुपये में एक सप्ताह घर का खर्च चलाते है, 9 लोगों के परिवार में। जो व्यक्ति हर दिन जीता है,  हर दिन मरता है, वो व्यक्ति एक साल से मनरेगा के अपने पैसे के लिए मोहताज है। यही स्थिति बाकी सभी मजदूरों की है उनको कोई पैसा नही मिला है,  एक साल होने को है। इनके पास जमीन का पट्टा नही है। कोदू- कुटकी पैदा कर लेते थे, वहां भी सरकार ने फूल की खेती शुरु कर दी बाहर से ठेकेदार आते हैं।


धानचनाचीनी और मिट्टी का तेल-दावे कितने लुभावने लगते हैं कि बस्तर बदल रहा है,  विकास की लहर चल रही है, बस्तर बदल जरूर रहा है उनकी अस्मिता ही समाप्त हो रही है। जब समझ जाएंगे तो यथार्थ में लौट आएंगे,  जब किसी पारा (गावँ के हिस्से) में जाएंगे तो पता चलेगा कि उनको 4 महीने से मिट्टी का तेल नही मिला है। चने मिले 3 महीना हो गया बस धान मिलता है वो पता नही कितना है हम पढ़े लिखे तो हैं नहीं उससे घर का 7 दिन भी काम नही चलता। जब उस कोटा देने वाले से पूछा गया तो उसने कहा कि ये लोग लेने नही आते तो मुझे घाटा पड़ जाता है इसलिए मैं लेकर नही आता, जबकि हकीकत जानेंगे तो कुछ सोच पाएंगे। वहां बायोमेट्रिक प्रणाली है तो हमें लगेगा कि कोई गड़बड़ी नही होती होगी,  होता ये है कि उनका तो अंगूठा लग गया अब उनको केवल धान दे दिया बाकी सब अपने पास रख लिया कह दिया कि आगे से नही आया,  अगर किसी को पता भी है तो उसके पास न्यूनतम पैसे भी नहीं कि उसको खरीद पाए। 


3 महीने से मिट्टी का तेल नहीं मिला बोले कि गैस मिलेगा। जरा सोचिए जिसके पास इतने रुपए नही की वो चने ले पाए,  वो 800 का सिलिंडर कैसे भरवा लेगा? क्या मजाक है उनके जीवन के साथ,  वो लोग जंगल से सूखी लकड़ी लाकर जलाते हैं उस जंगल को आग से बचाते हैं,  उस सांमजस्य को भी हम खत्म कर रहे हैं और इधर इनके साथ मजाक कर रहे हैं।


ये तो था उनका हाल जिनका राशन कार्ड है जब आप जंगल मे थोड़ा सा अन्दर जाएंगे तो जीवन की हकीकत का सामना नही कर पाएंगे। गदापाल के कुछ पारा में जाकर देखा तो ये एहसास हुआ कि जिंदगी कितनी यातना देती है? एक महिला से बात हुई,  "कीड़ो ",उसके उसके पति को मरे 3 साल हो गए उसके 2 छोटे बच्चे हैं एक 3 साल का एक 4-5 साल का,  उसका घर जिसके ऊपर फूस की छत,  मिट्टी की दीवार,  तन पर एक कपड़ा जो शरीर को भी ठीक से नही ढक पा रहा था,  न कोई विधवा पेंशन,  न कोई राशन कार्ड ताकि धान तो मिल सके,  न इंदिरा आवास योजना का मकान,  जब पानी गिरता है तो दोनों बच्चों के साथ पेड़ के नीचे बैठ जाती है,  सर्दी से लड़ने के लिए वस्त्र नही हैं तो पुलाव जलाकर उसके नजदीक सो जाती है,  जमीन का पट्टा नही है तो थोड़ा बहुत धान भी नही उपजा सकती,  एक समय धान खाकर गुजारा करना पड़ता है,  2 रुपए की कमाई का भी साधन नही है। मनरेगा भी नही चलता करे तो क्या करे,  3 साल से सबके पास घूम ली कोई मदद नही मिली,  बच्चों को 8-10 दाने धान के पानी मे मिलाकर पिला देती हूं,  पाडा के अन्य लोगो से मांगकर खाती हूँ,  बाकी पाडा का भी यही हाल है। फिर एक और गोंड़ व्यक्ति के घर गए, चेहरा मुरझाया हुआ,  आंखे बाहर निकली हुई उनका नाम आयतु था वो करीब 90 वर्ष के होंगे उनकी पत्नी की भी 80-85 वर्ष उम्र रही होगी,  उनके साथ उनकी लड़की रहती है, उसका पति भी मर चुका है। न उनकी वृद्धावस्था पेंशन है,  न उसकी बेटी की विधवा पेंशन,  न उनका राशन कार्ड है,  न उनका घर, बस एक घास फूस मिट्टी की झोपड़ी, बारिश आने पर पेड़ के नीचे बैठते है। न मनरेगा है ना पट्टाइसलिए धान भी नही है। इमली हुई नही,  तेंदूपत्ता इधर होता नहीजीविका का आधार है महुवा की शराब,  जो 3 बोतल एक सप्ताह में 90 रुपए में बिकती है, उसमें 10 रु तो बाजार वाले ने ले लिया बचा 80 रुपए। इसीमें 3 लोगों का खर्च चलाती हैं।  

फिर लगा कि नही एक दो होंगे बस फिर जब पाडा के अन्य घरों में गए तो कदम साथ नही दे रहे थे कि ऐसी भी जिंदगी हो सकती है एक व्यक्ति मिला बुधो उसकी स्थिति भी यही न राशन कार्ड,  न जमीन का पट्टा,  न घर,  न मनरेगा,  न किसी का साथ न कोई आवाज सुनने वाला,  मुझे वो ऐसे देख रहा था जैसे मैं उसके जीवन के सब दुख दूर कर दूंगा,  उसकी पत्नी मेरे पास बैठकर रो रही थी उनके शरीर पे केवल एक चिथड़ा था जो शायद वर्षों से नही धुला था,  बच्चे उस चॉकलेट को ऐसे देख रहे थे जैसे जीवन मे पहली बार देखा था। उनके शरीर पे कपड़ा नही था वो उस शरीर मे ही अगर जगह होती तो उसको छुपा लेते उनको शायद उसके खत्म होने का डर था।  

मेरी जुबान लड़खड़ाने लगी, दिमाग ने काम करना बंद कर दिया,  आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था। मैं उस परिवार की हताशा को देख रहा था। मैं ये सोच रहा था कि इनके जीवन की त्रासदी देखिए जहां शराब की दुकान पे 20 ऑप्शन है और राशन की दुकान पर 3 धान, चीनी और चना। मिट्टी का तेल तो बंद कर दिया, उनको धुआँ मुक्त जो करना है,  शायद सरकार ये कहना चाहती है कि हम तुम्हे जीवन मुक्त कर रहे हैं।फिर पता किया कि किसके किसके घर पक्के बने है? तो बची हुई कमी भी पूरी हो गई,  जिनके घर पक्के बने थे उसमे कहीं कच्ची ईट तो कही बाहर पलस्तर नहीं,  कहीं बीम नही तो और कोई पैमाना नही मकान ऐसा की 4-5 साल में गिर जाए। 

बस्तर क्षेत्र तो एक मंच बन गया है जहां सब लोग आकर अपनी प्रस्तुति देकर वाही वाही लूटकर चले जाते है और कीमत होती है, आदिवासी जीवन। एक धुआँ मुक्त स्कूल बनाता है,  एक धुआँ मुक्त घर, एक जैविक खेती शुरु करता है,  एक व्यावसायिक खेती,  एक अंत मे आकर कैशलेस विलेज बना देता है। सब अपना अपना इनाम जीत लेते हैं उस आदिवासी के जीवन के मूल्य पर। 

4) रोज़मर्रा का जीवन- उनके साप्ताहिक बाजार में जाएंगे तो कुछ अलग जीवन देख पाएंगे, आदिवासियों को हर दिन,  हर रूप में शोषण का शिकार होना पड़ रहा है,  वह हर दिन मर रहा है। उठ रहा है,  गिर रहा है,  संघर्ष कर रहा है, वो बेजुबान है,  न कोई उसकी बात सुनता है, न कोई सुनना चाहता है, उसकी गरीबी, हताशा,  असहायता को देखिए। यहां जितने शोषण के रूप हो सकते हैं वो सभी मौजूद है,  जो साप्ताहिक बाजार उनके लिए उत्सव का दिन अपने सगे संबंधियों से मिलने का स्थान होता है वहां उनके अस्तित्व को ही छिन्न-भिन्न  किया जा रहा है। कटेकल्याण के साप्ताहिक बाजार में एक गोंड़ महिला" बुमडी" से बात हुई,  बीच मे एक अनुवाद करने वाले थे तो कई बातों का पता चला वो शकरकंद बेचने आई थी,  वो लोग हमारे बाजार की तरहं सामान तोलकर नही बेचते एक साथ सब दे देते हैं, उनके सारे सामान की कीमत हुई महज 20 रु, तो मैंने उनसे पूछा कि इससे क्या खरीदना है तो उसने बताया कि 10 रु मार्केट में बैठने का देना होगा,  मुझे सुनकर कुछ अटपटा सा लगा कि उनके जंगल के उत्पाद की कीमत पूरी 20 रुपये और उसमे भी जमीन पे बैठने की 10 रु की पर्ची,  ये है उनके जीवन की त्रासदी,  जंगल उनके थे,  जल भी उनका था और जमीन भी उन्ही की थी, पहले जंगल से अधिकार समाप्त हुआ फिर जल को छीना अब जमीन पर बैठने का भी 10 रु,  ये पैसा वहां लठैत इकट्ठा करते हैं। 

उस बचे हुए 10 रुपए को ऐसे निहार रही थी जैसे उसको इससे उसके परिवार का जीवन खरीदना है,  जब मैंने इनकी जमीन का पूछा,  तो बताया कि जैविक खेती होगी। पहले 14 -15किलो धान होता था अभी 7 किलो ही हुआ। अभी कुछ बाहर से लोग आए हैं कह रहे हैं कि यहां फूल की खेती करेंगे आपको काम भी मिलेगा लेकिन जमीन पर आप कुछ नही लगा पायेंगे।इमली का पेड़ नही हैं तो उससे कुछ नही मिलता,  घर मे 4 बच्चे हैं,  राशन कार्ड बना नही है, तो कुछ मिलता नही। 

उनके साप्ताहिक बाजार के केंद्र में दूसरे राज्य से आये लोगों का कब्ज़ा है। जगदलपुर एशिया की इमली की सबसे बड़ी मंडी और वहां कीमत भी 35-40 रु जबकि आदिवासी के सारी इमली की कीमत महज 10 रू है। राज्य को आर्गेनिक स्टेट घोषित कर दिया,  जिसका खामियाजा इन बेजुबानों को भुगतना पड़ रहा है।  बाहर से लोग आए हैं, वो फूल की खेती कर रहें हैं,  कोदू कुटकी की फसल को हटा दिया,  पहले तो जमीन ले ली अब उत्पादन पर भी अधिकार कर लिया,  आजकल विदेशों से पढ़े लिखे लोग वहां पहुँच रहे हैं,  जो अब उनको खेती करना सिखाएंगे। 

नजदीक बैठे एक वृद्ध व्यक्ति बैगा से बात की,  वो केला लेकर आया था,  कह रहा था कि समय बदल गया है। काम तो दिन भर करते हैं लेकिन 5 -10 रुपए की भी आमदनी नही होती,  इससे अच्छा तो पहले थे हमारे जंगल भरे हुए थे,  बहुत फल मिलते थे, सब्जियाँ मिलती थी,  शिकार मिलता था अब सब खत्म हो गया। शायद वो कहना चाह रहा था कि कभी हमारे जीवन की कीमत पर भोपाल,  इंदौर चमकते थे आजकल रायपुर और बिलासपुर चमकते हैं। 

5)मानव तस्करी एवं सफ़ारी- जब व्यक्ति असहाय हो,  गरीब हो, हताश हो तो उसका हर कोई शोषण करना चाहता है। ठीक यही स्थिति बस्तर क्षेत्र की है,  यहां से रोजगार के नाम पर इन भोले भाले आदिवासियों को हैदराबाद काम करने के बहाने ले जाया जाता है,  उसके बाद उनको वहीं बन्धुआ मजदूर के रूप में रखा जाता है। एक कमरे में 15 लोग,  केवल 2 समय धान,  14 घंटे का काम और कोई मजदूरी नही,  बेचारे 6 महीने- साल  भी में लौटते हैं तो अपना किस्सा सुनाते हैं। भोजू को 8 महीने की मजदूरी महज 600 रुपए मिली। कितने लोगों को बेच दिया गया और ये सब वहां रसूखदार लोगों के मिलने से हो रहा है,  कितने बच्चे और महिलाएं गायब है कोई रिकॉर्ड नहीं है,  क्योंकि कोई राशन कार्ड नही कोई नाम नही। अगर कुछ हुआ भी तो कुछ पता ही नही चलेगा,  जहां पुलाव से 20-30 लोग जलकर मार जाएं वहां ऐसा होना सामान्य घटना है। कटेकल्याण की  नजदीक अभी 10-15 दिन पहले एक केस हुआ,  वहां का सरपंच,  सचिव और कुछ अन्य लोग मिलकर वहां के लोगों की पेंशन निकालकर खा रहे थे बेचारे आदिवासियों को पता ही नही क्या हो रहा है, जब मामला बढ़ गया तो सरपंच और सचिव के खिलाफ शिकायत दर्ज हुई मुख्य लोग बच गए। और शर्म की बात ये है कि इस खरीद- फरोख्त में प्रशाशन भी हिस्सेदार है। सबका हिस्सा बंधा है, अगर कोई कुछ कहता है तो उसको नक्सली कहकर हमेशा के लिए शांत कर दिया जाता है। वहां अधिकतर लोगों को ये ही नही पता कि उनके घर वाले को क्यों जेल में बंद किया हुआ है? 2 साल से सड़ रहें हैं अभी ट्रायल ही नही हुआ है,  न किसी के पास जमानत करवाने का पैसा है। एक बात तो होती है जो बाहर से लोग घूमने के लिए आते हैं, उनके लिए आदिवासी महज एक जंगल मे विचरण करने वाला इंसानी जीव है,  इससे अधिक कुछ भी नही। लोग जाते हैं, उनकी जीवन शैली को देखते हैं, झूठी संवेदना प्रकट करते हैं, और लौट आते हैं, आदिवासी बेचारे नही हैं, बेचारे तो हम हैं, जो उनकी इंसानियत को न देख पा रहें हैं और न ही महसूस कर पा रहे हैं। जब व्यक्ति की सादगी,  सहजता और सरलता उसके लिए अभिशाप बन जाये,  उसका त्याग,  प्रेम और सहयोग उसके शोषण का कारण बन जाये,  उसका भोलापन और साफगोई ही उसकी शत्रु बन जाए तो शर्मिन्दा  उस समाज को होना चाहिए जो ऐसे जिंदादिल इंसानों को भी नही समझ पा रहें है, दरअसल वो हमें जीवन के असल नाटक दिखा रहें हैं। 

अश्वनी कबीर (आशु)
निदेशक-सेन्टर फ़ॉर डायलोग
(स्पिपा गुजरात और 
पुलिस ट्रेनिग अकादमी,
रायपुर में विजिटिंग फैकल्टी हैं 
और 
वर्तमान में दंतेवाड़ा और 
सुकमा में काम कर रहे हैं।)
सम्पर्क
sharma.ashwani100@gmail.com
अब हमें ये सोचना चाहिए कि क्या उनके  पास वो सभी चीज़ें पहुंच रही है जिनका लोकतंत्र दावा करता है

क्या हमारा ये फ़र्ज़ नही बनता की उन बेज़ुबानों की हम आवाज बने?

क्या हम ये सोच पा रहें हैं कि वो किन परिस्थितियों में अपना जीवन जी रहें हैं 

किसी भी देश की संस्थाएँ हर व्यक्ति को कुछ वजहदेती है कि लोग उसका सम्मान करें, लेकिन क्या हम आदिवासियों को एक भी ऐसी वजह दे रहें हैं जिससे कि वो इनका सम्मान करें?आखिर इनके लिए लोकतंत्र के मायने ये होने चाहिए कि इनको जमीन पे हक दिलाया जाए या इनको अनाज देकर, फूल की खेती,  केले की फसल तथा जैविक खेती के नाम पर जमीन छीन लें? जहां हक के बजाय उपेक्षा हो,  न्याय के बजाय अन्याय होकानून के बजाय मनमानी हो तो ऐसी व्यवस्था को अगर लोकतंत्र के नाच की संज्ञा दी जाए तो क्या गलत होगा?

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)         वर्ष-4,अंक-26 (अक्टूबर 2017-मार्च,2018)          चित्रांकन: दिलीप डामोर 

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